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शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

मधु हो तुम

मधु हो तुम
और मेरी क्षुधा अनंत
सदियों से अतृप्त 


प्रेम सुधामृत हो तुम
और मेरी तृष्णा अखंड 
सदियों से अपूर्ण

अलोकिक श्रृंगार हो तुम
रूप का अनुपम भंडार हो तुम
और मैं प्रेमी भंवरा
सदियों से रूप पिपासु


पूर्ण  हो तुम
और मेरी यात्रा अपूर्ण
सदियों से भटकता
सदियों तक भटकता
अनंत कोटि मिलन
अनंत कोटि विछोह 
अनंत अपूरित
तृष्णाओं का महाजाल 
ओह! पूर्ण , कहो 
अब कैसे अपूर्ण
पूर्ण  हो ?
कैसे विशालता में
बिंदु समाहित हो?
हे पूर्ण तृप्त
करो मुझे भी 
अब पूर्ण तृप्त !

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

मेरे मन मधुबन में आओ

मेरे मन  मधुबन में आओ-२-
श्याम हम झूला झूलें रे 


प्रेम के हिंडोले पर मुझको बिठाकर
श्याम प्रीत की पींगे बढ़ावो रे
श्याम हम .............................


रास रंग में मुझको रंगाकर
श्याम प्रीत की माँग सजावो रे
श्याम हम.................................

डर डर जाऊं जब मैं वैरागन 
श्याम प्रेम से गले लगावो रे
श्याम हम ........................