पृष्ठ

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ …………"दर्द "हो मोहन !


5) 

यहाँ तक कि
 
मीरा के प्रेम की तो
सभी दुहाई देते हैं
मगर उसे भी
ना तु्मने बख्शा
मीरा तुम्हारा नाम ले
गली गली भटकती रही
मगर चैन की सांस ना ले सकी
कभी विष का प्याला
तो कभी सांप पिटारा
उसे भेंट मिला
तो कभी देश निकाला
कहो तो मीरा का
कौन सा क्षण था जो
सुखकर रहा
मगर वो प्रेम दीवानी
प्रेम की घूँट भर चुकी थी
अपना सर्वस्व तुम्हें
मान बैठी थी
इसलिये उफ़ नहीं करती थी
मगर थी तो आखिर
इंसान ही ना
आखिर कब तक
लड सकती थी
क्योंकि
तुमने तो ठान रखी थी
इसे चैन से नही रहने दूँगा
और तब तक उसे दर्द देते रहे
जब तक कि  उसकी
दर्द सहने की शक्ति ना चुक गयी
तब कही जाकर
अन्त मे मीरा की कारुणिक पुकार पर
और खुद को प्रमाणित करने को
स्वंय को सिद्ध करने को
तुमने उसे खुद मे समाहित किया
ताकि तुम्हारे नाम का
गुणगान होता रहे
मगर सोचना ज़रा
ये कैसा प्रेम का बन्धन हुआ
जिसमे सिर्फ़ इकतरफ़ा प्रेम
ही नि्भाया गया
मगर तुम पर ना कोई
असर हुआ
तुम तो आखिरी पडाव पर
ही आते हो
और अपने अस्तित्व को बचाते हो
वरना तो उम्र भर
तुम दर्द और पीडा की
अभिव्यक्ति बन
नसों मे रम जाते हो


6)
 

ये तो तुमने भक्तों का हाल किया
 
और जो अभक्त थे
जिन्होने ना कभी
तुम्हारा नाम लिया
जिन्होने ना कभी
तुम्हारा गुणगान किया
सदा द्वेष मे ही जीवन जीया
कोई भी ना पुण्य कर्म किया
उन्हें एक पल में
दर्शन दे देते हो
और जीवनमुक्त कर देते हो
ये तो भेदभाव ही हुआ
जिसने तुम्हें चाहा
उसने दर्द पाया
और जिसने नही चाहा
वो ही मुक्त हुआ
फिर चाहे वो अजामिल हो
या गज और ग्राह हो

अजामिल को देखो
 
तुमने कैसे तारा
जो सारी उम्र
पाप कर्म मे लिप्त रहा
जिसने हर बुरा कर्म किया
सिर्फ़ एक नाम उसने लिया
वो भी अपने बेटे को पुकारा
तो भी तुमने उसे तार दिया
क्या तुम नही जानते थे
कि इसने अपने पुत्र को
है पुकारा
मगर खुद को  सिद्ध करने के लिये ही
तुमने उसका उद्धार किया
और जिसे युगों बीत गये पुकारते
उसका ना उद्धार किया
और दूसरी तरफ़ देखो
उस गज को
जो वासनाओं मे लिप्त
महाकामी हाथी था
उसे भी तुमने
उसकी एक पुकार पर
ग्राह से छुडाया था
और दोनो का उद्धार किया था
तो इससे कहो तो मोहन
क्या सिद्ध होता है
जो तु्म्हें चाहता है
वो ही दर्द पाता है
और जो नहीं चाहता
वो भवसागर पार
यूँ ही हो जाता है
और ज़िन्दगी भी
खुशी से गुजारता है
ये कैसा तुम्हारा खेल हुआ
जो भक्त की पीडा से आरम्भ हुआ
और पीडा पर ही अन्त हुआ

अब इससे बढकर 

और क्या प्रमाण दूँ तुम्हें
बस चाहने वालों के प्रेम से ही
अलंकृत हो तुम
आज मैं भी तुम्हें अलंकृत करती हूँ
यूँ तो दुनिया ने तुम्हे
बहुत नाम दिये
मगर एक नाम
मैं भी देती हूँ
जो किसी ने नहीं दिया होगा
ओ चाहने वालों को
पीडा देने वाले
निष्ठुर, निर्मोही
तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ …………"दर्द "हो मोहन !

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

सखि री ,बस नैनों से नीर बहे


मन के पनघट सूखे ही रहे 
सखि री ,बस नैनों से नीर बहे 

न कोई अपना न कोई पराया 
जग का सारा फ़ेरा लगाया 
सूनी अटरिया न कोई पी पी कहे 
सखि री ,बस नैनों से नीर बहे 

इक बंजारे का भेस बनाया 
जाने कौन सा चूल्हा जलाया 
खा खा टुकडा कबहूँ न पेट भरे  
सखि री ,बस नैनों से नीर बहे 

जोगन का जब जोग लिया 
तन मन उस रंग रंग लिया 
इक  बैरागन भयी बावरी 
प्रीत अटरिया न श्याम बंसी बजे 
सखि री ,बस नैनों से नीर बहे

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ …"दर्द "हो मोहन …4


और तो और 

देखो जरा
भरत की
निस्वार्थ प्रीती
कैसे प्रेम का स्वरूप
उन्होने पाया था
जिसे देख प्रेम भी
लजाया था
जिसने तुम्हारे लिये
सारा राज -पाठ
ठुकराया था
यहाँ तक कि
अपनी जननी को भी
ना अपनाया था
और उसे भी उसके
माँ होने के अधिकार के सुख 
से वंचित किया
कैसा वो वियोगी बना
जिसके आगे
प्रेम का स्वरूप भी
छोटा पडा
नवधा भक्ति का
पूर्ण रूप जिसमे समाया
उसके प्रेम का भी
ना तुमने सत्कार किया
तुम तो फिर भी
अपनी पत्नी और भाई के साथ
वन मे रहे
और कन्द मूल फ़ल
खाते रहे
ॠषि मुनियों से मिलते रहे
मगर भरत ने तो
एकान्तवास किया
पत्नी परिवार का त्याग किया
मुनि वेश धारण कर
14 वर्ष जमीन मे
गड्ढा खोदकर
उसमे शयन किया
क्योंकि पृथ्वी पर तो
तुम सोते थे
और सेवक का धर्म
यही कहता है
स्वामी से नीचे
उठना बैठना और सोना
बस वो ही तो
उन्होने व्यवहार किया
खाने मे भी
उन्होने घोडों की लीद में
जो जौ के दाने मिलते थे
उन्हें धोकर सुखाकर
फिर उनका भोजन बनाते थे
और उसका सेवन करते थे
स्वामीभक्ति का ना
ऐसा कोई उदाहरण होगा
ऐसी प्रेम की जीवन्त मूर्ति
ना किसी ने देखी होगी
पर तुम्हें ना कोई असर हुआ
तुम तो अपने कर्तव्य पथ पर चलते रहे
भावनाओं प्रेम का ना
कोई मोल रहा
विरह जन्य दुख से
भरत का ह्रदय कातर हुआ
ज़िन्दगी भर सिर्फ़ और सिर्फ़
दुख ही दुख सहा
ये भी कोई प्रेम परीक्षा
लेने का ढंग हुआ
मगर तुम तो इसी मे
आनन्दित होते हो
फिर भाई हो या पत्नी
निष्कलंक सीता पर भी तो
तुमने आक्षेप लगा त्याग दिया
जिसने उम्र भर
पत्नीधर्म निभाया
दुख सुख मे साथ दिया
जो चाहती तो
महलों मे रह सुख
भोग सकती थी
क्योंकि वनवास तो
सिर्फ़ तुम्हें मिला था
मगर अपने प्रेम के कारण
उसने तुम्हारा साथ दिया
वन वन तुम्हारे साथ भटकी
यहाँ तक कि
अपह्रत भी हो गयी
फिर भी ना शिकायत की
वहाँ भी तुम्हारे नाम की रटना
वो लगाती रही
तब भी तुमने उसकी
अग्निपरीक्षा ली
चलो ये ली सो ली
मगर उसके बाद
किस दोष के कारण
तुमने उसका त्याग किया
महज स्वंय को ही
सिद्ध करने के लिये ना
स्वंय को ही प्रमाणित करने
के लिये ही ना
तुमने सीता का त्याग किया
ताकि तुम्हारा वैभव बना रहे
फिर चाहे तुम्हारे कर्म से
आने वाली कितनी ही
सीताओं की दुर्दशा बढे
मगर तुम पर ना कभी असर हुआ 

आज घर घर में सीता दुत्कारी जाती है 
तुम्हारी बिछायी नागफ़नियों पर 
लहूलुहान की जाती है
तुमने तो सिर्फ़
अपना मनचाहा ही किया
फिर चाहे उससे
कोई कितना ही पीडित हुआ
कैंसर के दर्द से भी भयंकर
तुमने दर्द का टीका दिया
जिसे भी हर प्रेमी ने
खुशी खुशी संजो लिया
भला बताओ तो
कैसे कह सकते हो तुम
कि तुम सुखस्वरूप हो
जबकि तुम तो सदा
परपीडा में ही आनन्दित हुए

कहो मोहन अब कैसे कहूँ तुम्हें आनन्दघन
मेरे लिये तो 
तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ दर्द हो मोहन 

क्रमश : ……………

बुधवार, 19 मार्च 2014

ए री अब कैसे धरूँ मैं धीर



कर दिया खुद को खोखला 
अब जो चाहे भर दो पोर पोर में 
बन गयी हूँ तुम्हारी बाँसुरी श्याम 
अब चाहे  जैसे बजा लेना 
बस इक बार अधरों से लगा लेना 
मेरी कोरी चुनरिया 
प्रेम रंग में रंगा देना 
श्याम चरणों से अपने लगा लेना
ऐसी रंगूँ श्याम रंग में 
बस मुझे दर्पण अपना बना लेना 
अधरों पे श्याम सजा लेना 


ए री 
अब जिया ना धरत है धीर 
मेरे ह्रदय में उठत है पीर 
कित खोजूँ मैं ध्याम धन को
अब नैनन से बहत है नीर 


ए री
कोई खबर ले आओ 
कोई श्याम से मिलाओ 
कोई मुझको जिलाओ 
मेरा जिया हुआ है अधीर 


ए री 
अब कैसे धरूँ मैं धीर 

किस बैरन संग छुपे हैं सांवरिया 
लीन्ही ना कोई मोरी खबरिया 
मोरा जिया धरत नाहीं धीर 

ए री 
अब कैसे धरूँ मैं धीर 


जब से भाँवर डाली श्याम संग 
तब से रंग गयी उनके ही रंग 
कह तो सखी अब कैसे बदलूँ चीर 


ए री 
अब कैसे धरूँ मैं धीर 

रस की धार बहती जाये 
तन मन मेरा रंगती जाये 
अब दिन रैन जिया में उठती है पीर 

ए री 
अब कैसे धरूँ मैं धीर 

सोमवार, 10 मार्च 2014

तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ …"दर्द "हो मोहन ......3



3) 
चलो ये छोडो
माँ यशोदा का
क्या दोष हुआ
तुमसे उसने
निस्वार्थ प्रेम किया
अपना वात्सल्य
तुम पर लुटा दिया
पहले तो
बुढापे मे तुमने जन्म लिया
और फिर भी
ना उसके प्रेम का
तुम पर असर हुआ
जो तुम्हारे लिये ही जीती थी
तुम्हारे लिये ही सांस लेती थी
जिसका दिन
तुम्हारी खिलखिलाहट
से शुरु होता था
और तु्म्हारे सोने पर
रात्रि होती थी
उस माँ के भी
 निस्वार्थ प्रेम की
ना तुमने कद्र की
तुम्हें पल नहीं लगा
उसे छोडकर जाने में
कैसी विरह व्यथा में
वो माँ रही
कैसी उसने पीर सही
कि आँखों से अश्रु
इतना बहे कि
एक पतनाला ही
बहने लगा
जब उद्धव ने बृज में
नन्द के घर का पता पूछा
तो बताने वाले ने
यही कहा
ये जो पतनाला बह रहा है
इसके किनारे किनारे चले जाओ
और जहाँ पर इसका सिरा मिले
वो ही नन्द बाबा का घर
इसका उदगम स्थल है
कभी सोचा तुमने
उस माँ के विरह की व्यथा को
जो उम्र भर
पालने में सिर्फ़
तुम्हारा ही अक्स देखती रही
उधो को भी चुप
जिसने करा दिया
चुप हो जाओ उधो
देखो मेरा लाल सोता है
कैसे तुम्हारे प्रेम में
बावरी हो गयी
जिसकी भूख नींद प्यास
सब तुम्हारे साथ ही गयी
फिर भी ना तुमने
पीडा देने मे कोई
कसर छोडी
जो एक बार गये
तो ना मुडकर देखा
उस माँ के प्रेम की
कितनी कठिन
परीक्षा तुमने ली
कि मिले भी तो तब
जब 100 साल बाद
कुम्भ का मेला हुआ
और ये मिलन भी
कोई मिलन हुआ
ये तो सिर्फ़ तुमने
स्वंय को सिद्ध करने के लिये
और अपने वचन को
प्रमाणित करने के लिये
भरम पैदा किया
क्योंकि वचन दिया था तुमने
"मैं मिलने जरूर आऊँगा"
बस हर जगह
सिर्फ़ स्वंय को प्रमाणित
करने के लिये
तुमने दरस दिया
वरना तो किसी की पीडा
या दर्द से ना
तुम्हारा ह्रदय
व्यथित हुआ
जब एक करुणामूर्ति
माँ के लिये
ना तु्म्हारा ह्र्दय पसीजा
तो कैसे तुम्हें सुख स्वरूप कहूँ
क्योंकि
तुम तो परपीडा मे ही
आनन्दित होते हो
और उसे दर्द ही दर्द देते हो 


क्रमश: ………

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ ……"दर्द "हो मोहन ……2



1) 
अब देखो
गोपियों ने कितना
तुम्हें चाहा
अपना माना
अपने आप को
मिटाया
पर तब भी
अन्त में तुमने
उन्हें क्या दिया
सिवाय और सिवाय
दर्द के
विरह के
यहाँ तक कि
आँख के आँसू भी
उनके सूख गये
सोचना ज़रा
द्रव्यता का हर
स्रोत सूख गया जिनका
उन्हें भी नहीं
तुमने बख्शा
यहाँ तक कि
यदि धडकनों के धडकने से भी
जिनका ध्यान च्युत
हो जाता था
तो वो उन्हें भी
रोकने को उद्यत हो जाती थीं
ऐसी परम स्नेहमयी
गोपियों की पीडा को भी
ना तुमने उचित मान दिया
एक बार गये तो
मुड्कर भी नहीं देखा
प्रेम का प्रतिकार तो
तुम क्या देते
कभी उन प्रेम प्यासी
मूर्तियों को ना
अपना दरस दिया
बस जोगन बना
वन वन भटकने को छोड दिया
ना मिलने आये
ना उन्हें बुलाया
फिर भी ना उन्होने
तुम्हें चाहना छोडा
प्रेम शब्द भी
जिनके आगे छोटा पडा
ऐसे प्रेम को भी तुमने
सिर्फ़ दर्द ही दर्द दिया
बस विरह की ज्वाला में
ही दग्ध किया
इससे बढकर और क्या
तुम्हारा दर्दीला स्वरूप होगा


2)
 
चलो ये छोडो
दूसरा चरित्र पकडो
सुदामा तुम्हारा परम मित्र
प्रशान्त आत्मा
जिसमें कोई चाहना नहीं
ईश्वर से भी कोई शिकायत नहीं
निसदिन अपने धर्म पर
अडिग रहने वाला
तुम्हारा भजन करने वाला
तुमसे भी कुछ ना चाहने वाला
भला ऐसा मित्र भी कोई होगा
क्योंकि
इस दुनिया में तो
स्वार्थ के वशीभूत ही सब
एक दूजे से प्रीती करते हैं
मगर तुमने भी
उसकी परीक्षा लेने में
कोई कसर ना छोडी
लोग तो एक दिन
व्रत ना रख पाते हैं
मगर उसके तो
कितने ही दिन
फ़ाकों पर गुजर जाते हैं
गरीबी की इससे
बढकर और क्या
इंतिहाँ होगी
कि एक साडी मे
उसकी बीवी भरी सर्दी में
गुजारा करती है
मगर दोनो दम्पत्ति
ना उफ़ करते हैं
फिर भी ना शिकायत करता है
फिर भी ना तुम्हें कुछ कहता है
ना तुमसे कोई आस रखता है
यहाँ तक कि
पत्नी , बच्चों की
भूख की पीडा से भी
ना विचलित होता है
ऐसे अनन्य भक्त
मित्र की कारुणिक दशा से
कैसे तुम अन्जान रहे
ज़िन्दगी भर उसे
दुख पीडा के
गहरे सागर में
डुबाते उतराते रहे
अगर उसने अपना
मित्र धर्म निभाया
और ना तुम्हें पुकारा
तो क्या तुम्हारा फ़र्ज़
नही बनता था
मगर तुम तो
यही कहते रहे
बस एक बार वो
मुझे पुकार ले
एक बार वो मेरे
पास आ जाये
तब मैं उसे
सर्वस्व दे दूँगा
अरे ये कौन सा
मोहन तुम्हारा
मित्र धर्म हुआ
क्योंकि
जब बुढापा उसका आया
तब कहीं जाकर
स्वंय के अस्तित्व को
बचाने के लिये
स्वंय को मित्र सिद्ध करने के लिये
तुमने कृपा का उदाहरण पेश किया
जब स्वंय को सिद्ध करने की
बात जहाँ आयी
वहीं तुमने स्वंय को प्रकट किया
क्योंकि लोग ये ना कह दें
हरि मित्र दुखी
ये कलंक कैसे सहूँगा
बस सिर्फ़ अपने पर कलंक ना लगे
स्वंय को बचाने हेतु
तुमने ये सब उपक्रम किया
वरना तो ता-उम्र
दुख, दर्द, विपत्ति देना
ही तुम्हारा परम कर्म हुआ
और इसी मे तुम्हें आनन्द मिला
कहो फिर कैसे ना कहूँ
तुम हो दुखस्वरूप

क्रमश: …………

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ "दर्द "हो मोहन !………भाग 1


दर्द का 
रूप नही 
रंग नहीं 
आकार नहीं 
फिर भी भासता है 
अपना अहसास कराता है 
और इस तरह कराता है 
कि सहने वाला छटपटा जाता है 
बस वो ही तो हो तुम भी 
न रूप 
न रंग 
न आकार 
मगर फिर भी हो
और होकर न होना 
और ना होकर होने के बीच 
जो खेल खेलते हो 
उससे जो सहने वाला 
छटपटाता है 
उसे जानते हो 
मगर फिर भी 
सामने नही आते
तुम्हें चाहने वाले 
तुम्हें मानने वाले
जब तुम्हारी चाहत में
खुद को मिटा देते हैं
बस तुझे ही अपना
सब कुछ मान बैठते हैं
तब भी कितने निष्ठुर हो ना तुम
जब चाहे उसकी
अग्निपरीक्षा ले लेते हो
अरे ! जिसने 
सिर्फ़ तुम्हें चाहा
तुम्हें माना
अपना आप मिटा दिया
उसकी भी अग्निपरीक्षा लेना
कहाँ का न्याय हुआ
नहीं! तुम्हें कैसे 
सुख स्वरूप कह दूँ 
तुम तो पीडा हो
ऐसी पीडा जिसमें
सिर्फ़ पीडित ही
मजबूर होता है
वैसे देखा जाये
तुम अपने चाहने वालों को
और देते ही क्या हो
सिवाय दर्द के
छटपटाहट  के 
पता नहीं कैसे
कह देते हैं तुम्हें …सुख स्वरूप
मैं तो तुम्हें अब 
यही कहूँगी
तुम हो दर्दस्वरूप
एक तरफ़ तो तुम
जो तुम्हें नही मानता 
नास्तिक हो
उसके सामने बिना कारण ही
स्वंय को 
प्रकट कर देते हो
बिना उसके पुकारे
बिना उसके चाहे
जैसे बस तुम्हारा सब कुछ
वो ही हो
फिर चाहे वो 
तुम्हारी कितनी ही 
अवहेलना करे
तो दूसरी तरफ़ 
जो रात दिन
तुम्हें पुकारा करते हैं
तुम ही जिनकी
आस हो, विश्वास हो
जीवन आधार हो
जिन्हें तुम्हें पुकारते पुकारते
एक जन्म नहीं
युग युगान्तर बीत गये
उनकी पुकार का
तुम पर ना असर होता है
तुम तो स्वंय में 
निमग्न रहते हो
और 
विपत्तियों को आदेश देते हो
बस इसके घर से 
ना डेरा हटाना
इसने मुझे चाहा है ना
तो इसका फ़ल यही देता हूँ
इसका सब कुछ हर लेता हूँ
दुख पीडा का 
सारा साम्राज्य 
इसके अर्पित करता हूँ
यही तुम्हारा परम
उद्देश्य बन जाता है
मगर उसके सामने 
ना आते हो
उसकी चाह ना पूरी करते हो
और मन ही मन मुस्काते हो
और सिद्ध करने के लिये बता दूँ
उदाहरण सहित 
फिर चाहे परम मित्र
सुदामा हो या गोपियाँ
भरत हों या माँ यशोदा
गज हो या ग्राह
अजामिल हो या मीरा
एक एक कर 
सबका आख्यान करती हूँ
और इसे प्रमाणित करती हूँ
कि तुम हो दर्दस्वरूप मोहन!

क्रमश: ……………

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

अपरिचित हूँ मैं .........

ना जाने कैसे कह देते हैं
हाँ , जानते हैं हम 
खुद  को या फ़लाने को
मगर किसे जानते हैं
ये भेद ना जान पाते हैं
कौन है वो ?
शरीर का लबादा ओढ़े 
आत्मा या ये शरीर
ये रूप
ये चेहरा -मोहरा
कौन है वो
जिसे हम जानते हैं
जो एक पहचान  बनता है
क्या शरीर ?
यदि शरीर पहचान है तो
फिर आत्मा की क्या जरूरत
मगर शरीर निष्क्रिय है तब तक
जब तक ना आत्मा का संचार हो
एक चेतन रूप ना विराजमान हो
तो शरीर तो ना पहचान हुआ 
तो क्या हम
आत्मा को जानते हैं
वो होती है पहचान 
ये प्रश्न खड़ा हो जाता है
अर्थात शरीर का तो 
अस्तित्व ही मिट जाता है
मगर सुना है
आत्मा का तो 
ना कोई स्वरुप होता है
आत्मा नित्य है
शाश्वत है
उसका ना कोई रूप है
ना रंग
फिर क्या है वो
एक हवा का झोंका 
जो होकर भी नहीं होता
फिर कैसे कह दें
हाँ जानते हैं हम
खुद को या फ़लाने को
क्योंकि ना वो आत्मा है
ना वो शरीर है
फिर क्या है शाश्वत सत्य
और क्या है अनश्वर
दृष्टिदोष तो नहीं
कैसे पृथक करें 
और किसे स्थापित करें
द्वन्द खड़ा हो जाता है
शरीर और आत्मा का 
भेद ना मिटा पाता है
कोई पहचान ना मिल पाती है
ना शरीर को
ना आत्मा को
दोनों ही आभासी हो जाते हैं
शरीर नश्वर 
आत्मा अनश्वर 
फिर कैसे पहचान बने
विपरीत ध्रुवों का एकीकरण 
संभव ना हो पाता है 
फिर कैसे कोई कह सकता है
फलाना राम है या सीता
फलाना मोहन है या गीता
ये नाम की गंगोत्री में उलझा 
पहचान ना बन पाता है
ना शरीर है अपना ना आत्मा
दोनों हैं सिर्फ आभासी विभूतियाँ
मगर सत्य तो एक ही
कायम रहता है
सिर्फ पहचान देने को
एक नाम भर बन जाने को
आत्मा ने शरीर का
आवरण ओढा होता है
पर वास्तविकता तो 
हमेशा यही रहती है
कोई ना किसी को जान पाता है
खुद को भी ना पहचान पाता है
फिर दूसरे को हम जानते हैं
स्वयं को पहचानते हैं 
ये प्रश्न ही निरर्थक हो जाता है
ये तो मात्र दृष्टिभ्रम लगता है
जब तक ना स्वयं का बोध होता है 
तो बताओ ,
कैसे परिचय दूं अपना
कौन हूँ
क्या हूँ
ज्ञात नहीं
अज्ञात को जाने की 
प्रक्रिया में हूँ तत्पर
परिचय की ड्योढ़ी पर
दरवाज़ा खटखटाते हुए
अपरिचित हूँ मैं ..........

रविवार, 19 जनवरी 2014

अदभुत आनन्दमयी बेला


अद्भुत आननदमयी बेला सखि री 
अद्भुत निराली छटा 
ना नाम ना धाम ना काम कोई 
भूल गयी मै कौन भयी 
कैसी निराली थी वो घटा 
सखि री अदभुत आनन्दमयी बेला 

इक क्षण में थी घटना घटी 
न आवाज़ हुयी न बिजली चमकी 
वो तो ज्योतिपुंज बन प्रकट हुयी 
और कर गयी मुझे निहाल सखी री 
 अदभुत आनन्दमयी बेला 

अब आनंद सिंधु बन गयी 
अपनी सुध बुध भूल गयी 
ऐसी थी वो श्यामल छटा 
कर गयी आत्मविभोर सखी री 
 अदभुत आनन्दमयी बेला 

सोमवार, 13 जनवरी 2014

एक बंजारापन का आभास

एक बंजारापन का आभास 
खुद में खुद को खोने की ख्वाहिश 
खुद से भी न मिलने की तमन्ना 
यूं ही नहीं होती 
भीड़ में अकेलापन 
शोर में सन्नाटा 
और भागम भाग भरी ज़िन्दगी में 
रुक जाना 
जैसे किसी अनादिकाल से चली आ रही 
किसी परंपरा को मिटाना 
या किसी युग को ही चित्रपट से गायब कर देना 
या शायद होने और न होने के बीच में 
जीवन बसर करने की चाह  का होना 
एक अपरंपरागत लेख सा ये जीवन 
ढूंढ लाता  है विसंगतियां 
लीक पर चलते चलते 
और कर देता है धराशायी 
उम्र की तहजीबों को 
वक्त के नालों में 
जहाँ सड़ांध ही सड़ांध होती है 
तब भागना चाहता है 
बंजारेपन की ओर 
खुद को भुलाने की ख्वाहिश में 
क्योंकि 
सामने का दृश्य चित्रपट सा होता है 
सिर्फ और सिर्फ झूठ का पुलिंदा 
जहाँ यथार्थ और सत्य सलीब पर लटके होते हैं 
कराहते से , सहमते से , मिटते से 
तब न ये दर न वो दर 
कोई न अपना दीखता है 
बंदिशों की बेड़ियों में जकड़े जूनून तो सिर्फ 
सर ही पटकते दिखते हैं 
छातियाँ पीटने की रवायतों का पालन करते 
क्यूँ ............आखिर क्यूं 
जीने के लिए अवतारी होना जरूरी है 
क्यूँ नहीं कोई बेल बिना सहारे के सिरे चढ़ती है 
क्यूँ नहीं हर गरजता बादल बरस पाता  है 
और इसी क्यूं की खोज में 
विश्राम से पहले 
ये सच नहीं जान पाता है 
ना खुदा ही सच ............. ना तू ही सच .............ना ये दुनिया सच 
बस बेबसियों की शाखों पर कंटीले तारों की लगी बाड से 
रक्त रंजित होना और रिसना ही आखिरी पड़ाव है ...........अंतहीन यात्रा का 
क्योंकि 
डूबने से पहले और तैरने की ख्वाहिश में हाथ पैर तो मारने ही पड़ते हैं 
जरूरी तो नहीं सबको रत्न मिलें ही या खुदा  का दीदार हो ही 

रविवार, 5 जनवरी 2014

प्यास के पनघटों पर


प्यास के पनघटों पर 
प्यास की गगरी न छलकती है 
प्यास से व्याकुल तो 
मीरा भी छनकती है 
दरस की दीवानी देखो 
गली गली भटकती है 
कहीं प्यास भी कभी 
किसी पानी से बुझती हैं 
जितना पियो ये तो 
उतनी ही रोज बढ़ती है 

लगा लो अगन 
बढ़ा लो तपन 
प्यास के शोलों में 
भड़का दो गगन 
जो सिमट जाए किसी गागर में 
ये न ऐसी शय होती है 
किसी को मिलन की प्यास है 
किसी को दरस की आस है 
किसी को किसी स्वप्न की तलाश है 
प्यास का क्या है 
ये तो हर घट में बसती है 
अब ये तुम पर है 
तुम कैसे इसे बुझाते हो 
चाहे राधा बनो चाहे श्याम 
प्यास के पंछियों का नहीं कोई मुकाम 
जो बुझ जाए वो प्यास नहीं 
जो मिट जाए वो आस नहीं 
पियो प्याला प्रेम का 
भर  नैनों में नीर 
फिर भी ना बुझे 
सदियों की जगी पीर 
बस यूँ दिगपर्यंत जो 
प्यास की लौ जलती है 
वो ही तो प्यास की
अंतिम लकीर होती है 
क्योंकि …… प्यारे 
एक युगपर्यंत चिता सी जो 
युगपर्यंत तक जलती है 
और बुझाने की कोई जुगत
न जिस पर चलती है 
बस वो ही तो अमिट प्यास होती है 
जितनी बुझाई जाए उतनी ही बढ़ती है 
प्यास के दीवानों की प्यास तो सिर्फ प्यास से ही बुझती है …… 

सागर का तीरा है 
खामोश ज़खीरा है 
और प्यास की रेत पर मीन का डेरा है 

यूँ भी प्यास के समन्दरों की प्यास भला कब बुझी है
बस अतृप्ति के आँचल में ही तो प्यास परवान चढ़ी है 

बुधवार, 1 जनवरी 2014

वैसे एक सच बताऊँ



देख रहे हो मानवी लीला 
नव वर्ष आया 
सबके लिए खुशियों के 
उपहार लाया 
हर चेहरा है खिलखिलाया 
और जानती हूँ 
तुमने ही मुँह फुलाया है 
देखो माधव 
मुँह ना फुलाओ 
जरा तुम भी मुस्काओ 
क्या , क्या कहा 
तुम्हें किसी ने मुबारकबाद नहीं दी 
इसलिए बेचैन हो 
सुनो मोहन ,चितचोर , सांवरे 
हर रूप में तुम ही तो हो 
इसलिए उन्हें कहूँ या तुम्हें 
क्या कोई फर्क पड़ता है 
और यदि पड़ता है तो 
लो प्यारे 
देती हूँ तुम्हें शुभकामनाएँ 
तुम भी सारा साल , सारी कायनात तक 
बस अपनी राधे संग मुरली बजाते रहो 
मुस्काते रहो 
और मुझे अपनी बावरी बनाते रहो 
ए  ………… देते देते लेने की अदा तुम्ही से सीखी है मोहन
फिर चाहे शुभकामनाएं ही क्यों ना हों :)


वैसे एक सच बताऊँ 
तुम्हें शुभकामना दिये बिना 
मैं भी अधूरी ही रहती 
अब चाहे तुम रूठते या नहीं 
बस यही है मेरी और मेरे जीवन की प्रथम और अन्तिम परिणति 

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

प्रेम की चरमोत्कर्ष अवस्था

प्रेम तो है ही शांति का प्रतीक और जो प्रेम का महासागर है, जिससे प्रेम उपजता है एक बूँद के रूप में वो कैसे स्वीकार सकता है एक कंकड की भी हलचल या एक लहर की तरह उछाल लेना……सत्यम शिवम सुन्दरम का आकार पाने के लिये , निराकार से एकाकार होने के लिये , हर तरंग का शांत होना जरूरी है तभी संभव है सम्पूर्ण प्रेम को पाना जहाँ कोई जल्दी नहीं , कोई वेग नहीं , कोई प्रवाह नहीं ………होती है तो एक अजस्र धारा सिर्फ़ बहती हुयी और उसमें चाहे जो समाये वो ही हो जाता है ………निर्द्वन्द, निर्विकल्प, निराकार …………प्रेम जिसका कोई आकार नहीं मगर फिर भी होता है साकार………प्रेमी के लिये उसके प्रेम के लिये उसको पूर्णता प्रदान करने के लिये…………प्रेम की गरिमा और  भंगिमा को छूना सबके लिये संभव नहीं …………बस खुदी को मिटाना और निशब्द हो जाना ही तो प्रेम को पाना है …………क्योंकि मौन में ही तो प्रेम भासता है।

प्रेम को खोजन जो प्रेम चला ……बस प्रेम प्रेम प्रेममय हो गया………प्रेम मे होना होता है ………खोजना नहीं …………प्रेम खोजने से परे की विषय वस्तु है…………प्रेम जितना सरल है उतना ही गूढ ………तात्विक विवेचन संभव ही नहीं ………तभी तो प्रेमपंथ सबसे कठिन कहा गया है क्योंकि जिसकी कब चाल बदल जाये पता ही नहीं चलता कभी मीरा बना देता है तो कभी मोहन …………और कभी दर दर का भिखारी एक अपनी ही अलख जगाता ………व्याख्यातित करने चलोगे तो कुछ नहीं मिलेगा वो ही कोरे का कोरा मिलेगा अंत में …………बस एक धुन बजाओ और डूब जाओ बिना जाने उसका उदभव कहाँ है, बिना जाने उसका अंत कहाँ है ………विवेक पर पट्टी बाँध जिसने चोला रंगा है वो ही प्रेम को जाना है और जिसने तार्किक शास्त्र गढा है उसने सिर्फ़ शोध किया है प्रेम नहीं और प्रेम शोध का विषय नहीं…
लेन देन के व्यापार से परे की स्थिति है प्रेम, हर चाह के मिटने की स्थिति का नाम है प्रेम, सर्वस्व समर्पण करने का नाम है प्रेम।जो करने से हो वो प्रेम नहीं ……ये तो स्वत:स्फ़ूर्त अनुभूति है , अजस्र बहती धारा कब किसे कैसे अपने साथ बहा ले जाती है पता नहीं चलता इसलिये कौन प्रेमी और कौन प्रेमास्पद्………हर भेद का मिट जाना ही प्रेम की चरमोत्कर्ष अवस्था है ।

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

सोचती हूँ क्या दूँ तुम्हें ?

लोक लाज त्याग 
मेरे हठी 
प्रेम ने प्रेम के गले में 
प्रेम की वरमाला डाल 
प्रेम को साक्षी मान 
प्रेम की भाँवरें डाल 
प्रेम को परिपूर्ण किया 
अब विदा होकर 
प्रेम के आँगन में 
पदार्पण कर 
प्रथम मिलन के इंतज़ार में 
सोचती हूँ 
क्या दूँ तुम्हें ?
प्रेम तो कब का 
तुम्हारा हो चुका 
अब तो सिर्फ जाँ बची है 
क्या मुँह दिखाई की रस्म जाँ लेकर ही निभाओगे ...................ओ मोहन !

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

धू धू कर जल रही है चिता मेरी


प्रेम 
जीवन का आधार 
जीने के लिए आवश्यक विषय 
मगर मानव इसी से अंजान 
कभी मुश्किल सवाल सा 
तो कभी इससे आसान कुछ नहीं 
कभी कश्मकश सा 
तो कभी तरंगित करता 
फिर भी जाने क्यूँ रहता अधूरा 
जिसने भी पढ़ा 
कहीं न कहीं कुछ न कुछ छूट ही गया 
चाहे वो इस विषय का 
एक अध्याय हो या एक प्रश्न 
या एक पंक्ति 
कहीं शोध का विषय बना 
कहीं कोई पूरा ही डूब गया 
और कोई तो 
न पूरा डूबा और न पूरा तरा 
बस गोते ही खाता रहा 
कभी असमंजस की नाव पर 
तो कभी पूर्ण विराम पर 
एक तर्कसंगत विषय बना 
कभी सभी तर्कों से परे 
सिर्फ अनुभूति की कसौटी पर ही परखा गया 

मगर मैंने तो सिर्फ सुना ही सुना सब 
मैंने तो सिर्फ पढ़ा ही पढ़ा सब 
कभी अनुभूति की प्रक्रिया से गुजरी ही नहीं 
कभी शोध के लिए आवश्यक 
सामग्री मिली ही नहीं 
और एक अजब सी असमंजस में डूब गयी 
आखिर कैसे होता है देह से परे 
अनुभूति की तरंगों पर आत्मिक प्रेम 
आखिर कैसे कोई कृष्ण किसी राधा के प्रेम में 
हिचकियाँ लेता है 
कैसे कोई कृष्ण प्रेम में इतना डूब जाता है 
कि श्वास श्वास पर सिर्फ राधा राधा ही गुनता है 
आखिर कैसे साज श्रृंगार कर राधा बन जाता है 
आखिर कैसे स्वयं को किसी के लिए 
विस्मृत कर देता है 
आखिर कैसे भाव तरंगों पर 
तादात्म्य हो जाता है 
जो एक पर गुजरती है 
वो दूसरे की  अनुभूति बन जाती है 
कैसे कोई एक इतना प्यारा लगने लगता है 
कि उसके अलावा संसार है 
या इस संसार में कोई और भी है 
वो भूल जाता है 
और प्रेम की आंच पर ही
खाली देग सा धधकता है 
नहीं जान पायी आज तक 
क्यूंकि 
गुजरी ही नहीं ऐसी किसी अनुभूति से 
क्यूंकि 
मिला ही नहीं कोई कृष्ण 
जो  प्रेम में बावरा बन घूम सकता 
यहाँ तो सिर्फ 
स्वार्थमयी ही दिखा सारा संसार 
यहाँ तो सिर्फ 
देह तक ही दिखा हर व्यवहार 
फिर कैसे सम्भव है 
तारों की ओढ़नी ओढ़ अपने चाँद की परिक्रमा करना 
जहाँ सारा आकाश सिर्फ 
देह की कँटीली झाड़ियों में ही उलझा हो 
या फिर स्वार्थ की वेदी पर 
सिर्फ स्व की आहुति दी जाती हो अर्थ के लिए 
वहाँ कैसे सम्भव है 
प्रेम के खगोलशास्त्र का भूगोल दर्शन 


पीर फ़क़ीर दरवेश 
मीरा राधा रुक्मणी 
बस अलंकार से लगते हैं 
जिन्हें सजा दूं किसी पंक्ति में 
और बढ़ा दूं उसका सौंदर्य 
लगता है जैसे 
किंवदंतियाँ हैं जिन्हें 
समयानुसार प्रयोग भर किया जा सकता है 
मगर 
मुझे मुझमें नहीं मिलता 
एक अंश , एक कण , एक क्षण भी प्रेम का 
फिर कैसे मानूँ प्रेम के स्वरुप को 
कैसे स्वीकारूँ प्रेम के रूप को 
कैसे साकार करूँ निराकार को 
जो ना मेरे मन के अरण्य में विचरता है 
ना मेरी अनुभूतियों से गुजरा है 
फिर कैसे जान सकती हूँ कि  
कैसे कोई इकतरफा प्रेम में 
बावरा बन गली गली नृत्य करता है 
और मगन रहता है 
सुख का अनुभव करता है 
प्रियतम न उससे दूर होता है 
मेरे हाथों में तो सूखी रेत है 
और दूर दूर तक कोई सागर नहीं 
जो भिगो सके और करा सके अहसास 
नमी का , भीगने का , डूबने का 
शायद तभी 
अधूरा ही रहता है प्रेमग्रंथ 
शायद तभी 
अधूरे ही रहते हैं प्रेमीयुगल 
क्यूंकि 
खारे पानी से कब किसी की प्यास बुझी है 
क्यूंकि 
कहाँ अनुभूति की प्रक्रिया से हर रूह गुजरी है 
क्यूंकि 
कहाँ कोई निराकार प्रेम की उद्दीप्त तरंगों पर साकार हुआ है 
और जब तक गुजरुँगी नहीं इस प्रक्रिया से 
कैसे मानूँ , कैसे जानूँ , कैसे स्वीकारूँ 
प्रेम के अस्तित्व को 

पागलपन का सुना है दूजा नाम प्रेम ही होता है 
और मुझे लग चुका है ये छूत का रोग 
अब मेरे पागलपन की दवा सिर्फ इतनी भर है 
प्रेम की अनुभूति से गुजरने के लिए एक अदद प्रेमी का होना 

और तभी है जीना सार्थक
और प्रेम का होना सार्थक जब 
तुम जवाब दो मेरे इस प्रश्न का 
क्या बन सकोगे वैसे ही मेरे भी प्रेमी जैसे तुम बने थे राज राजेश्वरी के लिए …………ए कृष्ण !!!

अनुभूति की चाहत के अरण्य में धू धू कर जल रही है चिता मेरी 
और परिक्रमा को मेरी सुलगती रूह के सिवा कुछ भी नहीं …………… 


शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

दो शब्दों के बीच के खालीपन को भरने के लिये

तुम और मैं
दो शब्द भर ही तो हैं
बस इतना ही तो है
हमारा वज़ूद
जो कब शब्दकोष की भीड में
खो जायेंगे
पता भी नहीं चलेगा
फिर भी प्रयासरत रहते हैं
दो शब्दों के बीच के खालीपन को भरने के लिये
जानते हो
ये दो शब्दों के बीच जो खाई होती है ना
उसमें ही सम्पूर्ण दर्शन समाया है
जीवन का, उसकी उपलब्धियों का
सार क्या है खालीपन का
ये खोजना है ?
और खोज के लिये दूरी जरूरी होती है
मैं से तुम तक की
और तुम से मैं तक की
ताकि गर उस सिरे से तुम चलो
और इस सिरे से मैं तो
प्रतिबिम्बित हों आईने में
और भेद मिट जाये खालीपन का
दो शब्दों की दूरी का
क्योंकि शब्द ही तो अक्षर ब्रह्म है
शब्द ही तो प्रणव है
शब्द ही तो ओंकार है
शब्द की तो साकार है
फिर कैसे रह सकता है दरमियाँ कोई परदा खालीपन का………
बस चिन्तन और विश्लेषण की दरकार ही
खोज को पूर्ण करती है जिसका मुडाव अन्दर की तरफ़ होता है
सत्य की तरफ़ होता है ……
और यही खालीपन ही तो सत्य है
क्योंकि सत्य निराकार होता है……तुम और मैं के बीच भी और उनके साथ भी

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

मैं स्वयम्भू हूँ


मेरा मैं 
मुझसे बतियाने आया 
अपनी हर अदा बतलाने आया 

मैं 
स्वयम्भू हूँ 
मैं 
अनादि हूँ 
मैं 
शाश्वत हूँ 
हर देश काल में 
न होता खंडित हूँ 
एक अजन्मा बीज 
जो व्याप्त है कण कण में 

मैं 
अहंकार हूँ 
मैं 
विचार हूँ 
मैं 
चेतन हूँ 
स्वयं के शाश्वत होने 
का विचार करता है पोषित 
मेरे अहंकार को 
क्योंकि चेतन भी 
मैं ही हूँ 
विचारों को , बोध को 
सुषुप्ति से जाग्रति की और ले जाना 
यही तो है मेरी चेतनता 
फिर कैसे न हो मुझमे 
सात्विक अहंकार 
मेरे मैं होने में 

जड़ चेतन मेरी ही अवस्था 
ये मेरा ही एक हिस्सा 
ज्ञानबोध चेतना की चेतन अवस्था 
अज्ञानावस्था चेतना की जड़ अवस्था 
मुझसे परे न कोई बोध 
मुझसे परे न कोई और 
मैं ही मैं समाया हर ओर 
दृष्टि बदलते बदलती सृष्टि का 
मैं ही तो आधार हूँ 
तू भी मैं 
मैं भी मैं 
धरती , गगन , जड़ जीव जंतु 
सभी मैं 
फिर कौन है जुदा किससे 
ज़रा करो विचार 
विचार ही ले जाएगा तुम्हें बोधत्त्व की ओर 
और बोध ले आएगा तुममें आधार 
निर्मल मृदु मुस्कान खिलखिलाएगी 
जब मैं की सृष्टि की कली तुम में खिल जायेगी 
फिर खुद से अलग ना पाओगे कुछ 
खुद ही मैं में सिमट जाओगे तब ............

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

कोई नयी कसौटी पर कसना होगा


ओ नटवर चितचोर नंदलाला
यूँ रो रो मुझे ना डराना
सब जानूँ तुम्हारा बहाना
कैसे पहले मन को हरते हो
फिर जो तुम्हें चाहे
उससे मुँह फेर लेते हो
और जब कोई उलाहना दे तो
रो -रो जीना दूभर करते हो
लो ना मानोगे श्याम
रो रोकर मोहिनी मत डारो
मैं ना मानूंगी इस बार
तुहारी भोली बातों में
ना आऊंगी इस बार
मैं ना लाड लडाऊँगी इस बार
तुम्हारी रोज- रोज की ठिठोलियाँ
मुझे बहुत भरमाती हैं
कभी पुचकारना
कभी दुत्कारना
कभी मनुहारना
कभी निहारना
कभी मीठी चितवन
बांकी मुस्कन से
घायल कर जाना
ये दांव पेंच पुराने हुए
अब ढूँढो श्याम
कोई नया बहाना
मैंने नहीं तुम्हारी
चतुराई में आना
इस बार ना चलेगा
पुराना बहाना
गर तुमको मुझे है लुभाना
नया रूप धारण करना होगा
कोई नयी कसौटी पर कसना होगा
श्याम तुम्हें भी अबकी मेरा बनना होगा .............


दूसरा भाव :