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बुधवार, 27 जुलाई 2011

कृष्ण लीला ………भाग 4

जब प्रथम पुत्र उत्पन्न हुआ
वासुदेव ने लाकर कंस को दिया
शिशु को देख कंस का दिल पसीज गया
ये बालक है मेरा क्या बिगाड़ेगा
मुझे डर तो आठवें से है
ये तो पहला है ,सोच छोड़ दिया
पर कान के कच्चे पर
कोई कैसे करे विश्वास
हरि इच्छा से नारद जी
पहुंचे कंस के पास
एक फूल के माध्यम से
सारा सच समझा दिया
और हर पंखुड़ी को फूल की
आठवां गिना दिया
इतना सुन कंस ने
बालक को बुलवा लिया
और पत्थर पर पटक
बालक का प्राणांत किया
वासुदेव देवकी को
कारागार में डाल दिया

उनके छहों पुत्रों को
इसी तरह मार दिया 
सातवें पुत्र के रूप में
शेषनाग का अवतार थे
जो भगवान के प्रिय भक्त थे
भक्त का अहित भगवान
होने देते नहीं
उसके लिए सृष्टि के
नियम ताक पर रख देते हैं
 सातवाँ गर्भ वासुदेव की
दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में
स्थानांतरित किया
और सारे में ये फ़ैल गया
देवकी के गर्भपात हुआ
इतना सुन कंस खुश हुआ
सोचा मेरे डर से बालक
ने ना जन्म लिया
अब वैकुंठनाथ
जगत मंगल के लिए
गर्भ में आ गए
सब मंगल जग में छा गए
मुख कान्ति देवकी की
चमकने लगी
जिसे देख कंस की नींद
उड़ने लगी
मन ही मन कंस
डरने लगा
हर ओर सोते जागते
कृष्ण का चिंतन करने लगा
हर तरफ उसे 

बाल गोपाल दिखने लगा
वैर से ही सही वो
भगवान का स्मरण करने लगा
कंस ने पहरे कठिन बैठा दिए
सात ताले कोठरियों में लगवा दिए
भगवद जन्म  के समय
देवता सारे आ गए
अदृश्य रूप से स्तुति
प्रभु की करने लगे
प्रभु को पृथ्वी का
भार हरण करने के लिए
जल्द जन्म लेने को कहने लगे
जब से वैकुंठनाथ गर्भ में आये
परमानन्द छाने लगा था
बिन ऋतुओं के भी 

वृक्षों पर फल फूल आने लगे
ग्रह , नक्षत्र , तारे
सौम्य शांत होने लगे
दिशायें स्वच्छ प्रसन्न होने लगीं
तारे आकाश में जगमगाने लगे
घर घर मंत्राचार होने लगे
हवानाग्नी स्वयं प्रज्ज्वलित
 होने लगी
मुनियों के चित्त प्रसन्न होने लगे
रात्रि में सरोवरों में
कमल खिलने लगे
शीतल मंद सुगंध वायु बहने लगी
देवता दुन्दुभी बजाने लगे
गन्धर्व ,किन्नर मधुर स्वर से गाने लगे
अप्सराएं नृत्य करने लगीं
जल भरे मेघ वृष्टि करने लगे
चारों तरफ प्रकृति में
हर्षोल्लास मनने लगे
भाद्रपद का महीना
अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र
अर्ध रात्रि में जग नियंता
जगदीश्वर प्रभु ने
स्वयं को प्रगट किया
अंधियारी कुटिया में
उजियारा हो गया
वासुदेव देवकी कर जोड़
प्रभु की स्तुति करने लगे
स्तुति में अपनी व्यथा कहने लगे
तब प्रभु ने समझाया
जैसा मैं कहूँ
अब तुम वैसा ही करना
मुझे तुम नंदगाँव में
नंदबाबा के घर छोड़ आना
वहाँ मेरी माया ने जन्म लिया होगा
उसे यहाँ उठा लाना
मेरे भक्तों ने बहुत दुःख पाया है
अब कंस का अंत निकट आया है
ताले सारे खुल जायेंगे
रास्ते सारे तुम्हें मिल जायेंगे
जैसे पहला कदम उठाओगे
सब पहरेदार सो जायेंगे
किसी को कुछ भी
पता ना चलेगा
और अपना स्वरुप
पूर्ववत तुम  पा जाओगे

शनिवार, 23 जुलाई 2011

कृष्ण लीला………भाग 3

अब पृथ्वी बहुत घबरायी थी
गौ का रूप रख ब्रह्मा के पास आई थी
ब्रह्मा जी कहने लगे
इसका उपाय तो
विष्णु जी ही बताएँगे
और गौ को ले सभी देवता
महादेव सहित क्षीरसागर किनारे
करबद्ध प्रार्थना करने लगे
प्रभु तारनहारे
हमारी नैया पार लगा देना
जैसे ग्राह से गज को छुड़ाया
परशुराम अवतार लिया
पृथ्वी को क्षत्रिय रहित किया
ब्राह्मणों का उद्धार किया
राम रूप में भी
पृथ्वी का भार हरण किया
हर बार पृथ्वी के भार
को आपने दूर किया
इस बार भी उसकी
नैया पार लगाइए
अब देर ना लगाओ प्रभु
पृथ्वी भयातुर हो गयी है
आपकी शरण में आ गयी है
अब इसकी रक्षा कीजिये
पृथ्वी भार हरण के लिए
अब प्रभु अवतार लीजिये
स्तुति सुन आकाशवाणी हुई
पृथ्वी तुम डरो नहीं
जल्द मैं अवतार लूँगा
देवकी के गर्भ से जन्म लूँगा
यशोदा को  पालन का सुख दूंगा
जो भी सेवा करना चाहे
बाल लीलाओं का आनंद लेना चाहे
जाकर गोकुल में जन्म ले ले
इतना सुन सब आनंदमग्न हो गए
प्रभु गुणों को गाते
निज स्थानों पर गए
अब प्रभु जन्म की आस में
ज़िन्दगी बिताने लगे
देवताओं , गन्धर्व , किन्नर
ऋषि मुनि आदि ने
ब्रजक्षेत्र  में जन्म लिया
वेदों की ऋचाओं  ने
गोपी रूप धारण किया


इसके आगे शुकदेव जी कहने लगे
जब कंस का अत्याचार बढ़ा
तब उसने विचार किया
कुछ अच्छा कार्य करना चाहिए
सबके दिलों में सम्मान भी पाना चाहिए
इतना सोच उसने अपने
चाचा की लाडली देवकी का ब्याह तय किया
 देवकी का ब्याह कंस
वासुदेव से करने लगा
और बहुत धूम धाम से ब्याह किया
दान दहेज़ बहुत मन से दिया
प्रेम के वशीभूत हो
विदाई रथ को कंस
जब स्वयं हांकने लगा
तभी आकाशवाणी ने उद्घोष किया
जिसे इतने हर्ष से ले जाता है
उसी देवकी का आठवां पुत्र
तुझे चिरनिद्रा में सुलाएगा
तू काल के फंदे से ना बच पायेगा
इतना सुन कंस क्रोध से भर गया
अंग प्रत्यंग क्रोध  से जलने लगा
देवकी के बाल खींच जब
तलवार से उसे मारने लगा
तब वासुदेव जी ने विचार किया
अब ये इसकी बहन नहीं
मेरी भार्या है
और इसकी रक्षा करना
मेरा धरम होगा
वासुदेव धर्मनिष्ठ और सत्यव्रती थे
ये कंस जानता था
जब वासुदेव ने वचन दिया
अपना हर पुत्र तुम्हें भेंट करूँगा
चाहे जो कर लेना
मगर देवकी से कोई खतरा नहीं तुम्हें
इसलिए उसे छोड़ देना
सूर्य चंद्रमा को साक्षी जान
तुम्हें वचन मैं देता हूँ
इतना सुन कंस ने उन्हें छोड़ दिया



क्रमश:

सोमवार, 18 जुलाई 2011

कृष्ण लीला ----भाग 2

तब शुकदेव जी कहने लगे
आहुक राजा के दो पुत्र थे
देवक और उग्रसेन
उग्रसेन महाप्रतापी  राजा था
पवन रेखा  उसकी भार्या
अति सुन्दरी पतिव्रता थी
कालसंयोग से इक दिन
वनविहार के समय
बिछड़ गयी राजा और सखियों से
घने जंगल में पहुँच गयी
द्रुम्लिक नामक दैत्य के
मन को भा गयी
उसकी कुदृष्टि से बच ना पाई
राजा का धर वेश उसने
रानी का शील हरण किया
और फिर निज स्वरुप में आ गया
उसे देख रानी का कलेजा थर्राया
रानी ने राक्षस को धिक्कारा
और श्राप देने का उपक्रम किया
तब वो राक्षस  बोल उठा
रानी श्राप मत देना
तेरी बंद कोख को खोला है
और अपने धर्म का फल
तुझे दिया है
अब जो पुत्र तेरे उत्पन्न होगा
महाप्रतापी चक्रवर्ती राजा होगा
और परमेश्वर के हाथों
उसका उद्धार होगा
मैं पिछले जन्म का कालनेमि हूँ
हनुमान जी के हाथों मारा गया था
इतना कह राक्षस चला गया
पवन रेखा  ईश्वर इच्छा समझ
स्वयं को धैर्य देने लगी
जब शिशु जन्म का समय आया
पृथ्वी पर भारी उपद्रव हुआ
दिशायें सारी भयभीत हुईं
दिन में अँधियारा  होने लगा
बादल सिंह गर्जन करने लगे
दामिनी भी कड़कने लगी
वृक्ष धराशायी होने लगे
आंधियां तेज़ चलने लगीं
तारे टूटने लगे
उल्कापात होने लगे
ऐसे में बालक ने जन्म लिया

राजा ने पुत्र जन्म का
खूब उत्सव किया
दान दक्षिणा से याचकों का
घर बार भर दिया
ज्योतिषियों से बालक की
कुंडली बंचवायी है
कुंडली सुन राजा परम दुखी हुआ
जब पता चला
गौ , ब्राह्मण, देवताओं को
दुख  देने वाला होगा
यज्ञ ,दान, तपस्या करने वालों
पर अत्याचार करेगा
राजसिंघासन  छीन प्रजा को दुःख देगा
जब पृथ्वी दुखी होगी
तब परमात्मा जन्म लेकर
इसका उद्धार करेंगे
इतना सुन राजा दुखी हुआ
परमेश्वर की इच्छा जान संतोष किया 

राजा ने एक डलिया मे
बालक को लिटाया है
और यमुना मे बहाया है
बहते बहते बालक शूरसेन को मिल गया
वो उसे अपने घर लाये हैं
और वसुदेव संग दोनो ने
साथ साथ शिक्षा पाई है
जब दोनो बडे हो गये
तब इक दिन नारद जी
उससे मिलने आये हैं
और उसे उसके जीवन का
सब हाल बतलाये हैं
इतना सुन कंस क्रोधित हो उठा
और बदला लेने को
आतुर हो गया
उसने जा घोर तपस्या कर
ब्रह्मदेव को प्रसन्न कर
दस हजार हाथियो का बल पाया
और राजधानी मे आ उत्पात मचाया
अपने पिता को बंदी बनाया 
जैसा भूदेवों ने बतलाया था
वैसा ही उसने आचरण पाया था
कंस के अत्याचारों से
पृथ्वी का ह्रदय डोलने लगा
दस हजार हाथियों का बल
तपस्या में पाया था
उसके अत्याचार से
सबका मन थर्राया था
पूजा पाठ यज्ञ हवन
बंद करवा दिए

इक दिन जरासंध का 
एक हाथी पगला गया था
रास्ते से जाते कंस ने
उसे वश किया था
जरासंध ने उसके पौरुष
पर खुश हो
अपनी दो बेटियों
अस्ति और प्राप्ति
का उससे ब्याह किया
अस्ति और प्राप्ति
जैसे नाम थे वैसे ही
कंस के आचरण बनने लगे
अस्ति का मतलब" है "
और प्राप्ति कर अर्थ " इतना और पाना है "
बस इसी उहापोह में लग गया
घमंड से फूला ना समाता था
प्रजा पर मनमाने अत्याचार किया करता



क्रमश:

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

कृष्ण लीला ………भाग 1

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
श्री गणेशाय नमः
श्री सरस्वत्यै नमः
श्री सदगुरुभ्यो नमः

दोस्तों
आज से श्रीमद भागवत के दशम स्कंध में जो भगवान कृष्ण की लीलाएं हैं उनको काव्य के रूप में लिखने की कोशिश की है ............अब ये हमारे कान्हा की मर्ज़ी है कब तक और क्या क्या लिखवाते हैं और आप सबको पढवाते हैं. ये मेरा इस तरह का पहला प्रयास है कोई त्रुटि हो तो माफ़ी चाहती हूँ.

मेरे ख्याल से गुरुपूर्णिमा से उत्तम कोई दिन नहीं होगा ये श्रृंखला शुरू करने का .........सब प्रभु प्रेरणा से हो रहा है.

जब शुकदेव जी परीक्षित को भगवान के दिव्य चरित्र सुना रहे थे और नौ स्कंध तक भगवान के विभिन्न अवतारों की कथा सुना चुके और देख लिया कि अब प्याला भर गया है तब इतना कह शुकदेव जी चुप हो गए उस वक्त परीक्षित व्याकुल हो गए क्योंकि अब तो प्रभु के चरित्रों का समय आया था और इसी वक्त शुकदेव जी चुप हो गए तब परीक्षित उनसे प्रार्थना करने लगे .........शायद शुकदेव जी भी देखना चाहते थे कि प्यास कितना बढ़ी है .




चतुर्थ दिवस की कथा ने कराया
परीक्षित को ज्ञान बोध
कर जोड़ कहने लगे 

शुकदेव जी
सूर्य वंशी राजाओं का
उद्भव आपने सुनाया है
जो मेरे मन को भाया है
ज्ञानोदय अब हो गया
मुक्ति का मार्ग दिख गया
कर कृपा अब कुछ
यदुवंशियों का हाल सुनाइए
और मेरे जीवन को सफल बनाइये
जिसमे जन्मे चन्द्र किरण स्वरूपी
आनंदघन कन्हैया लाल हैं 

उनकी बाल लीलाओं का अब दिग्दर्शन कराइए
उनके दिव्य चरित्रों का अब पान कराइए
कैसे मारा कंस को वो सब बतलाइए
इस अमृत तत्व रुपी सुधा का पान कराइए
मेरे मन मंदिर में
कान्हा प्रेम का सागर बहाइये
मेरे ह्रदय कमल पर
ठाकुर जी को बिठाइए 


इतना सुन शुकदेव जी कहने लगे
राजन चार दिन से तुमने
कुछ ना खाया पीया है
कुछ खा पीकर चित्त ठिकाने कर लेना
उसके बाद कृपामृत का पान कर लेना
इतना सुन राजन यो कहने लगे
नौ स्कंधों में जो आपने
अमृत पान कराया है
कर्ण दोने से मैंने वो
अमृत पान किया है
अब ना क्षुधा तृषा कोई सताती है
अब तो सिर्फ मनमोहन की
कथा ही याद आती है
इतना सुन प्रफुल्लित शुकदेव जी
प्रभु के चरणों में ध्यान लगा यो कहने लगे
शूरसेन राजा की पञ्च कन्याएं
और दश पुत्र हुए
बड़े पुत्र वासुदेव का विवाह किया
सत्रह पटरानियों को उसने
अंगीकार किया
अठारहवीं शादी जब
देवकी से होने लगी
आकाशवाणी तब ये होने लगे
आठवां पुत्र देवकी का
कंस को मारेगा
इतना सुन कंस ने
वासुदेव देवकी को कैद किया
वहीँ कैद में परब्रह्म ने जन्म लिया
इतना सुन राजा यों कहने लगा
गुरुदेव कृपा कर बतलाइए
विस्तार से सारी कथा सुनाइए
मेरे प्रभु की यूँ ना पहेलियाँ बुझाइए
जिसे सुनने को मेरा मन मचलता है
उस आनंद के सागर में मेरी भी
डुबकी लगवाइए
वो अलौकिक दिव्य अमृतपान कराइए 





क्रमश:

रविवार, 10 जुलाई 2011

तोसे नैना लड गये जो इक बार

तोसे नैना लड गये जो इक बार
अब खुद को ढूँढे इत उत बावरी बयार
श्याम प्रेम मे री्झ गये दो नैना मतवार
दरस प्यास बुझत नाही चाहे देखे आठों याम


श्याम प्रेम रस माधुरी भीजत है जो इक बार

श्याममय हो जाय है सुध बुध सारी बिसार

मेरी अज्ञान मटकी फ़ोड दयी जा दिन से श्याम
अब श्याम बिना ना दीखत है दिन रात

मन माखन चुराय लिया जा दिना सों श्याम
ह्रदय सिंघासन बैठ गये वा दिना सों श्याम

अपनी सुध बिसार के हो गयी श्याम की डोर
जित ले जायेंगे उडाय के संग चलेगी डोर



नैनन की धोवन मे जब बहते श्याम हो अधीर
अंजुलि भर पी जाऊँ मै वो नैनन को नीर





दोस्तों
इस रसमयी धारा के प्रवाह को आगे बढाने के लिये मै
एक श्रंखला शुरु करने वाली हूँ जिसमे आनन्द की बयार 
बह रही होगी और उम्मीद करती हूँ आप सब का प्यार उसे 
भी इसी तरह मिलता रहेगा………ये शुभ कार्य मै गुरु 
पूर्णिमा से शुरु करने वाली हूँ।

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

पाठन से उपजा चिन्तन

दोस्तों,
आज की ये रचना एक कविता की उपज है...........मैंने रश्मि प्रभा जी की कविता कैकेयी की ख्वाहिश पढ़ी जिसमे केकैयी के मातृ प्रेम और दर्द को दर्शाया गया था जो सच मे एक अनूठी कल्पना है उसे पढ़कर मुझे ये सारा प्रसंग याद आ गया तो सोचा केकैयी के जीवन का एक उज्जवल पक्ष भी आपके सामने रखना चाहिए .........आखिर उसने ऐसा किया क्यों ? और जब आप ये जानेंगे तो उसके व्यक्तित्व को भी सलाम करेंगे . उम्मीद् करती हूँ रश्मि जी इसे अन्यथा नही लेंगी क्योंकि ये मैने वो ही लिखा है जो मैने कथाओ मे सुन रखा है जिसके बारे मे धर्म ग्रंथों मे वर्णित है।





लिख रही है दुनिया
मन के भावों को
उन अनजानी राहों को
जिन पर चलना मुमकिन ना था
उस दर्द को कह रही है
जो संभव है हुआ ही ना था
कभी किसी ने ना जाना
इतिहास और धर्म ग्रंथों
को नहीं खंगाला
गर खंगाला होता तो
सच जान गए होते
फिर ना ऐसे कटाक्ष होते
हाँ , मैं हूँ केकैयी
जिसने राम को वनवास दिया
और अपने भरत को राज दिया
मगर कोई नहीं जानता
प्रीत की रीतों को
नहीं जानता कोई कैसे
प्रेम परीक्षा दी जाती है
स्व की आहुति दे
हवनाग्नि प्रज्ज्वलित  की जाती है
मेरी प्रीत को तुम क्या जानो
राम की रीत को तुम ना जानो
जब राम को जानोगे
तब ही मुझे भी पहचानोगे
मेरा जीवन धन राम था
मेरा हर कर्म राम था
मेरा तो सर्वस्व  राम था
जो भी किया उसी के लिए किया
जो उसके मन को भाया है
उसी में मैंने जीवन बिताया है
हाँ कलंकनी कहायी हूँ
मगर राम के मन को भायी हूँ
अब और कुछ नहीं चाह थी मेरी
राम ही पूँजी थी मेरी
जानना चाहते हो तो
आज बताती हूँ
तुम्हें राम और मेरी
कथा सुनाती हूँ
जब राम छोटे थे
मुझे मैया कहते थे
मेरे प्राणधन थे
भरत से भी ज्यादा प्रिय थे
बताओ कौन ऐसा जग में होगा
जिसे ना राम प्रिय होगा
हर चीज़ से बढ़कर किसे ना
राम की चाह होगी
बेटे , पति , घर परिवार
कभी किसी को ना
राम से बढ़कर चाहा
मुझमे तो सिर्फ
राम ही राम था समाया
इक दिन राम ने
प्रेम परीक्षा ली मेरी
मुझसे प्रश्न करने लगे
बताओ मैया
कितना मुझे तुम चाहती हो
मेरे लिए क्या कर सकती हो
इतना सुन मैंने कहा
राम तू कहे तो अभी जान दे दूँ
तेरे लिए इक पल ना गंवाऊँगी
जो तू कहे वो ही कर जाऊँगी
राम ने कहा जान तो कोई भी
किसी के लिए दे सकता है
मज़ा तो तब है जब जीते जी 
कांटों की शैया पर सोना होगा
ये ना प्रेम की परिभाषा हुई
इससे बढ़कर तुम क्या कर सकती हो
क्या मेरे लिए अपने पति, बेटे
घर परिवार को छोड़ सकती हो
क्या दुनिया भर का कलंक
अपने सिर ले सकती हो
उसकी बातें सुन मैं सहम गयी
लगा आज राम ने ये कैसी बातें कहीं
फिर दृढ निश्चय कर लिया
मेरा राम मेरा अहित नहीं करेगा
और यदि उसकी इच्छा ऐसी है
तो उसके लिए भी तैयार हुई
कहा राम तेरी हर बात मैं मानूंगी
कहो क्या करना होगा
तब राम यों कहने लगे
मैया सोच लेना
कुछ छोटी बात नहीं माँग रहा हूँ
तुमसे तुम्हारा जीवन माँग रहा हूँ
तुम्हें वैधव्य भी देखना होगा
मेरे लिए क्या ये भी सह पाओगी
अपने पुत्र की नफ़रत सह जाओगी
ज़िन्दगी भर माँ तुम्हे नही कहेगा
क्या ये दुख सह पाओगी
आज मेरे प्रेम की परीक्षा थी
उसमे उत्तीर्ण होने की ठानी थी
कह दिया अगर राम तुम खुश हो उसमे
तो मैं हर दुःख सह जाउंगी
पर तुमसे विलग ना रह पाऊँगी
तुम्हारे प्रेम की प्यासी हूँ
तुम्हारे किसी काम आ सकूँगी
तभी जीवन लाभ पा सकूँगी
कहो क्या करना होगा
तब राम ये कहने लगे
मैया जब मुझे राजतिलक होने लगे
तब तुम्हें भरत को राज दिलाना होगा
और मुझे बनवास भिजवाना होगा
ये सुन मैं सहम गयी
राम वियोग कैसे सह पाऊँगी
राम से विमुख कैसे रह पाऊँगी
तब राम कहने लगे
मैया मैं पृथ्वी का भार हरण करने आया हूँ
इसमें तुम्हारी सहायता की दरकार है
तुम बिन कोई नहीं मेरा
जो इतना त्याग कर सके
तुम पर है भरोसा मैया
इसलिए ये बात कह पाया हूँ
क्या कर सकोगी मेरा इतना काम
ले सकोगी ज़माने भर की
नफ़रत का अपने सिर पर भार
कोई तुम्हारे नाम पर
अपने बच्चों का नाम ना रखेगा
क्या सह पाओगी ये सब व्यंग्य बाण
इतना कह राम चुप हो गए
मैंने राम को वचन दिया
जीवन उनके चरणों मे हार दिया
अपने प्रेम का प्रमाण दिया
तो क्या गलत किया
प्रेम में पाना नहीं सीखा है
प्रेम तो देने का नाम है
और मैंने प्रेम में
स्व को मिटाकर राम को पाया है
मेरा मातृत्व मेरा स्नेह
सब राम में बसता था
तो कहो जगवालों
तुम्हें कहाँ मुझमे
भरत के लिए दर्द दिखता था
मैंने तो वो ही किया
जो मेरे राम को भाया था
मैंने तो यही जीवन धन कमाया था
मेरी राम की ये बात सिर्फ
जानकार ही जानते हैं
जो प्रेम परीक्षा को पहचानते हैं 
ए जगवालों 
तुम न कोई मलाल करना
ज़रा पुरानों में वर्णित
मेरा इतिहास पढ़ लेना
जिसे राम भा जाता है
जो राम का हो जाता है
उसे न जग का कोई रिश्ता सुहाता है
वो हर रिश्ते से ऊपर उठ जाता है
फिर उसे हर शय में राम दिख जाता है
इस तत्वज्ञान को जान लेना
अब तुम न कोई मलाल करना    

रविवार, 3 जुलाई 2011

आखिर कब तक ऐसा होगा?


(केरल में 18 वीं सदी में बने पद्मनाभास्वामी मंदिर के तहखाने से निकला एक टन सोना, 50000 करोड़ का खजाना बड़ी मात्र में हीरे जवाहरात , ९ फुट लम्बी सोने कि चैन, हजारों साल पुराने सोने के सिक्के  और ना जाने क्या क्या निकला है और दूसरा तहखाना खोला जाना बाकी है
ऐसे में कहा जा रहा है कि इस दौलत के दम पर पद्मनाभास्वामी मंदिर ट्रस्ट तिरुपति बालाजी ट्रस्ट को दौलत के मामले में पीछे छोड़कर देश का सबसे धनवान ट्रस्ट का खिताब हासिल कर सकता है। )


अभी ऊपर लिखी ये पोस्ट पढ़ी रूबी सिन्हा की........तो ये ख्याल आया
आखिर कब तक ऐसा होगा?

आज जहाँ देखो वहाँ जिस मंदिर में देखो वहीँ हर जगह सिर्फ यही सुनने को मिलता है कि अमुक मंदिर में  इतने किलो का मुकुट या इतने किलो की चेन चढ़ाई गयी .......
मंदिरों में इतना पैसा होना क्या आश्चर्य की बात नहीं है ? सभी जानते हैं कि  मंदिरों में श्रद्धालु अपनी कामना पूरी होने पर कुछ ना कुछ चढाते ही हैं  लेकिन मेरा कहना है कि यदि इतना पैसा मंदिरों में  है तो फिर 
हम सब क्यों सिर्फ इसी में लगे रह जाते हैं कि कौन सा मंदिर आगे हो गया और कौन सा पीछे , हमारी सोच सिर्फ यहीं आकर क्यूँ सिमट जाती है कि कौन सा मंदिर खजाने में आगे है और कौन सा पीछे ........हम ये क्यों नहीं सोच पाते कि ये पैसा भी काम आ सकता है  ....क्या फायदा इतना पैसा मंदिरों में पड़ा सड़ता रहे और देश की गरीब जनता दो वक्त की रोटी के लिए तरसती रहे ...........क्या भगवान पैसा चाहता है या बिना पैसे के खुश नहीं होता? बेशक कहना ये होगा कि लोग चढाते हैं तो कोई क्या करे ? जिनके काम पूरे होते हैं तो वो चढाते हैं इसमें मंदिर का क्या दोष? मगर प्रश्न अब भी अपनी जगह है कि ..........क्या मंदिर के कर्ताधर्ताओं का कोई फ़र्ज़ नहीं बनता?  जितना मंदिर की देखभाल और जरूरी खर्चों के लिए जरूरी हो उतना रखकर यदि उस पैसे का सही सदुपयोग करें तो क्या उससे भगवान नाराज हो जायेंगे? क्या उस पैसे को समाज , देश और गरीब जनता के कल्याण के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता? और यदि ऐसा किया जाता है तो ना जाने कितने लोगों का भला होगा और मेरे ख्याल से तो इससे बढ़कर और बेहतर काम दूसरा कोई हो ही नहीं सकता .............मगर ना जाने कब हम ये बात समझेंगे...........अब देखिये जम्मू कश्मीर श्राइन बोर्ड ने जनता कि सुविधा के लिए वहाँ का नक्शा ही बादल दिया चाहे वैष्णो देवी जाना हो या अमरनाथ .......और सबसे बड़ी बात इस कार्य में सरकार ने भी सहयोग दिया .......जब वैष्णो देवी के रास्तों को संवारा गया तब श्री जगमोहन जी ने वहाँ की कायापलट कर दी  .......तो क्या और मंदिरों या ट्रस्टों  के लोग ऐसा नहीं कर सकते ?............अब चाहे पैसा भ्रष्टाचार के माध्यम से बाहर गया हो या देश के मंदिरों में सड रहा हो क्या फायदा ऐसे पैसे का ? क्या इस पैसे के बारे में कोई कुछ नहीं कर सकता ? क्या इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई जा सकती ?  मेरे ख्याल से तो मेरा देश कल भी सोने की चिड़िया था तो आज भी है जिस देश के मंदिरों में आज भी इतना पैसा बरसता हो वो कैसे गरीब रह सकता है ये तो हमारी ही कमजोरी और लालच है जो हमें आगे बढ़ने से रोकता है.............आखिर कब हमारी सोच में बदलाव आएगा? आखिर कब हम खुद से ऊपर उठकर देश और समाज के लिए सोचेंगे?