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मंगलवार, 29 सितंबर 2009

अमर प्रेम ---------भाग १०

गतांक से आगे ...........................

अर्चना और अजय की ज़िन्दगी न जाने किस मुकाम पर आ गई थी । दोनों एक दूसरे को समझते भी थे ,एक दूसरे को जानते भी थे मगर मानना नही चाहते थे। दोनों ही अपनी- अपनी जिद पर अडे थे । समय का पहिया यूँ ही खिसकता रहा और दोनों के दिल यूँ ही सिसकते रहे।
प्रेम का अंकुर किसी जमीं पर पलमें ही फूट जाता है और किसी जमीं पर बरसों लग जाते हैं । प्रेम हो तो ऐसा जहाँ शरीर गौण हों सिर्फ़ आत्मा का मिलन हो । शुद्ध सात्विक प्रेम हो जहाँ कोई चाह ही न हो सिर्फ़ अपने प्यारे के इशारे पर मिटने को हर पल तैयार हो। लगता है प्रेम की उस पराकाष्ठा तक पहुँचने के लिए अभी वक्त को भी वक्त की जरूरत थी। वक्त भी साँस रोके उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था ------कब इन दोनों का प्रेम (जिसे एक मानता है मगर दूजा नही ) चरम स्थिति में पहुंचे और कब वो भी उस दिव्यता के दर्शन करे ।

वक्त इंतज़ार के साथ अपनी गति से चल रहा था। एक दिन अर्चना समीर और बच्चों के साथ घूमने गई । इत्तेफाक से उसी शहर में पहुँच गई जहाँ अजय रहता था। या नियति उसे वहां ले गई थी । एक दिन रेस्तरां में जब अर्चना अपने परिवार के साथ खाना खाने गई हुई थी वहीँ पर अजय भी अपने परिवार के साथ आया हुआ था। दोनों में से किसी को भी एक -दूसरे की मौजूदगी का पता न था। आज का दिन अर्चना की ज़िन्दगी का एक खास दिन था। उस दिन अर्चना की शादी की सालगिरह थी और उसके पति और बच्चे उस दिन को खास बनाना चाहते थे इसलिए समीर ने अर्चना से उसकी समीर के लिए लिखी एक खास कविता सुनाने को कहा -------जिस कविता पर अर्चना को अपने पाठकों से भी बेहद सराहना मिल चुकी थी। आज अर्चना मना भी नही कर सकती थी क्यूंकि समीर ने जिस अंदाज़ में उसे सुनाने को कहा था वो अर्चना के अंतस को छू गया। अर्चना कविता सुनाने लगी। कविता के बोल क्या थे मानो अमृत बरस रहा हो । आँखें मूंदें समीर कविता सुन रहा था और उसके भावों में डूब रहा था। जब अर्चना कविता सुना रही थी उसे मालूम न था कि ठीक उसके पीछे कोई शख्स बड़े ध्यान से उस कविता को सुन रहा है । जैसे ही कविता पूरी हुई समीर और बच्चों के साथ एक अजनबी की आवाज़ ने अर्चना को चौंका दिया। अर्चना ने सिर उठाकर ऊपर देखा तो एक अजनबी को तारीफ करते पाया। एक पल को देखकर अर्चना को ऐसा लगा कि जैसे इस चेहरे को कहीं देखा है मगर दूसरे ही पल वो सोच हकीकत बन गई जब उस शख्स ने कहा ----------"कहीं आप अर्चना तो नही"। अब चौंकने की बारी अर्चना की थी। इस अनजान शहर में ऐसा कौन है जो उसे नाम से जानता है। जब अर्चना ने हाँ में सिर हिलाया तो उस शख्स ने अपना परिचय दिया ---------मैं अजय हूँ ,चित्रकार अजय , जिसके चित्र आपकी हर कविता के साथ छपते हैं। ये सुनकर पल भर के लिए अर्चना स्तब्ध रह गई। एक दम जड़ हो गई------------आँखें फाड़े वो अजय को देख रही थी जैसे वो कोई अजूबा हो।वो तो ख्वाब में भी नही सोच सकती थी कि अजय से ऐसे मुलाक़ात हो जायेगी। अब समीर ने अर्चना को एक बार फिर मुबारकबाद दी कि आज का दिन तो खासमखास हो गया क्यूंकि आज तुम्हारे सामने तुम्हारा एक प्रशंसक और एक कलाकार दोनों एक ही रूप में खड़े हैं । एक ही पल में इतना कुछ अचानक घटित होना-----------------अर्चना को अपने होशोहवास को काबू करना मुश्किल होने लगा। जैसे तैसे ख़ुद को संयत करके अर्चना ने भी अपने परिवार से अजय का परिचय कराया और फिर अजय ने भी अपने परिवार से अर्चना के परिवार को मिलवाया। दोनों परिवार इकट्ठे भोजन का और उस खास शाम का आनंद लेने लगे। मगर इस बीच अर्चना और अजय दोनों का हाल 'जल में मीन प्यासी 'वाला हो रहा था।
आज दोनों आमने- सामने थे मगर लब खामोश थे . दोनों के दिल धड़क रहे थे मगर धडकनों की आवाज़ कानों पर हथोडों की तरह पड़ रही थी। सिर्फ़ कुछ क्षण के लिए नयन चोरी से दीदार कर लेते थे। सिर्फ़ नयन ही बोल रहे थे और नयन ही समझ रहे थे नैनो की भाषा को। बिना बतियाये बात भी हो गई और कोई जान भी न पाया। अपनी- अपनी मर्यादाओं में सिमटे दोनों अपने -अपने धरातल पर उतर आए।
ये शाम दोनों के जीवन की एक अनमोल यादगार शाम बन गई । अजय अपनी सारी नाराज़गी भूल चुका था . आज अजय पर वक्त मेहरबान हुआ था. अजय के लिए तो ये एक दिवास्वप्न था। वो अब तक विश्वास नही कर पा रहा था कि उसकी कल्पना साकार रूप में उसके सामने थी आज। उस दिन के लम्हे तो जैसे सांसों के साथ जुड़ गए थे हर आती-जाती साँस के साथ अजय का दिल धड़क जाता-----------वो सोचता --------वो स्वप्न था या हकीकत। अजीब हालत हो गई अजय की । कई दिन लगे अजय को पुनः अपने होश में आने के लिए। एक स्वप्न साकार हो गया था। बिना मांगे ही अजय को सब कुछ मिल गया था।अजय की खुशी का ठिकाना न था । इन्ही लम्हों की तो वो बरसों से प्रतीक्षा कर रहा था शायद उसकी चाहत ,उसका प्रेम सच्चा था तभी उसे उसके प्रेमास्पद का दीदार हो गया था।


क्रमशः ..........................................

रविवार, 27 सितंबर 2009

अमर प्रेम -----------भाग ९

गतांक से आगे ..........................

धीरे धीरे अजय के जीवन में परिवर्तन आता चला गया । उसने चित्रकारी करना छोड़ दिया । ज़िन्दगी जैसे बेरंग सी हो गई । बिना प्रेरणा के कैसी कला और कैसे रंग और कैसा जीवन। उसने अपने आप को अपने दायरों में समेट लिया । किसी मौसम का कोई असर अब उस पर नही होता । उधर अर्चना की कवितायेँ अब बिना अजय के चित्रों के छप रही थी इसलिए अर्चना परेशान होने लगी । उसने अजय को न जाने कितने ख़त लिखे मगर किसी का कोई जवाब नही मिला । अब तो अर्चना के लिए जैसे वक्त वहीँ थम गया । उसे समझ नही आ रहा था कि क्या करे । अब उसका भी दिल नई कवितायेँ गढ़ने का नही होता था। न जाने कौन सी कमी थी जो उसे झंझोड़ रही थी । उसका अंतः मन बेचैन रहने लगा। उसके कारण एक अनमोल जीवन बर्बादी के कगार पर पहुँच रहा था और वो कुछ कर नही पा रही थी ।ये ख्याल उसे खाए जा रहा था । उसे समझ नही आ रहा था कि ये उसे क्या हो रहा है -------क्यूँ वो अजय के बारे में इतना सोचने लगी है । अर्चना के जीवन का ये एक ऐसा मोड़ था जहाँ उसे हर ओर अँधेरा ही अँधेरा दिखाई दे रहा था । न वो अजय को समझ पा रही थी न ही अपने आप को । जब अजय पुकारता था तो वो मिलना नही चाहती थी और अब जब अजय ने पुकारना छोड़ दिया तो तब भी उसे अच्छा नही लग रहा था ।अब उसका दिल करता एक बार ही सही अजय उसे आवाज़ दे। उसे समझ नही आ रहा था कि उसे क्या हो रहा है । वो अजय के रूप में मिला दोस्त खोना भी नही चाहती थी साथ ही उसकी जिद पर वो भी कहना नही चाहती थी जो अजय कहलवाना चाहता था। वो एक उगते हुए सूरज को इतनी जल्दी डूबते हुए नही देखना चाहती थी इसके लिए स्वयं को दोषी समझती थी मगर समझ नही पा रही थी कि कैसे इस उलझन को सुलझाए । कैसे अजय के जीवन में फिर से बहार लाये। कैसे अजय को ज़िन्दगी से मिलवाए । अजीब कशमकश में फंस गई थी अर्चना । उसने ख़ुद को और अजय को नियति के हाथों सौंप दिया । शायद वक्त या नियति कुछ कर पाएं जो वो नही कर पा रही है । अब उसे अजय के लौटने का इंतज़ार था .........................

क्रमशः...........................................

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

अमर प्रेम -----------भाग ८

गतांक से आगे ..........................

वक्त पंख लगाकर उड़ रहा था । ऐसे सुखद अहसासों के साथ दोनों जी रहे थे । कई साल गुजर गए । फिर एक दिन अजय ने अर्चना से मिलने की इच्छा जाहिर की । अजय जब भी ख़त लिखता उसमें अपने आत्मिक प्रेम का भव्य वर्णन करता और चाहता अर्चना भी उसके प्रेम को स्वीकारे।उसका प्रेम तो सिर्फ़ आत्मिक था हर बार अर्चना को समझाता । कहीं कोई वासना नही थी उस प्रेम में । सिर्फ़ एक बार देखने की चाह ,एक बार मिलन की चाह...............सिर्फ़ एक छोटी सी चाह अपने जज्बातों को बयां करने की । मगर अर्चना -----वो तो सिर्फ़ अहसासों के साथ जीना चाहती थी क्यूंकि उसकी मान्यताएं , उसकी मर्यादाएं उसे कभी ऐसा सोचने पर मजबूर ही नही करती थी। उसे कभी वो कमी महसूस ही नही होती थी जो अजय को हो रही थी । अर्चना अपनी सम्पूर्णता में जी रही थी इसलिए कभी भी अजय के प्रेम को स्वीकार ही नही कर पाई क्यूंकि उसके लिए अजय का प्रेम न आत्मिक प्रेम था न ही कुछ और , वो सिर्फ़ एक सुखद अहसास था जिसे वो अपनी रूह से महसूस करती थी ।
अब इसी बात पर अजय अर्चना से नाराज़ हो गया। आए दिन दोनों की इसी बात पर बहस होने लगी और नाराज़गी बढ़ने लगी । अब अजय ने धीरे धीरे अर्चना को ख़त लिखना ,उसकी कविताओं की सराहना करना बंद कर दिया । शायद वो सोचता था कि उसके इस कदम से अर्चना आहत होगी तो उसके प्रेम को स्वीकार कर लेगी ।इक तरफा प्रेम का अद्भुत मंज़र था । मगर अर्चना के इरादे पर्वत के समान अटल थे । उसका विश्वास ,उसकी मर्यादाएं सब अटल। लेकिन अर्चना ने कभी भी अजय के चित्रों की प्रशंसा करना नही छोडा। वो उसके लिए आज भी वैसा ही था जैसा कल। अर्चना बेशक अजय की ऐसी आदतों से आहत होती थी और तब फिर एक नई कविता का जन्म होता था । अपने उदगारों को अर्चना कविता के माध्यम से व्यक्त करती रहती मगर अजय पर तो जैसे अपनी जिद मनवाने की धुन सवार रहती । इसलिए उसने भी अपने चित्रों की नायिका के रंग और रूप बदलने शुरू कर दिए । उसकी इस दीवानगी से अर्चना परेशान हो जाती । शायद इसीलिए वो उससे कभी मिलना नही चाहती थी।
जहाँ अपूर्णता होती है वहां मिलन की चाह होती है मगर जहाँ पूर्णता होती है वहां कोई चाह बचती ही नही। अर्चना शायद उसी प्रकार की नारी थी।

क्रमशः.........................................

बुधवार, 23 सितंबर 2009

अमर प्रेम ------------भाग ७

गतांक से आगे ....................................

एक बार अर्चना को पत्रिका वालों की तरफ़ से एक सूचना मिली कि पत्रिका में अपनी कविता छपवाने के लिए फोटो का होना जरूरी है -------------- अर्चना की कविताओं के दीवानों के आग्रह के कारण पत्रिका वालों को अर्चना से ये गुजारिश करनी पड़ी। अब इस आग्रह को अर्चना को स्वीकार तो करना ही था । और फिर जब अर्चना की फोटो उसकी नई कविता के साथ छपी तो जैसे तहलका सा मच गया । जितने पाठक थे उनकी इच्छा तो पूरी हो ही चुकी थी मगर जिसके ह्र्दयान्गन पर ,जिसकी कुंवारी कल्पनाओं पर जिस हुस्न की मलिका का राज था जब उसने अपनी कल्पना को साकार देखा तो जैसे होश खो बैठा। उसकी कल्पनाओं से भी सुंदर थी उसकी हकीकत । अपने ख्वाब को हकीकत में देखना --------आह ! एक चिराभिलाषा पूरी होना। अजय अब तो जैसे दीवाना हो गया और उसके चित्रों की नायिका का भी जीवन बदलने लगा , वहाँ अब प्रेम का सागर हिलोरें मारने लगा। अब अजय की अभिव्यक्ति और भी मुखर हो गई। उसकी नायिका और चित्रों के रंग और रूप दोनों ही बदलने लगे।
अजय की चित्रकारी देखकर अर्चना को भी एक नया अहसास होने लगा । उसे भी लगने लगा कि उसका भी एक आयाम है किसी के जीवन में । वो भी किसी की प्रेरणा बन सकती है ---------उसे कभी इसका विश्वास ही नही होता था। अर्चना के जीवन का ये एक नया मोड़ था । जहाँ उसके अस्तित्व को एक पहचान मिल रही थी जिसका उसे सपने में भी गुमान न था । उसके लिए ये एक सुखद अहसास था ..............अपने अस्तित्व की पहचान का ।


क्रमशः .................................

सोमवार, 21 सितंबर 2009

अमर प्रेम ----------भाग ६

गतांक से आगे ..............................

एक बार अजय को चित्रकारी के लिए राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुआ उसे प्राप्त करने के लिए उसे अर्चना के शहर जाना था। जाने से पहले अजय ने ये खुशखबरी अर्चना को ख़त लिखकर पहुंचाई और साथ ही अर्चना से मिलने की इजाजत मांगी और अपना फ़ोन नम्बर दिया । उससे पूछा कि क्या वो उससे मिल सकती है सिर्फ़ एक बार या एक बार फ़ोन पर ही मुबारकबाद दे सकती है । मगर अपने संस्कारों और मर्यादाओं से बंधी अर्चना ने उससे मिलने से मना कर दिया।

जिस दिन अजय को सम्मान प्राप्त हुआ हर ओर उसकी चित्रकारी की ही प्रशंसा थी। हर टी वी के चैनल पर उसी का नाम था। चारों तरफ़ से अजय को बधाइयाँ मिल रही थीं मगर जिस आवाज़ को वो सुनना चाहता था या जिस चेहरे को वो देखना चाहता था उस भीड़ में बस वो ही एक चेहरा ,वो ही एक आवाज़ न थी । इतनी बड़ी सफलता पाकर भी अजय को वो खुशी न मिल सकी जिसकी उसे दरकार थी। जिस कल्पना को उसने अपने रंगों में ढाला था ,जो उसकी प्रेरणा थी वो इतने पास होकर भी इतनी दूर थी। एक कसक के साथ अजय अपने शहर वापस आ गया ।

उधर अर्चना को अजय की शोहरत पर गर्व हुआ। उसने अपने परिवार में सबको अजय की उपलब्धि के बारे में बताया। उसने बताया कि अजय उसका कितना बड़ा प्रशंसक है और वो भी उसकी चित्रकारी कितनी पसंद करती है । उसकी हर कविता के साथ अजय के ही चित्र छपते हैं। वो दिन अर्चना के लिए भी काफी खुशगवार था। मगर साथ ही उसे इस बात का भी अहसास था कि उसने अजय का दिल दुखाया है और शायद अजय को भी पता था कि कैसे दिल पर पत्थर रखकर अर्चना ने न कहा होगा। अपने इन्ही अहसासों को और अजय के दिल पर क्या गुजरी होगी ,कितना तडपा होगा उसे अर्चना ने अपनी कविताओं में ढालना शुरू कर दिया। शायद ये भी उस तड़प के इजहार का एक रूप था ।


क्रमशः .................................

शनिवार, 19 सितंबर 2009

अमर प्रेम --------------भाग ५

गतांक से आगे .......................................

नदी के दो किनारों से दोनों चल रहे थे मगर एक कसक साथ लिए । जैसे नदी के किनारे चाह कर भी नही मिल पाते मगर फिर भी मिलने की कसक हर पल दिल में पलती रहती है कुछ ऐसा ही हाल दोनों का था। अजय की तड़प मिलने की चाह बार- बार अर्चना को बेचैन कर जाती । वो बार- बार समझाती ,हर बार कहती ये क्या कम है कि हम एक दूसरे की भावनाओं को समझते हैं ,जो तुम कह नही पाते या जो मैं सुन नही पाती वो भी हम दोनों के दिल समझते हैं,हमसे ज्यादा हमारे दिल एक दूसरे को जानने लगे हैं ,बिना कहे भी हर बात पहचानने लगे हैं,तो क्या वहां वाणी को मुखर करना जरूरी है ?हर चीज़ की एक मर्यादा होती है और जो मर्यादा में रहता है वहां दिखावे को जरूरत नही होती,अपनी अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करना कहाँ ठीक है-----------क्या जीने के लिए इतना काफी नही । जब शब्दों से ज्यादा मौन बोलने लगे तब वाणी को विराम देना ही उचित है । कुछ अनकही बातें मौन कह जाता है और मौन की भाषा कभी शब्दों की मांग नही करती। मगर अजय वो तो अपनी कल्पना के साथ जीना चाहता था ------------तन से नही मन से , शरीर से नही आत्मिक प्रेम के साथ और उसी प्रेम की स्वीकारोक्ति अर्चना से भी चाहता था इसीलिए अजय हर बार अर्चना से पूछता ------------क्या वो उसे प्रेम करती है ? मगर अर्चना हर बार मना कर देती । अजय का उन्माद अर्चना को हकीकत लगने लगा था इसीलिए वो अजय को हर बार सच्चाई के धरातल पर ले आती । अपने और उसके जीवन का सच समझाती मगर अजय तो जैसे इन सबसे दूर अपनी कल्पनाओं के साथ ही जीने लगा था , बेशक शारीरिक प्रेम नही था मगर वो कहते हैं ना प्रेम के पंछी ये कब सोचते हैं ---------वो तो बस उड़ना जानते हैं । कुछ ऐसा ही हाल अजय का था । मगर अर्चना -------उसका तो आत्मिक प्रेम हो या शारीरिक या मानसिक जो कुछ था वो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने समीर के लिए था । वो तो कभी ख्वाब में भी ऐसा ख्याल दिल में लाना ही नही चाहती थी । मगर अजय के रूप में मिला दोस्त खोना भी नही चाहती थी । अजय का अर्चना के जीवन में एक अलग ही स्थान था मगर वो प्रेम नही था अर्चना का। वो शायद उससे भी ऊंचा कोई स्थान था अर्चना के जीवन में जहाँ उसने अजय को बिठाया था मगर अजय के लिए स्वीकारोक्ति जरूरी थी और ये अर्चना के लिए एक कठिन राह.........................


तुमने दर्द माँगा माँगा
मैं दे ना सकी
तुमने दिल माँगा
मैं दे ना सकी
तुमने आंसू मांगे
मैं दे ना सकी
तुमने मुझे चाहा
मैं तुम्हें चाह ना सकी
दिल की बात कभी
होठों पर ला ना सकी
ना जाने किस मिटटी के बने हो तुम
जन्मों के इंतज़ार के लिए खड़े हो तुम
ये कैसी खामोशी है
ये कैसा नशा है
ये कैसा प्यार है
क्यूँ ज़हर ये पी रहे हो
क्यूँ मेरे इश्क में मर रहे हो
मैं इक ख्वाब हूँ, हकीकत नही
किसी की प्रेयसी हूँ , तेरी नही
फिर क्यूँ इस पागलपन में जी रहे हो
इतना दीवानावार प्यार कर रहे हो
अगले जनम में मिलन की आस में
क्यूँ मेरा इंतज़ार कर रहे हो


क्रमशः .....................................

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

अमर प्रेम ------------भाग ४

गतांक से आगे .................................

कभी कभी कुछ रिश्ते अनजाने में ही बन जाते हैं । पता नही ये रिश्ता था या प्रेम या सिर्फ़ अहसास ...............मगर अनजाने ही ज़िन्दगी का एक नया मोड़ बन गया।
अजय ने एक बार अपनी तस्वीर भेजी और अर्चना से भी आग्रह किया मगर अर्चना ऐसा कुछ नही चाहती थी जिससे उसकी खुशहाल गृहस्थी में कोई ग्रहण लगता,इसलिए उसने मना कर दिया । अजय जब भी ख़त लिखता हर बार एक तस्वीर भेजने का अनुरोध करता और अर्चना हर बार उसका आग्रह ठुकरा देती । अजय जानना चाहता था कि उसकी कल्पना दिखने में कैसी लगती है ........क्या बिल्कुल वैसी जैसा वो सोचता था या उससे भी अलग। मगर अर्चना अपनी किसी भी मर्यादा को लांघना नही चाहती थी।

अजय का भी एक हँसता खेलता खुशहाल परिवार था । उसकी पत्नी और दो बच्चे । पूर्ण रूप से संतुष्ट । मगर वो कहते हैं ना कहानीकार हो ,कवि हो,लेखक हो या चित्रकार ---------एक अलग ही दुनिया में विचरण करने वाले प्राणी होते हैं। दुनिया की सोच से परे एक अलग ही दुनिया बसाई होती है जहाँ ये ख़ुद होते हैं और इनकी कल्पनाएं । कल्पनाएं भी ऐसी जो हकीकत से परे होती हैं मगर फिर भी उसी में विचरण करना इनका स्वभाव बन जाता है । शायद ऐसा ही ह्रदय अजय का भी था। उसके चित्रों में सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम बरसा करता था। शायद प्रेम का कोई रूप ना था जो उसने बयां ना किया हो प्रेम की तड़प,प्रेम की पराकाष्ठा इतनी गहन होती कि देखने वाला कुछ पलों तक सिर्फ़ उसी में विचरण करता रहता था । ठगा सा वहीँ खड़ा रह जाता। ऐसा कोमल ह्रदय था अजय का और ऐसी थी उसकी कल्पनाएँ। अब उसे उसकी प्रेरणा भी मिल गई थी अर्चना के रूप में । अर्चना में वो अपनी कल्पना की नायिका को देखने लगा । एक अनदेखा रिश्ता कायम हो गया था अजय की तरफ़ से । अब अजय अपनी नायिका के ख्वाबों में विचरण करने लगा था। मिलने की उत्कंठा तीव्र होने लगी थी। मगर शहरों की दूरियां थी साथ ही समाज की बेडियाँ ।
दोनों ही एक दूसरे के प्रेरणास्पद बन गए । मगर अर्चना के लिए अजय सिर्फ़ एक अहसास था एक सुखद अहसास----------जो उसके जज्बातों को ,उसकी भावनाओं की गहराइयों को समझता था और वो अपने इन्ही अहसासों के साथ जीना चाहती थी । कुछ इस तरह ---------------

इक हसीन अहसास बना
आ तुझे पलकों में बसा लूँ
अहसास जो सिमट जाए अंखियों में
तुझे दिल के आसन पर बिठा लूँ
दिल जब खो जाए अहसासों में
तुझे रूह के दामन में झूला लूँ
रूह जब मिल जाए तेरी रूह से
फिर तेरे मेरे अहसासों को खुदा बना लूँ



क्रमशः ..........................................

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

अमर प्रेम -------------भाग ३

गतांक से आगे ...............................

वक्त ने एक बार फिर करवट बदली। अर्चना के पास असंख्य ख़त आने लगे । लोग उसकी कविताओं की सराहना करने लगे। उन्ही में एक दिन उसे एक ख़त मिला जिसमें लिखा था :---------------

अर्चना जी ,

आप कैसे इतना गहन लिख लेती हैं ? आपकी हर रचना में ज़िन्दगी की सच्चाइयाँ छुपी होती हैं । आपके लेखन को नमन है। अर्चना जी आपकी हर कविता के साथ मेरी बनाई कोई न कोई फोटो छपती है या यूँ कहो मेरी बनाई हर फोटो के जज़्बात ,उसकी गहनता को आप कैसे अपनी कविताओं में ढाल देती हैं।
जो मैं अपनी चित्रकला के माध्यम से कहना चाहता हूँ उसके भाव सिर्फ़ और सिर्फ़ आप ही कैसे समझ लेती हैं । कौन सा रिश्ता है आपकी कविताओं और मेरी चित्रकला के बीच।

सादर आभार
अजय


इस ख़त का जवाब अर्चना ने कुछ यूँ दिया :-----------------

अजय जी ,
सादर धन्यवाद ................आपको मेरी लिखी कवितायेँ पसंद आती हैं। आपकी बनाई कलाकृति हर कोमल ह्रदय इंसान को ख़ुद -ब-ख़ुद कोई न कोई कविता गढ़ने को विवश कर दे .............इतनी जीवन्तता होती है आपकी कलाकृति में।
फिर भी इतना कहना चाहूंगी शायद हम दोनों की राशि एक है------------हो सकता है इसलिए समझ सकती हूँ आपकी गहन भावनाएं जो हर कृति में छुपी होती हैं।

सादर आभार
अर्चना

उस वक्त अर्चना ने न जाने किन भावनाओं के वशीभूत होकर या यूँ कहो दिल्लगी करने के लिए इस प्रकार की बातें कह दीं । उस वक्त अर्चना ने सोचा भी न था कि हल्के से कही बात अजय के जीवन को एक नया मोड़ दे देगी। बस उसके बाद तो अर्चना और अजय के खतों का सिलसिला चल ही पड़ा । दोनों के बीच एक अनोखा दोस्ती का रिश्ता कायम हो गया। अजय जब तक अर्चना कि कविता पढ़ न लेता या अर्चना जब तक अजय की चित्रकला पर कविता न गढ़ लेती दोनों में से एक दूसरे को चैन ही न पड़ता। अजय के लिए तो अर्चना जैसे भोर का नया उजाला बन कर आई थी। धीरे धीरे रिश्ता आकार लेने लगा। सबसे अहम बात इस रिश्ते की कि अब तक दोनों कभी एक दूसरे से मिले भी न थे .....................एक दूजे को देखा भी न था। कितना सुखद अहसास था इस रिश्ते का।शायद कुछ इस तरह :---------------
न तुमने मुझे देखा
न कभी हम मिले
फिर भी न जाने कैसे
दिल मिल गए
सिर्फ़ जज़्बात हमने
गढे थे पन्नों पर
और वो ही हमारी
दिल की आवाज़ बन गए
बिना देखे भी
बिना इज़हार किए भी
शायद प्यार होता है
प्यार का शायद
ये भी इक मुकाम होता है
मोहब्बत ऐसे भी की जाती है
या शायद ये ही
मोहब्बत होती है
कभी मीरा सी
कभी राधा सी
मोहब्बत हर
तरह से होती है
क्रमशः .............................................

शनिवार, 12 सितंबर 2009

अमर प्रेम ------------भाग -2

गतांक से आगे ..........

हर नारी के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब वो सिर्फ़ अपने लिए जीना चाहती है या सिर्फ़ अपने लिए जीती है। अब अर्चना की ज़िन्दगी भी अपना रूप बदलने लगी थी । परिवार को समर्पित अर्चना के पास, अब वक्त ही वक्त था। अब उसके बच्चे बड़े हो गए थे । अपनी अपनी पढाई में व्यस्त रहने लगे । पति व्यापार में व्यस्त और अर्चना ..............उसके लिए अब वक्त पाँव पसारने लगा । दिन का एक -एक लम्हा एक -एक युग बनने लगा। उसे समझ नही आ रहा था कि क्या करे.ऐसे में उसकी सहेली ने उसकी सहायता की.उसे उसके पुराने शौक की याद दिलाई.हाँ .............जिस शौक को वो भूल चुकी थी । अब वो ही शौक उसके तन्हा लम्हों का साथी बनने लगा. अर्चना को बचपन से ही कवितायेँ लिखने का शौक था.मगर घर की जिम्मेदारियां निभाते-निभाते वो अपने शौक को भूल ही चुकी थी।

अब अर्चना की ज़िन्दगी कल्पना की उड़ान पर एक बार फिर रंग भरने लगी। उसने एक बार फिर कवितायेँ लिखना शुरू किया और पत्रिकाओं में छपवाने लगी। अब अर्चना का भी अपना एक मुकाम बनने लगा। लोग उसे जानने लगे और वो भी बेजोड़ कवितायेँ लिखने का प्रयास करने लगी। धीरे- धीरे उसके अनेक प्रशंसक बनने लगे.उसकी अपनी एक अलग पहचान बनने लगी । लोग उसे सराहते और वो भी औरों की कवितायेँ पढ़ती और उन्हें सराहती। ज़िन्दगी अपनी ही धुन में गुजरने लगी।

और अब कुछ इस तरह अर्चना अपनी कल्पनाओं में रंग भरने लगी.

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

अमर प्रेम

अर्चना और समीर की खुशहाल बगिया और उसके दो महकते फूल .................हर तरफ़
ज़िन्दगी में बहार ही बहार । दोनों खुशहाल जीवन जीते हुए । प्रेम का सागर चहुँ ओर ठाठें
मार रहा हो जहाँ । समीर एक सौम्य नेकदिल इंसान ,अपने व्यवसाय में व्यस्त ,पारिवारिक
जिम्मेदारियों के प्रति पूर्णतया समर्पित और अर्चना एक पढ़ी लिखी ,सुशील ,सुंदर घर परिवार
की जिम्मेदारियां निभाती हुई पति के कंधे से कन्धा मिलकर चलती हुई एक संपूर्ण नारी
का प्रतिरूप।
उन्हें देखकर लगता ही नही कि वक्त ने कोई लकीर छोडी हो उनकी ज़िन्दगी पर। वैवाहिक
जीवन के २० साल बाद भी यूँ लगता है जैसे विवाह को कुछ वक्त ही गुजरा हो । दोनों ज़िन्दगी
को भरपूर जीते हुए यूँ प्रतीत होते जैसे एक दूजे के लिए ही बने हों।

ओ मेरे प्रियतम
प्रेम मल्हार गाओ तुम
प्रेम रस में भीगूँ मैं
मेघ बन नभ पर छा जाओ
मयूर सा नृत्य करुँ मैं
वंशी में स्वर भरो तुम
और रस बन बहूँ में
वीणा के तार जगाओ तुम
सुरों को झंकृत करुँ मैं
शरतचंद्र से चंचल बनो तुम
चांदनी सी झर झर झरूँ मैं
तारागन के मध्य , प्रिये तुम
और नीलमणि सी , खिलूँ मैं

ऐसा अद्भुत प्रेम अर्चना और समीर का ।

क्रमश .........................................
दोस्तों
ज़िन्दगी में कभी नही सोचा था कहानी लिखने का ।
एक प्रयास कर रही हूँ जिसमें आप सबके सहयोग की
आकांक्षी हूँ । मेरे दो ब्लॉग हैं ------'ज़िन्दगी' और 'ज़ख्म'
उन पर अपने ह्रदय के उदगार प्रगट करती हूँ ।
अब यह एक नया प्रयास है जिसमें प्रेम और विरह को
नमन है ।





प्रेम और विरह का स्वरुप

प्रेम ----एक दिव्य अनुभूति --------कोई प्रगट स्वरुप नही,
कोई आकार नही मगर फिर भी सर्व्यापक ।
प्रेम के बिना न संसार है न भगवान । प्रेम ही खुदा है और खुदा ही प्रेम है --------सत्य है।
प्रेम का सौन्दर्य क्या है ------विरह । प्रेम का अनोखा अद्भुत स्वरुप विरह(वियोग)है ।
बिना विरह के प्रेम अधूरा है और बिना प्रेम के विरह नही हो सकता ।
दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । एक के बिना दूसरे की गति नही ।
प्रेम के वृक्ष पर विकसित वो फल है विरह जिसका सौंदर्य
दिन-ब-दिन बढ़ता ही है । जो सुख मिलन में नही वो सुख विरह में है
जहाँ प्रेमास्पद हर क्षण नेत्रों के सामने रहता है और इससे बड़ा
सुख क्या हो सकता है । बस इसी विरह और प्रेम का सम्मिश्रण है ये
अमर प्रेम ।