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शुक्रवार, 27 मई 2011

अब कैसे कहूं याद आ रही है

वो जो हर पल
नैनों में समाये रहते हैं
जहाँ पलकें भी
स्थिर हो  जाती हैं
दृष्टि निर्मिमेष
हो जाती है
वहाँ कैसे कहूँ
याद आ रही है

वो जो हर पल
धड़कन में
समाये रहते हैं
मुरली मधुर बजाते हैं
मुझे हरदम
नाच नाचते हैं
वहाँ कैसे कहूँ
याद आ रही है

वो जो हर पल
सांसों के मनकों में
समाये रहते हैं
हर आती जाती
सांस संग धड़कते हैं
सांसों की आवाजाही में
मोती बन चमकते हैं
वहाँ कैसे कहूँ
याद आ रही है

याद तो उसे करूँ
जिसे भुलाया हो कभी
याद तो उसे करूँ
जिसे बिसराया हो कभी
जो स्वयं से जुदा
 हुआ हो कभी
याद तो उसे करूँ
जो अलग वजूद
बना हो कभी
जो मुझमे समाया रहता है
जिसमे मैं समायी रहती हूँ
जहाँ जिस्मों से परे
आत्मिक मिलन
हो गया हो
वहाँ कैसे कहूं
याद आ रही है
कोई तो बता दे
अब कैसे कहूं
याद आ रही है

रविवार, 22 मई 2011

अब कैसे मिलन हो पाए?







किशोरी जी तुम बिन
चैन ना आये
कान्हा बुलाये
मन भरमाये
तुम बिन चैन ना आये
एक बार दर्शन
करने को
खुद वृन्दावन आये
फिर भी चैन ना आये
तुम्हारे चरणन के दर्शन को
कान्हा भी दौडा आये
प्रेम की गागर
छलक - छलक जाये
प्रीत की रीत
निभा न पाए 
तुम बिन चैन ना पाये
कान्हा तुम बिन
चैन ना पाये
चरण कमल पर 
बलि बलि जाए
फिर भी उॠण
न हो पाए
प्रेम का मोल
कैसे चुकाए
इतना समझ न पाए
किशोरी जी
कान्हा तुम बिन 
चैन न पाए 
तुम्हरे चरणों में
वास करन को
कान्हा भी अकुलाये  
दिव्य प्रेम के 
आगे उसकी
एक न चलने पाए 

किशोरी जी तुम्हरे
दरस बिन
कान्हा अश्रु बहाये
पर तुम बिन 
चैन न पाए
किशोरी जी
तुम बिन कैसे
कान्हा मुरली बजाये 
हर पल तुम्हारे विरह में
तड़प - तड़प जाये
पर तुम बिन चैन ना पाए
विरह अगन की तीव्र वेदना
कान्हा को झुलसाये
जो बीती तुम्हरे जीया पर
वो कान्हा खुद पर
सहता जाये
पर तुम बिन चैन ना पाये
किशोरी जी 
अब कैसे मिलन हो पाए?
दोस्तों 
ये दुर्लभ चित्र मुझे फ़ेसबुक पर कल मिला
तो सोचा आप सबको भी 
इसके दीदार कराऊँ
और मन मे जो भाव जागृत हुये
वो आपसे साझा कर रही हूँ 
उम्मीद है पसंद आएगा

शनिवार, 14 मई 2011

कैसे धार्मिक हैं हम ?

 दोस्तों ,
 ब्लोगर की खराबी के कारण ये पोस्ट डिलीट हो गयी और अब इसे दोबारा पोस्ट कर रही हूँ .........कृपया अपने विचारों से दोबारा अवगत कराएं .......ये पोस्ट १३ मई  को ब्लोग्स इन मीडिया में भी छपा है जिसका लिंक साथ में लगा रही हूँ .
http://blogsinmedia.com/2011/05/%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A4%AE-%E0%A4%A1%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%A8/




हमने धार्मिकता सिर्फ ओढ़ी हुई है मगर अपनाई नहीं है . अगर अपनाई होती तो आज ये हालत ना होती ...........आज आप देखिये हमारे देवी - देवता और बड़े- बड़े साधू संतों की तस्वीरें और मूर्तियाँ कैसे जमीन में धूल चाट रही होती हैं , या पैरों के नीचे आ रही होती हैं ..........जिस दिन मिलेंगी तो बहुत करीने से सहेजेंगे हम सब और यदि ना मिले तो लेने की भूख .......हर हाल में लेकर ही रहते हैं आखिर मुफ्त का माल होता है .......और घर लाकर उसे कुछ दिन दीवार की शोभा बना देते हैं या मंदिर में बिठा देते हैं ..........उसके बाद जब वो पुरानी हो जाती हैं तो हम क्या करते हैं ?


हम सभी उन्हें उठाते हैं और किसी पीपल पर या चौराहे पर रख देते हैं या नदी में प्रवाहित कर देते हैं . मगर कभी सोचा उसके बाद उनका क्या हुआ ? हमने तो अपना काम करके इतिश्री कर ली मगर उसके बाद उन प्रतिमाओं और तस्वीरों का क्या हश्र होता है कोई जानना नहीं चाहता............

आज के वक्त में अगर नदी में प्रवाहित करते हैं तो वो प्रदूषित हो जाती है तो इससे बचने के लिए लोग उन्हें पीपल पर या चौराहे पर रखने लगे मगर कभी नहीं जानना चाहा कि अगले दिन उनके साथ क्या हुआ ?

वैसे पता सबको होता है मगर ये सोचकर कि हमने तो अपना काम कर दिया अब जो चाहे सो हो करके खुद को तसल्ली दे देते हैं जबकि अगले दिन उन तस्वीरों और प्रतिमाओं को जमादार सफाई करते हुए अपने साथ कूड़े में समेट कर ले जाता है , यहाँ तक देखा गया है कि उनके ऊपर ही कूड़ा उठा रहा होता है ......देखकर ही दिल दुखता है और आँखें शर्म से झुक जाती हैं और यदि उस जमादार को कहो कि ये क्या कर रहा है तो उसका तो सीधा सा जवाब होता है कि क्या करूँ जी मेरा तो काम ही कूड़ा उठाना है ...............तो ये होता है हमारे देवी देवताओं और संतों की प्रतिमाओं का हश्र?

क्या हमारा धर्म हमें यही सिखाता है ? या हम सब इतने नासमझ हैं वैसे तो धर्म के नाम पर एक दूसरे को मारने काटने को तैयार हो जाते हैं, और यदि कोई दूसरा हमारे देवी देवताओं के चित्रों का दुरूपयोग करे तो भी हम उसे नहीं छोड़ते और उसे माफ़ी मांगने पर मजबूर कर देते हैं इसका ताज़ा उदहारण तो अभी बिकिनी पर हामारे देवी देवताओं कि तसवीरें हैं ............चलो वो तो विदेशी ठहरे उन्हें किया और हमने आपत्ति उठाई तो उन्होंने माफ़ी मांग ली मगर क्या हम खुद ऐसा ही नहीं कर रहे ...........जब भी कहीं धार्मिक आयोजन होते हैं उसमे हर जगह न जाने कितने देवी देवताओं की तसवीरें छपी होती हैं और जिस दिन आयोजन समाप्त होता है तो वो ही तसवीरें पैरों के नीचे कुचली जा रही होती हैं ...........क्या तब हमारी गैरत मर जाती है ? हमें तब शर्म क्यूँ नहीं आती है ? तब क्यूँ नहीं सोचते कि जो बात हम गैर से मनवा सकते हैं वो अपने ही लोगों में जन जाग्रति लाकर क्यूँ नहीं मनवा सकते ? मगर कभी ये नहीं सोचते कि क्या ऐसा होने से रोकना हमारा धर्म नहीं?

क्यूँ सोचें भाई ? इसके लिए दुनिया पड़ी है और किसके पास वक्त है इतना ? लेकिन क्या हमारी अन्तरात्मा हमें नहीं धिक्कारती . इससे तो अच्छा है कि हम कम से कम तस्वीरें रखें जितनी हम संभाल सकें और यदि ख़राब हो जाये या मन से उतर जायें तो अपने घर में कामवाली बाई को दे दें क्यूंकि वो लोग तो ऐसी तसवीरें खरीद नहीं पातीं तो अपने घरों में लगा लेती हैं और उसे भी पूछकर दिया जाये की लगाएगी तो ले जा वर्ना नहीं या फिर उसे किसी उद्यान में ,या अपने ही बगीचे में या अपने गमलों में या किसी खेत खलिहान में मिटटी में दबा दें कम से कम ना तो प्रदुषण होगा और ना ही अपमान और धार्मिकता भी बनी रहेगी ...........हम लोग हवन करते हैं तो सारी हवन की राख़ आखिर में नदी में प्रवाहित करने की परंपरा है और हम उसका पालन करते हैं ये सोचकर कि ऐसा नहीं किया तो कुछ गलत हो जायेगा मगर ये नहीं सोचा कि इससे प्रदुषण बढेगा .......अब यदि इसी को हम बागों में , खेतों में मिटटी में दबा दें तो वहाँ ना तो धर्म और ना ही मर्यादा का उल्लंघन होगा और उसके परमाणु से आस- पास का वातावरण भी शुद्ध होगा.............अगर हम सब इन छोटी - छोटी चीजों पर ध्यान दें तो ये हमारे और हमारे धर्म और भविष्य सबके लिए हितकर होगा .

ये हम सबका कर्तव्य है कि हम सब मिलकर अपने धर्म की रक्षा करें और उसे पांव तले ना रौंदें. ये सब मैंने आँखों देखा ही कहा है ज्यादातर मंदिरों आदि में भी ऐसा हो रहा है .........इसलिए हम सबको इस तरफ ध्यान देना चाहिए और अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करना चाहिए तभी हम सही मायने में हिन्दू या धर्मनिष्ठ कहलाने के अधिकारी हैं .

मंगलवार, 10 मई 2011

रे मन ! तू इतना सा भी ना समझ पाता है

मोह का छोटा सा अंकुर भी
कैसे झुलसा जाता है
रे मन !
तू इतना सा भी
ना समझ पाता है

तेरे वर्षों के तप को
खंडित कर जाता  है
फिर दूर बैठा मुस्काता है
रे मन !
तू इतना सा भी
ना समझ पाता है

तुझसे तेरा ही
सब छीन ले जाता है
देख कैसी
धमाचौकड़ी मचाता है
कहीं का नहीं
फिर छोड़ पाता है
जब अपनों की
लात खाता है
रे मन !
तू इतना सा भी
ना समझ पाता है

ये आदमखोर है ऐसा
जो जीते जी को खाता है
पर इसके पंजों से
ना छूट  पाता है
रे मन !
तू इतना सा भी
ना समझ पाता है

ये मोह की ऐसी
जोंक है जो
अमरबेल सी
लिपट जाती है
फिर तो राम नाम की
वीणा से ही
मन विश्रांति पाता है
रे मन !
तू इतना सा भी
ना समझ पाता है