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बुधवार, 28 मार्च 2012

.कृष्ण लीला ......भाग 42




आठवें वर्ष में कन्हैया ने
शुभ मुहूर्त में दान दक्षिणा कर
वन में गौ चराने जाना शुरू किया
मैया ने कान्हा को 
बलराम जी और गोपों के 
सुपुर्द किया
वन की छटा बड़ी निराली थी
सुन्दर पक्षी चहचहाते थे
हिरन कुलाचें भरते थे
शीतल मंद सुगंध 
समीर बहती थी
वृक्ष फल फूलों से लदे खड़े थे 
आज मनमोहन को देख
सभी प्रफुल्लित हुए थे 
वहाँ कान्हा नई- नई 
लीलाएं करते थे
गौ चरने छोड़ देते
और खुद ग्वालों के संग
विविध क्रीडा करते थे

कभी मुरली की मधुर तान छेड़ देते थे 
जिसे सुन पशु - पक्षी स्तब्ध रह जाते थे 
यमुना का जल स्थिर हो जाता था
कभी मधुर स्वर में संगीत अलापा करते थे
कभी पक्षियों की बोलियाँ निकाला करते थे
कभी मेघ सम गंभीर वाणी से
गौओं को नाम ले पुकारा करते थे
कभी ठुमक- ठुमक कर नाचा करते थे
और मयूर के नृत्य को भी 
उपहासास्पद बनाया करते थे
कभी खेलते खेलते थक कर
किसी गोप की गोद में 
सो जाया करते थे
कभी ताल ठोंककर 
एक दूजे से कुश्ती लड़ते थे
कभी ग्वाल बालों की 
कुश्ती कराया करते थे
और दोनों भाई मिल 
वाह- वाही दिया करते थे 
जो सर्वशक्तिमान सच्चिदानंद 
सर्वव्यापक था
वो ग्रामीणों संग ग्रामीण बन खेला करता था
जिसका पार योगी भी 
ध्यान में ना पाते थे
वो आज गोपों के संग
बालसुलभ लीलाएं करते थे
फिर किसमे सामर्थ्य है जो 
उनकी लीला महिमा का वर्णन करे 

इक दिन गौ चराते दोनों भाई 
अलग- अलग वन में गए
तब श्रीदामा बलराम से बोल उठा
भाई यहाँ से थोड़ी दूर
इक ताड़ का वन है 
जिसमे बहुत मीठे फल लगा करते हैं
वहाँ भांति- भांति के वृक्ष लगे खड़े हैं
पर वहाँ तक हम पहुँच नहीं पाते हैं
धेनुक नामक दैत्य गर्दभ रूप में
वहाँ निवास करता है 
जो किसी को भी उसके
मीठे फल ना खाने देता है
ये सुन बलराम जी वहाँ पहुँच गए
और एक वृक्ष को हिला
सारे फल गिरा दिए
जैसे ही फल गिरने की आवाज़ सुनी
दैत्य दौड़ा आया और
बलराम जी पर वार किया
बलराम जी ने उसकी 
टांग पकड़ पटक दिया
बलराम जी को दुलत्तियाँ मारने लगा
तब बलराम जी ने उसे वृक्ष पर
मार उसका प्राणांत किया 
ये देख उसके दूसरे साथी दौड़े आये
पर बलराम जी के आगे 
कोई ना टिक पाए
ये देख देवताओं ने 
पुष्प बरसाए

जब मोहन बलराम और ग्वालों संग
गोधुली वेला में वापस आते हैं
ये मधुर वेश कान्हा के 
हर दिल को भाते हैं
संध्या समय ब्रज में प्रवेश करते हैं
घुंघराली अलकों पर धूल पड़ी होती है
सिर पर मोर पंख का 
मुकुट शोभा देता है 
बालों में सुन्दर सुन्दर 
जंगली पुष्प लगे हैं 
जो मोहन की सुन्दरता से
शोभित होते हैं
मधुर नेत्रों की चितवन 
मुख पर मुस्कान ओढ़े 
अधरों पर बंसी सुशोभित होती
मंद मंद गति से 
मुरली बजाते जब 
श्याम ब्रज में प्रवेश करते हैं
तब दिन भर विरह अगन से 
तप्त गोपियों के ह्रदयो को
मधुर मतवारी चितवन से 
तृप्त करते हैं 
गोपियाँ अपने नेत्र रुपी 
भ्रमरों से 
प्रभु के मुखारविंद के 
मकरंद रस का पान कर 
जीवन सफल बनाती हैं 
और प्रभु के ध्यान में 
चित्र लिखी सी खडी रह जाती हैं 
यशोदा रोहिणी तेल उबटन लगा
उन्हें स्नान करती हैं
फिर भांति भांति के भोज करा
सुन्दर शैया पर सुलाती हैं 
इसी प्रकार कान्हा 
रोज दिव्य लीलाएं करते हैं 
ग्वाल बाल गोपियों और ब्रजवासियों को
जो वैकुण्ठ में भी सुलभ नहीं
वो सुख देते हैं 

क्रमशः .........

सोमवार, 19 मार्च 2012

कृष्ण लीला ..........भाग 41






जो बछड़े जंगल में थे चरने गए
उन्हें ब्रह्मा ने अपनी माया से लिया छुपा 
जब बहुत देर हुई और बछड़े नहीं आये
तब ग्वाल बाल घबराये
तब कान्हा ने धैर्य बंधाया
और उन्हें रोक खुद 
ढूँढने का उपक्रम किया 
जंगल में बछड़े नहीं पाए 
तब कान्हा वहीँ लौट आये 
आकर देखा तो 
सारे ग्वाल बालों को भी
वहाँ नहीं पाया 
तब उन्हें जोर से आवाज़ लगाया है
पर जब ना बछड़े और ग्वालों को पाया है
तब अंतर्यामी भगवान ने ध्यान लगाया है
और ब्रह्मा द्वारा अपहृत 
ग्वालबाल और बछड़ों का
हाल जाना है
प्रभु समझ गए ये ब्रह्मा की 
बुद्धि मेरी माया ने हर ली है
चाहूँ तो अभी सभी को
वापस ला सकता हूँ
मगर इससे ना ब्रह्मा का
भरम टूटेगा
ये सोच कान्हा ने 
ग्वाल बाल और बछड़ों का रूप धरा
जितने ग्वाल- बाल और बछड़े थे
उतने ही कान्हा ने रूप धरे थे
ये भेद ना किसी ने पाया था
जो -जो जिस- जिस 
गुण- स्वभाव और आकार का था 
जैसे श्रृंगार करता था
जैसा बोला करता था
जैसा आचार- व्यवहार करता था
प्रभु ने बिल्कुल वैसा ही रूप धरा था 
और शाम को ब्रज की ओर
प्रस्थान किया था
बांसुरी की  तान सुन
गोपों की माताएं दौड़ी आई थीं
और कृष्ण रूप ग्वाल को गले लगायी थीं
और वात्सल्य स्नेह सुधा बरसाई थी
अजब आनंद आज समाया था
जैसा पहले कभी नहीं आया था
गाय दूध ज्यादा देने लगी थीं
अपने बछड़ों से स्नेह 
ज्यादा करने लगी थीं 
माताएं भी अति आनंदित रहती थीं
ग्वाल बालों से कृष्ण सरीखा
प्रेम किया करती थीं
ये भेद कोई ना जान पाया था
कि हर रूप में 
कृष्ण ही तो समाया था
फिर कैसे ना हर्षातिरेक होता
और कैसे ना प्रभु सम प्रेम होता
ये देख बलराम जी चकराए थे
ये कैसी विचित्र बात नज़र आती है
हर ओर कृष्ण प्रेम की 
बयार बही जाती \ है
यह कैसी माया छाई है
दैवी है या दानवी 
जो मेरा स्नेह भी
कृष्ण सम इन ग्वालों और 
बछड़ों पर आया है
ये किसकी माया है
प्रभु की माया के सिवा
और कोई मोहित 
कर नहीं सकता
इतना विचार कर 
दिव्य दृष्टि से 
सब देख लिया
इधर ब्रह्मा जी वापस आये हैं
और प्रभु को ग्वाल बालों सहित
बृज में पाए हैं
ये देख ब्रह्मा चकराए हैं 
ग्वाल बालों को तो मैं
ब्रह्मलोक  छोड़ आया हूँ
फिर ये कैसे यहाँ आ गए
सोच ब्रह्मा जी ने ध्यान किया
पर पार ना कोई पाया है
कौन से असली और कौन से नकली
पता ना लग पाया है
अब ब्रह्मा भी चकराया है
और फिर ध्यान लगाया है
अब तक दीखते थे जो
बछड़े और ग्वाल बाल
उन सबमे कृष्ण का 
दर्शन पाया है
अपने भी कई रूप
प्रभु की पूजा करते देखे
ये देख ब्रह्मा जी घबराये हैं
आँखें खोल प्रभु के 
चरणों में शीश झुकाए हैं
प्रभु की सारी माया समझ गए
और अपनी करनी पर 
उन्हें ग्लानि होती है
प्रभु चरणों की वन्दना करते हैं
प्रभु की  यूँ तो होती हैं
चार परिक्रमा 
पर ब्रह्मा जी तीन करके
निकल गए
प्रभु के गुस्से से घबराये हैं
इधर प्रभु प्रेरणा से
जब ब्रह्मा जी 
ब्रह्मलोक में पहुंचे हैं
वहाँ द्वारपालों ने 
उन्हें रोक लिया
तब ब्रह्मा जी बोल उठे
आज तुम्हें क्या हो गया
मैं तुम्हारा स्वामी ब्रह्मा हूँ
पर उन्होंने ना ध्यान दिया
कर जोड़ कह दिया
हमारे ब्रह्मा तो अन्दर विराजते हैं
हम उनसे पूछकर आते हैं
ये सुन ब्रह्मा का दिमाग चकरा गया
ये कौन सा दूसरा ब्रह्मा आ गया
ये कैसी लीला चलती है
ब्रह्मा ने ध्यान लगाया है 
और अपनी गद्दी पर 
अपना वेश धरे 
प्रभु को बैठा पाया है
वहाँ प्रभु कह रहे हैं
देखा ब्रह्मा तुमने मुझ पर शक किया
आज तेरे घरवाले ही 
तुझ पर शक करते हैं 
जो प्रभु पर शक करते हैं
वो कहीं के नहीं रहते हैं 
ये देख ब्रह्मा ने कर जोड़ लिए
इधर पहरेदार आया है , कहा
तुम्हें अन्दर ब्रह्मा ने बुलाया है
जैसे ही ब्रह्मा जी ने प्रवेश किया
प्रभु ने ब्रज को प्रस्थान किया
इस तरह प्रभु ने ब्रह्मा का 
मोह भंग किया
इतना कह शुकदेव जी ने
पांचवें वर्ष की कथा का 
छटे वर्ष में कैसे
ग्वालबालों ने बतलाया 
वो रहस्य बतला दिया 
ये रूप प्रभु ने एक वर्ष तक धारण किया 
पर ये भेद किसी ने ना जाना
ये दिव्य लीला प्रभु की 
सिर्फ इतना बतलाती है 
अपने पालनहार को न बिसराना
बस प्रभु से ही अपने तार लगाना 
कब कौन सी लीला वो रच देंगे 
ये पार न कोई पाता है 
बस जो प्रभु की ऊंगली पकड़ 
चलता जाता है 
वो भव से आसानी से तर जाता है 

क्रमशः .........

शनिवार, 10 मार्च 2012

कृष्ण लीला .......40



ये सुन शुकदेव जी बोल उठे
भगवत प्रेमियों में तुम्हारा श्रेष्ठ स्थान है
उनमे तुम्हारा अनुराग भी महान है
तुम्हें प्रभु की लीलाएं 
नित्य नयी लगा करती हैं
तभी प्रभु चर्चा में तुम्हें आनंद आता है
यद्यपि ये लीला अत्यंत रहस्यमयी है
फिर भी इसके सभी 
राज़ तुम्हें सुनाता हूँ
जब अघासुर मारा गया तब
कन्हैया ग्वालबालों संग
यमुना किनारे गए
सबने मिल स्नान किया
और मंडलाकार पंक्ति बना
भोजन का आनंद लिया
कान्हा ने सबसे पहला ग्रास लिया
फिर सारे गोपों ने 
भोजन शुरू किया 
कभी कान्हा खुद खाते हैं 
कभी गोपों को खिलाते हैं
उन्हीं झूठे हाथों से 
सबको खिला 
परम सुख देते हैं
जिस सुख के लिए
ऋषि मुनि योगी भी तरसते हैं
आज वो सुख ये 
ग्वाल बाल लेते हैं
सबका भोजन करते हैं
कभी सबकी जूठन खाते हैं
ये देख- देख देवताओं के सिर चकराते हैं
जब सब भोजन करते थे
तब कान्हा का एक सखा छुपा बैठा था
वो बाल सखा बेहद गरीब था
खाने को उसके घर में
कुछ भी नहीं था
तीन दिन की बासी रखी 
खट्टी छाछ वो लाया था
और कैसे उसे खिलाऊँ 
सोच चकराया था
और वृक्ष की  ओट  में जा
छुपा  बैठा था 
और अश्रु बहा रहा था
आज मेरे मोहन ने कलेवा मंगाया था
और मैं निर्भाग्य इतना भी न कर सका
अपने प्यारे सखा को 
भोजन भी न अर्पित कर सका 
ये सोच- सोच सीने में उसके 
हूक उठ रही थी 
पर जिसे सारी दुनिया 
भुला देती है
उसी पर तो हमारे प्रभु की
कृपा बरसती है
जो किसी के काम का नहीं रहता है
वो ही तो प्रभु को सबसे प्यारा होता है
फिर कैसे न उसकी पुकार 
उन तक पहुँचती 
और कान्हा को उसकी याद आई थी
और "कहाँ है मनसुखा "
आवाज़ लगायी थी
तभी एक ग्वाल ने बतलाया
वो देखो पेड़ की ओट में 
छुपा बैठा है
और अपना भोजन खुद कर रहा है
इतना सुन कान्हा उसकी  तरफ चल पड़े 
उँगलियों में भोजन कण लगे थे
किसी में दही, किसी में चावल
किसी ऊँगली में कधी
किसी में माखन लगा था
पर मोहन का चित्त तो 
मनसुखा के भोजन में अटका था
इधर मनसुखा रोता जाता था
आज मेरे पास अपने कान्हा को
खिलाने को कुछ नहीं है
ये खट्टी छाछ तो 
उसे नहीं पिला सकता
ये सोच खुद ही घूँट भर रहा था 
जैसे ही आखिरी घूँट भरी
कान्हा ने जाकर उसकी गर्दन पकड़ी
क्यों रे मनसुखा सारा 
भोजन खुद कर लिया
और मुझे तो 
चखने को भी नहीं दिया
अब मनसुखा के मुँह में 
जितनी छाछ थी बस
वो ही बची थी
बाकी तो लोटे में 
ख़त्म हो चुकी थी
कान्हा ने उसकी गर्दन को दबाया
और उसके मुँह की छाछ को
अपने मुखे में पाया
जिसे पीकर कान्हा का मन हर्षाया
और वो बोल पड़े
अरे मनसुखा! तेरी छाछ तो बहुत मीठी है रे 
इतना स्वाद तो माँ यशोदा के
दूध में भी नहीं आया कभी 
इतना स्वाद तो 
शबरी के बेरों में भी ना पाया कभी 
इतना स्वाद तो विदुरानी के 
छिलकों में भी ना समाया था
और तू मुझे इससे 
बंचित रखता था
ये होती है प्रभु की महती कृपा 
सोचने वाली बात सिर्फ इतनी थी 
जैसे माँ बाप अपने बच्चों का
जूठा प्रसन्नता से खा लेते हैं
और तनिक भी भेदभाव नहीं करते हैं
वैसा ही दृश्य तो प्रभु ने 
पेश किया था
क्योंकि सभी उन्ही की तो संतान हैं
यूँ ही तो नहीं कहा जाता
"त्वमेव माता च पिता त्वमेव "
जब वो ही हमारे सर्वस्व हैं
तो उनमे हम में क्या भेद हुआ
जब आम इन्सान अपने बच्चे की जूठन खा
खुश हो सकता है 
तो फिर परमपिता क्यों नहीं ऐसा कर सकता है
पर मनुष्य बुद्धि इसके पार नहीं जा पाती है
ये परम भेद नहीं जान पाती है 
सिर्फ तेरे मेरे झूठ सच में ही 
उलझती जाती है 
मोह माया के गंदले सलिल में
धंसती जाती है 
पर प्रभु का पार न कोई पाती है 

इस दृश्य को देख
ब्रह्मा का मन भटका था
ब्रह्मा तो मोहित हो गए
ये कैसे भगवान है 
जो सबकी जूठन खाते हैं
ये तो भगवान नहीं हो सकते
अगर भगवान  हैं तो
परीक्षा लेनी होगी 
सोच ब्रह्मा ने एक माया रची

क्रमशः .........