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रविवार, 15 जुलाई 2018

काश वापसी की कोई राह होती

काश वापसी की कोई राह होती
है न ...दृढ निश्चय
फिर छोड़ा जा सकता है सारा संसार और मुड़ा जा सकता है वापस उसी मोड़ से

लेकिन क्या संभव है सारा संसार छोड़ने पर भी उम्र का वापस मुड़ना ?
युवावस्था का फिर बचपन में लौटना
वृद्धावस्था का फिर युवा होना
है न ....मन को साध लो फिर जो चाहे बना लो
कैसे ?
किसी बच्चे के साथ खुद को जोड़ लो
बचपन लौट आएगा
किसी युवा की सोच अपना लो
जवानी का दौर फिर लौट आएगा
मगर जर्जर तन कब इजाज़त देता है
ये तो हर मोड़ पर एक इम्तिहान लेता है
मन से ही तन सधता है
बस इतना जान लो
मृत्यु से पहले न खुद को मृत मान लो
फिर वापसी स्वयमेव हो जायेगी
फिर वो संसार हो
उम्र हो
ब्रह्माण्ड हो
कल्प हों
या फिर प्रकृति हो

जहाँ से कहानी शुरू वहीँ ख़त्म होती है
वापसी की राह भी रास्ता देती है
अंतिम अणु तक पहुँच ही वापसी का द्योतक है

©वन्दना गुप्ता vandana gupta 




गुरुवार, 21 जून 2018

जब से तुम बिछड़े हो प्रियतम

मरघट का सन्नाटा पसरा है 
मन प्रेत सा भटका है 
जब से तुम बिछड़े हो प्रियतम 
हर मोड़ पे इक हादसा गुजरा है 

मैं तू वह में ही बस जीवन उलझा है 
ये कैसा मौन का दौर गुजरा है 
चुभती हैं किरचें जिसकी 
वो दर्पण चूर चूर हो बिखरा है 

जब से तुम बिछड़े हो प्रियतम 
हर मोड़ पे इक हादसा गुजरा है 


प्रेमाश्रु से न श्रृंगार किया है 
मन यादों के भंवर में डूबा है 
आवारा हो गयी रूह जिसकी 
उसका रोम रोम सिसका है 

जब से तुम बिछुड़े हो प्रियतम 
हर मोड़ पे इक हादसा गुजरा है 

मंगलवार, 19 जून 2018

फिर वो स्त्री हो या ईश्वर

मैं भाग रही हूँ तुमसे दूर
अब तुम मुझे पकड़ो
रोक सको तो रोक लो
क्योंकि
छोड़कर जाने पर सिर्फ तुम्हारा ही तो कॉपीराइट नहीं

गर पकड़ सकोगे
फिर संभाल सकोगे
और खुद को चेता सकोगे
कि
हर आईने में दरार डालना ठीक नहीं होता
शायद तभी
तुम अपने अस्तित्व से वाकिफ करा पाओ
और स्वयं को स्थापित
क्योंकि
मन मंदिर को मैंने अब धोकर पोंछकर सुखा दिया है

एक ही देवता था
एक ही तस्वीर
जिसे तुमने किया चूर चूर
अब
नए सिरे से मनकों पर फिर रही हैं ऊँगलियाँ
जिसमे तुम्हारे ही अस्तित्व पर है प्रश्नचिन्ह
तो क्या इस बार कर सकोगे प्रमाणित खुद को
और रोक सकोगे अपने एक प्रेमी को बर्बाद होने से
संकट के बादल छाये हैं तुम पर इस बार
और
शुष्क रेत के टीलों से आच्छादित है मेरे मन का आँगन
जिसमे नकार की ध्वनि हो रही है गुंजायमान
कहो इस बार कैसे करोगे नकार को स्वीकार में प्रतिध्वनित ?

अस्तित्व की स्वीकार्यता ही मानक है ज़िन्दगी की
फिर वो स्त्री हो या ईश्वर

रविवार, 17 जून 2018

मैं बनूँ सुवास तुम्हारी कृष्णा


मैं बनूँ सुवास तुम्हारी कृष्णा
करो स्वीकार मेरी ये सेवा

जाने कितने युग बीते
जाने कितने जन्म रीते
पल पल खाए मुझे ये तृष्णा
मैं बनूँ सुवास तुम्हारी कृष्णा

जाने कब बसंत बीता
जाने कब सावन रीता
चेतनता हुई मलीन कृष्णा
मैं बनूँ सुवास तुम्हारी कृष्णा

जाने कितनी प्यासी हूँ
जन्म जन्म की दासी हूँ
चरण शरण आई कृष्णा
मैं बनूँ सुवास तुम्हारी कृष्णा

(एक बहुत लम्बे अंतराल बाद कान्हा ने बाँसुरी बजाई)

गुरुवार, 24 मई 2018

पीर प्रसव की............


पीर प्रसव की
यूं ही तो नहीं होती है
इसमें भी तो
इक चाहत जन्म लेती है
और जन्म किसी का भी हो
पीर बिना ना हो सकता है
यही तो प्रसव का सुख होता है
गर करें विचार शुरू से
तो बीजारोपण से लेकर प्रसव वेदना तक
एक सफ़र ही तो तय होता है
जो नयी संभावनाओं को जन्म देता है
तो क्यों ना आज
सफ़र का दिग्दर्शन किया जाए
प्रसव वेदना तक के सफ़र को टंकित किया जाए

यूँ तो ये अटल सत्य है

बिना बीज के ना अंकुरण होता है
सो बीज तो रोपित हुआ ही होगा
फिर चाहे उसके लिए
रूप जन्मों ने बदले होंगे
शिलाओं पर लेख लिखे होंगे
मगर कब और कैसे
इसका ना हम निर्धारण कर पाते हैं
बस सफ़र में चलते चले जाते हैं
कब कैसे कहाँ से खाद पानी मिलता रहा
किसने उसे पोषित किया
ये ना बेशक हम जान पाए
मगर कहीं ना कहीं हम ही उसका माध्यम बने
आंवल नाल से जुड़ने के बाद
चिंता सारी मिट जाती है
भ्रूण को उसकी खुराक तो
हर कीमत पर मिल ही जाती है
यूँ सफ़र जारी रहता है

प्रथम द्वितीय और तृतीय महीने

सुना है बेहद संवेदनशील होते हैं
शायद यही तो आराधना का शैशवकाल होता है
जहाँ भ्रूण ना परिपक्व होता है
सारा दारोमदार माता पर ही होता है
उसे ही उसके प्रति फिक्रमंद रहना पड़ता है
और साधक की साधना को दुरुस्त रखने को
अनुभूति का संचार करना पड़ता है
अनुभूति क्या होती है ............
ये तो ह्रदय की धड़कन होती है
जो बालक की पहचान बनती है
जो बालक के जीवन को दिशा देती है
जब अनुभूति का आगमन होता है
उत्साह द्विगुणित होता है
मन प्रसन्न प्रफुल्लित होता है
क्योंकि अब तक भ्रूण भी
अपनी शैशवावस्था से बाल्यावस्था
की ओर पदार्पण करने लगता है

चतुर्थ , पंचम और षष्ठ महीनो में

बालक आकार लेता है
यही तो साधक के जीवन का
सबसे उत्तम सोपान होता है
अपनी साधना में रत वो
देवता का आह्वान करता है
रो कर , रूठकर , मनाकर
कभी इठलाकर तो कभी उलझाकर
कभी गाकर तो कभी नृत्यकर
मधुसुदन को मोहित करता है
और अपनी साधना के दूसरे
सोपान चढ़ता है
जहाँ ना कोई सहारा होता है
ना कश्ती का किनारा होता है
सिर्फ भावों की बेल ही अमरबेल बन
वटवृक्ष से लिपटती है
साधक जो भावों से परे
ज्ञान नैया में बैठ जाता है
वो ज़रा सी लहर से ही डूब जाता है
साधक जो कर्म की खेती करता है
उसमे भी कभी ना कभी
अहंकार का उदय हो जाता है
और बीच मझधार में ही
उसका गर्भपात हो जाता है
मगर साधक जो प्रभु को
समर्पित होता है
जीवन डोर उसके हाथ सौंप
निश्चिन्त होता है
वो ही अंत में भव से पार होता है
जैसे भ्रूण का शैशवकाल ख़त्म होता है
वैसे ही वो बाल्यकाल में पदार्पण  करता है
तो माँ का दायित्व हो जाता है
खट्टा मीठा तीखा कड़वा
सोच समझ कर खाए
जिससे ना भ्रूण को कोई दुःख पहुंचे
जो ना उसके अस्तित्व को हानिकारक हो
वो ही क्रियाएं आजमाए
वैसे ही प्रभु भी अपने उस साधक का
ध्यान निरंतर करते हैं
जो सर्वस्व  समर्पित कर
भक्ति भाव से उनको भजता है
और यूँ उसका बाल्यकाल संपूर्ण होता है
फिर चाहे जन्म जन्मान्तरों के चक्कर लगते रहें
उसकी साधना में ना अवरोध उत्पन्न होता है
वहीँ से फिर शुरू हो जाती है
जहाँ से पिछले जन्मों में छुटी होती है
बस यही तो प्रभु की महती कृपा होती है

सप्तम , अष्टम और नवम महीने

फिर बहुत संवेदनशील होते हैं
जहाँ भ्रूण अपने बाल्यकाल से तरुणावस्था
को प्राप्त करता है
तभी तो उसमे समझ का संचार होता है
वो आदतें वो ही ग्रहण करता है
जैसा माँ  का व्यवहार होता है
दिमाग भी तभी आकार पाता है
यही समय तो होता है
जब माँ को विशेष ध्यान रखना होता है
कहीं गलती से भी कोई आचरण बिगड़ जाए
तो संस्कार ना वो मिट पायेंगे
जो जन्म के साथ ही बाहर आयेंगे
ऐसे ही प्रभु को भी ध्यान रखना होता है
जब साधक साधना की अंतिम अवस्था में होता है
जब साधक पूर्णता की ओर अग्रसित होता है
तब रिद्धि सिद्धियों का प्रकटीकरण होता है
जो लालच में फंसाती हैं
जन्मों के फेर में उलझाती हैं
मोह माया के बंधनों के दांव पेंच आजमाती हैं
जिसे साधक ना समझ पाता है
और वो उन्ही में उलझ जाता है
और उसे ही साधना की अंतिम परिणति समझ लेता है
जैसे माँ को कंसूले उठते हैं
तो लगता है जैसे अभी जन्म हुआ
वैसे ही भक्त का वो ऐसा ही समय होता है
ऐसे में किसी ज्ञानी संत की जरूरत होती है
जो इन बाधाओं से पार कराता है
जैसे चिकित्सक बतलाता है
अभी समय नहीं आया है
बस आने वाला है
तब तक इंतज़ार करो
और पग संभल संभल कर रखो
ऐसे ही संत आखिरी पड़ाव में
मार्गदर्शन करते हैं
संत रूप में प्रभु ही भक्त की देखभाल करते हैं
ये बस रूप बदले होते हैं
साधना में परिपक्वता लाने के लिए
यूँ भी परीक्षा लेते हैं

जब नौ महीने का समय

व्यतीत हो जाता है
तब शिशु आगमन में
माँ का ह्रदय हिलोर खाता है
प्रतिक्षण एक ही इच्छा रहती है
कब जन्म होगा
कब उसे देखूँगी
कब उसे खिलाऊंगी
कब मेरी ममता सम्पूर्ण होगी
कब मेरे ममत्व को आधार मिलेगा
जो पयोरस  का वो पान करेगा
और जब वो वक्त आता है
तब पीर ना सहन हो पाती है
जान पर बन आती है
मगर शिशु दरस की लालसा में
माँ वो मृत्युतुल्य कष्ट भी सह जाती है
और शिशु को देखते ही
उसकी मुस्कान देख
उसका रुदन सुन
दुग्धपान कराते ही
उसकी सारी पीड़ा छू मंतर हो जाती है
वो प्रसव की वेदना भी भूल जाती है
कुछ ऐसी ही दशा भक्ति की होती है
जब साधना की अंतिम अवस्था होती है
प्रभु दरस की लालसा में
नित्य अश्रु बहाया करता है
उसका गुणगान किया करता है
चहुँ ओर उसके ही दर्शन किया करता है
कभी गाता है कभी नाचता है
प्रभु दरस की लालसा में यूँ बिलखता है
कि प्राण देने को आतुर हो जाता है
हर किसी के पाँव में वो पड़ जाता है
कोई पिया से मिलन करा दे
इसी आस में प्रतिक्षण गुजारने लगता है
और जब भक्ति की चरम सीमा आ जाती है
और पीर इतनी बढ़ जाती है
कि ह्रदय फटने को आतुर होता है
अपना पता भी ना उसे फिर चलता है
सोने खाने पीने का ना उसे होश होता है
क्या पहना है , क्या कर रहा है
इसका भी भान जब नहीं होता है
बस मुख में नाम और आँख से अश्रु बहते हैं
और शब्द ना मुख से निकलते हैं
दुनिया दीवाना कहने लगती है
पागल उपनाम पड़ने लगता है
वो ही तो प्रसव वेदना का अंतिम चरण होता है
फिर प्रभु भी ना रुक पाते हैं
दरस को दौड़े आते हैं
यूँ उसका साक्षात्कार होता है
और निराकार आकार पाता है
तब पीर सारी बह जाती है
अश्रुओं में ढल जाती है
मैं - तू का भेद मिट जाता है
खुद का खुद से मिलन हो जाता है
आत्मसाक्षात्कार हो जाता है
फिर चाहे ८४ लाख योनियों में ही
क्यों ना भटका हो वो
फिर चाहे साधना में ही क्यों ना अटका हो वो
फिर चाहे कितनी ही बार
योगभ्रष्ट क्यों ना बना हो वो
एक बार तो वो उस ड्योढ़ी को पार कर ही जाता है
जिसके उस तरफ उसे
दिव्यज्ञान मिल जाता है
पीड़ा का हरण हो जाता है
चहुँ ओर सिर्फ उजाला ही उजाला चमचमाता है
यूँ पीर प्रसव की सुखकर हो जाती है
जब दिव्य अनुभूति होती है
फिर ना कोई कारण बचता है
वो जन्मों के खेल से बाहर निकलता है
यही तो मनुष्य जीवन का प्रथम और अंतिम लक्ष्य होता है
जिसे कोई कोई ही जान पाता है
और इस पथ पर चल पाता है
क्योंकि यहाँ परीक्षाएं निरंतर होती हैं
और प्रसव वेदना को सहने में हर कोई ना समर्थ होता है
जो इस पीड़ा को सह जाता है वो फिर और ना कुछ चाहता है
हर चाह का अंत हो जाता है
आत्मसुख में वो डूब जाता है
जब आत्म परमात्म मिलन हो जाता है .......आनंद सागर लहराता है
बस रसानंद छा जाता है .......बस रसानंद छा जाता है

यूँ ही नहीं पीर प्रसव की सहने को कोई आतुर होता है ............

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

लागी छूटे न



मेरी सीमितताएँ
सीमित संसाधन
सीमित सोच
उठने नहीं देते तल से मुझे
फिर कैसे एक नया आसमां उगाऊँ

होंगे औरों के लिए तुम
चितचोर भँवरे
माखनचोर नंदकिशोर
लड्डूगोपाल
और न जाने क्या क्या
मगर
इक नशा सा तारी हो गया है
जब से तुम्हारा संग किया
मेरे लिए तो मेरी 'वासना' भी तुम हो
और 'व्यसन' भी तुम ..... मोहन 


लागी छूटे ना ..........

शनिवार, 30 सितंबर 2017

अपने पक्ष में

राम
जाने क्यों हम तुम्हें मानव ही न मान पाए
महामानव भी नहीं
ईश्वरत्व से कम पर कोई समझौता कर ही न पाए
शायद आसान है हमारे लिए यही
सबसे उत्तम और सुलभ साधन

वर्ना यदि स्वीकारा जाता
तुम्हारा मानव रूप
तो कैसे संभव था
अपने स्वार्थ की रोटी का सेंका जाना ?

आसान है हमारे लिए ईश्वर बनाना
क्योंकि
ईश्वर होते हैं या नहीं, कौन जान पाया
हाँ, ईश्वर बनाए जरूर जाते हैं
क्योंकि तब आसान होता है
न केवल पूजना बल्कि पुजवाना भी
हथियार उठाना भी
बबाल मचाना भी
धर्म की वेदी पर नरसंहार शगल जो ठहरा मानव मन का

आस्था अनास्था प्रतीकात्मक धरोहर सी
ढोयी जाने को विवश हैं
धर्म की ठेकेदारी के लिए जरूरी था तुम्हारा ईश्वरीय रूप
वर्ना देखने वाले देख भी सकते थे
और समझ भी सकते थे
मानव सुलभ कमजोरियों से घिरे कितना असहाय थे तुम भी

यहाँ बलि देकर ही पूजे जाने का रिवाज़ है
फिर वो पशु की हो या इंसान की
वाल्मीकि के राम से तुलसी के राम तक का सफर
अपनी विभीषिका के साथ चरम पर है
यहाँ ईश्वर स्वीकारा जाना आसान है बनिस्पत मानव स्वीकारे जाने के

अब मारना ही होगा हर साल तुम्हें सबका मनचाहा रावण
कि युग परिवर्तन का दौर है ये
तुम्हारे होने न होने
तुम्हारे माने जाने न माने जाने से परे
हम जानते हैं भुनाना अपने पक्ष में हर चीज को
फिर वो ईश्वर हो या मानव


सोमवार, 21 अगस्त 2017

प्रीत की भाँवरें

मुझ सी हठी न मिली होगी कोई
तभी तो
तुमने भी चुनी उलट राह ... मिलन की
दुखी दोनों ही
अपनी अपनी जगह

दिल न समंदर रहा न दरिया
सूख गए ह्रदय के भाव
पीर की ओढ़ चुनरिया
अब ढूँढूं प्रीत गगरिया
और तुम लेते रहे चटखारे
खेलते रहे , देखते रहे छटपटाहट
फिर चाहे खुद भी छटपटाते रहे
मगर भाव पुष्ट करते रहे

कभी कभी सीधी राहें रास नहीं आतीं
और तुम
'उल्टा नाम जपत जग जाना
वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना'
के समान राह आलोकित करते रहे
उसमे भी तुम्हारा प्रेम छुपा था
आर्त स्वर कौन सुनता है सिवाय तुम्हारे
आर्त कौन होता है सिवाय तुम्हारे
एक ही कश्ती में सवार हैं दोनों
आओ खोजें दोनों ही मिलन की कोई स्थली

शायद
मौन का घूँट पीयूँ
और सुहाग अटल हो जाए
ये प्रीत की भाँवरें इस बार उल्टी ली हैं हमने...है न साँवरे

सोमवार, 14 अगस्त 2017

घरों में मातम और जन्मोत्सव?

पूछना तो नहीं चाहिए
लेकिन पूछ रही हूँ
क्या जरूरी है हर युग में
तुम्हारे जन्म से पहले
नन्हों का संहार ...कंसों द्वारा
कहो तो ओ कृष्ण
जबकि मनाते हैं हम तुम्हारा जन्म प्रतीक स्वरुप

सोचती हूँ
यदि सच में तुम्हारा जन्म हो फिर से
तो जाने कितना बड़ा संहार हो
सिहर उठती है आत्मा
क्या तुम नहीं सिहरते
क्या तुम्हारा दिल नहीं दुखता
क्या जरूरी है हर बार ये आक्षेप अपने सिर पर लेना

कभी तो विचार लो इस पर भी
कि
सृष्टि में तुम्हारे आगमन पर संहार के बीज जो बोये हैं
वो कैसे खिलखिला रहे हैं
मगर जाने कितने घरों में मातम पसरा है
क्या जरूरी है चली आ रही परंपरा का ही वाहक बनना?

जन्मोत्सव कैसे स्वीकार सकते हो तुम बच्चों की चिता पर
अबूझ रहस्य है
गर संभव हो तो सुलझा देना जरा
सुना है
तुम करुणा के सागर हो
द्रवित हो उठते हो किसी की जरा सी पीड़ा पर
तो इस बार क्या हुआ?

इस बार करो कुछ ऐसा
कि
सार्थक हो जाए तुम्हारा जन्मोत्सव
तुम्हारी भृकुटी के विलास से भला क्या संभव नहीं ?
 
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©वन्दना गुप्ता vandana gupta  
 

रविवार, 6 अगस्त 2017

मित्रता किसने किससे निभाई

 
मित्रता किसने किससे निभाई
ये बात कहाँ दुनिया जान पाई
निर्धन होते हुए भी
वो तो प्रेम का नाता निभाता रहा
अपनी गरीबी को ही बादशाहत मानता रहा
उधर
सम्पन्न होते हुए भी
अपने अहम के बोझ तले
तुमने ही आने/अपनाने में देर लगाई
 
तुम्हारे लिए क्या दूर था और क्या पास
मगर ये सच है
नहीं आई थी तुम्हें कभी उसकी याद
वर्ना न करते इतने वर्षों तक इंतज़ार 
 
इकतरफा मित्रता थी ये
जिसका मोल तो सिर्फ वो ही जानता था
तभी न कभी उसने गुहार लगाई
तुम्हारी ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी जताई
फिर कैसे कहूँ
जानते हो तुम मित्रता की सच्ची परिभाषा ......कान्हा 
 
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©वन्दना गुप्ता vandana gupta  
 

बुधवार, 2 अगस्त 2017

अब तुम्हारी बारी है ...

तुम थे
तो जहान में सबसे धनवान थी मैं
अब तुम नहीं
तुम्हारी याद नहीं
तुम्हारा ख्याल तक नहीं
तो मुझ सा कंगाल भी कोई नहीं

वो मोहब्बत की इन्तेहा थी
ये तेरे वजूद को नकारने की इन्तेहा है
जानते हो न
इसका कारण भी तुम ही हो
फिर निवारण की गली मैं अकेली कैसे जाऊँ?

मुझे जो निभाना था , निभा चुकी
सच और झूठ के पलड़ों में
तुम्हारे होने और न होने के पलड़ों में
अब तुम्हारी बारी है ... यदि हो तो ?

आस्था विश्वास और अविश्वास के मध्य
महीन सी लकीर
तुम्हारा कथ्य तोल रही है

जानते हो न
बदले बेशक जाएँ
टूटे तार फिर जुड़ा नहीं करते ...


बुधवार, 19 जुलाई 2017

पहन लूँ मुंदरी तेरे नाम की


उलझनों में उलझी इक डोर हूँ मैं या तुम
नही जानती
मगर जिस राह पर चली
वहीं गयी छली
अब किस ओर करूँ प्रयाण
जो मुझे मिले मेरा प्रमाण

अखरता है अक्सर अक्स
सिमटा सा , बेढब सा
बायस नहीं अब कोई
जो पहन लूँ मुंदरी तेरे नाम की
और हो जाऊँ प्रेम दीवानी 

कि
फायदे का सौदा करना
तुम्हारी फितरत ठहरी
और तुम्हें चाहने वाले रहे
अक्सर घाटे में

यहाँ कसौटी है
तुम्हारे होने और न होने की
तुम्हारे मिलने और न मिलने की
रु-ब-रु
कि तत्काल हो जाए पूर्णाहूति

प्रश्न हैं तो उत्तर भी जरूर होंगे
कहीं न कहीं
तुम महज ख्याल हो या हकीकत
कि
इसी कशमकश में अक्सर
गुनगुनाती हूँ मैं

तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं
तेरे बिना ज़िन्दगी भी लेकिन ज़िन्दगी तो नहीं...माधव 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

शनिवार, 8 जुलाई 2017

मैं, कैसे आत्ममंथन कर पाऊँ

मैं निर्जन पथगामी
अवलंब तुम्हारा चाहूँ
साँझ का दीपक
स्नेह की बाती
तुमसे ही जलवाऊँ
मैं, तुमसी प्रीत कहाँ से पाऊँ

मन मंदिर की
देह पे अंकित
अमिट प्रेम की लिपि
फिर भी खाली हाथ पछताऊँ
मैं, रीती गागर कहलाऊँ

जो पाया सब कुछ खोकर
खुद से ही निर्द्वंद होकर
तर्कों के महल दोमहलों में
पग पग भटकती जाऊं
मैं, जीवन बेकार गवाऊं
 

स्नेहसिक्त से स्नेहरिक्त तक 
तय हुआ सफ़र 
कोरा कागज कोरा शून्य बन 
किस जोगी से आकलन करवाऊं 
मैं, कैसे आत्ममंथन कर पाऊँ 

आत्मबोध जीवन दर्शन के 
कुचक्र में फंसकर 
वो कौन सा राग है 
जिसका मल्हार बन जाऊँ
जो मन की तपोभूमि पर
मैं, तपस्या कर रहा जोगी चहकाऊँ



सोमवार, 19 जून 2017

प्रश्नचिन्ह

मैं भाग रही हूँ तुमसे दूर
अब तुम मुझे पकड़ो
रोक सको तो रोक लो
क्योंकि
छोड़कर जाने पर सिर्फ तुम्हारा ही तो कॉपीराइट नहीं

गर पकड़ सकोगे
फिर संभाल सकोगे
और खुद को चेता सकोगे
कि
हर आईने में दरार डालना ठीक नहीं होता
शायद तभी
तुम अपने अस्तित्व से वाकिफ करा पाओ
और स्वयं को स्थापित
क्योंकि
मन मंदिर को मैंने अब धोकर पोंछकर सुखा दिया है

एक ही देवता था
एक ही तस्वीर
जिसे तुमने किया चूर चूर
अब
नए सिरे से मनकों पर फिर रही हैं ऊँगलियाँ
जिसमे तुम्हारे ही अस्तित्व पर है प्रश्नचिन्ह
तो क्या इस बार कर सकोगे प्रमाणित खुद को
और रोक सकोगे अपने एक प्रेमी को बर्बाद होने से

संकट के बादल छाये हैं तुम पर इस बार
और
शुष्क रेत के टीलों से आच्छादित है मेरे मन का आँगन
जिसमे नकार की ध्वनि हो रही है गुंजायमान
कहो इस बार कैसे करोगे नकार को स्वीकार में प्रतिध्वनित ?

अस्तित्व की स्वीकार्यता ही मानक है ज़िन्दगी की
फिर वो स्त्री हो या ईश्वर