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सोमवार, 30 मई 2016

समाधान तुम्हारे पास भी नहीं



कभी कभी लगता है
समाधान तो तुम्हारे पास भी नहीं है
जब नहीं कर पाते समाधान
दुनियावी नीतियों का
दुनिया के व्यवहार का
तो बुला लिया करते हो
अपने चाहने वाले को अपने पास
और दिखा देते हो
खुद को ज़माने की नज़र में पाक साफ़

तुम्हें चाहने वाले करोड़ों होंगे और हैं
लेकिन तुमने किसी को नहीं चाहा
यदि चाहा होता तो
मीरा
जिसने किया सर्वस्व अर्पण
जिसके तुम ही तुम थे सब कुछ
वो भी जब हुई हैरान परेशान
आई तुम्हारी शरण
लेकर पुकार
गिरधर ! अब नहीं सह पाती सांसारिक लांछन
बहुत दे चुकी परीक्षाएं
ये हैं मेरे इम्तिहान की अंतिम सीमाएं
तो क्या किया तुमने ?
बस उसे अपने आगोश में समा लिया
तो क्या वास्तव में
यही है तुम्हारे प्रेम का प्रतिदान ?

न न मोहन , प्रेम को तो कभी कभी लगता है
तुम भी न जान पाए
गर जानते तो
कलंकित न होने देते प्रेम को
रुसवा न होने देते अपने प्रेमी को
करते कोई ऐसा उपाय
जो बनता उदाहरण ज़माने के लिए

जानते हो तुम्हें क्या करना चाहिए था
जो भी तुम्हारे प्रेमी हों
निस्वार्थ तुम्हें चाहते हों
जिनके तुम ही तुम सर्वस्व हों
उन्हें दुखों की आंच पर तो तुमने खूब माँजा
परीक्षाएं भी खूब लीं
यहाँ तक कि
अपनों से भी दुत्कार खूब खिलवायी
लेकिन
खुद में समाहित करने से पहले
उनके भावों को पुष्ट कर
देते उन्हें दुनिया का
हर सुख
हर वैभव
हर संतोष
अपनों का न केवल साथ
बल्कि प्यार सम्मान और विश्वास भी
दिखाते सबको
मुझे चाहने वाले को मैं न केवल देता हूँ सर्वस्व
बल्कि उनका योगक्षेम भी करता हूँ वहन
और इतने सुख वैभव में रहकर भी
न हो पाते जब वो तुमसे तुम्हारे प्रेम से विमुख
तब कहलाता
आग के दरिया को
मोम के घोड़े पर होकर सवार
किया है पार ........वो भी बिना पिघले ........इस बार तुमने


क्या फायदा ऐसे खुद में समाहित करने का
जहाँ वो दुनिया से दुखी मायूस हो
तुम्हारी शरण आया
तो तुमने भी दुःख की गागर में ही उसे डुबाया
जहाँ तुम मिलकर भी नहीं मिलते
इसी उहापोह में जीवन बिताया
न तुम मिले न दुनिया
बताओ तो जरा ओ कृष्ण
तुम्हें चाहकर उसने भला क्या पाया
सिवाय दुःख के
इधर भी दुःख उधर भी दुःख
फिर भी उसने तुम्हें चाहने का अपना वचन निभाया
मगर जानते हो
तुम हार गए मोहन इस खेल में

हाँ , ये तुम्हारी हार है
तुम्हारे भक्त की नहीं
ये परीक्षा भक्त की नहीं मोहन तुम्हारी थी और है
और हर युग में होती रहेगी
जब तक तुम नहीं सीखोगे
प्रेम का यथोचित उत्तर देना

मानती हूँ
नहीं आता तुम्हारा भक्त किसी चाह से तुम्हारे पास
हर दुनियावी चाह को छोड़ लेता है तुम्हारी शरण
तुमसे तुम्हें मांगने की चाह का भी किया है जिसने तर्पण
लेकिन क्या तुम्हारा कोई फ़र्ज़ नहीं बनता ?
इसीलिए कहा
नहीं है तुम्हारे पास भी
दुनिया की कुटिलाई का कोई साहसपूर्ण जवाब
गर होता
तो न होते तुम्हारे भक्त यूं रुसवा ...

खुद में समा लेना अंतिम उपाय नहीं
नहीं है स्वीकार्य तुम्हारा ये कृत्य
कम से कम मुझे तो नहीं ...

और सुनो
मैं भक्त नहीं तुम्हारी
इसलिए मत होना मेरे लिए परेशान
बस कर सको तो कर लेना उनका ख्याल
जो सब कुछ छोड़कर आये तुम्हारे द्वार

जैसे
सिर्फ वंशी बजाना , रिझाना  और मनुहार करवाना ही अंतिम विकल्प नहीं
वैसे ही
मेरे प्रश्नों से बचना भी संभव नहीं
तब तक
जब तक नहीं देते तुम मुझे यथोचित उत्तर ....

शनिवार, 7 मई 2016

क्या है कोई हल

ये जानते हुए भी
कि
तुम ही हो मेरे
तर्क वितर्क
संकल्प विकल्प
आस्था अनास्था
फिर भी
आरोप प्रत्यारोप से नहीं कर पाती ख़ारिज तुम्हें

ऊँगली तुम पर ही उठा देती हैं मेरी चेतना
और तुम
प्रश्नचिन्ह का वो कटघरा बन जाते हो
जो किसी उत्तर का मोहताज नहीं

ये कैसा बनवास है मेरा और तुम्हारा
जहाँ न मिलन है न जुदाई
फिर भी मन और बुद्धि के धधकते लावे में छिपी है रुसवाई

क्या है कोई हल मेरे तुम्हारे इस झगडे का .......कहो तो ओ कृष्ण ?


शनिवार, 30 अप्रैल 2016

आस्तिकता से नास्तिकता की ओर



आस्तिकता से नास्तिकता की ओर
प्रयाण शायद ऐसे ही होता है
जब कोई तुम्हें जानने की प्रक्रिया में होता है

और जानेगा मुझे ?
मानो पूछ रहे हो तुम
हाँ , शायद उसी का प्रतिदान है
जो तुम दे रहे हो

पहले भी कहा था
आज भी कहती हूँ
नहीं हो तुम किसी के माता पिता , सर्वस्व या स्वामी
क्योंकि
यदि होते  तो
कष्ट में न देख सकते थे अपने प्रिय को
कौन माता पिता चाहेगा
कि बच्चा तो मुझे बेइंतिहा चाहे
अपना सब कुछ मुझे ही माने
और मैं उसे कष्ट पर कष्ट देता रहूँ
वो एक वार झेले
तो दूसरा और तगड़ा करूँ
ये कैसा प्रपंच है तुम्हारा
जहाँ जब कोई अपना
सर्वस्व तुम्हें मान ले
तो उसे सर्वस्व मानने की ही सजा मिले
ऊपर से चाहो तुम
वो उसे तुम्हारी कृपा कहे
अरे वाह रे ठग !
तुझसे बड़ा जालिम तो शायद
पूरे ब्रह्माण्ड में कोई नहीं
जो भक्त या अपने बच्चों को कष्ट में देख न द्रवित हो 


हाँ , कहते हैं कुछ अंध अनुयायी
तुम भक्त को कष्ट में देख ज्यादा दुखी होते हो
क्या सच में ?
क्या कर सकते हो प्रमाणित ?
जबकि मज़े की बात ये है
तुम्हें न देखा न जाना
बस माना ... तुम्हारा होना
और उस पर वो कर देता है सब कुछ न्यौछावर
उसका प्रतिकार ये मिलता है
देखा फर्क उसमे और तुममें

दूसरी बात बताना ज़रा
कैसे पता चले इतना झेलकर
जब मृत्यु का मुख चूमे तो
उसकी सद्गति हुई या उसने तुम्हें प्राप्त किया या वो पूर्ण मुक्त हुआ
क्योंकि
किसे पता उसने फिर जन्म लिया या नहीं
कैसे करोगे सिद्ध ?
क्या कर सकते हो सिद्ध अपनी बात को
जो तुम कभी
गीता में कभी रामायण में तो कभी भागवत में कहते हो
या अपने शतुर्मुगों से कहलवाते हो
हमें तो लगता है
तुम कष्ट में देख ज्यादा खुश होते हो
ज्यादा सुखी होते हो
गोपियों से बड़ा उदाहरण क्या होगा भला ?
वो भी वैसे तुमने  ही कहा है
ताकि इस धोखे में हम प्राणी
भटकते रहें , उलझते रहें
मगर वास्तव में तुम्हारा होना भी
आज संशय की कगार पर है

चाहे तुम हो या नहीं
क्या फर्क पड़ता है
बस मानव को समझना होगा
तुम किसी के सगे नहीं
इसलिए जरूरी है
एक निश्चित दूरी तुमसे
कम से कम जी तो सकेगा
नहीं तो एक तरफ
संसार की आपाधापी से सुलगा रहेगा
तो दूसरी तरफ
यदि वहां से तुम्हारी तरफ मुड़ा
तो कौन सा चैन पायेगा
तुम कौन सा उसे चैन से जीने दोगे ?
तो फिर संसार ही क्या बुरा है
यदि उम्र भर
किसी न किसी अग्नि में जलना है तो ?

बस शायद यही है अंतिम विकल्प
खुद को एक बार फिर मोड़ने का
तुम्हारी आस्तिकता से अपनी नास्तिकता की ओर मुड़ने का

तुम वो हो
जो छीन लिया करते हो
अपने चाहने वालों की सबसे प्रिय वस्तु उससे
तो कैसे कहलाते हो
करुणामय , दयामय , भक्तवत्सल
क्या ऐसे होते हैं ?
तो नहीं चाहिए तुम्हारी
कृपालुता , दयालुता , भक्तवत्सलता
ये तुम्हारे गढ़े छलावे तुम्हें ही मुबारक

मैं थोड़ी अलग किस्म की हूँ
अब यदि हो हिम्मत
मेरी कही बातों अनुसार चलने की
फिर भी मेरे साथ रहने की
उम्र भर साथ देने की
अपना बनने और बनाने की
तभी बढ़ाना कदम
वर्ना तो
एक निश्चित दूरी तक ही है
अब तुम्हारा हमारा सम्बन्ध

सोचो ज़रा
वर्ना क्यों संसार बनाया था ?
और क्यों हमें भेजा
जब खुद को ही पुजवाना था
ये दो नावों की सवारी कम से कम मैं नहीं कर सकती
अब होना होगा तुम्हें ही
मेरी नाव पर सवार
थामनी होगी मेरी पतवार 

संसार और तुम्हारे प्रेम की धार पर
गर हो तैयार
तभी बसेगा प्रेम का संसार
वर्ना
एक निश्चित दूरी बनाना ही होगा
अब हमारे सम्बन्ध का आधार

देख लो
ये है पहला पग मेरा
आस्तिकता से नास्तिकता की ओर

क्या हो तैयार इस परिवर्तन के लिए ओ कृष्ण ?

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

जन्मदिन हो या वैवाहिक वर्षगाँठ

जन्मदिन हो या वैवाहिक वर्षगाँठ , यदि भूल जाए कोई एक भी तो उसकी आफत .......लेकिन क्यों ? क्या ये सोचने का विषय नहीं ?

अब जन्मदिन तुम्हारा . तुम जन्मे उस दिन जरूरी थोड़े ही तुम्हारा पार्टनर भी उसे याद रखे और खुश होने का दिखावा करे . एक तो तुम पार्टनर की ज़िन्दगी में कम से कम २० से २५ साल बात आते हो और उससे उम्मीद करते हो वो तुम्हारा जन्मदिन याद रखे . क्या उसे और कोई काम नहीं . फिर क्या पता वो तुम्हारा जन्मदिन मनाने में खुश है भी या नहीं . आज व्यावहारिक होना ज्यादा जरूरी है बजाय भावनात्मक होने के . बेशक एक सम्बन्ध जुड़ता है पति पत्नी का लेकिन वहां यही अपेक्षाएं अक्सर बेवजह की कलह का कारण बन जाती हैं . 
 
ऐसा ही कुछ आज के युवा के साथ होता है जिस वजह से ज्यादातर रिलेशन बीच राह में ही टूट जाते हैं क्योंकि वो तो जुड़ते ही इस वजह से हैं कि पार्टनर हमारी हर इच्छा पूरी करेगा और जब वैसा नहीं होता तो ब्रेक अप . फिर दूसरे को पकड़ लेते हैं लेकिन कहीं ठौर नहीं पाते क्योंकि दिशाहीन होते हैं . सम्बन्ध कोई भी हो वहां यदि इस तरह की चाहतें होंगी तो संभव ही नहीं दूर तक जा सकें . 

इसी तरह वैवाहिक वर्षगाँठ की बात है . अब सोचिये जरा कोई बेचारा / बेचारी विवाह से खुश नहीं तो क्यों वो उस मनहूस दिन को याद रखेंगे ? उस पर पार्टनर की चाहत कि न सिर्फ याद रखा जाए बल्कि कोई महंगा गिफ्ट भी दिया जाए और बाहर डिनर भी किया जाए . सोचिये जरा बेमन से किया गया कार्य क्या ख़ुशी दे सकता है जिसमे एक खुश हो और दूसरा जबरदस्ती दूसरे की ख़ुशी में खुश होने का दिखावा भर कर रहा हो . जब सम्बन्ध ही मायने न रखता हो वहां दिखावे का क्या औचित्य ?

यदि इन बेवजह की औपचारिकताओं से सम्बन्ध को मुक्त रखा जाए तो आधी कलह तो जीवन से वैसे ही समाप्त हो जाए मगर हम भारतीय कुछ ज्यादा ही भावुक होते हैं और आधे से ज्यादा जीवन इसी भावुकता में व्यतीत कर देते हैं . बाद में कुछ भी हाथ नहीं लगता . यदि थोडा व्यावहारिक बनें और संबंधों को स्वयं पनपने दें , उन्हें थोडा उन्मुक्त आकाश दें तो स्वयमेव एक ऐसी जगह बना लेंगे जहाँ आपको कहना नहीं पड़ेगा बल्कि पार्टनर खुद स्वयं को समर्पित कर देगा .

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

क्या हूँ मैं ऐसी ही स्वीकार ?




सुना है
गोपाला नंदलाला
तुम्हें लाड लड़ाना बहुत प्रिय है
लेकिन मैं
झूठा आडम्बर नहीं ओढ़ सकती
देखा देखी नहीं कर सकती

तर्क कुतर्क के बवंडर में घिर
जो अक्सर तुम्हारे कान उमेठ लिया करती है
तुम पर ही आरोप प्रत्यारोप किया करती है
तुम्हें ही कटघरे में खड़ा कर दिया करती है
यहाँ तक कि
तुम्हारे अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया करती है

बोलो अब
क्या हूँ मैं ऐसी ही स्वीकार
रूखी खडूस सी
जिसमे प्रेम का लेश भी नहीं ???

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

सोच लो ?



जब दुःख पाना नियति है
चाहे तुम्हें की माने या नहीं
तो फिर क्यों
तुम्हें कोई भजे ?

जिसने जितना भजा
उतना ही दुःख पाया
और जिसने तुम्हारे
अस्तित्व पर ही प्रश्न खड़ा किया
सुखपूर्वक जीवन बिताया
तो बताओ कृष्ण
तुम्हारे होने का क्या औचित्य ?

अब तुम्हें हम माने या नहीं
क्या फर्क पड़ता है
क्योकि
दुःख हमारी नियति है
खासतौर से उस भक्त की
जो सब कुछ अपना तुम्हें मानता हो
और तुम्हारे दिए ज्ञान को आत्मसात करता हो
वो मान लेता है तुम्हारे गीता ज्ञान को
कर्म का लेखा मिटे न मिटाए
मगर
किसने देखा अगला पिछला जन्म ?

और कभी कभी तो प्रश्न उठता है
तुम हो भी या नहीं
या फिर हो महज वहम
एक मन बहलाने का साधन भर
एक खुद को ढाँढस बंधाने का जरिया भर
क्यंकि
यदि होते तुम हमारे माता पिता
जैसे कि तुम्हारे सभी ग्रंथों में कहा गया है
तो क्या अमरे दुखो पर
तुम मौन रह सकते थे
क्या तुम्हारा अंतस न चिंघाड़ता
हम भी माता पिता हैं
बच्चों की सिसकारी पर
जान देने को हाजिर हो जाते हैं
और उनका दुःख खुद सहने को इच्छुक हो जाते हैं
लेकिन तुम ---- तुम पर कोई असर नहीं होता
सारे संसार में व्याप्त
अन्धकार , व्यभिचार , दुःख तकलीफ , अराजकता से
नहीं होते तुम व्यथित 

स्त्री पुरुष बच्चे या तुम्हारी बनायी सृष्टि का कोई जीव हो 
जब रोता है , तुम्हें पुकारता है ये सोच 
सारा संसार बेशक छोड़ दे
तुम साथ जरूर दोगे
लेकिन हो ही जाता है अंततः निराश
क्योंकि तुम नहीं उतर सकते अपने आसन से नीचे
वर्ना सुन पाते अबलाओं बच्चों की चीख पुकार

तो फिर कैसे माने तुम्हें
हम अपना सर्वस्व या माता पिता
इतनी हृदयहीनता कैसे समाई है तुम में .......बताना तो जरा ओ कृष्ण ?


तब लगता है
नहीं हो तुम कहीं भी
तुम हो सिर्फ हमारी बनायी
एक ऐसी कृति
जिसे हमने अपने जीवन का
एक सहारा बनाया
एक अस्तित्वहीन विग्रह

आस्तिकता और नास्तिकता के
मध्य की एक महीन रेखा
जिसे यदि अब और खींचा
तो शायद अस्तित्व ही नकार दिया जाए तुम्हारा
और उग आये नास्तिकता का घनेरा जंगल
जिसमे तुम बिलबिलाओ एक दिन
ये मेरा आग्रह है न इल्तिजा
बस मन की विडंबना है
तुम्हें स्वीकारूँ या नकारुं अब ... सोच लो
क्योंकि
अंध श्रद्धा , अंध भक्ति की बलि नहीं चढ़ सकती मेरी चेतना

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

गोपिभाव ६



रे निर्मोही
जब लौट के जाना ही था
तो जीवन में आया ही क्यूँ था
ये प्रेम का रोग लगाया ही क्यूँ था

अब जीती हैं न मरती हैं
तेरी गोपियाँ देख तेरे बिन
ज़िन्दगी की तपती रेत में
नंगे पाँव भटकती हैं
सुन , तुझे जरा भी लाज नहीं आई क्या कभी ?

यूँ डेरा उठा लिया
जैसे कभी ठहरा ही न था
क्या तुझमे कभी कोई
मौसम उमड़ा ही न था
या फिर स्वांग था वो सब तेरा
छलने का एक नया ढब
छला और चल दिया बिना मुड़े बिना पीछे देखे
सुन , कभी नहीं जान पायेगा तू प्रेम होता है क्या ?

आज हम जल रही हैं
तड़प रही हैं
भटक रही हैं
और किसी से कह भी नहीं सकतीं अपनी पीड़ा
न कोई समझ सकता हमारे हिय की जलन
जब तू ही न समझा तो और किसी से क्या उम्मीद ?

एक तेरी प्रीत के हवाले था हमारा तन मन और जीवन
अब मन रहा न जीवन
सिर्फ साँसों के आरोह अवरोह से ही बंधा है तन
कभी देखी है ऐसी मृत्यु तूने
जहाँ साँस चलती हो
लेकिन जीने की न आरजू बची हो
नहीं , तू नहीं जान पायेगा कभी प्रेम की परिभाषा
प्रेम किया होता तो जानता
हमारे हिय की अभिलाषा

इकतरफा प्रेम की मारी हम
सिर्फ एक पंक्ति पर गुजर करती हैं
सबसे ऊँची प्रेम सगाई
जो सिर्फ हमने की है
तू तो सदा का निर्मोही था , है और रहेगा .........




बुधवार, 30 मार्च 2016

मुक्तिबोध

वो संवाद के दिन थे या नहीं
मगर संवाद जारी था

मौन का मुखर संवाद
बेशक आशातीत सफलता न दे
मगर बेचैनियों में इजाफा कर देता था
और संवाद मुकम्मल हो जाता था

मगर आज
मौन , मौन है
जाने किस मरघटी खामोशी ने घेरा है
जहाँ सृष्टि है या आँखों से ओझल
इसका भी पता नहीं
फिर क्रियाकर्म की रस्म कोई कैसे निभाये
तो क्या
मौन की ये ब्राह्मी स्थिति ही  मुक्तिबोध है ?

बुधवार, 23 मार्च 2016

साँवरे रसिया रे



साँवरे रसिया रे 
होली के बहाने आ जा 
साँवरे रसिया रे 
मोहे अपने रंग में रंग जा 

आज मोहे रंग भाये न दूजा 
श्याम रंग में ही रंग जा 
साँवरे रसिया रे 
एक बार गले लग जा 
साँवरे रसिया रे 
प्रीत को अमर कर जा 

सखिया सभी रंगी खड़ी हैं 
मेरी चूनर सूखी पड़ी है 
तू ही आकर भिगो जा 
साँवरे रसिया रे 
फाग का राग बन जा 
साँवरे रसिया रे 
इस होली मेरी गली फिर जा

लालम लाल हो जाउंगी 
तेरे ही रंग में रंग जाऊंगी 
जो तू फाग मुझ संग मना जा 
साँवरे रसिया रे 
होली के बहाने आ जा 
साँवरे रसिया रे 
मेरे अंग अंग में बस जा 



रविवार, 20 मार्च 2016

कृपण द्वार

अब मेरे पास शब्द है न भाषा
न बची खुद से ही कोई आशा
सभी सांसारिक तृष्णाओं से होकर मुक्त
हो गया हूँ निर्द्वंद
बिल्कुल नवजात शिशु सा
कच्ची मिटटी सा

क्या अब संसारिकता से परे भर सकते हो इसमें कुछ
जो जीवन के औचित्य को कर दे रेखांकित ?
या फिर चलता रहेगा चक्र
जीवन मृत्यु का अनवरत
बिना किसी अन्वेषण के

उत्तर में प्रतीक्षा की घायल आँखें हैं या रूह ...........कौन जाने
शायद जवाब के परिंदे ही खोलें कृपण द्वार ?

शनिवार, 2 जनवरी 2016

मौन का विलोम

अब कोई प्रतीक्षा नहीं
कोई उमंग कोई उल्लास नहीं
जाने किस परछत्ती में दुबक गयी है
ललक मेरी
कि
सुबहो शाम की गर्द से अटा पड़ा है
ख्याल तेरा

इतना बेनूर हो जाना ज़िन्दगी का
कि
कभी कभी शक होता है खुद के जिंदा होने पर

शायद
मेरे मौन का विलोम थे
तुम ... सिर्फ तुम ... माधव !!!

रविवार, 27 दिसंबर 2015

मौन का कुम्भ

लगता होगा कुम्भ
हर बारह बरस में
मगर
मेरे मौन का कुम्भ तो
महीनों दिनों और पलों में
होकर विभक्त
अक्सर टोहता रहता है मुझे
और मैं
अपनी शिथिल इन्द्रियों
शिथिल साँसों संग
लगा लेती हूँ डुबकी
अनंत में
अनंत होकर

बस यही तो है मेरा विस्तार और शून्य

सोमवार, 14 दिसंबर 2015

गोपीभाव 2

सुना है
खिले कँवल ही देवता को अर्पित किये जाते हैं

मन तो मर चुका
तुम्हारे जाने के साथ ही
अब इस मिटटी से कौन सा खिलौना बनाओगे और खेलोगे ?

जलती चिता होती
तो सुलगती रहती उम्र भर
डालती रहती उसमे
तुम्हारे निष्ठुर प्रेम की आहुति
मगर
यहाँ न राख है न चिता

खुद भी शक में हूँ
जिंदा होना केवल साँस लेना भर तो नहीं होता न

और मन की मौत होने पर
तुम चाहे सारे ज़माने की सबसे खूबसूरत चीजें रख दो
नहीं फूँक पातीं
ज़िन्दगी का मन्त्र

अब न कोई कामना है न चाहना
न तुमसे कोई गिला न शिकवा
सच पूछो तो
रोते हैं नैन तड़पता है दिल
मगर फिर भी नहीं दे पाती
कोई उपालंभ

वक्त की चिकोटियों से हैरान हूँ
या फिर
शायद
एक महाशून्य में अवस्थित हूँ ... माधव


बुधवार, 18 नवंबर 2015

तुम क्या हो ...एक द्वन्द



मैं स्वार्थी
जब भी चाहूँगी
अपने स्वार्थवश ही चाहूँगी

तुम्हारे प्रिय भक्तों सा नहीं है मेरा ह्रदय
निष्काम निष्कपट निश्छल
जो द्रवित हो उठे तुम्हारी पीड़ा में
और तुम उनके लिए नंगे पाँव दौड़े चले आओ

जो तुम्हें दुःख न पहुंचे
इसी सोच के कारण साँस लेते भी डरे 
या फिर तुम्हारे मानवीय अवतार लेने से
पृथ्वी पर दुःख सहने से
खुद भी अश्रु बहाने लगें 
और कहने लगें
प्रभु ! मुझे अधम , पापी के कारण बहुत दुःख पाया आपने

न , न , मोहन ऐसा नहीं चाह सकती तुम्हें
नहीं है मुझमे मेरी चाहतों से परे कुछ भी
जानते हो क्यों
क्योंकि
ज्ञान की डुगडुगी सिर उठाने लगती है
कि तुम तो निराकार , निस्पृह , निर्विकार परम ब्रह्म हो
तो तुम्हें कैसे कोई दुःख तकलीफ पीड़ा छू सकती है
तुम कैसे व्यथित हो सकते हो
और मैं दो नावों में सवार हो जाती हों
जब भी तुम्हारे दो रूप पाती हूँ
साकार और निराकार
और हो जाती हूँ भ्रमित

बताओ ऐसे में कैसे संभव है
तार्किक और अतार्किक विश्लेषण
कैसे संभव है
एक तरफ तुम्हें चाहना
तुम्हारी मोहब्बत में बेमोल बिक जाना
तो दूसरी तरफ
तुम्हारे निराकारी निर्विकारी स्वरुप को आत्मसात करते हुए चाहना

क्योंकि
हूँ तो अज्ञानी जीव ही न
जो तुम्हारा पार नहीं पा सकता
और मेरा प्रेम स्वार्थी है
पहले भी कह चुकी हूँ
आदान प्रदान की प्रक्रिया ही बस जानती हूँ
एकतरफा प्रेम करना और निभाये जाना मेरे लिए तो संभव नहीं
उस पर तुम दो रूपों में विराजमान हों
ऐसे में तुम्हारे भ्रमों की उलझन में उलझे
मेरे दिल और दिमाग दोनों ही
द्वन्द के सागर में अक्सर डूबते उतरते रहते हैं
और मैं इस भंवर में जब खुद को घिरा पाती हूँ
सच कहती हूँ
तुम्हारे अस्तित्व से ही निष्क्रिय सी हो जाती हूँ
कभी तुम्हें तो कभी खुद को बेगाना पाती हूँ
तभी तो कहती हूँ मोहन
तुम्हें चाहना मेरे वश की बात नहीं ..

तुम क्या हो 

एक द्वन्द 
या उससे इतर भी कुछ और 
बता सकते हो ?

बुधवार, 4 नवंबर 2015

यदि आज मैं मर जाऊँ

यदि आज मैं मर जाऊँ
कुछ भी तो नहीं बदलना
सिवाय कुछ जिंदगियों के
जहाँ कुछ वक्त एक खालीपन उभरेगा
वो भी वक्त के साथ भर जाएगा
अक्सर मन में उठते इस विचार से
होती है जद्दोजहद
तो फिर जीवन का आखिर क्या है औचित्य ?

क्या सिर्फ इतना भर
पैदा होओ , कमाओ धमाओ
बच्चे पैदा करो
उनका पालन पोषण करो
और फिर एक दिन
तिरस्कृत हो जीवन से कूच कर जाओ
क्या सिर्फ इसीलिए
एक पूरे जीवन की जद्दोजहद ?

कभी छल प्रपंच
कभी बेईमानी , कभी झूठ
कभी अत्याचार के परचम तान
खुद को सर्वेसर्वा सिद्ध करना
जबकि अंत तो एक ही है
मृत्यु से कौन बचा है
फिर किसलिए डर आतंक का साम्राज्य
जब कुछ भी स्थायी नहीं
यहाँ तक कि खुद का होना भी ?

चाहतों के अम्बार लगा
आखिर किस आसमान पर उगायें उपवन और क्यों ?
जबकि
नश्वरता ही है अंतिम सत्य

मुझे मेरा होना प्रश्नों के कटघरे में अक्सर खड़ा कर देता है
और उत्तर में सिर्फ एक आश्रय
या तो कीर्ति की पताका ऐसी फहराओ
जन्म जन्मान्तरों तक न मिटे
या फिर
गिरधर से प्रीत लगा मीरा सूर कबीर तुलसी बन जाओ
जो आवागमन ही छुट जाए
या फिर
ज्ञान का दीप जला लो
हर तम मिट जाए
खुद का आभास हो जाए

और मैं बावरिया
किसी भी आन्तरिक तर्क से
खुद को नहीं कर पाती संतुष्ट
क्योंकि
येन केन प्रकारेण
नश्वरता ही है जब अंतिम सत्य
तो फिर किसलिए इतना उद्योग ?

खाली हाथ आना जाना
तो मध्य में क्यूँ खुद को भरमाना ?

उत्तर जानते हुए भी हो जाती हूँ अक्सर निरुत्तर
और खोज के पर्याय फिर निकल पड़ते हैं प्यास के रेगिस्तान को खोदने ...

सोमवार, 26 अक्तूबर 2015

गोपिभाव 1




सुना है
तुम्हें खेलने का बहुत शौक रहा
खेलने आये और खेल कर चल दिए

अब
यहाँ कोई मौसम नहीं ठहरता

हम नहीं जानतीं सच और झूठ
जीवन और मृत्यु
तुम थे तो जिंदा थीं हम
अब तुम नहीं तो
क्या तुम्हें जिंदा दिखती हैं हम ?

न, न , कोई अनुनय विनय नहीं तुमसे
कोई शिकवा शिकायत नहीं तुमसे
सोच में हैं
क्या मज़ा आता है तुम्हें
पहले पुचकार कर
फिर दुत्कार कर

हाँ , हाँ  , दुत्कारना ही तो हुआ न ये भी
जब तुम्हें अपना बना लिया
जब तेरे हम हो लिए
तभी तुमने मुख मोड़ लिए

अब कहाँ जाएँ
जो जिया की जलन मिट जाए
अब कहाँ पायें
जो अंखियों की हसरत पूरी हो जाये

सुनो जानती हैं हम
तुम दूर नहीं हमसे
हम दूर नहीं तुमसे
मगर बताओ तो जरा
वो रास रंग फिर से कहाँ पायें
जो तेरी मुरली की धुन सुन
दौड़ी दौड़ी चली आयें
घर परिवार को भी बिसरा आयें

ए मोहन ! तुम प्रेम निभाना क्या जानो
तुम हिय में उठती अगन क्या जानो
तुम किसी का होना क्या जानो
तुम किसी के लिए मिटना क्या जानो

यहाँ दिन नहीं होते अब 

सूरज नहीं निकलता अब
एक अरसा हुआ
तुम्हारी तरह ही काली अंधियारी रात्रि ने डेरा डाला हुआ है
और
हम जानती हैं
अब इन अंधेरों की कोई सुबह नहीं .....................

तुम तो गए वक्त से गुजर गए
हमारे साँझ सवेरे भी साथ ले गए 

आज शरद की पूनो फिर आई है 
चाँद अपनी पूर्णता पर इठला रहा है 
जो तुम सामने होते तो
रास की मधुर बेला में रास रचा हम भी इठलाते , पूर्णता पा जाते 
और कुछ पल जी जाते ........


अब इसे खेल न कहें तो क्या कहें ........बोलो तो ज़रा !!!



सोमवार, 21 सितंबर 2015

रंग सांवला होने लगा है











निहारूँ छवि जब जब आईने में 
खुद को न पहचान पाऊँ 
रंग सांवला होने लगा है 
सखी री 
जियरा बावरा होने लगा है 

कोई पिया बसंती छुप गया है 
मेरा रंग रूप ले उड़ गया है 
कित खोजूँ मैं रंग की गागर 
जो मिल जाये खोया यौवन 
ये कैसा पिया से आलिंगन हुआ है 
श्याम रंग मेरा हो गया है 

प्रीत के रंग की गुलाबी गागर में 
जियरा मेरा उलझ गया है 
श्याम से मिलन को तरस गया है 
यूं ही नहीं सलोना रंग मेरा हुआ है 
श्याम का ही मुझ बावरिया पर 
सखी री
शायद परछावां पड़ा है 
तभी तो तन मन सब 
श्याममय हुआ है 

अब की श्याम ने 
ये कैसा रंग डाला
रंग सांवला होने लगा है 
सखी री 
जियरा बावरा होने लगा है 

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

आओ के बतियाओ मुझसे

चुप्पी खलनायिका सी सोच के कूपे में धरना दिए बैठी है . ..... कहने सुनने को कुछ नहीं बचा , अगर है तो एक विरक्ति सी जहाँ जो है जैसा है ठीक है , जो हो रहा है ठीक हो रहा है ..........सोचने समझने की फसल को मानो पाला पड़ गया हो और एक ठूंठ अकड़ा खड़ा हो मानो कहता हो कर लो जो तुमसे हो सके ........नहीं हिला सकते तुम मेरी अटल भक्ति को अपनी कोशिशों के पहाड़ से ..........

ये कोई वैराग्य नहीं है और न ही भक्ति की कोई अवस्था ......... न ही दीन हीनता उभरी है बस एक तटस्थता ने बो दिए हैं बीज अपने ........ कोई नहीं है जो ध्यान दे और मुझे चाहिए एक साथ जो अंतर्घट के किवाड़ों को झकझोर डाले , खोल डाले भिड़े हुए कपाट और करा दे दुर्लभ देव दर्शन .........शायद टूट जाये चुप्पी का कांच

खुद को समझना कभी कभी कितना मुश्किल हो जाता है तो फिर व्यक्त करना कैसे संभव है ..........ऐसे में करने चल देते हैं दूसरों का आकलन जबकि खुद को ही किसी भरोसे नहीं छोड़ सके , खुद के अस्तबल में ही हिनहिनाते चुप के घोड़ों से ही नहीं गुफ्तगू कर सके ..........ऐसे में कैसे संभव है ' आखिर मैं चाहती / चाहता क्या हूँ ' की व्याख्या ?

एक घनघोर निराशा का समय नहीं तो और क्या है ये ? या फिर ये सोच में पड़े कीड़ों के कुलबुलाने का समय है जो जब तक मरेंगे नहीं , नए जन्मेंगे नहीं ? या फिर हरे कृष्ण करे राम जपने का वक्त है ये ? या फिर सब जिरहों से आँख मूँद खुद से संवाद करने का वक्त है ये ?

एक अकारण उपजी त्रासदी सी चुप के अंकुश से कुम्हलाई हुई है सारी बगिया फिर किसी एक फूल की फ़िक्र कौन करे ........

आओ के बतियाओ मुझसे
आओ के रो लो कुछ दुःख मुझसे
आओ के गुनगुना दो कुछ मुखड़े अपने गीतों के
कि शायद खिल जाए अमलतास वक्त से पहले
कि रूठी हुई नानी दादी की कहानी सा मिल जाए कोई शख्स मुझसे
और मैं अपने चुप के कोठार पर जला दूं एक दीप
उमंगों का , तम्मनाओं का , संभावनाओं का

कि शायद गणगौर के गीतों सी उभर सके इक आभा मुझमे ...

शनिवार, 5 सितंबर 2015

आज तो बहुत बिजी होंगे तुम



आज तो बहुत बिजी होंगे तुम
चारों तरफ तुम ही तुम
तुम्हारी ही पूछ
नाक पर मक्खी भी नहीं बैठने दे रहे होंगे .....है न

खुश तो बहुत होंगे
अच्छा लगता है न
जब हर तरफ अपनी ही पूछ हो
कुछ ख़ास हों एक दिन के लिए

मगर कभी सोचा
वो कहाँ जाएँ , कहाँ पायें तुम्हें
जिनके सिर्फ तुम ही एक आधार थे
तुम थे तो धड़कन थी
तुम थे तो श्रृंगार था
तुम थे तो जीवन था
ये किस तपते रेगिस्तान में छोड़ गए हो
जहाँ दूर दूर तक प्यास के पंछी फडफडाते दिखते हैं
और प्यास द्रौपदी के चीर सी नित निरंतर बढती जाती है
मगर तुम्हें न कहीं पाती है

सोचा कभी
जिनका कोई आधार नहीं होता
उसके एकमात्र आधार तुम ही हो ......कहा था तुमने
और जब तुमने ही पाँव के नीचे से जमीन खिसका ली
बताओ तो जरा
कहाँ ठौर पायें वो गुजरिया
कैसे जन्मदिन मनाएं तुम्हारा सांवरिया
जब तुम ही सामने न हों ..........

और मैं हूँ ही कौन तुम्हारी
जो नज़र में तुम्हारी जगह बना पाती
और उम्र मेरी उसी में गुजर जाती

जाओ खुश रहो मोहन
मनाओ ठाठ से अपना जन्मदिन
हमारा क्या है
कल भी ठूंठ थे आज भी ठूंठ ही हैं
और फिर एक मेरे न होने से
कोई कमी न होगी तुम्हारी महफ़िल में

मेरी प्रीत ने तो अभी कच्चा स्नान किया था
फिर कैसे तुमने मुख मोड़ लिया ?
कभी सोचना इस पर भी फुर्सत में
आज तो बहुत बिजी होंगे तुम ...........सांवरे !!!

वैसे भी हर किसी का अपना दिन होता है
और आज तुम्हारा दिन है
वैसे कह सकते हो ........ हर दिन तुम्हारा ही तो है
फिर भी
आता है एक दिन तेरे चाहने वालों का भी
जिस दिन तू कटघरे में खड़ा होता है
और मुझे इंतज़ार है उसी दिन का ...........

जन्मदिन मुबारक हो श्याम ........

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

प्रतिकार की चिता पर

सच और झूठ दो सिरे .......कभी इधर गिरे तो कभी उधर गिरे ........करने वाले पैरवी करते रहे....... चारों तरफ फैली भयावह मारकाट के इस वीभत्स समय में कशमकश के झूले पर पींग भरते रहे मगर आकलन के न हल निकले .........ये कैसा वक्त ने मांग में सिन्दूर भरा है हर तरफ सिर्फ लाल रंग ही बिखरा पड़ा है फिर वो चाहे किसी की तमन्नाओं का हो या किसी की इज्जत का या किसी के मान का या किसी को जड़मूल से ख़त्म कर देने का, या फिर झूठ के बुर्ज तैयार कर देने का.............वक्त की दुल्हन इतरा रही है ये देख देख कि सच का पेंडुलम हाशिये पर खड़ा है तो झूठ का अपनी दावेदारी में अग्रिम पंक्ति में खड़ा मुस्कुरा रहा है.........' चलो हवा में उड़ा दें धूप और बारिश को ये वक्त की साजिशें हैं वक्त को ही सुलटने दो.....तुम तो बस अपने गेसुओं को मोगरे से महकने दो' ........चलन है आज का तो साथ चलना ही पड़ेगा आखिर प्रतिकार की चिता पर कब तक सुलगे कोई ?

शनिवार, 29 अगस्त 2015

गोपीभाव



गोपीभाव
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न ख़ुशी न गम
तटस्थ सा हो गया मन

न मिलने की चाह रही
न बिछड़ने की परवाह रही
उमंगों के घोड़े रुक गए
जाने कहाँ तुम छुप गए

जब से किया किनारा है
मेरा न कोई दूजा सहारा है
अब बिरहा की मारी जाएँ कहाँ
तुम्हारी वो अलौकिक छवि पायें कहाँ
यूं सोच सोच बेजार हुईं
हम तो खुद को तुम पर हार गयीं

न वो सांझ सकारे रहे
न वो मधुबन के द्वारे रहे
न वो रास रंग की बतियाँ रहीं
न वो तुम संग बीतीं रतियाँ रहीं
न वो हास - विलास रहा
न वो पहला सा उल्लास रहा
जब से गए हो परदेस मोहन
अपना पता भी भूल गया
तभी तो कहता है ह्रदय हमारा
न ख़ुशी न गम
तटस्थ सा हो गया मन.......... मोहन !!!

मेरा हर ख़ुशी हर गम
सिर्फ मोहन से रति
यही है मेरे प्रेम की परिणति


सोमवार, 10 अगस्त 2015

है न यही स्थिति

मैं और तू कहूँ
या तू ही तू कहूँ
या मैं ही मैं कहूँ 
भाव तो दो का ही बोध कराता है 

जब न मैं हो न तू 
बस प्रेम ही प्रेम हो 
बोध से परे 
आनंद ही आनंद हो 
वही तो परमानन्द है 
वही तो प्रेम है 
वही तो निराकारता है 

है न यही स्थिति तुम्हें पाने की , तुम में समाने की .........कृष्णा ! मोहना ! माधवा !

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

मन की वीणा

मन की वीणा विकल हो रही है
तुम्हारे दरस की ललक हो रही है

जाएँ तो जाएँ कहाँ गुरुवर
ज्ञान का दीप जलाएं कहाँ

आत्मदीप अब जलाएं कहाँ
चरणकमल कृपा अब पायें कहाँ

मेरे मन में बसा अँधियारा था
गुरु आपने ही किया उजियारा था

अब वो प्रेमसुधा हम पायें कहाँ
कौन प्रीत की रीत निभाये यहाँ

मेरे मन की तपन कौन बुझाए यहाँ
गुरुवर कौन जो तुमसे मिलन कराये यहाँ

ये बेकल मन की अटपटी भाषा
तुम्हारे बिन कोई समझ न पाता

अब ये भावों की समिधा चढ़ाएं कहाँ
गुरुदरस की लालसा मिटायें कहाँ