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बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

न कोई गाँव न कोई ठाँव

न कोई गाँव न कोई ठाँव 
फिर भी मुसाफ़िर 
चलना है तेरी नियति

अंजान दिशा अंजान मंज़िल
फिर भी मुसाफ़िर
पहुँचना है तेरी नियति 

देह के देग से आत्मा के पुलिन तक ही है बस तेरी प्रकृति

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

रावण कभी नहीं मरा करते




हर साल रावण को जलाना प्रतीकात्मक संकेत 
मगर फिर भी अंजान रहना इंसानी फ़ितरत से 
नहीं , मुझमें रावण नहीं,  राम है 
फिर क्यों तेरे व्यवहार से जली पडोसी की ऊँगली है 
जब तक ये नहीं जान पाओगे रावण को न मार पाओगे 

जब तक मन रूपी रावण पर 
संयम और संतोष का अंकुश नहीं लगाओगे
रावण का वध सम्भव ही नहीं 

रावण कभी किसी भी युग में नहीं मरा करते 

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

नवदुर्गा के पूजन यही उद्देश्य है बतलाया


महागौरी सिद्धिदात्री का तेज समाया 
माँ ने आज अदभुत रूप बनाया 

सच्चे मन से जो कोई ध्याता 
हर मनोरथ सिद्ध हो जाता 

नव कन्या के पूजन तक ही न सीमित रहना 
गृहकन्या को भी उचित मान सम्मान देना 

नवदुर्गा के पूजन यही उद्देश्य है बतलाया 

जिसने जीवन में इसे ध्याया 
वो ही माँ का सच्चा भक्त कहलाया 



बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

भक्ति के आधार



सप्तम दिवस माँ का कालरात्रि स्वरूप 
शुभफ़ल देने वाली माँ शुभंकरी अनूप  

भूत प्रेत भय ग्रह बाधा पल में  दूर भगाए
नाम स्मरण भर से सब व्याधि मिट जाए

श्रद्धा विश्वास ही भक्ति के आधार 
कालरात्रि की है भक्तों महिमा अपार 

मंगलवार, 30 सितंबर 2014

माँ की महिमा




छटा दिवस कात्यायनी धारे अद्भुत स्वरूप 
दिव्य अलौकिक तेज से हो जाओ भरपूर 

हो रिद्धि सिद्धि के साथ से जीवन भरपूर
आज्ञा चक्र की जागृति का ये अद्भुत प्रभाव

नित माँ की महिमा का करो तुम गुणगान
फिर रोग शोक संताप का हो जाता है नाश

सोमवार, 29 सितंबर 2014

स्कन्ध रूप लिया धार



पञ्च दिवस माँ ने स्कन्ध रूप लिया धार 
तब भक्तों में किया एकाग्रता का संचार 

अच्छे और बुरे का खुद ही करो ध्यान 
बन खुद के सेनापति निर्णय करो तत्काल 

परम सुख और शांति का अनुभव जब हो जाए 
शक्ति की कृपा को तब हर प्राणी मान जाए 

रविवार, 28 सितंबर 2014

आओ करें आराधना



चतुर्थ दिवस चतुर्थ रूप कू्ष्मांडा का अनूप 
धन धान्य सम्पदा से जीवन भरती भरपूर 

माँ की आराधना करे रोग शोक का नाश  
आयु यश और बल से भरा रहे भण्डार 

माँ की दिव्यता का नित्य करो गुणगान 
भवसागर से बिन प्रयास हो जाओगे पार 

शनिवार, 27 सितंबर 2014

चन्द्रघंटा की टंकार



तृतीय दिवस तृतीय रूप माँ शिवदूती कहलाए 
जो भी नतमस्तक हो सर्व सिद्धि पा जाए 

काम क्रोध लोभ मोह अहंकार शत्रु जब सताये 
चन्द्रघंटा की टंकार से हर अमंगल मिट जाए 

दिव्य स्वरूप दिव्य ज्योति जगमग चमकी जाए 
सच्चे दिल से करो अराधना दिव्य दर्शन हो जाए

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

पूजा वही होती सार्थक



द्वितीय दिवस द्वितीय रूप का आओ करें आह्वान 
माँ की दिव्य ज्योति से पायें परम विश्राम

पूजा वही होती सार्थक जो देती ये संदेश 
जब जीवन में तुम उतारो माँ का ये उपदेश 

श्रम परिश्रम बिना न होते सफ़ल अभियान 
ब्रह्मचारिणी के इस रूप की यही महिमा महान


गुरुवार, 25 सितंबर 2014

वन्दन बारम्बार



प्रथम दिवस प्रथम रूप का दर्शन 
कर बने सम्पूर्ण जगत  खुशहाल 

शक्ति  औ दृढता करो माँ प्रदान 
जो दे जीवन को स्थिरता का आधार 

माँ के अदभुत रूप को करें वन्दन बारम्बार
तेजोमयी के तेज से प्रकाशित हो जाए संसार 

 नवरात्रि सभी के लिए मंगलमय हों 

रविवार, 21 सितंबर 2014

प्रेम -- एक प्रश्नचिन्ह -- आखिर क्यों ?

जाने कितने युग गुजर गये व्यक्त करते करते मगर क्या कभी हुआ व्यक्त ?पूरी तरह क्या कर पाया कोई परिभाषित ? नहीं , प्रेम- विशुद्ध प्रेम परिभाषाओं का मोहताज नहीं होता तो कैसे उसे उल्लखित किया जा सकता है ? कैसे उसके बारे में दूसरे को समझाया जा सकता है ? 

जब आप प्यार में होते हो तो वो शारीरिक होता है प्यार इंसान सभी से करता है फिर वो अपने हों या पराये या पेड पौधे , पशु या पक्षी । इंसान की फ़ितरत है प्यार करना । प्यार में भी अन्तर आ जाता है कहीं वो दयाभाव से होता है तो कहीं करुणा से तो कहीं किसी अपने के प्रति अपार स्नेह के रूप में मगर प्रेम उससे बहुत आगे की श्रृंखला में आता है जहाँ पहुँचने के बाद और कुछ पाना शेष न रहे , कोई आपमें इच्छा न रहे , सब एक में ही समाहित हो जाए या आप का" मैं " मिट जाए बस एक वो ही नज़र आए आप उसके अक्स में ऐसे सिमट जाएं कि दो होने का अहसास ही गुम हो जाए वो होता है अलौकिक प्रेम जो कम से कम इंसानों के बीच तो नहीं दिखता या मिलता। इंसान तो वशीभूत होता है अपनी जरूरतों के और जब आप किसी के साथ रहते हैं तो वो आपकी आदत बन जाता है और जो आदत बन जाए अगर उससे आपको बिछडना पडे हमेशा के लिए तो वहाँ एक ऐसा ज़ख्म बन जाता है जो जल्दी से नहीं भरता मगर एक दिन भरता जरूर है क्योंकि ये इंसान का स्वभाव है या उसकी स्मृति ऐसी है कि उसे उन संबंधों और रिश्तों को भुलाना पड जाता है क्योंकि जो चला गया वो वापस नहीं आ सकता जानता है वो ये सत्य इसलिए उसे उस सत्य को स्वीकारने में वक्त लगता है लेकिन जब स्वीकार लेता है तो स्मृति पर भी धूल गिरने लगती है और अब उसकी याद की वेदना इतना नहीं कचोटती । कोई याद दिलाए तो याद आता है तब भी उस स्तर तक नहीं उतरता जिस पर वो उससे बिछडते वक्त होता है जो यही सिद्ध करता है कि इंसान का प्रेम सिर्फ़ शारीरिक स्तर तक ही होता है और वो भी किसकी उसके जीवन में कितनी अहमियत है या थी सिर्फ़ उस स्तर तक ही लेकिन ये कहा जाए कि दो इंसानों में अलौकिक विशुद्ध प्रेम होता है तो एक नामुमकिन सा ख्याल भर लगता है क्योंकि आज के भौतिक युग में कहाँ इतना वक्त है इंसान के पास , उसे आगे बढना है , जीवन चलता रहता है तो वो नहीं बँधा रह सकता निराशा के एक ही खूँटे से और आगे बढने के लिए जरूरी होता है अतीत की परछाइयों से खुद को मुक्त करना । 

ऐसे में कैसे आज के भौतिक युग में इंसान विशुद्ध प्रेम के सहारे जीवनयापन कर सकता है और यदि विशुद्ध प्रेम किसी का होगा भी तो वो सिर्फ़ प्रभु से होगा इंसान से नहीं । अब प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में प्रभु से विशुद्ध प्रेम होना ही प्रेम की उच्चतम अवस्था है ? क्या प्रेम को मिल जाता है उसका स्वरूप ? क्या इस तरह हो जाता है प्रेम पूरी तरह व्यक्त ? क्या 'प्रेम ही खुदा है और खुदा ही प्रेम' को चरितार्थ किया जा सकता है इस तरह ? क्योंकि कभी कभी लगता है कि प्रेम भी जीवनयापन के लिए मात्र एक उपकरण है ताकि इंसान इसका अवलम्बन ले जीवन जी सके वरना देखा जाए तो ये जानने की प्रक्रिया का अंत तो खुद पर ही होता है जब इंसान अपने अन्तस में उतरता है , खुद को पहचानने की कोशिश करता है और जिस दिन खुद को जान लेता है प्रेम , ईश्वर , संसार सब मिथ्या हो जाते हैं उसके लिए क्योंकि तब उसे लगता है जो कुछ है सिर्फ़ वो ही है , सब उसी की दृष्टि का विलास है उससे इतर कुछ भी तो नहीं है और जब ये बोध हो जाता है तो खत्म हो जाता है संसार ,प्रेम व  उसका अस्तित्व । जो यही सिद्ध कर रहा है कि प्रेम भी मात्र एक उपकरण भर है जब तक कि इंसान को बोध न हो जाए फिर एक अलौकिक आनन्द में समाया इंसान अपने मौन में ऐसा समाहित हो जाता है जहाँ दो का भास खत्म हो जाता है और अपनी नैसर्गिक आनन्दानुभूति में डूब जाता है मगर जब तक न इस हद तक पहुँचता है तब तक जीवन जीने के लिये प्रेम और प्यार के उपकरणों का प्रयोग करता है और एक भटकाव में जीता रहता है । 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

किससे करूँ जिद

किससे करूँ जिद 
कोई हो पूरी करने वाला तो करूँ भी 
और तुम , तुमसे उम्मीद नहीं 
क्योंकि बहुत जिद्दी हो तुम 
मुझसे भी ज्यादा 
और मुझसे क्या 
इस दुनिया में सबसे ज्यादा 
फिर भला कैसे संभव है मेरा पानी पर दीवार बनाना 
देखा है तुम्हारी जिद को 
और देख ही रही हूँ जाने कब से 
कितने युग बीते तुम न बदले 
और न ही बदली तुम्हारी परिभाषा , तुम्हारे मापदंड 
वैसे भी सुना है 
जहाँ चाहत होती है वहाँ ही जिद भी होती है 
मगर मुझे तो पता ही नहीं 
तुम्हारी चाहत मैं कभी बनी भी या नहीं 
तो बताओ भला किस आस की पालकी पर चढूँ 
और करूँ एक जिद तुमसे तुम्हारे दीदार की ……ओ मोहना !!!

शनिवार, 13 सितंबर 2014

तुम्हें पाने और खोने के बीच


तुम्हें पाने और खोने के बीच 
तुम्हारे होने और न होने के बीच 
डूबती उतराती मेरे विचारों की नैया 
मेरा भ्रम नहीं तुम्हारा निर्विकल्प संदेश है 
जो मैने गुनगुनाया तब तुम्हें पाया ………ओ कृष्ण ! 

अखण्ड समाधिस्थ की स्थिति में स्थितप्रज्ञ से तुम 
हो जाते हो कभी कभी आत्मसात से 
तो कभी विलीन इतने दूर 
कि असमंजस की दिशायें 
कुलबुलाकर छोडने लगती हैं धैर्य के संबल 

निष्ठा श्रद्धा विश्वास और प्रेम के तराजू पर 
काँटे कभी समस्तर पर नही पहुँचते 
तुम्हारा ज्ञान हो जाता है धराशायी प्रेम के अवलंबन पर 
कहो तो कैसे तुममें से तुम्हें जुदा करूँ 
कैसे खुद को फ़ना करूँ 
जो निर्बाध गति हो जाए 
प्रेम प्रेम में समाहित हो जाए .......कहो तो ओ कृष्ण !

शनिवार, 6 सितंबर 2014

एक शून्यता और मैं

कोई उन्माद नहीं

कोई जेहाद नहीं


मन मौन के प्रस्तरों को


छिद्रित करने को आतुर नहीं


फिर विचार श्रृंखला


ध्वस्त हो या बिद्ध


मौसम ऊष्ण हो या शीत


जीवन की क्षणभंगुरता में


मोह के कवच और लोभ के कुण्डल


कितने ही आकर्षित करें



एक शून्यता और मैं निर्बाध विचरण कर रहे हैं

फिर किस्म किस्म के कुसुम अब कौन चुने और क्यों ?

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

प्रधानमंत्री जनधन खाता योजना कितनी सार्थक

प्रधानमंत्री जनधन खाता योजना कितनी सार्थक रहेगी ये तो वक्त ही बतायेगा मगर आज तो एक एक आदमी तीन तीन बैंकों में खाते खुलवा रहा है उसका लाभ पाने को जो यही सिद्ध कर रहा है ………आप मौका तो दीजिये ………अब तक औरों ने लूटा अब हम खुद लूट लेंगे ………जाने क्या सोच कर ये योजना लागू की गयी है जिससे बात करो यही कहता है ये फ़्लॉप होगी यहाँ तो हर डाल पर चोर बैठे हैं ………कहीं ये सिर्फ़ अपनी छवि सुधारने भर की कवायद तो नहीं ? कहीं इस तरह जनता के दिल में जगह बनाने की कोशिश तो नहीं फिर चाहे इस योजना का लाभ भी सबको मिले न मिले मगर जगह जगह फ़ैले सांप्रदायिक तनाव , अव्यवस्था , बलात्कार जैसी घटनायें आदि जो कुछ देश में हो रहा है उससे ध्यान भटकाने का प्रयास है …………फ़िलहाल तो इस योजना का कोई औचित्य नज़र नहीं आ रहा जब तक सही ढंग से लागू न की जाती ………आनन फ़ानन खाते खोलो बस एक फ़रमान सुना दिया गया मगर ये नही सोचा गया क्या वास्तव में इसका फ़ायदा जिस तबके के लिए प्रयोग किया गया है उसे होगा भी या नहीं ? …………

सही या गलत तो भविष्य ही बतायेगा मगर एक व्यक्ति यदि तीन तीन जगह खाते खुलवायेगा तो सोचिए नुकसान किसका होगा ? क्या देश का और टैक्स देने वालों का नुकसान नही होगा इससे ? ये तो अभी एक ही उदाहरण पता चला है ऐसे न जाने कितने और नये घोटाले इस माध्यम से शुरु हो जायेंगे ………क्योंकि इसका फ़ायदा उठाने के लिए शरारती तत्व भी सक्रिय हो जाएंगे तब कैसे पता चल पायेगा कि किसने कितने खाते खुलवाए ? क्या एक सिर्फ़ आधार के माध्यम से ये सब संभव हो पायेगा ? …………इंतज़ार में हैं अब तो हम देखें अच्छे दिन और क्या क्या गुल खिलाते हैं । 

रविवार, 17 अगस्त 2014

भए प्रगट कृपाला --- जन्मदिन मुबारक हो कान्हा




जब से वैकुंठनाथ गर्भ में आये
परमानन्द छाने लगा था
बिन ऋतुओं के भी 
वृक्षों पर फल फूल आने लगे
ग्रह , नक्षत्र , तारे 
सौम्य शांत होने लगे
दिशायें स्वच्छ प्रसन्न होने लगीं
तारे आकाश में जगमगाने लगे
घर घर मंत्राचार होने लगे
हवानाग्नी स्वयं प्रज्ज्वलित
होने लगी 
मुनियों के चित्त प्रसन्न होने लगे
रात्रि में सरोवरों में 
कमल खिलने लगे
शीतल मंद सुगंध वायु बहने लगी
देवता दुन्दुभी बजाने लगे
गन्धर्व ,किन्नर मधुर स्वर से गाने लगे
अप्सराएं नृत्य करने लगीं
जल भरे मेघ वृष्टि करने लगे
चारों तरफ प्रकृति में
हर्षोल्लास मनने लगे

भाद्रपद का महीना
अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र 
अर्ध रात्रि में जग नियंता
जगदीश्वर प्रभु ने 
स्वयं को प्रगट किया
अंधियारी कुटिया में 
उजियारा हो गया
वासुदेव देवकी कर जोड़ 
प्रभु की स्तुति करने लगे
स्तुति में अपनी व्यथा कहने लगे
तब प्रभु ने समझाया 
जैसा मैं कहूँ 
अब तुम वैसा ही करना
मुझे तुम नंदगाँव में
नंदबाबा के घर छोड़ आना
वहाँ मेरी माया ने जन्म लिया होगा 
उसे यहाँ उठा लाना 
मेरे भक्तों ने बहुत दुःख पाया है
अब कंस का अंत निकट आया है
ताले सारे खुल जायेंगे
रास्ते सारे तुम्हें मिल जायेंगे
जैसे पहला कदम उठाओगे
सब पहरेदार सो जायेंगे
किसी को कुछ भी 
पता ना चलेगा
और अपना स्वरुप
पूर्ववत तुम पा जाओगे

इतना कह भगवान ने 
बालक रूप धारण किया 
और वसुदेव ने सूप में
भगवान को रख लिया
जैसे ही पहला कदम बढाया है
हथकड़ी बेड़ियाँ सारी खुल गयीं
ताले सारे टूट गए
दरवाज़े सारे खुल गए
बाहर बरखा रानी 
अपना रूप दिखाने लगी
घटाटोप अंधियारा छाया है
घनघोर अँधेरे में 
यमुना भी ऊपर चढ़कर
आने लगी 
ठाकुर के चरण स्पर्श 
करने को अकुलाने लगी
शेषनाग ने ऊपर भगवान के 
छाँव करी
वसुदेव ठाकुर को बचाने को
हाथ ऊपर करने लगे
और यमुना भी रह रह 
उफान पर आने लगी
चरण स्पर्श की लालसा में
हुलसाने लगी
अपने सभी प्रयत्न करने लगी
प्रभु ने सोचा 
ये ऐसे नहीं मानेगी
कहीं बाबा ना डूब जायें
सोच प्रभु ने 
अपने चरण बढ़ा 
यमुना का मनोरथ पूर्ण किया
कल - कल करती 
यमुना नीचे उतर गयी 
हरि चरण के स्पर्श से
वो तो पावन हो गयी
गोकुल में नन्द द्वार खुला पाया
यशोदा के पास ठाकुर को लिटा
नव जन्मा कन्या को उठा लिया
इधर देवकी बेचैन हो रही थी
तभी वासुदेव जी पहुँच गए
कन्या को ला देवकी को दिया
देते ही किवाड़ और ताले बंद हो गए
हथकड़ी बेड़ियाँ वापस लग गयीं
तभी कन्या रोने लगी
रोना सुन पहरेदार जाग गए
दौड़े गए कंस के पास समाचार सुनाया
आपके शत्रु ने जन्म ले लिया
इतना सुन गिरता पड़ता 
नंगी तलवार ले कंस
कैदखाने में पहुँच गया
देवकी के हाथ से 
कन्या को छीन लिया
देवकी चिरौरी करने लगी
भैया तुम्हें डर तो आठवें पुत्र से था
मगर ये तो कन्या है
इसने क्या बिगाड़ा है
मगर कंस ने ना एक सुनी
उसे तो नारद जी की वाणी याद थी 
जैसे ही कन्या को पटकने लगा
हाथ से वो छिटक गयी
और आसमाँ में पहुँच
दुर्गा का रूप लिया
जिसे देख कंस 
थर थर कांप गया
सोचने लगा शायद
इसी के हाथों मेरी मृत्यु होगी
तभी देवी ये बोल पड़ी
हे कंस ! तुझे मारने वाला
और पृथ्वी का उद्धार करने वाला 
तो बृज में जन्म ले चुका है
और तेरे पापों का अब घड़ा भर चुका है 
इतना कह देवी अंतर्धान हुई
ये सुन कंस लज्जित और चिंतित हुआ
मन में विचार ये करने लगा
मैंने व्यर्थ की इन्हें इतना दुःख दिया
और देवताओं की बात का विश्वास किया
देवता तो शुरू से झूठे हैं 
सारी बातें अपने 
मंत्रिमंडल को बतला दीं
तब सब ये बोल उठे
राजन आप ना चिंतित हों
अगर उसने जन्म लिया है
तो अभी तो वो 
मारने योग्य नहीं होगा
बालक रूप में इतनी शक्ति कहाँ
आज्ञा हो तो इन दिनों जन्मे
सभी बच्चों को मार डालें
उसके साथ वो भी ख़त्म हो जायेगा
आपका कांटा सदा के लिए मिट जायेगा
ये उपाय कंस के मन को भा गया
और उसका पाप का घड़ा 
और भी भरने लगा

इधर यशोदा जी की जब आँख खुली
चंद्रमुखी बालक को देख प्रसन्न हुईं
आनंद मंगल मन में छा गया
नन्द बाबा को समाचार पहुंचवा दिया
घर घर मंगल गान होने लगे 
सब नन्द भवन की तरफ़ दौडने लगे
सबके ह्रदय प्रफुल्लित होने लगे
प्रेमानंद ब्रह्मानंद छा गया 
गोप गोपियों में 
हर्षोल्लास छा गया
गोपियाँ नृत्य करने लगीं
मंगल वाद्य बजने लगे
मंत्रोच्चार होने लगे
नन्द बाबा दान करने लगे
नौ लाख गाय दान कर दी हैं 
पर फिर भी ना कोई गिनती है
बाबा हीरे मोती लुटाने लगे 
सर्वस्व अपना न्योछावर करने लगे
जिसने पाया उसने भी ना
अपने पास रखा
दान को आगे वितरित किया
आनन्द ऐसा छाया था
ज्यों नन्दलाला हर घर मे आया था
साँवली सुरतिया मोहिनी मूरतिया 
हर मन को भाने लगी
हर सखी कहने लगी
लाला मेरे घर आये हैं
किसी को भी ना ऐसा भान हुआ
लाला का जन्म नन्द बाबा घर हुआ 
हर किसी को अहसास हुआ
ये मेरा है मेरे घर जन्मा है
देवी देवता ब्राह्मण वेश धर आने लगे
प्रभु दर्शन पा आनंदमग्न होने लगे
बाल ब्रह्म के दर्शन कर 
जन्म सफ़ल करने लगे
रिद्धि सिद्धियाँ अठखेलियाँ करने लगीं
ब्रजक्षेत्र लक्ष्मी का क्रीड़ास्थल बन गया
रोज आनंदोत्सव होने लगा 

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

कुछ नहीं है

निर्मम छाया जीवन 
एकांत अंधकूप जीवन 
राहु केतु का ग्रास बना 
मन का तोरण 
हास परिहास उपहास का 
पात्र बना ये जीवन 
न काल से परे 
न काल के साथ 
निकला कोई औचित्य 
होने न होने की सूक्तियों पर 
न चला कोई  वक्तव्य 
तुम जहाँ थे 
जहाँ हो 
जहाँ रहोगे 
भेद विभेद की परिसीमा में 
प्रवेश क्रिया हुई वर्ज्य 
बस खुद का क्षरण हुआ त्याज्य 
तुम , मैं ,  वो 
पहले और बाद में 
कुछ नहीं है 
कुछ नहीं है 
कुछ नहीं है 
बस अग्नि लील रही है जीवन 

एक संग्राम का साक्षी भी अंततोगत्वा अदृश्य 
फिर भोजन का स्वाद कौन व्यक्त करे !!!

सोमवार, 4 अगस्त 2014

ज्ञान चक्षु खुल गए

बातों के बतोले खिलाने वाले बहुत मिलेंगे आपको । मीठी मीठी बातें करके अपना ज्ञान बघार कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले ज़िन्दगी भर हर मोड पर मिल ही जाते हैं और इंसान आ भी जाता है उनकी बातों में , उनके ज्ञान की चकाचौंध में कि शायद इनसे ज्यादा जानकार तो कोई होगा ही नहीं और हो जाता है उनके चरणों में नतमस्तक । आहा ! मिल गया तारणहार , अब जरूर मेरी नैया पार हो जाएगी और आस की उम्मीद बाँध देखता रहता है अपने देवता के मुख की तरफ़ , कब कृपा दृष्टि हो और मेरा उद्धार । 

वैसे भी ज़िन्दगी में इंसान उम्मीदों के सहारे ही तो जीता है और जब उसकी उम्मीदों को दिशा दिखाने वाला , पार लगाने वाला कोई मिल जाता है तो हो जाता है हवा के घोडे पर सवार । तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो वाला व्यवहार । हर पल एक ही ख्याल बस अब बना काम , अब मिलेगा मुझे मेरी प्रतिभा का फ़ल , अब हो जायेगी हर समस्या हल , अब दूर हो जायेंगी कठियाइयाँ , बस इन ख्वाबों में खोया जान ही नहीं पाता उनके व्यक्तित्व का दूसरा रुख कि बस बातें बनाने तक ही होते हैं उनके वक्तव्य । 

कहाँ इतना वक्त है किसी के पास जो दूसरों की समस्या को हल करे आखिर उन्हें भी अपनी ज़िन्दगी जीनी होती है , उन्हें भी पचासों काम होते हैं मगर उनका भक्त बेचारा तो अपने ही स्वप्न से बाहर नहीं आना चाहता तो कैसे सोचेगा कि भगवान को और भी काम हैं उसके काम के सिवा । तो तात्पर्य सिर्फ़ इतना है कि जीवन में इंसान दूसरे की बातों से इतना प्रभावित हो जाता है कि आशाओं की डोर उससे बाँध लेता है बिना सोचे समझे जबकि उसे भी ये समझना जरूरी है कि हर बातों में निपुण जरूरी नहीं कि तुम्हारे लिये भी कुछ करेगा क्योंकि उसकी भी घर गृहस्थी होती है उसके जीवन में भी समस्यायें होती हैं इसलिए कभी किसी से उम्मीद न करो बस एक साधारण जीवन जैसे जीते आए जीते जाओ हाँ इस बीच कोई खुद को स्वंय प्रस्तुत कर दे तुम्हारी समस्या के निराकरण के लिए तो ये तुम्हारा सौभाग्य है मगर इसके बाद भी ये नहीं हमेशा उसे परेशान करो , रोज अपनी समस्या ले उसे परेशान करो ………हम सभी जीवन में हमेशा समस्याओं से ग्रस्त रहते हैं और बातें बनाने वालों से भी रोज मिलते हैं इसलिए जरूरी है अपनी समस्याओं का खुद सामना करना और खुद ही निराकरण करना ……वरना तो दूसरे पर ही दोष मढते रह जाओगे कि उसने कहा था मेरा काम कर देगा या करवा देगा और उसके भरोसे मेरी तो लुटिया ही डूब गयी । तो मोरल ऑफ़ द स्टोरी इज़ ……बचपन में पढी थी न कहानी " अपना काम स्वंय करो " :p

शनिवार, 2 अगस्त 2014

आपसी संबंध और पैसा

आपसी संबंध और पैसा , रिश्ते और पैसा , दोस्ती और पैसा ……सोच का विषय बन जाते हैं आज के संदर्भ में । 

जब आप किसी अपने को जरूरत में पैसा दे देते हो तो उसके तारणहार बन जाते हो और यदि कहीं गलती से तुमने कुछ समय बाद वो पैसा माँग लिया तो सबसे बडे दुश्मन आखिर कैसे अपने हुए जो थोडी मदद भी नही की गयी तकाज़े पर तकाज़े कर दिए मगर वो ये नहीं सोचेगा कि वक्त पर तो तुम्हारे काम आया , आज उसे जरूरत होगी तभी तो माँगा होगा मगर नहीं कैसे बर्दाश्त हो जाए।उस वक्त बेचारा देने वाला सोच में पड जाता है कि आखिर उसने वक्त पर सहायता करके क्या कोई गुनाह कर दिया और ऐसे में जब यदि कोई दूसरा अपना फिर वो रिश्तेदार हो या मित्र वो माँगे तो उस बेचारे के पास मना करने के सिवा दूसरा चारा नहीं होता आखिर कब तक दानवीर बने , आखिर कब तक सब जानबूझकर खुद को ठगे बेशक पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होतीं मगर फिर भी आज के ज़माने में जब एक बार किसी का विश्वास उठ जाता है तो जल्दी से कहीं जमता नहीं क्योंकि न जाने कितने अपनों की जरूरतों के विरुद्ध जाकर उसने सहायता की होगी या उधार दिया होगा मगर जब वापस माँगने पर खुद ही दोषी सिद्ध कर दिया जा रहा हो तो इसके सिवा उसके पास कोई चारा नहीं बचता और जब वो ये रास्ता अख्तियार करता है तो भी अन्दर ही अन्दर कुछ उसे कचोटता है कि उसने मना क्यों किया मगर जिसे मना कर दिया वो जाने कैसे कैसे विचार उसके प्रति बना लेता है और कई बार तो संबंध ही तोड लेता है । 

बेशक आज पैसा इंसान की सबसे बडी जरूरत है मगर देने वाले के साथ लेने वाले को भी चाहिए कि वक्त पर काम आने वाले की भावनाओं को समझे और उसके माँगने से पहले ही यदि पैसा वापस कर दे तो शायद रिश्तों में , अपनेपन में , दोस्ती में कभी कडवाहट ना आए , बल्कि एक मजबूत रिश्ता बने जिसकी साझीदारी लम्बे समय तक रहे । आज ये समझने की बहुत जरूरत है कि जितना जरूरी पैसा है उतने ही जरूरी रिश्ते भी होते हैं जिन्हें सहेजे रखने के लिए निर्णायक कदम जरूरी होते हैं । जिस दिन इंसान की सोच बदलेगी और वो अपने स्वार्थ से ऊपर उठेगा उस दिन से एक बार फिर रिश्तों और मित्रता पर विश्वास अपनी गहरी जडें जमा लेगा वरना इंसान जीवन के सफ़र में कब अकेला होता जाएगा उसे पता भी नही चलेगा इसलिये वो वक्त आये उससे पहले जरूरी है दोनों में सामंजस्य बिठाना ।

सोमवार, 14 जुलाई 2014

तुम्हारा " मैं "


सुना है 
माता पिता के गुणसूत्रों से ही 
शिशु का निर्माण होता है 
और आ जाते हैं उसमें 
मूलभूत गुण अवगुण स्वयमेव ही 

और हम हैं 
तुम्हारी ही रचना 
तुम्हारा ही प्रतिरूप 
तो कैसे संभव है 
तुम्हारे गुणों अवगुणों से 
मुक्त होना हमारा 

क्योंकि तुम्ही ने कहा है गीता में 
प्राणिमात्र का बीज हूँ " मैं " 
मैं ही सभी प्राणियों 
स्थावर , जंगम जड़ चेतन 
सभी का आदि मध्य व् अंत हूँ 
मैं ही मैं व्याप्त हूँ 
हर रूप में हर कण में 
फिर दैत्य हों या दानव 

हर जगह गीता में तुमने बस 
खुद को ही सिद्ध किया 
हर सोच में " मैं " 
हर  विचार में " मैं " 
हर क्रिया कलाप में " मैं " 
सिद्ध कर स्वयं के होने को 
प्रतिपादित किया 

यहाँ तक की ब्रह्मा को जब 
चतुश्श्लोकी भागवत सुनाई 
वहां भी इसी सिद्धांत का प्रतिपादन किया 
ब्रह्मा जब तुम नहीं थे 
तब भी मैं था 
जब तुम नहीं रहोगे 
तब भी मैं रहूँगा 
और ये जो तुम सब तरफ देख रहे हो 
ये है मेरी माया 
अर्थात मेरी इच्छा से उत्पन्न सृष्टि 
उसके भी तुम कर्ता नहीं 
इस सब में भी " मैं " ही व्याप्त हूँ 
हर जगह तुमने सिर्फ 
अपने मैं को  पोषित किया 

यहाँ तक कि 
जिसने तुम्हें अपना सर्वस्व माना 
अपना मैं भी तुम्हारे चरणों में 
समर्पित किया 
और जिसने तुम्हारी सत्ता नकारी 
तुम्हारा " मैं " न स्वीकार किया 
जिन्होंने माना और  जिन्होंने नकारा 
दोनों का तभी उद्धार किया 
जब तुम्हारा " मैं " पोषित हुआ 

तभी तो गीता के अंत में कह देते हो 
तू सरे धर्म छोड़ मेरी शरण  में आ जा 
" मैं " मुक्त पापों से करूंगा 
तू न कोई चिंता कर 
अर्थात 
जिसने तुम्हारे " मैं " रुपी दासता को स्वीकारा 
उसे तुमने उसकी भक्ति और प्रेम नाम दे उद्धार किया 
या जिसने  मैं को पोषित किया 
अपने बल और बुद्धि को ही सर्वस्व माना 
फिर वो रावण हो , हिरण्यकशिपु हो या कंस 
उनका तुमने संहार कर 
खुद के  " मैं " को पोषित किया 

अर्थात 
जब माधव 
तुम ही अपने " मैं " से मुक्त नहीं 
जब तुम ही अपनी " प्रशंसा " चाहते हो 
बस सब तुम्हारे होने को ही स्वीकारें 
तो बताओ भला कैसे संभव है 
आम मानव या प्राणी का 
" मैं " के व्यूह्जाल से मुक्त होना 
क्योंकि 
आखिर बीज तो तुम ही हो 
फिर फसल तो वैसी ही उपजेगी 
" मैं " का पोषण चाहने वाली 
आखिर तुम्ही हो माता पिता तुम तुम्ही हो 
तो कैसे मुक्त हो सकते हैं हम 
तुम्हारे द्वारा हस्तांतरित 
गुणसूत्रों के अवगुणों से भी 

एक अपने अहम के पोषण के लिए 
कितना बड़ा संसार रच देते हो 
सोचना ज़रा तो कैसे मुक्त हो सकता है 
मानव तुम्हारी दी इस सौगात से 
जिसके अंदर शामिल हैं 
इन्द्रियजनित काम क्रोध लोभ मोह भी अहंकार के साथ 

जब तुम सृष्टि निर्माण और विध्वंस का 
खेल बना सकते हो 
फिर मानव तो जो इस गंदले  सलिल में अटा पड़ा है 
 कैसे हो सकता है मुक्त 
या सोच सकता है कुछ अच्छा 
क्योंकि 
फर्क है तुममे और उसमें 
जैसा तुम कहते हो 
तुम निर्विकार हो और वो विकारी 
जबकि अहम के विकार से तो तुम भी नहीं हो मुक्त 
तब वो तो पांच पांच विकारों से ग्रस्त है 
और तुम एक से 
तुम्हारा एक विकार 
जन्म जन्मांतरों तक बंधन में 
भटकाए रखता है 
तो फिर जिसके अंदर पांच हों 
उसकी क्या हो सकती है 
कोई सीमा तय 
सोचना ज़रा 
तब पाप पुण्य आदि की 
परिभाषा तय करना 
तुम्हारे " मैं " से हमारे " मैं " तक के सफर में !!!

मंगलवार, 24 जून 2014

धर्म ----- एक यंत्र ?



विविधताओं से भरे हमारे देश में धर्म को एक ऐसा यंत्र बना दिया गया है जिसके दम पर जैसा चाहे धार्मिक उन्माद पैदा किया जा सकता है । आज लोग जानते ही नहीं कि धर्म का वास्तविक अर्थ है क्या बस दो धर्मों में बाँटकर लोगों की भावनाओं से खेलना भर इनका मकसद रह गया है । यदि देखा जाए तो किसी भी धर्म में धर्म की सिर्फ़ एक व्याख्या मिलेगी कि किसी भी तरह इंसान को इंसान बनकर , मिलजुल कर रहना आ जाए , उसमें से ईर्ष्या , द्वेष , लोभ , मोह और अहंकार की प्रवृत्तियाँ दूर हो जाएं । कोई धर्म ये नहीं कहता कि यदि मनुष्य दूसरे धर्म को मानता है तो वो गलत है । सबसे ऊँचा धर्म इंसानियत और मानवता की सेवा है और आज कुछ धर्म के ठेकेदार एक बार फिर देश में धार्मिक उन्माद फ़ैलाने की कोशिश में हैं सिर्फ़ ये कहकर कि साईं भगवान नहीं थे या उन्हें भगवान मानना पाप है या उनकी पूजा पाप है । ऊपर से कहते हैं कि वो मर चुके हैं वो तो इन्सान थे तो  अब उन्हें भगवान क्यों माना जाए । 

कोई इनसे पूछे यदि ऐसा ही है तो हिन्दू धर्म में भी तो राम हों या कृष्ण ये भी इंसान ही थे तो इन्हें क्यों भगवान माना जाए ? 

क्यों ये धर्म के ठेकेदार बडे बडे पदों पर विराजमान होकर राम भजो कृष्ण भजो का उपदेश देते हैं ? 

क्या इन्हें ये नहीं सोचना चाहिये जो बात एक धर्म के लिए लागू होती है वो ही दूसरे पर भी लागू होगी । तुम्हारे तो इंसान रूप में जन्मे भगवान नहीं और हमारे भगवान , ये कैसे संभव है ? 

दूसरी बात धर्म तो आस्था और विश्वास का संगम होता है उसके लिए किसी को कहना नहीं पडता कि इस धर्म को मानो उसे नहीं । ये तो मानव की स्वतंत्रता है कि उसकी आस्था कहाँ परिपक्व होती है । धर्म मनवाए नहीं जाते जबरदस्ती धार्मिक होना एक भावना है और वैसे भी भाव में ही भगवान बसते हैं फिर कोई किसी भी रूप में पूजे तभी तो आज पत्थर में भगवान पूजे जाते हैं , वृक्षों में भगवान पूजे जाते हैं तो क्या किसी ने इन्हें देखा है ? नहीं न मगर इंसान की आस्था है जो उन्हें प्रेरित करती है लेकिन आज के कुछ धर्म के ठेकेदार जाने क्या सिद्ध करना चाहते हैं जो इस तरह के बेबुनियाद प्रचार कर जनमानस की भावनाओं से खेल रहे हैं । 

मेरे ख्याल से तो उन्हें ही धर्म के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान नहीं क्योंकि वैसे भी हिन्दू धर्म में कहीं नहीं कहा गया कि गैर धर्म को मानना गलत है जबकि सांई बाबा ने न तो स्वंय कभी कहा कि वो भगवान हैं सिर्फ़ एक शब्द कहते थे सबका मालिक एक अर्थात उनसे ऊपर कोई शक्ति है जिससे समस्त संसार संचालित होता है फिर उन बातों को तोड मरोड कर गलत अर्थ देने का क्या औचित्य ? 

क्या यही धर्मगुरु अपने उपदेशों में कबीर और रहीम की वाणी नहीं सुनाया करते ? 

क्या कबीर और रहीम दूसरे धर्म के नहीं थे ? 

अरे ईश्वर का प्यारा सबका प्यारा होता है और ईश्वर को तो अपने सभी बच्चे प्यारे हैं ऐसे में कैसे इंसान उन्हें धर्म के नाम पर बाँट सकता है । आज ये समझना बहुत जरूरी है कि ये धर्म के ठेकेदार इंसान को हमेशा बाँटते आये हैं और हम इनके कुचक्रों में न फ़ँसकर अपनी आस्था के साथ जीवन यापन करते रहें क्योंकि यहाँ तो साफ़ नज़र आ रहा है सारा चक्कर ट्रस्ट की सम्पत्ति का है और उस पर उनकी निगाह है इसलिये ये सारा बवाल पैदा किया जा रहा है जबकि यदि देखा जाए तो हिन्दुओं के भगवानों के भी ट्रस्ट हैं और वहाँ का पैसा कितनी जगह तो मुसलमानों के पास ही जाता है क्योंकि उन्होने ही खोजे थे हमारे भगवान फिर वैष्णों देवी हों या अमरनाथ सुना है कि उनकी पीढी में ही जाता है फिर वो उसका प्रयोग चाहे जैसे करें यानि लोगों की भलाई मे या जैसे चाहे । यदि उस वक्त उन्होने नहीं बताया होता तो क्या हमें पता चलता आज तक भी कि माता वैष्णों देवी या अमरनाथ के बारे में मगर जाने क्यों हमारे हिन्दू धर्म के पुरोधा अपना कौन सा स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं और आम लोगों की भावनाओं को भडकाना चाहते हैं । 

जनता को चाहिये कि इनकी बातों में न आये और अपने विवेक से सोचे सही और गलत के बारे में ये नहीं कि जिसने जिस दिशा में हाँक दिया चल दिए बल्कि आज की जनता बहुत जागरुक हो गयी है इसलिये जरूरी है कि वो इन बेबुनियाद फ़तवों पर ध्यान न दे और सही निर्णय ले जिससे देश और समाज की शांति भंग न हो । 

अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए जनता की भावनाओं से खेलना क्या धर्म के ठेकेदारों को शोभा देता है ? ये एक विचारणीय प्रश्न है क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि जब इनके चेहरों से एक एक करके नकाब उतरते दिखें तो लोगों का इन पर से विश्वास ही उठ जाए फिर वो आसाराम हों या शंकराचार्य । कोई भी कार्य या संदेश ऐसा नहीं होना चाहिये जो मानव की धार्मिक आस्था पर प्रहार करे क्योंकि ये जनता तभी तक साथ है जब तक आप उसकी भावनाओं से नहीं खेल रहे जिस दिन कुछ तथाकथित ऐसा करने लगेंगे और जनता की भावनाओं से खेलेंगे इन्हें कहीं जगह नहीं मिलेगी फिर कहाँ चलायेंगे ये अपने धर्म की ठेकेदारी ? अब इन्हें ये भी समझना जरूरी है । 

आज जरूरत है इन तथाकथितों को समझने की सबसे पहले धर्म के वास्तविक अर्थ को फिर उपदेश दें यूँ ही नहीं बेबुनियाद बात कर लोगों की आस्था से खेलें। 


हमें चाहिए कि हम धर्म को कुछ कठमुल्लाओं के हाथ का यंत्र नहीं बनने दें और अपने विवेक को जागृत रखें वरना सभी जगह सिर्फ़ धर्म को लेकर युद्ध होते रहे हैं और उसमें नुकसान सिर्फ़ आम जनता का ही हमेशा हुआ है । 

बुधवार, 18 जून 2014

कभी गुजरना शून्य से


ना शब्द ना भाव
ना रूप ना रंग
संज्ञाशून्य हो जाना
अपलक शून्य मे ताकना
और अन्तस मे
शून्य की परिधि से बाहर
निकलने की खोज का जारी रहना
किसी खगोलीय घटना की तरह
कभी गुजरना शून्य से
तब जानोगे शून्यबोध की व्यथा ……एक अन्तर्कथा निर्विकार निर्लेप सी

सोमवार, 2 जून 2014

असार में फिर सार कहाँ ढूंढते हो ?

आकंठ डूबने के बाद 
सूख गयी नदी 
वाष्पित हो गया 
उसका सारा जल 
बची रही जलती रेत 
रेत पर छितरायी 
आड़ी तिरछी  धारियाँ 
जो चिन्हित करती रहीं 
कभी बहा करती थी 
एक मदमाती लहराती बलखाती 
उच्छ्रंखल नदी इस प्रदेश में 

जहाँ एक उम्र के बाद
बचती नहीं निशानियाँ भी 
सूख जाता है सकोरे का सारा पानी 
और उग आती हैं कँटीली झाड़ियाँ 
वहाँ 
सिर्फ निशानदेहियों पर ही 
उगाई जाती हैं नयी सभ्यताएं 
बिना जाने कारण और निवारण 
नदियों के गुप्त हो जाने का 


उसी तरह 
जीवन से एक उम्र के बाद 
क्या प्रेम के अणु भी इसी तरह विध्वंसित होते हैं 
और होते रहते हैं निशानदेही पर पुनः पुनः निर्माण 
बिना जाने कारण और निवारण 
सृष्टि चक्र का चलते जाना अनवरत 
किस बात का सूचक है 

क्या सिर्फ इतना भर कि 
'प्रेम'  महज एक जीवनयापन का दिशासूचक भर है 
बंधु 
असार (संसार) में फिर सार कहाँ ढूंढते हो ?