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शनिवार, 26 जून 2010

नमन

श्याम मोहन मदन मुरारी
राधे- राधे रटती प्यारी 
कृष्ण केशव कुञ्ज बिहारी
रमता जोगी बहता पानी 
आनंद कंद  मुरली धारी 
जमुना जी की महिमा न्यारी
गोविन्द माधव गिरिवरधारी 
खोजत -खोजत सखियाँ हारी 
आनंदघन अविनाशी त्रिभुवनधारी
कुञ्ज- कुञ्ज में बसे गिरधारी
नटवर नागर छैल बिहारी
रोम- रोम में रमे मुरारी
सुखधाम सुधासम कृष्ण मुरारी
कण -कण में रम रहे रमणबिहारी

गुरुवार, 17 जून 2010

दिव्य प्रेम

प्रेम प्रतिकार 
नहीं मांगता 
तुझसे तेरे
होने का हिसाब 
नहीं मांगता
प्रेम तो 
प्रेमी का
दीदार भी 
नहीं मांगता
जो रूह
बन गया हो 
जो साँसों में 
समा गया हो
जो जिस्म के 
रोएँ- रोएँ में
बस गया हो
फिर दीदार 
किसका करे 
और कौन करे
 जब दो हों
तो दीदार हो
जब दो हों तो
प्रतिकार  हो  
जहाँ एकाकार 
हो गया हो
प्रेम और प्रेमी का
वहाँ 
कोई बँधन नहीं
कोई चाहत नहीं 
वहाँ 
पूर्णता में लिप्त 
आनंद की 
स्वरलहरियाँ
गुंजारित होती हैं
रोम- रोम 
उल्लसित
पुलकित
प्रफुल्लित
कुसुम सा
महकता है
शरीर नगण्य
हो जहाँ
बस दिव्य प्रेम पनपता है वहाँ

गुरुवार, 10 जून 2010

प्रीत का रंग

प्रीत चदरिया ऐसी ओढ़ी 
हो गयी मैं बेगानी 
अपना पता खोजती डोलूं
बन के मैं दीवानी 
बांसुरी की धुन पर
वन -वन खोजूं
बन के मैं मतवाली
श्याम प्रीत की 
ओढनी ओढ़ के
हो गयीं मैं अनजानी
श्याम के  रंग में 
ऐसी रंग गयीं
हो गयी मैं भी कारी
श्याम रंग की चुनरिया 
पर मैं जाऊं वारी -वारी
प्रीत की  सब रीतें भुला दूँ
तन -मन की सुधि बिसरा दूँ
प्रेम धुन पर ऐसे 
नाचूँ  छम- छम 
होकर मैं  मतवाली

मंगलवार, 1 जून 2010

सखी री मेरे नैना भये चितचोर

सखी री मेरे
नैना भये चितचोर 

श्याम को चाहें
श्याम को निहारें 
प्रेम सुधा में
भीग- भीग जावें 
मुझ  बैरन के
हिय को रुलावैं 
सखी री मेरे
नैना भये चितचोर

श्याम छवि पर
बलि -बलि जावें
मधुर स्मित पर
लाड- लड़ावें 
मुझ  बेबस की 
एक ना मानें
सखी री मेरे 
नैना भये चितचोर

श्याम पर रीझें
श्याम को रिझावें
मुरली की धुन पर
बरस- बरस जावें
मुझ बिरहन के
विरह को बढ़ावें
सखी री मेरे 
नैना भये चितचोर