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शनिवार, 29 अगस्त 2015

गोपीभाव



गोपीभाव
**********
न ख़ुशी न गम
तटस्थ सा हो गया मन

न मिलने की चाह रही
न बिछड़ने की परवाह रही
उमंगों के घोड़े रुक गए
जाने कहाँ तुम छुप गए

जब से किया किनारा है
मेरा न कोई दूजा सहारा है
अब बिरहा की मारी जाएँ कहाँ
तुम्हारी वो अलौकिक छवि पायें कहाँ
यूं सोच सोच बेजार हुईं
हम तो खुद को तुम पर हार गयीं

न वो सांझ सकारे रहे
न वो मधुबन के द्वारे रहे
न वो रास रंग की बतियाँ रहीं
न वो तुम संग बीतीं रतियाँ रहीं
न वो हास - विलास रहा
न वो पहला सा उल्लास रहा
जब से गए हो परदेस मोहन
अपना पता भी भूल गया
तभी तो कहता है ह्रदय हमारा
न ख़ुशी न गम
तटस्थ सा हो गया मन.......... मोहन !!!

मेरा हर ख़ुशी हर गम
सिर्फ मोहन से रति
यही है मेरे प्रेम की परिणति


सोमवार, 10 अगस्त 2015

है न यही स्थिति

मैं और तू कहूँ
या तू ही तू कहूँ
या मैं ही मैं कहूँ 
भाव तो दो का ही बोध कराता है 

जब न मैं हो न तू 
बस प्रेम ही प्रेम हो 
बोध से परे 
आनंद ही आनंद हो 
वही तो परमानन्द है 
वही तो प्रेम है 
वही तो निराकारता है 

है न यही स्थिति तुम्हें पाने की , तुम में समाने की .........कृष्णा ! मोहना ! माधवा !

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

मन की वीणा

मन की वीणा विकल हो रही है
तुम्हारे दरस की ललक हो रही है

जाएँ तो जाएँ कहाँ गुरुवर
ज्ञान का दीप जलाएं कहाँ

आत्मदीप अब जलाएं कहाँ
चरणकमल कृपा अब पायें कहाँ

मेरे मन में बसा अँधियारा था
गुरु आपने ही किया उजियारा था

अब वो प्रेमसुधा हम पायें कहाँ
कौन प्रीत की रीत निभाये यहाँ

मेरे मन की तपन कौन बुझाए यहाँ
गुरुवर कौन जो तुमसे मिलन कराये यहाँ

ये बेकल मन की अटपटी भाषा
तुम्हारे बिन कोई समझ न पाता

अब ये भावों की समिधा चढ़ाएं कहाँ
गुरुदरस की लालसा मिटायें कहाँ

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

अब कैसे बीते ये उम्र सारी




अब कैसे बीते ये उम्र सारी
अब तो लगी है प्यारे लगन तुम्हारी
लगन तुम्हारी , लगन तुम्हारी
अब कैसे बीते -------

१) छोड़ गए हो मझधार कन्हाई
रो रो हारी ये गोपियाँ बेचारीं
अब कहाँ जाएँ , बिरहा की मारीं
अब तो लगी है मोहन लगन तुम्हारी
अब कैसे बीते ----------

२) दिन हैं पतझड़ रात वीरानी
तुम्हारे बिना न लागे , कोई ऋतू प्यारी
दरस दीवानी फिरें , गली गली मारीं
अब तो लगी है श्याम लगन तुम्हारी
अब कैसे बीते --------

३) मन की कुञ्ज गलिन में कब आओगे मुरारी
सूनी पड़ी है प्यारे , अटरिया हमारी
कहाँ खोजें अब तुम्हें हम, किस्मत की मारीं
अब तो लगी है प्यारे लगन तुम्हारी
अब कैसे बीते ये उमरिया सारी

४) घर आँगन न , अब भाये बिहारी
बिरहा की घड़ियाँ दहकें रह रह मुरारी
किस आस पे गुजरे, अब ये उम्र सारी
कहाँ छोड़ गए हो , हे कृष्ण मुरारी
गली गली फिरतीं  , बिरहा की मारी
अब कैसे बीते ................

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

क्या है कोई जवाब तुम्हारे पास ?



ओ कृष्ण 
नहीं मालूम तुझसे 
खुश हूँ नाराज या तटस्थ 
बस कहीं न कहीं 
अन्दर ही अन्दर हो गयी हूँ घायल मैं 

और तुम जानते हो वजह 
बेवजह कुछ नहीं होता 
सुना था कभी 
मगर वजह भी नहीं समझ आई 

या तो मिलते ही नहीं 
मिले तो बिछड़ते नहीं 
ये आँख मिचौली खेलने को 
तुमने मुझे ही क्यूँ चुना 
कभी समझ न पायी मैं 

तुम्हारे होने और न होने के चक्रव्यूह में घिरी मैं 
तुम्हें ही कटघरे में खड़ा करती हूँ 
सुना है 
तुम्हारे पास हर प्रश्न का उत्तर होता है 
तो देना जवाब यदि हो सके तो 

क्योंकि 
इस बार बात तुम्हारे अस्तित्व की है 
और मेरे द्वारा तुम्हें 
स्वीकारने और अस्वीकारने की 
कोरे भ्रम भर तो नहीं हो न तुम ?

होती होंगी तुम्हारी लीलाएं विलक्षण 
मगर यहाँ जो प्रेम रस की बहती 
अजस्र धारा सूख गयी है 
और रेत रह रह शूल सी सीने में चुभ रही है 
वहां मैं एक अंतहीन प्यास में तब्दील हो गयी हूँ 
कैसे करोगे साबित और भरोगे रीता घट 

और सुनो 
तुम्हारे रूप के सिवा दूजा रूप कोई निगाह में चढ़ता नहीं अब 
ऐसे में कैसे काजल की धार बन समाओगे फिर से नैनन में 

और सुनो 
ये तटस्थता आत्मबोध का पर्याय नहीं है 

बंजर जमीन को उपजाऊँ बनाने हेतु क्या है कोई जवाब तुम्हारे पास ?

शनिवार, 20 जून 2015

क्या चाहते हैं ?

क्या चाहते हैं ? 
क्या होगा यदि पूरी हो जायेगी ?
क्या दूसरी चाहत न जन्म लेगी  ?

बस इसी फेर में गुजरती ज़िन्दगी के सिलसिले 
एक दिन ऊबकर पलायन कर जाते हैं 
और खाली कटोरे सा वजूद 
भांय भांय करता डराता है 

पलायन 
आखिर कब तक ?
और किस किस से ?
यहाँ तो हर क्रिया कलाप पर कर्म का पहरा है 
क्या कर्म से विमुख हुआ जा सकता है ?
क्या कर्तव्य विहीन जीवन तटस्थ होकर जीया जा सकता है ?

तटस्थता 
यानि बुद्ध होना 
या कुछ और ?
अर्ध रात्रि में डराते प्रश्नों के कंकाल 

जबकि पता हैं उत्तर भी 
फिर भी 
प्रश्न हैं कि दस्तक दिए जाते हैं 

कपालभाति कितना ही कर लो 
जीवन योग के अर्थ अक्सर  नकारात्मक ही मिला करते  हैं 

आत्मिक यंत्रणाओं को मापने के अभी नहीं बने हैं यंत्र 
जहाँ मन बैरागी भी है उल्लासी भी 
जहाँ मन विरक्त भी है संपृक्त भी 


अनुलोम विलोम की जाने कौन सी परिभाषा है ज़िन्दगी ?

शनिवार, 13 जून 2015

तुम्हारे लिए कुछ भी असंभव नहीं


सुनो कृष्ण 
बच्चे की चाँद पकड़ने की ख्वाहिश 
जन्म ले रही है 
अलभ्य को प्राप्त करने की चाह 
है न कैसा अनोखा जूनून 
जो असंभव है 
उसे संभव करने का वीतराग 
कलियों के चटखने के भी मौसम हुआ करते हैं 
और ये बे- मौसमी आतिशबाजी 
जाने कौन सा नगर रौशन करने की चाह है 
जिस पर स्वयं ही प्रश्नचिन्ह लगाती हूँ 
बार बार खुद को समझाती हूँ 
मगर ये बेलगाम घोडा फिर 
सरपट दौड़ लगाने लगता है 

"मंजिल पता नहीं मगर तलाश जारी है "
का नोटिस बोर्ड टंगा है 
कोशिश की तमाम बेलें 
सिरे चढ़ा चुकी 
पर ख्वाहिश है कि मानती ही नहीं 
उपहास का पात्र बनाने को आतुर है 
मगर मानने को नहीं 
कि 
सबको सब कुछ नहीं मिलता 
सिर्फ एक चाह बलवती हो जाती है 
"यदि चाहोगे तो मिलेगा जरूर "

सुना है तुम पूरा करते हो 
जो कहा वो भी 
और जो न कहा वो भी 
बस इसी फेर में पड़ी ख्वाहिश 
नित परवान चढ़े जाती है 

देखो हँसना मत 
जानती हूँ बचपना है 
मैं वो कण हूँ 
जिसका कोई अर्थ नहीं 
कोई स्वरुप नहीं 
फिर भी तुमसे न कहूं तो किस्से कहूं 
सोच 
आज कहने का मन बना ही लिया 
तो मोहन 
वैसे तो तुम जानते ही हो 
लेकिन बच्चा जब तक स्वयं नहीं मांगता 
माता पिता भी तब तक नहीं देते 
वैसे ही जब तक तुम्हारे भक्त नहीं कहते 
तब तक तुम भी उसकी 
छटपटाहट का मज़ा लेते रहते हो 

तो सुनो प्यारे 
जानना है मुझे स्वरुप संसार का 
अपने जीवन रहते ही 

जानना है मुझे 
मेरे बाद मेरे अस्तित्व की परिभाषा को 

जानना है मुझे 
जब सब जल समाधि ले ले 
और तुम पत्ते पर 
अंगूठा चूसे अवतरित हों 
तब क्या होता है 
और उसके बाद भी 
तुम्हारा प्रगाढ़ निद्रा में सोना और जागना 
सब कुछ देखने की चाह 
सब कुछ जानना 
तुम्हारे भीतर से भी 
तुम्हारी इच्छा को भी 
कैसे स्वयं को अकेला महसूसते हो 
फिर कैसे सृष्टि निर्माण करते हो 
कितने ब्रह्माण्ड में विचरते हो 
कितने रूप धरते हो 

सुनो 
सुन और पढ़ तो बरसों से रही हूँ 
मगर अब देखने की चाह है 
यदि पा जाऊं जीवन में कोई मुकाम 
तो मेरे बाद मेरा जीवन में क्या हश्र होगा 
कैसे मेरा अस्तित्व जिंदा रहता है 

मानती हूँ 
सब झूठ है 
नश्वर है जगत 
और ये चाहना भी 
मगर फिर भी चाहत का जन्म हुआ 
और सुना है 
तुम्हारे लिए कुछ भी असंभव नहीं 

तो क्या कर सकोगे इस बार मेरी ये इच्छा पूरी 
जिसमे तुम खुद एक चक्रव्यूह में घिरे हो 
क्योंकि 
तुमसे तुम्हारे सारे भेद खोलने की चाह रखना 
बेशक मेरी बेवकूफी सही 
मगर इतना जानती हूँ 
असंभव नहीं तुम्हारे लिए कुछ भी 


मंगलवार, 2 जून 2015

ईश्वर ' ही ' है या ' शी '

ईश्वर ' ही ' है या ' शी ' 
प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया है 

हम छोटी सोच के बाशिंदे 
जानते हैं सिर्फ अपनी ही परिधि 
जिसके अन्दर एक दुनिया वास करती है 
उससे इतर भी कुछ है 
जानने को न उत्सुक होते हैं 
और अपनी छोटी सोच की लकुटिया ले 
आक्षेपों की टिक टिक करते हैं 

ओ खुदा , ईश्वर , अल्लाह 
आज तेरे अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा हो गया है 
आज तू भी स्त्री पुरुष जैसे लिंगों में बंट गया है 
'ही' और 'शी' के मध्य विवाद छिड़ गया है 

हँस रहा होगा न तू भी 
सोच सोच 
न मुझे जाना न पहचाना 
बस विवाद को रूप दे दिया 
अब तक तो अलग अलग धर्मों में बंटा रहा 
और घृणा का कारण बनता रहा 
लेकिन अब ?
अब क्या हश्र होगा इस बहस का 
जहाँ उसे भी स्त्री और पुरुष बना दिया गया 

सुना है 
विदेशी तो निराकार को मानते हैं 
यहाँ तक कि कुछ धर्मों में तो 
निराकार की ही उपासना होती है 
हिन्दू धर्म में ही उसे आकार दिया जाता है 
ऐसे में उसमे स्त्री और पुरुष तत्व ढूंढना 
या उद्बोधन पर प्रश्न खड़ा करना 
बचकाना सा लगता है 
क्योंकि 
जो जानकार हैं वो जानते हैं 
वो न स्त्री है न पुरुष 
वो है ब्रह्म एक पूर्ण ब्रह्म 
जिसका आदि है न अंत 
फिर उसे पुरुष मानो या स्त्री 
ये तो है तुम्हारे भावों का विस्तार 
क्योंकि 
वो तो है बस निराकार 
जो होता है साकार भक्त की भावना से 
जो धारण करता है रूप भक्त के भावानुसार 

स्वीकार सको तो स्वीकार लो 
ये बेकार की बहस में न उलझो 
ईश्वर' ही' भी है और 'शी' भी 
'जिस भाव से भजता मुझे उस भाव से भजता उसे '
करो जरा उसकी इस  उक्ति पर विचार 
अर्थात जिस रूप में आवाज़ दोगे उसमे आ जाएगा 
तभी तो उसने 
अर्धनारीश्वर का रूप धारण कर ये सिद्ध किया 
चाहे 'ही ' कहो चाहे ' शी ' 
या ' ही ' न मान ' शी ' मानो 
उसने तो कदम कदम पर खुद को प्रमाणित किया 
भक्त की जिज्ञासानुसार रूप धारण किया 

जाने कैसी सोच पनप रही है 
हर बात पर आक्षेप कर रही है 
ये अंधी दौड़ जाने कहाँ जाकर रुकेगी 
जो ईश्वर को पुकारे जाने पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रही है 

जानते हो न 
भेडचालों के नतीजे तो सिफर ही हुआ करते हैं .........



बुधवार, 20 मई 2015

प्रेम या विकल्प




सुनो
तुमसे कोई अदावत नहीं है
न ही खिलाफत है कोई
बस नहीं उठती अब कोई पीर विरह की

प्रेम के तुमने जाने कितने अर्थ दिए
और मैंने सहेज लिए
सच कहूं ..... रंग गयी थी तुम्हारे ही रंग में
बन गयी थी वंशी की मधुर तान सी
तुम्हारे होने में अपना होना बस
यही बनाया अंतिम विकल्प

मगर निर्मोही ही रहे तुम
सिर्फ अपनी त्रिज्या तक ही
सीमित था तुम्हारा हास्य
नहीं थी तुम्हें परवाह तुमसे इतर किसी की

सुनो
उलाहना नहीं है ये मेरा
न शिकायत है
बस तुमसे तुम्हें मिलवा रही हूँ
अहसास करा रही हूँ
" क्या हो तुम "
इतना जान लेते फिर न कभी
कर्मयोग , ज्ञानयोग या भक्तियोग का उपदेश देते

देखो तो जरा
बन चुकी है मूरत पत्थर की
मगर प्राण प्रतिष्ठा के लिए
जरूरत है तुम्हारी
और तुम ठहरे निर्मोही , निर्लेप
कहो तो अब कैसे संभव है
बिना प्रेम का स्वांग किये स्थापित होना

मैं आकार भी हूँ और प्रकार भी तुम्हारा
सोच लो
प्रीत के बंजारन होने से पहले
क्या खड़े कर पाओगे कदली वृक्ष

क्योंकि
प्राण प्रतिष्ठा के लिए जरूरी है
तुम्हारा प्रेम रूप में अवतरित हो मूरत में समाना

क्योंकि
प्रेम का सम्मिश्रण ही मनोकामना पूर्ति का अंतिम विकल्प है
अब ये तुम पर है
क्या बनना चाहोगे
प्रेम या विकल्प

जब से जाना है तुम्हें
तब से नहीं है इरादा मेरा सर्वस्व समर्पण का
क्या कर सकोगे तुम सर्वस्व समर्पण
और झोंक सकोगे खुद को उसी आग में
जिसमे एक अरसे से जल रहे हैं हम ............


प्रेम हो या विरह
तराजू के पलड़ों में
योगदान दोनों तरफ से बराबर का होना ही संतुलन ला पाता है

क्या इस बार कस सकोगे खुद को कसौटी पर ..........मोहना !


बुधवार, 6 मई 2015

हो तुम खुद की चाहतो में लिपायमान






बहुत उलटफेर किये तुमने
और हमने सब सह लिए
उह आह उफ़ करते करते
ज़िन्दगी के सितम सह लिए
मगर अब शक के घेरे में हो तुम !

हाँ तुम .........जिस पर अति विश्वास किया
उसने ही विश्वास का दोहन किया
तो कहो भला कैसे मुक्त करूँ तुम्हें इल्ज़ामात से

सुनो
तुम कहते हो
सृष्टि का आधार कर्म है
कर्म के अनुसार फल है
मैं तो कर्तुम अकर्तुम अन्यथा कर्तुम हूँ
यानी मैं कुछ नहीं करता
निर्लेप रहता हूँ
लेकिन नहीं लगता ऐसा
जानते हो क्यों ?

क्योंकि
जब कोई चल रहा हो सही राह पर
अचानक तो पथभ्रष्ट नहीं हो सकता न
हमें तो लगता है
कहीं न कहीं तुम ही डाल देते हो खाने में कीड़ा
नहीं देख पाते चलते हुए चक्की को सीधा
और डाल देते हो राह में रोड़े
तो बता सकते हो क्या
यहाँ कौन से कर्मों का लेखा जोखा आ गया ?


वैसे भी सुनो
जब सृष्टि निर्माण तुमने किया
तो अच्छी और बुरी शक्तियां भी तो तुमने ही बनायी न
किसी को अच्छा बनाया और किसी को बुरा
तो सोचो जरा किसने ?
तुमने ही न ........मानव के हाथ तो कुछ नहीं था
सारा सृष्टि विलास तुम्हारी चाहत की पूर्ति ही तो है
तो जिम्मेदार कौन हुआ कभी विचारना इस पर

मानव एक सीधी सच्ची राह चलना चाहता है
जन्म से या माँ के पेट से तो दुनियादारी सीख कर नहीं आता न
मगर तुम उसकी राह में अचानक जाने कितने तूफ़ान खड़े कर देते हो
वो उन्हें भी अपने हौसलों के बल पार कर जाता है जब
तब भी न तुम्हें चैन आता है
जो चल रहा होता है तुम्हारी बताई राह पर
और सुनो तुमसे भी कुछ नहीं चाहता
चाहत होती है तो सिर्फ इतनी
तुझसे मिलन होता रहे
और जब आस्था पहुँचती है अपने चरम पर
तब एक बार फिर तुम लक्ष्य संधान को उद्द्यत हो उठते हो
उत्पन्न कर देते हो भ्रम की सी स्थिति
जहाँ वो समझ नहीं पाता
कौन सी राह सही रही और कौन सी गलत ?
आस्था और विश्वास
की नैया हो उठती है डाँवाडोल
और ये सब यूँ ही नहीं होता
सीधी राह चलने वाला क्यों चाहेगा गलत राह पकड़ना
...... सोचना जरा

हाँ, कारण हो तुम
तुम फैला देते हो मायाजाल
परीक्षा के नाम का
और किंकर्तव्यविमूढ़ मानव फंसता जाता है
जहाँ ले चलते हो चलता जाता है
क्योंकि सम्मोहन की स्थितिओं में
विवेक धराशायी हो जाता है
ऐसे में बताना जरा
कहाँ कर्म की महत्ता रही ?

तुम जो चाहो करते हो
सच तो यही है
नहीं देख सकते तुम सीधा सादा सपाट जीवन जीते किसी को
या फिर साधनारत होते किसी को
कर ही देते हो
उंगल और बदल देते हो तस्वीर

बनाने को दुनिया को मूढ़
रच रखा है तुमने कर्मों का लेखा जोखा रचने का
विधान
सच तो यही है
तुम जो चाहते हो करते हो
क्योंकि
खेल तुम्हारा है और मोहरे भी
जब चाहे जिस भी खाने में जिस भी मोहरे को फिट कर देते हो
और जीत के पांसे सदा अपने हाथ में रखते हो

मुझे तो नहीं दिखते तुम कहीं से भी निर्लेप
हो तुम खुद की चाहतो में लिपायमान
जिनसे तुम खुद मुक्त नहीं हो ..........केशव

वैसे भी किसे पता तुम्हारे सत्य का
सुना है श्रुतियाँ भी नेति नेति कह शीश को झुकाती हैं
ऐसे में कैसे संभव है
आम मानव का तुम्हें रेखांकित करना
तुम्हारे सच और झूठ का पर्दाफाश करना
क्योंकि
उस तरफ सिर्फ तुम ही तुम हो ........एकल खिलाड़ी
और अकेला किसी भी रेस में हो .......जीतेगा ही

मत मढो हम पर कर्म और भाग्य की कुंठाएं
ये तो हैं बस तुम्हारे ह्रदय की विडंबनायें
जिनसे कुंठित हो तुम थोप देते हो परिणाम
और परवश हो भुगतने को होते हैं हम मजबूर

काश ! एक बार परवशता का जीवन तुमने जीया होता तो जान पाते हमारे दर्द को मोहन
विवशताओं की ड्योढ़ी पर माथा रगड़ना क्या होता है शायद जान पाते


एक सच ये भी है
नहीं हो सकते तुम कभी पूर्णतः मुक्त इन इल्जामों से
फिर चाहे देते रहो कितनी ही दुहाई अपनी निर्लेपता की .........
मोहन!

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

अब कैसे धरूँ मैं धीर






गुरु जी अब कैसे धरूँ मैं धीर 
तुम तो गए साकेत धाम को 
तुम तो गए बैकुंठ धाम को 
कर किसके आधीन 
ए री  अब कैसे धरूँ मैं धीर 

१) रह रह हुक उठे मेरे मन में -२-
                  किस विधि मिलूँ अब इस जीवन में -२- 
ए री मेरे पाँव पड़ी जंजीर 
गुरु जी अब कैसे ................

२) मैं थी तुम्हारे जल की मछरिया -२- 
    काम लोभ  मोह के मगर ने घेरा -२-
अब कौन छुडावे भीर 
गुरु जी अब कैसे ................

३) निसदिन अँखियाँ बरस रही हैं -२- 
   तुमको चहुँ दिसी खोज रही हैं -२- 
ए री अब कौन बंधावे धीर 
गुरु जी अब कैसे ................

४) धोखा कैसा दे गए हो -२-
            किसके भरोसे छोड़ गए हो -२- 
ये कैसी फूटी तकदीर 
        गुरु जी अब कैसे ................


मित्रों 
पिछले एक हफ्ते से बहुत दुखी हूँ . मानो मेरा जीवन ही छिन गया हो , शरीर से आत्मा ही निकल गई हो ऐसा महसूस कर रही हूँ क्योंकि कुछ होने वाला हो तो पहले से इंसान अवगत रहता है लेकिन अचानक ही किसी पर पहाड़ टूट पड़े तो वो शायद ऐसा ही महसूस करता हो . 

महामंडलेश्वर विशुद्धानंद पीठाधीश्वर (हरिद्वार ) स्वामी धर्मदेव जी महाराज जी पिछले हफ्ते ९ अप्रैल को ब्रह्मलीन हो गए कहूं या कहूं उन्हें उनके भाइयों ने संपत्ति के लालच में मार दिया और आनन फानन अंतिम संस्कार कर दिया . न उनकी किसी को शक्ल दिखाई न ही किसी की बात सुनी और न ही उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखने दिया . मृत्यु के पश्चात भी उनके मुख , आँख , नाक , कान और मूत्रेन्द्रिय से रक्त बहता रहा तो प्रश्न उठता है कि 

१) क्या ऐसा संभव है कि इंसान की मृत्यु हो जाए और २०-२२ घंटे बाद भी जब उन्हें अंतिम स्नान कराया जाए तो रक्त बहता रहे ? 

२ ) हमें बताया गया कि उन्हें हार्ट अटैक आया और फिर एंजियोग्राफी करायी जिसमे बाईपास कराने को कहा गया लेकिन दस मिनट में ही उनके प्राण निकल गए तो क्या ऐसा संभव है कि जो एक हट्टा कट्टा इंसान हो सेहतमंद हो न ही ब्लड प्रेशर हाई रहता हो न ही कोई बिमारी हो अचानक उसका ये हाल हो जाए और उसे अटैक आ जाए और वो दस मिनट में ख़त्म हो जाए ?

३ ) उनके भाई ने किसी को आगे नहीं आने दिया और सब जगह कब्ज़ा करके बैठ गया है और वहां पानीपत के लोकल हॉस्पिटल में उन्हें दिखाया गया था और वहीँ उनसे किसी कागज़ पर हस्ताक्षर करवा लिए और अगले दिन सारी प्रॉपर्टी का खुद को मालिक सिद्ध करने लगा ये दिखाकर की विल मेरे नाम है तो क्या उसके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया जा सकता ? 

४ ) क्योंकि उसने उन्हें समाधि नहीं देने दी और न ही किसी को अंतिम दर्शन करने दिए और उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया जिससे महाराज जी की संगत के पास कोई सबूत नहीं रहा तो उसे किस तरह दोषी सिद्ध किया जा सकता है क्या कोई जानकार इस पर रौशनी डाल सकता है ?

५) बस हमारे पास उनके फोटो हैं जिनमे उनके आँख नाक मुंह आदि से खून बह रहा है या फिर जब हॉस्पिटल में उन्हें straiture पर उन्हें लिटा रखा है और कोई भी इंस्ट्रूमेंट उन्हें नहीं लगाया हुआ और न ही उनके किसी भी अंग से तब खून बह रहा तो क्या कोई बता सकता है कि मरने के बाद इंसान के शरीर से खून कब तक बहता रहता है ?

६) पानीपत  में कंप्लेंट भी करवा दी है मगर समझ नहीं आ रहा कैसे न्याय मिलेगा ? 

मित्रों आप सबकी बहुत आभारी रहूँगी यदि इस सब पर रौशनी डाल सको और शेयर कर सको ताकि जानकार बता सकें कि उनके खिलाफ क्या एक्शन लिया जा सकता है ? 

चित्र ह्रदयविदारक है मगर फिर भी इसलिए लगा रही हूँ शायद कोई डॉक्टर मित्र इसमें हमारी मदद कर सके या कोई वकील मित्र इस पर प्रकाश डाल सके .

शनिवार, 28 मार्च 2015

सुनो राम तुम सिर्फ अवतार थे


राम तुम्हारा जन्म लेना 
वास्तव में प्रतीक है 
सद्भावनाओं और मर्यादा के जन्म का 

देखो 
कितनी धूमधाम से मनाते हैं सब 
बिना जाने तुम्हारे जन्म के महत्त्व को 

सुनो 
खुश तो हो जाते होंगे न इस तरह मनाने पर 
आहत तो नहीं होते न देख कर 
यहाँ कैसे होता है मर्यादाओं का हनन 

सुनो राम 
तुम सिर्फ अवतार थे , अवतार हो और अवतार ही रहोगे 
क्योंकि 
यहाँ सिर्फ अवतार पूजे जाते हैं 
अवतारों के बताये रास्तों पर चला नहीं जाता 

और सीख लो तुम भी इसी तरह खुश रहना 
तुम्हारा जन्मदिन मनाने का सिर्फ इतना ही औचित्य है 
सिद्ध कर सकें खुद को राम भक्त 
बाकि फिर चाहे रोज मर्यादा और सद्भावना का चीरहरण करते रहे 

तुम महज खिलौना भर हो 
जैसे तुम्हारे लिए हम ............

आज का इंसान बहुत प्रैक्टिकल हो चुका है ......पता तो होगा न 

और फिर 
जन्मदिन मनाने के लिए 
जरूरी तो नहीं होता न तुम्हारे बताये आदर्शों पर चलना .........



भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी 
हर्षित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप विचारी 

रामनवमी की ढेरों शुभकामनाएं