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रविवार, 26 अगस्त 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी ………भाग 64

पिछली बार आपने पढा कि प्रभु मधुबन मे कदम्ब के नीचे आँख बंद किये अधरों पर वेणु धरे मधुर तान छेड रहे हैं जिसे सुनकर गोपियाँ बौरा जाती है और जो जिस हाल मे होती है उसी मे दौडी आती है ………अब उससे आगे पढिये…………




जब प्रभु ने आँखें खोलीं
गोपियों को अपने सम्मुख पाया
प्रभु ने गोपियों का स्वागत किया
आओ आओ गोपियों
तुम्हारा स्वागत है
कहो कैसे आना हुआ
जैसे  ही बोला
गोपियों के अरमानों पर तो
जैसे पाला पड़ गया
जैसे कोई आपको घर बुलाकर पूछे
कहो क्यों आये हो
तो इससे बढ़कर उसका
और क्या अपमान होगा
इधर प्रभु अपनी रौ में बोले जाते थे
अच्छा अच्छा तुमने
ये शरद पूर्णिमा की रात्रि नहीं देखी
वो ही देखने आई हो ----देखो देखो
अच्छा तुमने ये यमुना का
कल कल करता निनाद नहीं सुना
सुनो सुनो
अच्छा तुमने ये रंग बिरंगे
पुष्पों से लदे वन की शोभा नहीं देखी
अच्छा अब तो तुमने सब देख  लिया ना
अब अपने अपने घर जाओ
तुम्हारे घरवाले राह देखते होंगे
अकेली स्त्री का रात को घर से निकलना ठीक नहीं
तुम्हें लोकनिंदा का तो
डर रखना चाहिए था
जब प्रभु ने बहुत उंच नीच समझाई
मगर गोपियाँ तो सिर्फ
अश्रुजल बहाती रहीं
निगाह नीची किये
अंगूठे के नाखून से
जमीन कुरेदती रहीं
तब प्रभु बोले
मैं इतनी देर से बोले जाता हूँ
कुछ  तुमको सुनाई भी देता है
या तुम सारी गूंगी हो गयी हो
और ये बताओ तुम
अंगूठे  के नाखून से
ये क्या कर रही हो?
इतना सुन बाकी गोपियाँ तो खामोश रहीं
मगर एक चंचल चपल
गोपी बोल पड़ी
दिखता नहीं क्या
गड्ढा कर रही हैं
प्रभु ने पूछा ,"क्यों"
बोली, कभी तो गड्ढा होगा
उसी में हम सब दब मरेंगी
क्योंकि तुझ जैसे
निर्दयी  से पाला जो पड़ गया है 
एक तो पहले आवाज़ देकर बुलाते हो
और अब हमें ऊंची ऊंची
ज्ञान की बातें सुनाते हो
हम तो अपने पति , बच्चे
भाई बांधव , घर परिवार
सब छोड़कर आई हैं
अपना सर्वस्व  समर्पण तुम्हें किया है
और अब तुम्हीं हमें
दुत्कारते हो
तो बताओ अब हम कहाँ जायें
वापस जा नहीं सकतीं
और तुम स्वीकारते नहीं
तो इसी गड्ढे में ही दब मरेंगी
इतना सुन प्रभु बोले
गोपियों मै तुम्हारे भले की बतलाता हूँ
अपने पति की आज्ञा में
चलना ही पत्नी का परमधरम होता है
पति चाहे जैसा हो उसकी
सेवा सुश्रुषा करना ही उसको शोभा देता है
ऐसे अर्धरात्रि में पर पुरुष के पास जाना
कुलीन स्त्रियों को ना भाता है
मैं तुम्हें एक ऐसे जोड़े
के बारे में बतलाता हूँ
पतिव्रत धर्म की महिमा समझाता हूँ
एक पति पत्नी का जोड़ा
रोज हवन करता था
और नियम से गुजर बसर करता था
एक दिन वो आँगन में
गेहूं बिन रही थी
तभी पति लकड़ियाँ काट कर आया
और पत्नी के घुटने पर
सिर रख कर लेट गया
तभी उसको गहरी नींद ने दबोच लिया
इधर उनका ढाई वर्ष का पुत्र
आँगन में खेल रहा था
वहीँ पास में
अग्निकुंड जल रहा था
बच्चा खेलते खेलते
हवनकुंड पर चढ़ गया
इधर माँ का ध्यान जैसे ही
बच्चे पर गया
वो उठकर बचाने को आतुर हुई
तभी देखा पतिदेव सो रहे हैं
अगर इन्हें जगाकर उठती हूँ
तो पत्नीधर्म खंडित होता है
और नहीं उठती तो
मेरा पुत्र हवनकुंड की भेंट चढ़ता है
बेटे तो और मिल जायेंगे
मगर पति ना रहा तो कहाँ जाऊंगी
सोच वो अश्रु बहाने लगी
तभी दो बूंद अश्रुओं को
पतिदेव के मुख पर गिर पड़ीं
पति एकदम उठा और बोला ---क्या हुआ ?
मगर क्या हुआ  वो तो ना उसने जवाब दिया
बल्कि हाय मेरा लाल हाय मेरा लाल
कहती दौड़ पड़ी
तब तक बच्चे ने
हवनकुंड में
छलांग लगा दी थी
जैसे ही हवनकुंड की तरफ गयी
देखा कि बच्चा अग्निदेव  के
हाथों में खेल रहा है
पतिव्रता  स्त्री के बच्चे को
मैं कैसे जला सकता हूँ माँ
तुम्हारा पुत्र जीवित सकुशल है
कह उनका पुत्र उन्हें दिया
इतना कह प्रभु ने बतलाया
देखो पतिव्रत धर्म की
कितनी भारी महिमा है
जिसके आगे मृत्यु भी शीश नवाती है
देवता भी हार मान जाते हैं
ये पतिव्रत धर्म की महिमा न्यारी है
इतना कह प्रभु चुप हुए
ये सुन एक चपला सी
गोपी बोल उठी
पंडित जी महाराज
आपने कथा सुनाई
क्या हम भी एक कथा सुना सकते हैं
सुन कान्हा बोले , सबको बोलने का अधिकार है
तुम भी जो चाहे कह सकती हो
तुमसे भी ज्यादा
पतिव्रत धर्म को मानने वाला
जोड़ा हमारे पास है
वो ऐसी पतिव्रता नारी थी
जो पति के उठने से पहले उठ जाती
उसको  नहलाने के बाद नहाती
उसे भोजन कराने के बाद
स्वयं खाती
उसके सोने के बाद ही खुद सोती
अर्थात हर कार्य
पति के बाद ही करती
एक बार कार्यवश
उसके पति को विदेश जाना पड़ा
सुन वो उदास हुई
कैसे अब मैं रहूँगी
अपनी व्यथा पतिदेव को कही
तब उसके पति ने
अपना एक फोटो उसे दिया
तुम अपनी सारी क्रियाएं
इस फोटो के साथ किया करना
इसी को मेरा प्रतिरूप मान लेना
ये आश्वासन दे पति
विदेश चला गया
अब वो फोटो को ही
सब कुछ मानने लगी
हर क्रिया उसी के साथ करने लगी
उसे सुलाकर खुद सोती
उसे भोग लगाकर खुद खाती
बरसों यूँ ही बीत गए
एक दिन आया दीपावली का त्यौहार
उसने बनाये तरह तरह के पकवान
जैसे भी भोग लगाने बैठी
वैसे ही विदेश गया पति
भी आ पहुँचा
और उसने दरवाज़ा खटखटा दिया
देवी दरवाज़ा खोलो
देवी दरवाज़ा खोली
इतना कह गोपी पूछ बैठी
कहो पंडित जी महाराज
अब वो नारी क्या करे
उस फोटो  वाले को भोग लगाये
या जो दरवाज़े पर खड़ा है
उसे अन्दर बुलाये
ये सुन भगवान की
बोलती बंद हो गयी
और मंद मंद मुस्कुराने लगे
गोपी बोली यूँ मुस्कुराने से
ना काम चलेगा
मुँह भी खोलना पड़ेगा
इतना सुन कान्हा बोले
इसमें कौन सी बड़ी बात है
अगर बड़ी बात नहीं
तो बताते क्यों नहीं
गोपी ने उच्चारण किया
अरे जब असली का पति
आ ही गया
तो फिर नकली के
फोटो के पति की क्या जरूरत बची
उठे ,जाये और दरवाज़ा खोले
और असली पति को ही भोग लगाये
कान्हा ने जवाब दिया
सुन गोपी बोली
लो पंडित जी महाराज
तुम्हारा ही सवाल
और तुम्हारा ही जवाब
हम भी तो यही कहती हैं
जब हमें हमारे
परम पति मिल ही गए हैं
अर्थात तुम मिल गए हो
तो फिर इन माटी के पुतलों
अर्थात फोटो के पतियों
का हम अब क्या करें
हमने तो अपना सर्वस्व 
तुम्हें ही समर्पित किया है
तुम ही तो हमारे प्राण धन हो
जिसे पाने को हमने
मानव जन्म लिया
जब तुमसे नाता जोड़ लिया
जब तुम हमारे बन गए
फिर इस स्वप्नवत
संसार का हम करें क्या
जिस कारण जीव जन्म लेता है
जब अपना होना जान लेता है
फिर ना उसका संसार से
कोई प्रयोजन रहता है
सब संसार उसे मिथ्या ही दिखता है
सब दृष्टि विलास हो जाता है
जब जीव और ब्रह्म का मिलन हो जाता है





क्रमश:…………

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी ………भाग 63


लो आ गयी शरद पूर्णिमा की रात्रि
जब चन्द्रमा  अपनी सोलह
कलाओं से परिपूर्ण था
 प्रभु ने योगमाया का आह्वान किया
योगमाये ! कामदेव का
मानमर्दन करना है
और गोपियों का भी
मनोरथ पूर्ण करना है
अब तुम्हें सबसे पहले
मेरा मन बनाना है
क्योंकि प्रभु तो निर्विकार
निर्लेप मनरहित होते हैं
उनमे ना प्रकृति प्रदत्त कोई भी तत्व होते हैं
जैसे बच्चे के साथ हम खेलने के लिए
अपना मन भी बालक जैसा बनाते हैं
वैसे ही आज प्रभु ने भी
अपने प्रेमियों संग खेल करने हेतु
मन बनाने की इच्छा रखी
क्योंकि बिना माया के तो
प्रभु कुछ ना कर पाते हैं
इसलिए योगमाया को समझाते हैं
योगमाये ! आज तुम्हें दिव्य रात्रि बनानी है
रात्रि यूँ तो बारह घंटे की होती है
मगर तुम्हें
बारह घंटे की ना बनाकर
छः माह की बनानी है
कामोद्यीपन के सारे साजो समान भी सजाने हैं
वासंतिक मौसम का आह्वान करो
शीतल सुगन्धित मधुर पवन बहती हो
यमुना का स्वच्छ शीतल जल कलकल निनाद करता हो
मधुर भ्रमर गुंजार करते हों
वृक्ष फलों के बोझ से झुक रहे हों
वन उपवन में बिन मौसम भी
सभी फूल खिल रहे हों
वृक्ष बेमौसम फल दे रहे हों
नयनाभिराम दृश्य बना हो
संगीत नृत्य का भी
सारा सामान जुटा हो
भांति भांति के वस्त्राभूषण
का ढेर लगा हो
हर कोना रसमयी ध्वनि से
गुंजारित हो रहा हो
आज सभी कार्य ऐसे  करने हैं 
कामदेव को कहने का ना मौका मिले
कि समय कम था या
कामोद्यीपन का कोई
सामान कम था
जैसा प्रभु ने समझाया था
वैसा ही वातावरण वहाँ पाया था
ब्रज क्षेत्र तो छोटा पड़ता इसलिए
योगमाया ने
दिव्य वृन्दावन बनाया था
क्योंकि ५६ करोड़ तो
यादवों की स्त्रियाँ ही थीं
इनके अलावा वेदों की ऋचाओं ने भी
शरीर धारण किया
ऋषि रूपा , गन्धर्व रूपा , देवताओं की पत्नियाँ
नागकन्या आदि सभी
इस रात्रि की बाट जोह रही थीं
जन्म जन्मान्तरों की चाह
पूरी करने को आतुर थीं 



 जब मोहक वातावरण प्रभु ने देखा
तब कदम्ब के नीचे खड़े हो
आँख बंद कर
बंसी को होठों पर धर
क्लीं बीज फूंका
क्लीं यानि कामना बीज
वंशी में प्रभु ने ऐसी तान बजाई
जिसे सुन गोपियाँ दौड़ी दौड़ी आयीं
जिसका नाम वंशी में पुकारते थे
सिर्फ उसी गोपी को धुन सुनाई देती थी
बाकी किसी को ना
वो धुन सुनती थी
जैसे ही जिसने अपना नाम सुना
वैसे ही गोपी ने अपनी दशा बिसरायी
ज्यों योगी किसी योग में समाधिस्थ हो
ऐसे हाल हो गया
जो जिस हाल में थी
उसी में दौड़ी आई
कोई गोपी दूध दूह रही थी
जैसे ही आवाज़ सुनी
वो दूध दूहना भूल दौड़ पड़ी
कोई गोपी पति को भोजन कराती थी
एक फुल्का हाथ में
और एक तवे पर था
जैसे ही आवाज़ सुनी
वो फुल्का हाथ में लिए
वैसे ही दौड़ पड़ी
कोई गोपी बच्चे को दूध पिलाती थी
वंशी की धुन सुनते ही
बच्चे को पटक
उसी अवस्था में दौड़ पड़ी
कोई गोपी शरीर में
अंगराग , चन्दन , उबटन
लगा रही थी
वंशी की धुन सुन
उलटे सीधे वस्त्र पहन
दौड़ पड़ी
लहंगे की जगह चादर ओढ़ ली
और चुनरी हाथ में ले दौड़ पड़ी
कोई गोपी सिंगार करती थी
 वंशी की धुन सुन
आंख का अंजन माथे पर
और बिंदी गालों पर लगा दौड़ पड़ी
कोई गोपी आभूषण पहनती थी
वंशी की धुन सुन घबराहट में
हाथ का पाँव में
और गले का हाथ में पहने दौड़ी जाती थी
जो जिस अवस्था में थी
वैसे ही दौड़ रही थी
घरवालों ने कितना रोका
मगर वो ना किसी की सुनती थीं
जैसे कोई वेगवती नदी
सागर से मिलने को
आतुर दौड़ी जाती है
यों सारी गोपियाँ
बिना किसी को देखे
बिना किसी से बोले
बिना इक दूजे को आवाज़ लगाये
आज  ऐसे दौड़ी जाती हैं
आज मंगलमयी प्रेमयात्रा को
विश्राम जो पाना था
कैसे किसी विघ्ने के रोके
वो रुक सकती थीं
क्योंकि उनके मन प्राण  और आत्मा का
आज विश्वभरण ने हरण किया था
कुछ गोपियों के स्वजनों ने
घर द्वार बंद कर रोक लिया
उन्हें ना कहीं से निकलने का मार्ग मिला
तब उन्होंने आँख मूँद
बड़ी तन्मयता से
प्रभु के सौंदर्य , माधुर्य और लीलाओं
 का ध्यान किया
अपने प्रियतम की असह्य
विरह वेदना से
उनका ह्रदय दग्ध हुआ
उसमे जल जो भी
अशुभ संस्कार  थे
भस्मीभूत हुए
और उनका तुरंत ध्यान लग गया
ध्यान में ही बड़े वेग से
प्रभु ने आलिंगन किया
उस समय उस सुख और शांति से
उनके सभी पुण्य संस्कारों का क्षरण हुआ
यद्यपि उस समय उनमे
थोड़ी बहुत कामवासना भी थी
मगर जब सत्य का
परमसत्य से मिलन हो जाता है
तब वो भी तो परमसत्य बन जाता है
प्रभु ने अपनी प्रीति और भक्ति दे मुक्त किया
और उन सबको अपना परमधाम दिया
तब परीक्षित के मन में प्रश्न उठा
गोपियाँ तो केवल प्रभु को
अपना परम प्रियतम मानती थीं
उनका ना उनमे कोई
ब्रह्मभाव था
फिर कैसे उनकी मुक्ति हुई
सुन क्रोधित हो शुकदेव जी बोले
राजन मैं तुम्हें बतला चुका हूँ
शिशुपाल जो प्रभु से
शत्रुता का भाव रखता था
पर उसे भी प्रभु ने मुक्त किया
पूतना वृत्तासुर आदि सभी
राक्षसों को अपना परमधाम दिया
फिर गोपियाँ तो नित्यसिद्धा थीं
जन्म जन्म की उनकी
प्रभु से लौ लगी थी
यदि किसी भी भाव से आये
तो कैसे ना उन्हें मुक्त करते
जब प्रभु अपने से दुश्मनी
रखने वालों को भी तार देते हैं
कर्म क्रोध लोभ मोह
चाहे जैसे भी किसी ने भजा
मगर मरते समय जिसने भी
प्रभु का सुमिरन किया
उसे प्रभु ने भव बँधन से मुक्त किया
उनके यहाँ ना अपने पराये
का कोई भेद है
क्योंकि सब संसार के
वो ही तो परम पिता हैं
फिर कैसे कोई पिता
अपने बच्चों में
भेद कर सकता है
जो जैसे भी आये
उसका ही कल्याण करता है
जिस रूप से वृत्ति
प्रभु चिंतन में लग जाती है
तब वो वृत्तियाँ
भगवन्मय हो जाती हैं
क्योंकि चिंतन सुमिरन
हर पल हर रूप में
प्रभु का ही होता है
तभी जीव बँधन मुक्त होता है
तब परीक्षित का संशय दूर हुआ
शुकदेव जी आगे कथा सुनाने लगे

क्रमश: ……………



सोमवार, 13 अगस्त 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी ……भाग 62


एक दिन नारद जी को राह में
कामदेव दिखलाई दिया
दुष्ट सामने देख
नारदजी ने रास्ता बदल दिया
पर कामदेव भी कम घाघ नहीं था
उसे भी अपने होने पर
बहुत ही गर्व था
अपने बल से उसने
शंकर  आदि सबको था जीता
अब लड़ने के लिए
नया योद्धा था ढूँढता फिरता
नारद जी को देख आवाज़ लगायी
ओ तुम्बड़ी  वाले किधर जाते हो
ज़रा इधर आओ
क्यूँ रास्ता बदल रहे हो
मुझसे तुम क्यूँ डर रहे हो
सुन नारद जी बोले
भैया ऐसी ना कोई बात हुई
कहो मुझसे है क्या काम तुम्हें
लड़ना मरना जानते हो क्या
सुन नारद जी ने वीणा बजा दी
श्री मन नारायण नारायण
की धुन उसको सुना दी
क्रोधित हो कामदेव बोला
मैं लड़ने की बात कहता हूँ
और तुम्हें भजन का चस्का लगा है
 नारद जी बोले ये तो मेरे
रोम रोम में बह रहा है
लड़ना भिड़ना नहीं हमारा है काम
सुन कामदेव ने बचने की
सिर्फ एक राह बतलाई
यदि लड़ना नहीं जानते हो
तो कोई लड़ने वाला बतला दो
सुन नारद जी की सांस में सांस आई
बोले लड़ने वाला बतला देता हूँ
उसका सभी पता ठिकाना
मैं तुम्हें देता हूँ
मन में सोचा
एक बार कहीं उसने हाथ मिला लिया
ज़िन्दगी भर की ये खुजली
सारी मिट जाएगी
पर प्रकट में बोले
देखो धरती पर ब्रज क्षेत्र में चले जाओ
वहाँ नन्द बाबा के आँगन में
तुम्हें वो मिल जायेगा
यदि वहाँ भी ना मिले तो
सीधे वंशीवट जाना
कदम्ब के नीचे
अधरों पर वंशी धरे
जो तीन जगह से टेढ़ा है
खड़ा तुम्हें मिलेगा
सुन कामदेव ने कहा
तुम्बड़ी वाले बाबा
गर बात ना तुम्हारी सच हुई
तो तीनो लोकों में चाहे
कहीं चले जाना
मेरे हाथों से ना बच पाओगे
सुन नारद जी बोले
तुम एक बार चले तो जाओ
तुम्हारे सभी मनोरथ सफल होंगे
सुन कामदेव ने वृन्दावन का रुख किया
जैसा नारद ने था बतलाया
वैसा ही सब वहाँ पाया



कदम्ब के नीचे पीताम्बरी ओढ़े
श्यामल मूरत नैन बंद किये
मुरली मधुर बजाती  थी
जिसकी धुन में कामदेव की
मति भी भ्रमित हुई
कामदेव मुरली की धुन सुन
सुध बुध सारी भूल गया
आँख बंद कर समाधि में डूब गया
तीन गज़ब वहाँ पर हो रहे थे
काले कन्हैया काली कमरिया
उस पर काला यमुना का नीर
तीन कालों ने कैसा समा बनाया था
जड़ चेतन सबका मन भरमाया था
जब कन्हैया ने कामदेव को
आँख बंद किये मगन देखा
तब कामदेव को हिलाकर सचेत किया
कहो कामदेव यहाँ कैसे हो आये
सुन कामदेव बोला
तुम्हें किसने है मेरा नाम बतलाया
तुम्हारा नाम तो बच्चा बच्चा जानता  है
मैंने कह दिया तो कौन सी बड़ी बात कही
तुम अपने आने का कारण बतलाओ
सुन कामदेव बोला
मैं कृष्ण से मिलने आया हूँ
कान्हा बोले  मैं ही हूँ बोलो
 क्या काम मुझसे आ पड़ा
सुन कामदेव बोला
मैं तुमसे लड़ना चाहता हूँ
इतना सुनते ही कन्हैया ने
जोर से हँसना शुरू किया
कहाँ तो अभी कन्हैया
बड़ी बड़ी बातें कर रहे थे
कहाँ एकदम छोटे बालक बन गए
और कामदेव से बोले
तुम्हें गुल्ली डंडा खेलना आता है
तुम्हें कदम्ब पर चढ़ना आता है
तुम्हें गेंद से खेलना आता है
आओ खेलें देखें कौन जीतता है
ये सुन कामदेव के नथुने फूल गए
मन ही मन बहुत गरमाया
और भुनभुना कर बोला
तुम्बडी वाले नारद
तू किसी लोक में मिल जाना
अब तेरी खैर नहीं
मुझे बच्चे से लड़ने के लिए भेज
जग हंसाई करवानी चाही
ये तो बालक है
इससे मैं क्या लडूंगा कह
कामदेव चलने को उद्यत हुआ
 जैसे ही नारद जी का नाम सुना
कान्हा ने आवाज़ लगायी
अरे अरे कामदेव क्या कहा
तुम्हें किसने भेजा है
नारद जी का नाम सुन
कान्हा बोले अच्छा
तो हमारे बाबा ने तुम्हें
यहाँ है भेजा
वो तो हमारे बड़े हैं
उनका कहना कैसे टालें
अब कहो कामदेव
कैसे लड़ना चाहते हो
सुन कामदेव की बुद्धि चकराई
लडाई में भी क्या कोई प्रकार होते हैं ?
कामदेव बोला आप ही बतलाइए
कैसे लड़ना चाहते हैं
सुन कान्हा ने बतलाया
युद्ध दो प्रकार का होता है
एक किले का युद्ध
और एक मैदान का युद्ध
कामदेव बोला ज़रा दोनों युद्धों पर प्रकाश डालो
किले और मैदान के युद्ध का फर्क बताओ
तब कान्हा ने बतलाया
किले का युद्ध वो होता है
जिसमे आदमी शादी शुदा होता है
और स्त्री एक किले का काम करती है
फिर चाहे मनुष्य कहीं जाये
पर कहीं और ना आँख लड़ाए
कामशत्रु  पर विजय पाने हेतु
स्त्री रुपी किले में
खुद को सुरक्षित पाए
और मैदान के युद्ध में
इंसान रोज हजारों लाखों
रूपवती सर्वांग सुंदरी स्त्रियों से मिले
उनके मध्य रहे और
फिर भी वहाँ से
कामरूपी शत्रु  से बच
सुरक्षित बाहर निकल आये
ये सुन कामदेव बोला
किले का युद्ध तो
ज़िन्दगी भर करता आया
आज मैदान का युद्ध भी आजमाया जाये
सुन कान्हा बोले ठीक है कामदेव
शरद पूर्णिमा की रात्रि को
तुम अपने सभी
कामबाण लेकर आ जाना
करोड़ों अरबों स्त्रियाँ होंगी
और उनके बीच हम अकेले
अपना हर तीर चला लेना
मगर ये बतलाओ
हार गए तो क्या करोगे
सुन कामदेव बोला
हारा तो आप जो कहेंगे वो  ही करूंगा
और जीता  तो जो मैं कहूं
वो आप करेंगे
सो लग गयी काम में और राम में
एक प्रमुख कारण था ये भी महारास करने का
कामदेव का मद भंग करना था
अहंकार  को चूर चूर करना था
उधर गोपियों को भी
कान्हा ने वचन दिया था
उनका मनोरथ भी पूर्ण करना था
प्रभु का कोई भी कार्य
सिर्फ एक कारण से नहीं होता
जब कई हेतु मिल जाते हैं
तब प्रभु अपनी लीला करते हैं

 क्रमश:…………

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

कृष्ण लीला-- रास पंचाध्यायी………भाग 61

तुम्हारी लीला बहुत ही अजब है प्रभु ! 
रास पंचाध्यायी का प्रारंभ 
वो भी आज आपके जन्म पर ………
आहा! इससे शुभ और क्या होगा
तुम आओगे ना …………
इस महारास को सम्पूर्णता देने …………मोहन  !
बस हो जायेगा जन्म तुम्हारा उसी क्षण 
जब दोगे दर्शन गिरधारी
हो जायेगा महारास उसी क्षण 
जब मुस्कान बिखरेगी प्यारी -प्यारी 
और बाँह पकड कहोगे 
आओ सखी! महारास की वेला  प्रतीक्षारत है



ये तो थे मेरे भाव …अब चलिये करते हैं प्रवेश रास- पंचाध्यायी मे और जानते हैं उसकी महत्ता क्या है


अब रास - पंचाध्यायी का प्रारंभ होता है
जिसमे ना सभी को प्रवेश मिलता है
भागवत के पांच अध्याय
पञ्च प्राण कहलाते हैं
जिसमे मोहन ही मोहन नज़र आते हैं
यहाँ तो वो ही प्रवेश कर सकता है
जिसने " स्व " को दफ़न कर रखा है
जब ऐसी अवस्था पाता है
हर पल प्रभु दर्शन करता है
"स्व" विस्मृत होते ही
आत्म तत्व में रत होता है
वो ही रास पंचाध्यायी में
प्रवेश का हक़दार होता है

जब भक्त गर्भोद अवस्था को पाता है
तब रास पंचाध्यायी में प्रवेश पाता है
ज्यों माता नौ महीने तक
गर्भधारण करती है
और दसवें महीने में
शिशु जन्म की राह तकती है
कब आएगा कब आएगा
सोच सोच बाट जोहती  है
पल- पल युगों समान जब कटता है
कुछ वैसा ही हाल
भक्त का जब होता होने लगता है
जब भक्त की गर्भोद अवस्था आती है
नौ स्कंध सुन ह्रदय घट
प्रेम रस  से
आप्लावित हो जाता है
प्रेमानंद ही प्रेमानंद
चहुँ ओर छा जाता है
और प्रभु से मिलन की
उत्कट इच्छा जब
भक्त के ह्रदय में जागृत होती है
सिर्फ कृष्ण ही कृष्ण
रोम -रोम से निकलने लगता है
जीना दुश्वार हो जाता है
संसार ना सुहाता है
अश्रुपात निरंतर होने लगता है
अपनी सुध बुध जब
भक्त बिसरा देता है
जैसे ही कोई प्रियतम का नाम ले
उसे ही अपना मान बैठता है
और प्रभु नाम का
गुणगान करने लगता है
दरस बिन बावरा बन
घूमने लगता है
दुनिया दीवाना कहने लगती है
जो दुनिया के किसी
काम का नहीं रहता है
बस वो ही तो भक्त की
गर्भोद अवस्था होती है
जब आठों याम श्याम का दर्शन करता है
कब आओगे कब दोगे दर्शन
गिरधारी की
रटना लगाने लगता है
परिपक्व गर्भोद अवस्था में ही
प्रभु का अवतरण होता है
और प्रभु से जीव का मिलन ही तो
वास्तविक महारास होता है
जहाँ दो नज़र नहीं आते हैं
एक तत्व ही साकार होता है
सिर्फ एकत्व का राज होता है
रसधारा बहने लगती है
जब ब्रह्म जीव मिलन में
जीवन की पूर्णाहुति होती है
वो ही तो महारास की
अद्भुत बेला होती है
ब्रह्मानंद और रसानंद की
 दिव्य अनुभूति होती है
द्वैत की भावना अद्वैत में विलीन होती है
निराकार साकार हो
साकार को निराकार
बना देता है
बस वो ही तो जीवोत्सव होता है
बस वो ही तो ब्रह्मोत्सव होता है
बस वो ही तो आनंदोत्सव होता है
क्रमश:………… 


सोमवार, 6 अगस्त 2012

कृष्ण लीला ………भाग 60


एक दिन राधा यमुना
जल भरने जाती थीं
तभी मोहन से भेंट हुई
हाथ पकड़ कहने लगीं
तुमने मेरा मन चुरा लिया
मेरा तन घर में रहता है
चंचल मन दिन रात
तुम्हारे पीछे फिरा करता है
मेरा मन मुझे वापस कर दो
सुन मोहन ने बतलाया
प्यारी तुम्हारे विरह में
मेरा भी यही हाल हुआ
तभी ललिता आदि सखियों को देख
मोहन ने वन की राह पकड़ी
आज तो  मिलन की चोरी पकड़ी गयी
लज्जित हो राधे घर आ गयी
पर तारे गिनते- गिनते रैन कटी
प्रातः अपना हार पल्लू में बांधा
खोने का बहाना बनाया
जल्दी आ जाऊंगी कह श्याम से
मिलने को निकल पड़ीं
जा नन्द जी के पिछवाड़े आवाज़ लगायी
ललिता मैं वंशीवट जाती हूँ
तुम भी जल्दी आना
इधर मोहन ने पहला ग्रास उठाया था
राधा की आवाज़ ने
चमत्कार दिखलाया था
ग्रास छोड़ बहाना बना
फ़ौरन चल दिए
ये देख मैया अचंभित हुई
तब ग्वालबालों ने राज बतलाया
मगर माँ को ना विश्वास हुआ
इस प्रकार दोनों ने मिलन जारी रखा
इक दिन मोहन आधी रात
राधा से मिलने पहुंचे
और प्रातः जब घर से निकले
सखियों ने देख लिया
अब क्या बहाना बनाऊँ
अब कैसे मुकर जाऊँ
मगर सखियाँ पूछतीं
उससे पहले श्यामा ने बात बनाई
आज श्यामसुंदर ना जाने
हमारे घर के आगे से होकर
कहाँ जाते थे
यही देखने मैं बाहर आई हूँ
चतुर सखियाँ राधा की
चालाकी समझ गयीं
हमारे पूछने से पहले ही
राधा ने कैसी बात बना दी
सब सखियाँ जान गयीं
इधर राधा के मन में
अभिमान का अंकुर उपजा
सबसे ज्यादा मोहन
मुझे चाहते हैं
अब दूसरी किसी सखी से
बोले तो झगडा करूंगी
तभी केशवमूर्ति को झरोखे से
झांकते देखा
घर -घर क्या तांका- झांकी करते हो
ये बात ना हमको है भाती
सुन मोहन बिना कुछ कहे
वहाँ से चल दिए
जब राधा ने देखा
मोहन भीतर नहीं पधारे
तब बेहद लज्जित हो
द्वार पर दौड़ गयीं
वहाँ उन्हें ना पाकर अचेत हुईं
चेत आने पर
ललिता आदि सखियों के पास पहुँच गयीं
सारा हाल बता दिया
अब कोई उपाय करो
उनके दर्शन करवा दो
अब ना ऐसा मान करुँगी
कह राधा अचेत हुई
जब सखियों  ने देखा
ये विरहाग्नि में दग्ध हो
प्राण तज देगी
तब ललिता ने जा
सारा वृतांत
मुरलीमनोहर से कहा
सुन व्याकुल हो मोहन दौड़े आये
आते ही श्यामा को
श्याम ने ह्रदय से लगाया
जब दोनों एक दूजे में खोये थे
तभी वो दृश्य ललिता ने
अन्य सखियों को दिखलाया
दोनों की प्रीत का भाव
सबको समझ आया
इधर मोहन श्यामा पर
ऐसे मोहित हुए
  कि सुध- बुध तन- मन की भूल गए
वस्त्र आभूषण मुरली सब
राधा पर न्योछावर किया
इधर राधा भी ऐसी मोहित हुईं
स्वयं मोहन बन गयीं
उधर श्याम ने स्त्री वेश बनाया
लहंगा चुनरिया पहन
माथे पर बिंदिया
पाँव  में पायल पहन
घूंघट ड़ाल राधा रूप बनाया
अब मोहन राधा रूप में रूठ गए
और राधा  मोहन बन
उन्हें मनाने लगी
बार -बार चरणों में गिर
विनती करने लगीं
उस पल ना राधा को भान रहा
स्त्री- पुरुष कौन है
वो ना ध्यान रहा
जब राधा विह्वल हुई
तो मोहन ने अपनी माया का हरण किया
दोनों स्त्रीरूप में वंशीवट को चले
राह में चन्द्रावली ने घेर लिया
चन्द्रावली ने सारा हाल जान लिया
और राधा से पूछने लगी
कहो राधे ये नयी नवेली
साँवली सूरत मोहनी मूरत
कहाँ से है आई
सुन राधा ने बतलाया
ये मथुरा से है आयी
ललिता संग दधि बेचन
जब में मथुरा जाती थी
तभी हमारी थी जान- पहचान हुई
आज मिलने को आई है
इधर मोहन प्यारे ने
चेहरा घूंघट से ढका
कहीं सखियों ने पहचान लिया
तो बहुत ठिठोली करेंगी
पर चन्द्रावली भी कम ना थी
उसने भी मुँह देखने की ठानी
घूंघट उठाकर बोली
मुझसे क्यों लज्जा करती हो
मैने तुमको पहचान लिया
और गाल पर गुलचा धर दिया
ये देख मोहन ने आँखें नीची कीं
चंद्रावली ने राधा को समझाया
इस सखी से तुमने
अच्छा मिला दिया
हमारी प्रीत भी छोड़ दी
तुम्हें अपने सुख के सिवा
ना किसी का सुख भाया
स्वयं को छिपाकर रखना
वृथा जब  मोहन ने जाना
कि इसने मुझे है पहचाना
तब मोहन ने चन्द्रावली को
गले से लगाया
और उसके मन को
सुख पहुँचाया
इसी तरह मोहन सबको
सुख पहुंचाते थे
हर गोपिका के दिल को भाते थे


क्रमश: …………