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गुरुवार, 28 जून 2012

कृष्ण लीला ………भाग 54




इक दिन कान्हा ग्वाल बालों संग
वन में विचरण करते थे
भांति भांति के खेल 
खेला करते थे
जब सब मिल कलेवा करने लगे
तब भोजन कम पड़ गया
किसी की ना क्षुधा शांत हुई
कान्हा से सब कहने लगे
आज तो भूख मिटी नहीं
कोई उपाय करना होगा
ये सुन अंतर्यामी ने विचार किया
पास के वन में मथुरावासी 
ब्राह्मण स्त्रियाँ मेरी
दर्शनाभिलाषी हैं
आज उनका मनोरथ 
सुफल करना होगा
ये सोच  प्रभु ने
ग्वाल बालों को
ब्राह्मणों के पास भेज दिया
अज्ञानता और कर्म के अभिमान में
आकंठ डूबे ब्राह्मणों ने
ना श्याम बलराम की महिमा जानी
जब तक हवन पूजन ना पूरा होगा
किसी को कुछ ना मिलेगा
ये देवताओं के नाम 
यज्ञ हम करते हैं
यज्ञ पूर्ण होने पर ही
सबको प्रसाद मिलेगा
उन  ब्राह्मणों ने कान्हा को
साधारण बालक ही जाना
जिसके नाम का हवन करते थे
उसी आदिशक्ति को ना पहचाना
कोरे ज्ञान की महिमा गाते थे
असलियत को ना पहचान पाते थे
उदास हो ग्वालबालों ने
सारा किस्सा बतलाया है
सुन प्रभु ने उन्हें
दूजा उपाय बतलाया है 
अब की बार तुम सब 
उनकी पत्नियों के पास जाना
जाकर उनसे भिक्षा माँग लाना
वे बड़ा आदर सत्कार करेंगी
जो तुम चाहोगे वे सब देंगी
जब ग्वाल बालों ने जाकर
कृष्ण इच्छा बतलाई
सुन ब्राह्मण पत्नियाँ हर्षायीं
मनसा वाचा कर्मना 
केशव मूर्ति के दर्शन की
वो इच्छा रखती थीं
सोने चांदी के थालों में
हर्षित हो बड़े प्रेम से
मेवा , मिठाई, पकवान , पूरी
कचौरी, दूध , दही , मक्खन रख
ग्वाल बालों संग
केशव मूर्ति के दर्शन को चलीं
पतियों का कहा भी  ना माना
आज तो प्रेम था परवान चढ़ा 



इक ब्राह्मणी को उसके पति ने
बरजोरी घर में बंद किया
उसने उसी क्षण अपना
पंचभौतिक शरीर छोड़ दिया
और सबसे पहले पहुंच 
प्रभु के चरणों में
खुद को समर्पित किया
प्रभु की दिव्य ज्योति में 
स्वयं को लीन किया
इधर अन्य स्त्रियाँ जब पहुंची थीं
प्रभु की शोभा निरख
अति हर्षित हुई थीं 
साँवली सूरतिया
पीताम्बर ओढ़े
एक हाथ में कमल लिए
गले में वनमाला और
मस्तक पर मयूरपंख
प्रभु के स्पर्श से 
शोभायमान होते थे
जिन्हें देख ब्राह्मणियों के
नयन पुलकित होते थे
नयन कटोरों से 
रसपान करती थीं
प्रभु की छवि को 
नेत्र मार्ग से भीतर ले जा
आलिंगन करती थीं
और ह्रदय ज्वाल शांत करती थीं
जब प्रभु ने जाना
ये सब छोड़ मेरे पास आई हैं
सिर्फ मेरे दरस की 
लालसा ही इनमे समायी है
तब प्रभु ने उनका स्वागत किया
और उनके प्रेम को स्वीकार किया
अब तुम मेरा दर्शन कर चुकीं
तुम्हारा आतिथ्य भी हमने स्वीकार किया
मगर अब बहुत विलम्ब हुआ
तुम्हारे पति यज्ञ करते हैं
तुम्हारे बिना ना
यज्ञ सम्पूर्ण होगा
जाओ अब तुम प्रस्थान करो
सुन ब्राह्मण पत्नियों ने कहा
प्रभु आपकी ये बात निष्ठुर है
श्रुतियां भी यही गाती हैं
जिसने संपूर्ण समर्पण किया
जीवन अभिलाषा का त्याग किया
उसे ना फिर संसार में लौटना पड़ा
अपने प्रियजनों की आज्ञा का 
उल्लंघन कर तुम्हारे पास आई हैं
अब ना हमारे पिता , पुत्र, भाई
पति,बंधु- बांधव
ना कोई हमें स्वीकार करेंगे
अब आपके चरण कमलों के सिवा
ना कोई ठिकाना पाती हैं
इतना सुन मोहन बोल पड़े
अब ना तुम्हारा कोई 
तिरस्कार करेगा
उनकी तो बात ही क्या
सारा संसार तुम्हारा सम्मान करेगा
क्योंकि अब तुम मेरी बन गयी हो
मुझसे युक्त हो गयी हो
जो मेरा बन जाता है
फिर वो सबके मन को भाता है
उसे मेरा ही स्वरुप मिल जाता है
इसलिए हर मन में उसे देख
आनंद समाता है 
अब तुम जाओ 
मन मेरे को तुमने दे दिया है
पर गृहस्थ धर्म का भी तो 
निर्वाह करना होगा
और अपने पतियों में ही
मेरा दिग्दर्शन करना होगा
हे प्रभु एक स्त्री यहाँ आती थी
पर उसके पति ने रोक लिया
ना जाने उसका क्या हुआ
ये सुन प्रभु ने उसका
चतुर्भुजी रूप दिखला दिया
जब ब्राह्मण पत्नियाँ वापस आई हैं
जिनके मुखकमल पर 
दिव्य आभा जगमगाई है
जिसे देख ब्राह्मणों को
बुद्धि आई है
अब अपनी अज्ञानता का
उन्हें भान हुआ
जिस प्रभु के दर्शन 
ध्यानादिक  में भी 
नहीं मिलते हैं'
वो आज स्वयं यहाँ पधारे थे
हमारे जन्मों के पुण्यों को
सुकृत करने आये थे
हाय ! हमने ना उन्हें पहचाना
हमारे पत्थर ह्रदयों में 
ना दया का भान हुआ
अभिमान के वृक्ष ने
कैसा बुद्धि को भ्रमित किया
हमारे जीवन को धिक्कार है
सिर धुन - धुन कर पछताते हैं
निज पत्नियों को बारम्बार
शीश नवाते हैं
उनके प्रेम के आगे
नतमस्तक हुए जाते हैं
और प्रभु से क्षमा का दान
मांगे जाते हैं
जब पश्चाताप की अग्नि से
ब्राह्मणों का ह्रदय निर्मल हुआ
तब प्रभु ने उनका 
सब अपराध क्षमा किया
जिसने अपनी पत्नी को रोका था
जब घर में जाकर देखा
उसके मृत शरीर को पाया
ये देख सिर धुन- धुन कर 
वो पछताया
तब ब्राह्मण पत्नियों ने उसे
सारा हाल बतलाया
दौड़ा -दौड़ा प्रभु चरणों में वो आया
अपने अपराध पर बहुत पछताया
तब उसकी स्त्री की भक्ति के प्रभाव से
प्रभु ने उसे भी चतुर्भुज बनाया
और निज धाम में 
दोनों को भिजवाया
अब प्रभु ने ग्वालबालों संग
भोजन का आनंद लिया
मुरली बजा गायों को 
समीप बुला लिया
और वृन्दावन को प्रस्थान किया


क्रमश: ……………


शुक्रवार, 22 जून 2012

कृष्णलीला……भाग 53




गोपियों को प्रभु मिलन की चाह लगी
मनोरथ पूर्ण करने को अगहन में 
कात्यायिनी देवी का व्रत करने लगीं
हविष्यान्न खाती थीं 
चन्दन, फूल, नैवेद्य, धूप -दीप से
पूजन करती थीं 
हे महामाये , महायोगिनी
तुम्हें नमन हम करती हैं
नंदनंदन को पति बना दीजै
ऐसी प्रार्थना करती हैं
ऐसे गोपियाँ आराधना करती हैं
प्रतिदिन यमुना स्नान को जाती हैं
और ठन्डे पानी में डुबकी लगाती हैं 
फिर देवी का पूजन करती हैं
एक दिन जैसे ही वस्त्र उतार
यमुना जी में प्रवेश किया
गोपियों की अभिलाषा जान
प्रभु ने इक खेल किया
सब गोपियों के वस्त्र चुरा 
कदम्ब पर बैठ गए 
हँसी- ठिठोली करने लगे
गोपियों का ह्रदय 
प्रेम रस में भीग गया 
कान्हा से विनती करने लगीं
तुम्हारी दासी हैं चितचोर
हमारे वस्त्र लौटा दीजिये
हमें अपनी शरण में लीजिये
ठण्ड में ठिठुरी जाती हैं
कुछ तो हम पर रहम कीजिये
जब प्रभु ने जाना
ये सर्वस्व समर्पण कर चुकी हैं
तब कान्हा बोल पड़े
अपने- अपने वस्त्र आकर ले जाओ
गुप्तांगों को छुपाकर 
यमुना से जब बाहर आयीं
तब उनके शुद्ध भाव से
मोहन प्रसन्न हुए
वस्त्र कंधे पर रख लिए
और कहने लगे
तुमने जो व्रत लिया है
उसे मैंने जान लिया है 
तुमने अच्छी तरह निभाया
ये भी मैंने मान लिया
पर एक त्रुटि कर डाली
जब तक ना पश्चाताप करोगी
तब तक ना व्रत का 
संपूर्ण फल लोगी
तुमने यमुना में 
नग्न होकर स्नान किया
वरुण देवता और यमुना का
अपराध किया 
दोष शांति के लिए
हाथ उठा सिर से लगाओ
और प्रणाम करो
फिर अपने वस्त्र ले जाओ
प्रभु की बातों पर
भोली गोपियों ने 
विश्वास किया
व्रत में आई त्रुटि का
परिमार्जन किया
जैसा नंदनंदन ने कहा
वैसी ही आज्ञा का पालन किया 
जब प्रभु ने देखा
सब मेरी आज्ञा का 
पालन करती हैं
तब करुनामय ने
उनके वस्त्र दिए
प्रभु ने कैसी अजब लीला की
पर तब भी ना 
किसी गोपी के मन में 
क्षोभ हुआ 
उसे अपना ही दोष माना
कैसे मोहन ने सबका 
मन वश में कर रखा था 
जब सबने वस्त्र पहन लिए
पर एक पग ना आगे धरा
प्रभु पूजन की इच्छा 
मन में समायी थी
पर लज्जावश कुछ ना कह पाई थीं
अंतर्यामी ने सारा 
भेद जान लिया
शरदपूर्णिमा पर 
मनोरथ पूर्ण करूंगा
कह इच्छा को बल दिया
गोपियाँ प्रभु मिलन की लालसा में
दिन गुजारने लगीं
शरद पूर्णिमा का 
इंतजार करने लगीं
पर यहाँ ज्ञानीजन
चीरहरण के भेद बताते हैं
सभी अपने अपने मत 
बतलाते हैं
हर शंका  मिटाते हैं



जैसे प्रभु चिन्मय 
वैसे उनकी लीला चिन्मय
यूँ तो प्रभु की लीलाएं
दिव्य होती हैं
सर्वसाधारण के सम्मुख
ना प्रगट होती हैं
अन्तरंग लीला में तो
गोपियाँ ही प्रवेश कर पाती हैं
गोपियों की चाहना थी 
श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण
रोम रोम कृष्णमय हो जाये
इसके लिए साधना करती थीं
घर परिवार की ना चिंता करती थीं
लोक लाज का त्याग किया
प्रभु नाम का संकीर्तन किया
पर फिर भी ना पूर्ण समर्पण हुआ
लीला की दृष्टि से थोड़ी कमी थी
निरावरण रूप से नहीं जाती थीं
थोड़ी झिझक बीच में आती थी
साधक की साधना तभी 
पूर्ण मानी जाती है
जब आवरण हटा दिया जाता है
कोई भेद ना किसी में रहता है
उनका संकल्प तभी पूर्ण कहाता है
जब प्रभु स्वयं आकर 
संकल्प पूर्ण करते हैं
ब्रह्म जीव का जब 
भेद मिट जाता है
वो ही पूर्ण साक्षात्कार कहाता है
यूँ तो लीला पुरुषोत्तम 
जब भी लीला करते हैं
किसी मर्यादा का ना
उल्लंघन करते हैं
साधना मार्ग में विधि का अतिक्रमण
गोपियाँ अज्ञानतावश करती थीं
पर उसका मार्जन करवाना था
प्रेम के नाम पर विधि का उल्लंघन 
ना कान्हा को भाता था 
इसलिए गोपियों से 
प्रायश्चित करवाया
चराचर प्रकृति के अधीश्वर
स्वयं कर्ता, भोक्ता और साक्षी हैं
कोई ना व्यक्त अव्यक्त पदार्थ यहाँ
जिसका उन्हें भान ना हो 
या जो उनसे विलग हो
सब उनका और वो सबमे 
व्याप्त रहते हैं 
ये भेद तो सिर्फ
दृष्टि में रहते हैं
गोपियाँ पति रूप में चाहती थीं
वो पति जो उनकी 
आत्मा का स्वामी हो
देह से परे साक्षात्कार पाती थीं
आम जन की दृष्टि 
देह तक ही सीमित होती है
वो क्या जाने दिव्यता प्रेम की
जिसकी बुद्धि विषय विकारों में ही
लिप्त रहती है
जब साधक पर प्रभु की
अहैतुकी कृपा बरसती है
तब ही उसकी बुद्धि 
प्रभु भजन में लगती है
जब सत्संग मनन करता है
तब प्रभु केवट बन 
भवसागर पार करते हैं
जन्म जन्मान्तरों के बंधनों से
जीव को मुक्त करते हैं
तब दिव्यानंद का अनुभव होता है
परम विश्रांति का अधिकारी बन जाता है
जब प्रभु से चिर संयोग होता है
और गोपियाँ कोई
साधारण ग्वालिनें ही नहीं थीं
ये तो प्रभु की नित्यसिद्धा 
प्रकृतियाँ थीं
जो प्रभु इच्छा से लीला में
प्रवेश पाती थीं
जन्म जन्मान्तरों के 
कलुमश  मिटाती थीं 
जब प्रभु गोपियों को 
निरावरण हो सामने बुलाते हैं
यहाँ तरह तरह के भाव आते हैं
प्रभु जानते थे
मुझमे उनमे ना कोई भेद है
पर अज्ञानतावश गोपियाँ
वो भेद ना पाती हैं
यहाँ प्रभु ये समझाते हैं
साधक की दशा बताते हैं
भगवान को चाहना
और साथ में संसार को भी ना छोड़ना
संस्कारों में उलझे रहना
माया का पर्दा बनाये रखना
द्विविधा की दशा में 
साधक जीता है
वो माया का आवरण 
नहीं हटा पाता है
सर्वस्व समर्पण ना कर पाता है
यहाँ भगवान गोपियों के माध्यम से
सिखाते हैं
संस्कार शून्य निरावरण होकर
माया का पर्दा हटाकर 
अपना सर्वस्व समर्पण 
करना ही कल्याणकारी होता है
जहाँ जाकर ही
ब्रह्म जीव का भेद मिटता है 
यह पर्दा ही व्यवधान उत्पन्न करता है 
जब ये पर्दा हट जाता है
तब प्रेमी निमग्न हो 
स्वयं को भी भूल जाता है
लोग लाज को त्याग
प्रभु मिलन की उत्कंठा में
दौड़ा जाता है
वस्त्रों की सुधि भुला देता है
अपना आप मिटा देता है
जब कृष्ण ही कृष्ण नज़र आता है
तब वो ही प्रभु के प्रति
विशुद्ध प्रेम कहाता है
यहाँ प्रभु बतलाते हैं
प्रेम, प्रेमी और प्रियतम
के मध्य पुष्प का पर्दा भी
नहीं रखा जाता है 
क्योंकि प्रेम की प्रकृति यही है
सर्वथा व्यवधान रहित 
अबाध अनन्त मिलन
जब प्रेमी इस दशा को पाता है
तभी स्वयं भी प्रेममय बन जाता है
गोपियां लज्जावनत मुख किये आती हैं
पुराने संकार ना जाते हैं
पर प्रभु इशारे में बतलाते हैं
तुमने कितने त्याग किये
घर बार की मोह माया को त्यागा है
फिर इस त्याग  में क्यों
संकोच की छाया है 
गोपियाँ तो निष्कलंक कहाती हैं
इसलिए त्याग के भाव का भी त्याग
उसकी स्मृति का भी त्याग करना होगा
जहाँ सब संज्ञाशून्य होगा 
तभी पूर्ण समर्पण होगा
और जब गोपियाँ इस भाव में डूब गयीं
जब दिव्य रस के अलौकिक 
अप्राकृत मधु रस में छक गयीं 
फिर ना देह का भान रहा 
जब प्रेमी आत्मविस्मृत हो जाता है
तब उसका दायित्व प्रियतम पर आ जाता है
जब प्रभु ने देखा 
इनका पूर्ण समर्पण हुआ
इन्हें ना कोई भान रहा
तब मर्यादा की रक्षा हेतु
उनको वस्त्र दिया
और उन्हें हकीकत का भान कराया
शारदीय रात्रि में कामना पूर्ण का वचन दिया
यहाँ प्रभु ने साधना सफल होने की
अवधि निर्धारित की
जिससे स्पष्ट हुआ 
प्रभु में काम विकार की 
ना कल्पना हुई 
कामी (आम) मनुष्य अगर वहाँ होता
वस्त्रहीन स्त्रियों को देख
क्षणमात्र भी ना वश में रहता 
जो वस्त्र प्रभु सम्मुख जाने में
विक्षेप उत्पन्न करते थे
वो ही वस्त्र प्रभु स्पर्श से
प्रसाद स्वरुप हुए
इसका कारण भगवान से 
सम्बन्ध दर्शाता है
जब प्रभु ने वस्त्र स्पर्श किया
तब प्रभु स्पर्श से वस्त्र भी
अप्राकृत रसात्मक हो गए
कहने का ये तात्पर्य हुआ
संसार तभी तक 
विक्षेपजनक होता है
जब तक ना साधक का
भगवान से सम्बन्ध और
भगवान का प्रसाद ना बन जाता है
तब वो प्रभु का स्वरुप ही बन जाता है
आनंद में सराबोर हो जाता है
उसके लिए तो नरक भी
बैकुंठ बन जाता है
स्थूलताओं से परिवेष्ठित 
मानव बुद्धि जड़ बँधन तक ही
सीमित रहती है
प्रभु की दिव्य चिन्मयी लीलाओं की
कल्पना भी नहीं  कर सकती है
कोई यदि कृष्ण को
भगवान ना भी माने
तब भी तर्क और युक्ति के आगे
कोई बात ना टिक पाती है
जो कृष्णे के चरित्र पर 
लांछन लगाती हो
मात्र ग्यारह वर्ष की अवस्था तक
प्रभु ने बृज में वास किया
और रास लीला का समय 
यदि दसवां वर्ष माना जाये
और नवें वर्ष में मानो
चीरहरण लीला हुई
कैसे कोई कह सकता है
आठ नौ वर्ष के बालक में
कामोत्तेजना हुई
गर गाँव की ग्वालिनें
प्रभु की दिव्यता को जानतीं
तो कैसे उनके लिए
इतना कठिन व्रत करतीं
आज भी राम- सा वर पाने को
कुंवारी कन्या व्रत रखती हैं
वैसे ही उन कुमारियों ने
कृष्ण को पाना चाहा
और व्रत पूजन किया
फिर कैसे इसमें दोष समाया है
ये तो अज्ञानियों की
तुच्छ बुद्धि को दर्शाता है
ये तो प्रभु ने नग्न स्नान की कुप्रथा
मिटाने को चीरहरण किया
जीव ब्रह्म के बीच
माया का पर्दा हटाना ही
चीरहरण कहलाता है
जिसके भेद अज्ञानी मूढ़ 
ना जान पाता है


क्रमश: ……………

रविवार, 10 जून 2012

कृष्ण लीला……भाग 52




प्रभु नित्य नयी लीला करते हैं
जन जन को मोहित करते हैं
इक दिन ग्वाल बालों की इच्छा पर
मोहन मुरली बजाने लगे
मुरली की धुन सुन 
जड़ चेतन मोहित हो गए
यमुना का जल ठहर गया
पक्षी उड़ना भूल गए
गायों ने चरना छोड़ दिया
बछड़े दूध पीना भूल गए
मृगादिक चित्रलिखे से 
खड़े रह गए
देवता भी स्त्रियों सहित
आकाश में आ गए
पुष्प  वर्षा करने लगे
जड़ चेतन में ना कुछ भेद रहा
दिव्य गुंजार होने लगा 
मुरली ने यूँ सम्मोहित किया
मनहर प्यारे ने सबका मन हर लिया
बंसी की धुन सुन 
गोपियाँ सुध बुध भूल गयीं
प्रभु की मोहक छवि में डूब गयीं
जब ब्रजनाथ का दर्शन होगा
अब तो तभी आँखों को चैन मिलेगा
दूसरी गोपी बतियाने लगी
ना जाने कौन सा है गुण भरा 
जो बंसी ने उनके ह्रदय पर राज किया
क्षण भर ना अलग ये होती है
अधरामृत को ही पीती है
तीसरी गोपी कहने लगी
इस बंसी ने बांस के तन से जन्म लिया
धूप , बारिश , ताप सहा
एक पाँव पर खडी रह
प्रभु का तप किया
फिर पोर पोर कटवाकर
आँच का ताप सहा 
तब जाकर इसने सीधापन पाया
निश्छल निष्कपट ही प्रभु के मन को भाया
ऐसा तप ना किसी ने किया 
तभी तो प्रभु ने इसका वरण किया 
एक ब्रजबाला बोली 
प्रभु मुझे बांस  बना देता 
फिर आठों याम मोहन के 
अधरों से लगी रहती 
नित्य अमृत चखा करती
इक बोली देखो तो ज़रा
कैसे प्रभु के अधरों पर 
शोभा देती है
जिसके पोर पोर में
प्रभु अपना रस भर देते हैं
जिसे सुन मुर्दे भी जी उठते हैं
जिस वन में इसका बांस उगा
उसके जाति भाई भी खुश होते हैं 
इसकी धुन सुन देवताओं की
स्त्रियाँ भी सुध बुध खो देती हैं
कब कमर से घुँघरू गिरते हैं
कब केश खुल जाते हैं
ज़रा सी सुध नहीं रहती
बस प्रभु मिलन की 
आकांक्षा जगती है


इक बोली देवियों की तो बात ही क्या
जब मोहन मुरली में स्वर फूंकते हैं
गौएं अपने कर्ण दोने खड़े कर लेती हैं
मानो अमृत पान कर रही हों
नेत्रों से अश्रुपात होने लगता है
और बच्चों की दशा तो निराली होती है
गायों के थनों से दूध
स्वयमेव झरने लगता है
जब वो दुग्धपान करते करते
मधुर तान श्रवण करते हैं
तब मूँह में लिया घूँट 
ना उगल पाते हैं
ना निगल पाते हैं
और आनंद विभोर हो जाते हैं
नयनों से सावन भादों 
बरसने लगते हैं
कुछ ऐसे सुध बुध बिसरा देते हैं
एक सखी बोली ये
तो घर की वस्तु हैं
पक्षियों को तो देखो
वंशी की धुन सुन
निर्मिमेष दृष्टि से 
योगी की तरह स्थिर 
आसन हो जाता है
अपलक निहारा करते हैं
इक सखी बोली 
चेतन का तो कहना क्या
जड़ नदियों को ज़रा निहारो
इनमे पड़ते भंवर 
मोहन से मिलन की 
तीव्र आकांक्षा को इंगित करते हैं
मानो तरंगों ने प्रभु के
चरण कमलों को पकड़ा हो
अपना ह्रदय निछावर किया हो
इक सखी बोली
ये तो फिर सब 
वृन्दावन की वस्तु हैं
कैसे ना प्रभु पर रीझेंगी
पर उन बादलों को तो देखो
जब मोहन धूप में 
गौएं चराते हैं 
और बांसुरी बजाते हैं
तब इनमे प्रेम उमड़ आता है
और श्याम पर श्यामघन
मंडराने लगते हैं
श्वेत कुसुम सी बूँदें गिरने लगती हैं
मानो सर्वस्व प्रभु को 
अर्पण कर रहे हों 
निश्छल प्रेम को समर्पण कर रहे हों
इक सखी कहने लगी
वो भिलनियाँ भाग्यशाली हैं
जो प्रभु प्रेम में 
विह्वल हुई जाती हैं 
जब प्रभु घास पर चलते हैं
उस पर उन चरणों की 
केसर लग जाती है
जिसे वो अपने ह्रदय और 
मुख पर मल लेती हैं 
कुछ विरह पीड़ा शांत कर लेती हैं
इक सखी कहने लगी
वो गिरिराज गोवर्धन का
भाग्य निराला है
प्राणवल्लभ के चरणों का
स्पर्श पाता है
और खूब इठलाता है
उस सा भाग्य ना कोई पाता है


इस वंशी ने तो 
सबका मन लुभाया है
सखी बस हमें ही बिसराया है
मोहन की छवि ही समायी रहती है
आँखों की किवड़िया ना बंद होती है
इस जादूभरी  वंशी का 
जादू निराला है 
वृन्दावन वासियों को जिसने
मोहित कर डाला है
इक दिन सुने बिना भी
जियरा चैन ना पाता है 
सखी मोहन की वंशी की तान
में ही हमारा चैन मुकाम पाता है
ऐसे वंशी का गुणगान 
नित्य किया करती हैं
ह्रदय तपन मिटाया करती हैं 
यूँ सारा दिन गुजारा करती हैं 
और संध्या समय गोधूलि वेला मे 
प्रभु को निहार अपने नयनों को 
शीतल किया करती हैं 
हर पल बस मोहन की 
लीलाएं निहारा करती हैं



क्रमश:…………

मंगलवार, 5 जून 2012

कृष्ण लीला ……भाग 51




इधर वर्षा ऋतु ने 
अपना रंग जमाया है 
ताप से दग्ध ह्रदयों को
शीतलता पहुँचाया है
घनघोर घन घिर घिर आते हैं
दामिनी दमकने लगती है
सूर्य चन्द्रमा तारे
सब ढक जाते है 
आकाश यूँ शोभा पाता है
मानो जैसे गुण स्वरुप  होने पर भी
जीव माया के आवरण में ढक जाता है
अपना स्वरुप भूल जाता है
आठ महीनों तक सूर्य ने
मानो पृथ्वी से जल ग्रहण किया हो
और अब  मानो उसने जल बरसा
राजा समान कर्त्तव्य निभाया हो
जैसे दयालु पुरुष दया परवश
अपना जीवन न्योछावर करते हों 
वर्षा ऋतु का निराला वर्णन किया है
वर्षा होने से चहुँ ओर
हरियाली का पहरा हुआ है
वृन्दावन की छटा तो 
जैसे बड़ी निराली है
वृक्ष फलों से लद गए हैं
पक्षी मीठी बोली बोलने लगे हैं
नदी- नाले तालाब सब भर गए हैं
पर्वतों से झर- झर झरने झर रहे हैं
वृक्षों की पंक्तियाँ मधुधरा
उंडेल रही हैं
गोप गोपियाँ मल्हार गाते हैं
वस्त्राभूषण पहन इठलाते हैं
ऐसे वर्षा ऋतु  ने रंग जमाया है
वृन्दावन को मोहक बनाया है
इसमें प्रभु मनोहारी लीलाएं करते हैं
सभी जीवों को सुख पहुंचाते हैं 


वर्षा ऋतु के बीतने पर
शरद ऋतु ने पदार्पण किया
जल भी निर्मल हो गया
वायु मंद बहने लगी
कमलों से जलाशय भरने लगे
मानो योगभ्रष्ट पुरुषों का चित्त 
निर्मल हो गया हो
और फिर से योग की तरफ
मुड गया हो
शरद ऋतु ने पृथ्वी की कीचड़
मटमैलापन सब मिटा दिया
जैसे भगवान की भक्ति  जीवों के 
कष्टों और अशुभों का नाश करती है 
समुद्र का जल भी 
धीर गंभीर और शांत हुआ
मानो आत्माराम पुरुष का मन
निः संकल्प होने पर शांत हुआ
जैसे राजा के आगमन से 
चोर डाकू छुप जाते हैं
और प्रजा निर्भय हो जाती है
वैसे ही सूर्योदय के कारण
कुमुदिनी को छोड़ 
सभी कमल खिल जाते हैं
ऐसी शरद ऋतु ने अब 
अपना प्रभाव बनाया है 
जिसने वृन्दावन को
खास बनाया है


क्रमश:…………