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शनिवार, 21 मार्च 2015

करूँ तेरा आह्वान



विषय विकार से होकर मुक्त करूँ तेरा आह्वान 
आओ विराजो मन मंदिर में माँ हो मेरा कल्याण 

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके 
शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते 


नव संवत्सर और चैत्र नवरात्रों की सभी को अनेकानेक शुभकामनाएं 

बुधवार, 18 मार्च 2015

चलो महफ़िल सजा लूँ



शाम होने को आई 

चलो महफ़िल सजा लूँ

पलकों की ओट कर पर्दा लगा लूँ

क्यूंकि 

बड़ा शर्मीला मेरा यार है 

बड़ा रंगीला मेरा प्यार है




अब तो चले आओ 

सारा आलम बना दिया 

रतजगे के लिए दिल पर साँसों का पहरा बिठा दिया 

कि

आ जाओ अब तो आखों का खुमार बन कर 

ओ रंगीले छबीले मेरे श्याम बांसुरी की तान बनकर 

कि

अँखियाँ तरस रही हैं जलवा जरा दिखा जा 

निर्मोही श्याम बस इक बार गले लगा जा 

कि

प्रीत बावरिया पुकारे है 

रस्ता तेरा निहारे है 

ये प्रेम के सूने पंथों पर 

मेरी आस को मोहर लगा जा 

श्याम बस मुझे अपना बना जा 

बस इक बार 

मेरे मन वृन्दावन में रास रचा जा 

श्याम मेरी प्रीत अटरिया चढ़ा जा 

मुझे प्रेम का अंतिम पाठ पढ़ा जा 

कि

तुझ बिन अब रहा न जाए श्याम ये बिरहा सहा न जाए

शनिवार, 14 मार्च 2015

जीवन दर्शन

इन्सान भीड़ में भी खुद को अकेला महसूस करता है सर्वविदित सत्य है ये लेकिन क्यों ? प्रश्न ये उठता है . 

शायद अपनी आकांक्षाओं चाहतों इच्छाओं पर सबको खरा नहीं पाता . दुनिया में सब एक जैसे नहीं होते सबके अपनी सोच अपने विचार होते हैं ऐसे में कैसे संभव है सबका सबके आकलन पर खरा उतरना . शायद यही है मुख्य कारण क्योंकि कहने को वो सामाजिक प्राणी है मगर सिर्फ कहने को ही वास्तव में सामाजिकता थोपी गयी है उन पर वास्तव में तो वो जन्मतः अकेला ही है और जो चीजें थोपी जाती हैं वो एक न एक दिन चिंतन को विवश कर देती हैं और उस पल उसे लगता है ..... नहीं , ये भी ठीक नहीं और वो भी ठीक नहीं , अपनी कसौटियों पर कसता है , परखता है और निष्कर्ष निकालता है तब लगता है वो तो ठगा गया यहाँ तो कोई अपना नहीं या फिर कहने को होता है सारा जहान हमारा ,वास्तव में तो जिस दिन इस सत्य से रु-ब-रु होता है तब जान पाता है एकला चलो का वास्तविक अर्थ . और मिल जाता है उसे उत्तर ........ भीड़ में भी अकेले होने का . 

इंसान क्या खुद के साथ भी चल सकता है ? खुद से भी आजिज तो नहीं हो जाता ? प्रश्नों के रेले उसे घेरने लगते हैं जब तक कि यात्रा जारी रहती है क्योंकि कहीं न कहीं उसकी सामाजिकता उसे अकेले होने पर कचोटती है , फिर समूह उसे आकर्षित करता है , फिर सम्बन्ध उसे आवाज़ देते हैं तब एक बार फिर उसके मन का द्वन्द प्रगट हो जाता है और वो फिर एक बार अपने ही बनाए चक्रव्यूह में घिर जाता है कि आखिर वो चाहता क्या है ? 

न भीड़ पसंद है उसे और न ही एकांत फिर कहाँ है उसका ठहराव , उसकी खोज , उसकी अंतिम परिणति ? तय तो उसे ही करना है कहाँ वो खुश रह सकता है समझौते की डगर पकड़ सामाजिक होकर या फिर अपने एकांत में खुद के भीतर उतर कर ........आखिरी निर्णय उसे खुद लेना होता है शायद यही है इन्सान के सबसे मुश्किल प्रश्न का उत्तर या फिर जीवन दर्शन . 

गुरुवार, 5 मार्च 2015

होली आई रे कन्हाई



होली में श्याम करें ठिठोली 
राधे से कैसे करें बरजोरी 

सोच में मोहन पड़ गए हैं 
गोपियों मध्य घिर गए हैं 

आज तो श्याम फंस गए हैं 
फिर तो राधे रंग में रंग गए हैं 

देख प्रीत की रीत श्याम की 
गोपियाँ हो गयीं सभी बाबरी 

एक सुर में फिर करें आग्रह 
होली आई रे कन्हाई रंग बरसे सुना दे जरा बांसुरी ........


होली के रंग सभी के जीवन को रंगमय बनाएं :)

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

एक ज़िन्दगी और तीन चेहरे

 साहित्यिक और सामाजिक सरोकार की पत्रिका 'निरुप्रह ' में मेरी पहली कहानी ' एक ज़िन्दगी और तीन चेहरे ' सितम्बर -नवम्बर २०१४ अंक में :




पहला ख्वाब :

न वो जानती थी ना मैं और मिलने का कोई बहाना भी नहीं था फिर भी घटनाओं का घटित होना बताता है कि कहीं न कहीं कोई रिश्ता रहा होगा यूँ ही नहीं टकराव हुआ होगा यूँ ही नहीं मुलाकात हुयी होगी और ऐसी ही तो थी उसकी और मेरी मुलाकात।  वो जैसे बेमौसम आयी बरसात की तरह ज़िन्दगी में शामिल हुयी।  अचानक मेरी साइकिल का टायर फटना और बैलेंस बिगड़ने पर उससे टकरा जाना और उसका गिरते - गिरते संभल जाना यूँ ही नहीं हुआ होगा।  आज सोचता हूँ तो यही लगता है तुम्हें मेरे जीवन में  आना था फिर चाहे वाक्या कोई भी घटता और मैं उस पल खुद को सम्भाल रहा था और तुम , तुमने तो जो बोलना शुरू किया तो मेरे तो होश ही गुम हो गए।

अबे ओये आशिक की औलाद , देख कर साइकिल चलानी नहीं आती या लडकी देखकर तुम्हारी साइकिल उससे ट्कराने निकल पडती है । नीचे उतर अभी बताती हूँ कहते हुए सैंडिल निकाल ली और मारने को उतारूँ हो गयी ।

मैं न माफ़ी मांग सका न कुछ बता सका कि आखिर हुआ क्या तुमने तो यही समझा कि तुम्हें छेड़ने के लिये मैंने ये हरकत की है और तभी कुछ लोग जैसे ही मेरी और लपके तो जैसे होश आया और मुँह में जुबान तब जाकर तुम्हे बता पाया था कि हुआ क्या था ,
देखिये मैडम , मैं उन लडकों में से नहीं हूँ वो तो मेरी साइकिल का टायर फ़ट गया जिससे अचानक बैलेंस बिगड गया और ये हादसा हो गया ।

और फिर तुमने ही भीड़ से मुझे बचाया था बस वो क्षण ही था जिसने मुझे बाँध लिया।  मैं लड़का होकर भी वो हिम्मत नहीं कर पाया था और तुम लड़की होकर भी भिड़ गयीं सबसे और मुझे बचा लिया।  ऐसे दो रूपों को एक साथ देखने का ये मेरा पहला मौका था थोड़ी देर पहले रौद्र रूप और दो मिनट में ही शांत रस। आहा ! मेरा कवि ह्रदय करुणा से भर उठा और कविता का मुखड़ा वहीँ बन गया।  अब तुम्हारा नाम नहीं लूँगा क्योंकि जानता ही नहीं था कौन थीं , कहाँ से आयी थीं और कहाँ  चली गयी थीं बस एक ख्याल का दुपट्टा मेरे मन के आँगन में छोड़ गयी थीं जिसे मैंने ऐसे सहेजा जैसे कोई बच्चा अपना पहला खिलौना सहेजता है।  

ज़िन्दगी है तो चलती ही रहेगी और उसके साथ हम भी।  आज इकठ्ठा कर रहा हूँ ज़िदगी की कड़ियों को तो सिरे कभी छूट रहे हैं तो कभी रूठ रहे हैं।  काफी अरसा बीत गया तब एक बार मैं माँ के साथ उनकी सहेली के गया और जाकर जो बैठा तो बैठते ही उठ गया मानो किसी बिच्छू ने डंक मारा हो ,जैसे ही तुम्हें देखा और तुम भी ऐसे ठिठकी जैसे आगे रास्ता ही ना हो।  और हम दोनों की अकबकाहट देखकर मेरी माँ ने कहा , सुधि घबराओ नहीं बेटी ये मेरा बेटा है , सुनते ही हम दोनों वर्तमान में लौटे । एक दूसरे से इस तरह एक बार फिर मिलना अजब इत्तफ़ाक था । बात शुरु करते हुये तुमने ही उस दिन की सारी घटना बतायी जिसे सुन सभी हँसने लगे और माहौल कहूँ या खुद को, थोडा सहज हो गया मैं और तुमसे इस तरह  बात करने लगा जैसे जन्मों से जानता हूँ तुम्हें । लगभग दो घन्टे हम साथ रहे और हर तरह के विषय पर हमारी बात होती रही और जब बातों में पता चला कि तुम्हें एक ट्यूटर की जरूरत है जो मैथ्स पढा सके तो बन्दा किस मर्ज़ की दवा था सो तैयार हो लिया और यूँ एक सिलसिला शुरु हो गया । 

रोज बस शाम होने का इंतज़ार रहता कब चार बजें और तुमसे मिलना हो । पढाना तो मेरे बायें हाथ का खेल था चाहता तो सिर्फ़ एक महीने में सारा सिलेबस खत्म करा सकता था मगर फिर उसके बाद तन्हाई मेरी दुश्मन बन जाती , सोच , धीरे - धीरे पढाता और तुमसे ढेर सी बात करता क्योंकि तुम्हारे रूप से ही सिर्फ़ आकर्षित नहीं था बल्कि तुम्हारी शख्सियत ने मुझे अपने पंजे में चारों ओर से जकड लिया था । दिन का हर पहर सिर्फ़ तुम्हारे ख्यालों में गुजरा करता था ।  जान चुका था तुम्हारे घर के भी हालात । बस मुश्किल से ही गुजारा हुआ करता था उस पर तुम्हारी दो छोटी बहनें और थीं ऐसे में बडी होने के नाते ज़िन्दगी की जिम्मेदारियाँ तुम्हारे कंधे पर भी थीं जिन्हें पूरा करने के लिए तुम जल्द से जल्द अपने पैरों पर खडा होना चाहती थीं इसीलिए तुमने सोच लिया था कि अव्वल आना है । तुम्हारे पिता एक कपडे की दुकान में नौकर थे तो उसकी आमदनी भला होती ही कितनी थी ऐसे में उन्हें भी तुम्हारे सहारे की जरूरत थी क्योंकि भाई तो कोई था नहीं तुम्हारा इसलिए इस घर के लिए तुम्ही लडका भी थीं ।

वक्त की रफ़्तार अपनी गति से ही चला करती है और एक दिन आ ही गया जब तुम्हारा सिलेबस पूरा हो गया और मेरा तुम्हारे घर आना जाना बंद होना स्वाभाविक था मगर इस बीच एक अपनत्व का अंकुर हमारे बीच फ़ूट चुका था जिसे तुमने कभी स्वीकारा नहीं तो कभी नकारा भी नहीं क्योंकि जब भी मैने तुम्हारी पढाई से इतर तुम्हारे विषय में कोई बात की या अपने बारे में बताना चाहा तुमने उसमें पूरी दिलचस्पी तो दिखाई ही साथ में मेरे आने से पहले मेरे लिए हमेशा कुछ न कुछ बना कर रखना , मेरी पसन्द ना पसन्द जान कर उसके अनुसार बर्ताव करना तुम्हारी दिनचर्या का हिस्सा सा बन गया था तभी तो उस दिन कितने अधिकार से तुमने कहा था ,

देखिए , आप जब तक खाकर नहीं बतायेंगे हम आपसे नहीं पढेंगे और इठलाती सी तुम मेरी आँखों में झाँकने लगीं , शायद एक कदम बढ रहा था तुम्हारा मेरी ओर ।
कभी मैं कोशिश करता अपने दिल की बात कहने की ।

जानती हो सुधि , तुम जिस घर में जाओगी वहाँ इस तरह खिला खिला कर सबकी सेहत बना दोगी ।

अरे शेखर देखिए आप इस तरह की बातें मत करिए हम जानते हैं आपको क्या खिलाना है और क्या नहीं और तुम शरमा कर नज़र नीची कर लेती थीं जो काफ़ी था मुझे समझने के लिए कि हाँ , उस तरफ़ भी उठ रहा है धुआँ , उस तरफ़ भी कुछ तो पहुँची है हवा बेशक शर्म की झिर्रियों से सही वैसे भी कोई लडकी भला कब आसानी से इकरार करती है  और मेरे लिए इतना ही काफ़ी था कि ख्यालों के खत पहुँच चुके हैं प्रियतम के पास तो जवाब का कागा एक दिन जरूर मेरे मन की मुंडेर पर आ आवाज़ देगा ।

इस बीच मेरी नौकरी दिल्ली में लग गयी । मैं उच्च पदाधिकारी के पद पर कार्यरत हो गया और मुझे तुमसे मिले एक अरसा गुजर गया । फिर एक दिन जब गाँव वापस आना हुआ तो पता चला कि तुम्हारा ब्याह तय हो गया है , जानती हो कैसा लगा ? मानो मेरे प्राण ही किसी ने बेदर्दी से खींच लिए हों , मानो मेरी सारी जमापूँजी किसी ने लूट ली हो , मानो कोई शैतान खिलखिला कर हँस पडा हो मेरी बेबसी पर और मैं काँटों की शैया पर रस्सियों से बँधा रक्तरंजित हुआ तुमसे मिलने को बेचैन होउँ । क्या सोचा था और क्या हो गया था , सोचा था अब जब गाँव जाऊँगा तो माँ से कहकर तुम्हारे नाम का संदेसा भिजवाऊँगा और फिर हम एक हो जायेंगे मगर वक्त तो मुझसे पहले अपनी चालें चलने में कामयाब हो रहा था । फिर भी मैने हिम्मत नहीं हारी और तुमसे मिलने तुम्हारे घर पहुँच गया ।

मुझे देख तुम हतप्रभ रह गयीं । तुम्हारे माता – पिता को तो यही लगा कि मैं उनसे मिलने आया हूँ मगर तुम जानती थीं कि मैं क्यों आया हूँ तभी तो मुझे जाते वक्त जब बाहर तक छोडने आयीं तो किस अधिकार से कहा था तुमने , शेखर , आज के बाद मुझसे मिलने की कोशिश मत करना ।

क्यों सुधि ? तुम जानती हो , मैं सिर्फ़ तुमसे ही मिलने यहाँ आया हूँ ।

हाँ , जानती हूँ , इसीलिये कह रही हूँ ।

नहीं , मैं ऐसा नहीं कर सकता , मुझे तुमसे बहुत जरूरी बात करनी है , कहीं मिलो मुझे ।

नहीं , छोटी जगह है , सबको पता चल जायेगा तो मेरा परिवार बदनाम हो जायेगा ।
अरे तुम और मैं कोई गैर थोडे हैं सभी जानते हैं मैं तुम्हें पढाता रहा हूँ और हमारे पारिवारिक रिश्ते भी हैं और क्या आज से पहले हम कभी साथ कहीं गए नहीं । इस बीच कितनी बार हम दोनो साथ साथ सभी जगह गए हैं तब तो तुमने ऐसा कभी नही कहा तो अब क्या हो गया और यहाँ के लोगों को पता ही है कि पहले भी हम साथ आते जाते थे तो अब क्या हो जाएगा ।

अच्छा ऐसा करो शाम को गोपाल मंदिर में मिलूँगी लेकिन आखिरी बार ।

उफ़ ! एक तीखी कटार सी चुभी थी तुम्हारी बात मगर मेरे लिए उस वक्त इतना ही काफ़ी था कि तुमने आखिर मिलने को हामी तो भरी।

सुबह से शाम तक वक्त मानो गर्मी की दोपहर सांय - सांय करती तुम्हारे और मेरे बीच पसर गयी हो जहाँ घडी के काँटे उसके साथ रोमांस कर रहे हों यूँ सरक रहे थे मानो कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका के मुख पर आयी लट को हौले से पीछे ले जा रहा हो । एक - एक पल मेरे लिए मौत का सा पल था और उन पलों में जाने कितनी बार जीया और मरा था , जब तुमसे मिलने का ख्याल आता तो जी उठता और जब घडी पर ध्यान जाता तो मर जाता । आखिर इस समय को मुझसे इतनी शत्रुता क्यों है जो एक - एक पल यूँ सरक रहा है मानो कोई कछुआ सरक रहा हो और मुझे चिढा रहा हो । वक्त कब किसी का सगा हुआ है और कम से कम प्रेम करने वालों के लिए तो घडियाँ होनी ही नहीं चाहिएं जो वक्त की जंजीरों में उनकी आत्मा बँधे । उल्टे सीधे ख्यालों की जद में घिरा मैं समय से घंटे पहले ही मंदिर पहुँच गया और तुम्हारी राह देखने लगा।

मंदिर में कोई खास भीड भाड तो पहले भी कभी नहीं होती थी क्योंकि आज के वक्त में कहाँ इतनी श्रद्धा बची है इंसान में बस जरूरत हुयी तो पहुँच गया हाजिरी लगाने वरना कौन भगवान कैसा भगवान मगर आज न जाने क्या कारण था जो इतनी रौनक लगी थी सोच  शंका से ग्रस्त हो पंडित जी के पास चला गया पूछने , पंडित जी , ये इतनी भीड भाड कैसी आज ?

आज भगवान की छटी मनायी जायेगी इसलिए इतनी रौनक लगी हुयी है सोच मेरा दिल धक धक करने लगा कि अब हम कैसे मिलेंगे यहाँ तो सारा गाँव उमडा होगा । फिर भी मैं वहाँ सीढियों पर बैठ तुम्हारा इंतज़ार करता रहा और डरता रहा , तुम आओगी , तुम नहीं आओगी की पज़ल खेलता रहा । इस बीच भगवान की छटी भी मन गयी सब लोग प्रसाद लेकर चले भी गए मगर तुम अब तक नहीं आयीं तब मैने वक्त पर निगाह डाली तो रात के आठ बजने को आ गए थे , तो क्या तुमने मुझे झूठ कहा था ? क्या तुम्हारी निगाह में मेरी कोई कीमत नहीं ? निराश हताश हो भगवान को सुनाने लगा

सुना है तेरे दर से कोई खाली नहीं जाता मगर देख मैं खाली हाथ जा रहा हूँ । अरे तुम तो प्रेम के देवता हो , तुम तो प्रेम की पीर समझते हो फिर क्यों मुझे निराश करते हो ? थके टूटे कदमों से सीढियाँ उतरने को उद्द्यत हुआ तभी एक परछाईं सी दिखी , मेरी आस एक बार फिर बलवती होने लगी , शायद तुम ही होंगी मगर देखा पंडित जी प्रसाद लेकर आये और मुझे दे कहने लगे , यहाँ  से कोई खाली हाथ नहीं जाता , ये लो प्रसाद लगता है भगवान से कोई इच्छा पूरी करवानी है तभी अब तक बैठे हो वरना यहाँ कौन इतनी देर बैठता है वो भी तुम्हारी उम्र का नौजवान , ईश्वर से यही प्रार्थना है जिस मकसद से बैठे हो वो तुम्हारी मनोकामना भी जरूर पूरी करे क्योंकि पंडित जी जानते थे मैं कितना बडा नास्तिक हूँ आज तक कभी मंदिर की चौखट पार नहीं की थी और आज चार घंटे हो गये थे तो एक तो उम्र दूजा तजुर्बा पंडित जी के मन में अंदेशा उत्पन्न करने को काफ़ी था फिर भी जो इच्छा चार घंटे में पूरी न हुई वो अब क्या होनी थी मगर पंडित जी के विश्वास को ठेस न पहुँचे इसलिए प्रसाद मुँह में रख लिया और पंडित जी भी मुझे प्रसाद दे अपने घर चले गए । अब सिर्फ़ मैं अकेला और मंदिर का बियाबान रास्ता बचा था तो मैं भी अपनी उम्मीद की चिता जलाते हुए नीचे उतरने लगा तभी अचानक जाने कहाँ से किसी अवतार की तरह तुम प्रगट हो गयीं पेड के पीछे से और तुम्हें देख मैं हताशा और खुशी के मिलेजुले संसार की दहलीज पर खडा किंकर्तव्यविमूढ सा रह गया । ये सच है या सपना । गिले शिकवे करने का वक्त नहीं था हमारे पास । मेरे लिए काफ़ी था तुम आ गयी थीं फिर चाहे कितनी भी देर से क्यों न सही। तुम देर से आने का कारण बताने लगीं ,

‘वो मंदिर में आज छटी थी न ‘ इतना भर कह पायी थीं कि मेरी ऊँगली तुम्हारे लबों तक पहुँच चुकी थी ।

बस और कुछ मत कहो और ये बताओ क्या तुम मेरा इंतज़ार नहीं कर सकती थीं ।
नहीं , ये मेरे अधिकार की बात नहीं थी ।

क्यों ?

क्योंकि रिश्ता ही ऐसा आया कि पिताजी मना नहीं कर सके और तुमसे कौन सा मेरा कोई अनुबंध हुआ था , किस आस के सहारे तुम्हारी उम्मीद करती , कभी न तुमने कुछ कहा न मैने ।

लेकिन तुम जानती तो थीं न

हाँ जानती थी मगर फ़र्क होता है समझने और इज़हार में

जब तक इज़हार न हो क्या पता सामने वाले के दिल में क्या है और मैं गलतफ़हमी का शिकार हो सारे घर को शर्मिंदा करती । यदि आस का एक टुकडा भी यदि तुम मेरे पल्लू से बाँध कर गए होते कि सुधि , मेरा इंतज़ार करना तो कोशिश भी कर सकती थी मगर तुम तो अचानक नौकरी मिलते ही ऐसे गायब हुए कि इतने महीनों बाद आए हो तो किस अधिकार से कुछ कह सकती थी । कुछ बातें समय पर हो जाएं तभी आकार पाती हैं और अब समय तुम्हारे हाथ से निकल चुका है शेखर ।

 मगर कुछ दिन रुकने को तो कह सकती थीं न ।

कहा था मगर रिश्ता एक खाते - पीते घर का है बस उसके एक बेटा है वो विधुर है और उसने मेरे सारे परिवार की जिम्मेदारी भी खुद उठा ली है , उन्हें एक समझदार घर संभालने वाली लडकी चाहिए थी जो उनके बच्चे को माँ की कमी महसूस न होने दे बच्चा छोटा होने के कारण उन्हें विवाह की जल्दी है उसके बदले वो सब कुछ करने को तैयार थे और तुम जानते हो हमारे घर के हालात जैसे तैसे गुजारा करते हैं और मेरे बाद मेरी दो बहनें और हैं ऐसे में मैं कुछ भी कहने में असमर्थ थी । वो मेरी दोनो बहनों को पढा लिखा कर अच्छे घर में ब्याह देंगे ऐसा वादा किया है, साथ ही बिना दहेज के शादी को राजी हो गए तो किस बिनाह पर न करती , यहाँ तक कि लडके की उम्र भी ज्यादा नहीं है उसकी पहली पत्नी के साथ शादी हुए सिर्फ़ 2 साल ही हुए थे कि वो नहीं रही । अब घर की माली हालत भी थोडी सही हो जायेगी बेशक मैं कुर्बान हो जाऊँगी मगर सब को सबकी खुशियाँ तो मिल जायेंगी यूँ खट - खट कर तो नहीं जीना पडेगा इसलिए मैने हाँ कह दी । अब तुम्हें सारी बात बता दी है इसलिए उम्मीद करती हूँ अब तुम मुझसे कभी नहीं मिलोगे ताकि मेरी शादी शुदा ज़िन्दगी सही ढंग से गुजर सके ।

आह ! कितना आसान हो गया तुम्हारे लिए सब कहना । मेरे बारे में एक बार भी नहीं सोचा । क्या मैं वो सब नहीं कर सकता था तुम्हारे परिवार के लिए जो वो कर रहा है , अच्छी खासी मेरी नौकरी लग गयी है , तुम चाहो तो मैं अभी बात करता हूँ तुम्हारे माता पिता से ? क्यों बेवजह कुर्बानी का बकरा बन रही हो ? इससे तुम जानती हो हम सब के जीवन बर्बाद हो जायेंगे ।

पागल हो गये हो क्या ? चार दिन बाद मेरी शादी है और अब ये सब ? जानते हो कितनी बदनामी होगी फिर मेरी बहनों तक के रिश्ते होना आसान नहीं होगा । नहीं शेखर , मैं सिर्फ़ अपनी खुशियों के स्वार्थ में अंधी हो अपने परिवार के भविष्य को दोजख में नहीं धकेल सकती । देखो यदि तुम्हें मुझसे सच में मोहब्बत रही है तो तुम्हें उसी मोहब्बत का वास्ता है , तुम अब कभी मुझसे मत मिलना , यही मेरी शादी का तुम्हारी तरफ़ से दिया तोहफ़ा होगा । बल्कि एक सुखमय जीवन जीना क्योंकि जानते हो असली मोहब्बत मिलन में नहीं हुआ करती क्योंकि उसके बाद तो हम भी आम पति पत्नी ही बन जाते हैं और फिर चूल्हे की आग में मोहब्बत कब जलकर राख हो जाती है , पता भी नहीं चलता सिर्फ़ घर गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ ही दिखाई देती हैं और तब अफ़सोस होता है कि क्या इसीलिए हमने मोहब्बत की थी और मैं नहीं चाहती हम अपनी मोहब्बत को इस तरह याद करें इसलिए जो बात जुदाई में है वो मोहब्बत में कहाँ । एक बार जुदाई का इत्र लगाकर देखो , महकने न लगो तो कहना । मैं जानती हूँ , तुम खुद को संभाल लोगे और मुझे मेरा कहा तोहफ़ा जरूर दोगे , तुम्हें हमारी अधूरी मोहब्बत की सौगंध ।

उफ़ , सुधि ये क्या कर दिया ?

सौगंध क्यों दे दी । तुमने तो मेरी आखिरी उम्मीद भी छीन ली । सुधि अच्छा एक वादा करो , कभी ज़िन्दगी में तुम मुझे एक बार जरूर मिलोगी मेरे मरने से पहले ।
नहीं शेखर ऐसा मत कहो ।

नहीं सुधि , ये वादा दोगी तभी मैं तुम्हारी सौगंध मानूँगा ।

अच्छा ठीक है । एक जिद्दी बालक सी हठ थी मेरी जिसका कोई औचित्य नहीं था शायद इसी वजह से तुमने हाँ का लॉलीपॉप देकर मुझे बहला दिया ।

विदाई के पल किसी की भी ज़िन्दगी के सबसे सिसकते हुए पल होते हैं जहाँ तुमने एक वादे की शाख पर मेरी मोहब्बत को लटका दिया था उम्र भर के लिए सिसकने को , जहाँ मैं खुद से भी उस पल अंजान हो गया था जब तुम जाते जाते मेरे पैरों को हाथ लगा , मेरे अधरों पर एक चुम्बन रख बिना पीछे मुडे चलती चली गयी थीं और मैं पुकारना चाहकर भी नहीं पुकार सका था तुम्हें । सुन्न हो गयी थी मेरी चेतना । ओह ! किस हद तक प्यार करती थीं तुम मुझे मैं तो शायद कल्पना भी नहीं कर सकता था वरना एक कुँवारी लडकी किसी पराये मर्द के न तो पैर छूती है और न ही आगे बढ खुद से अधरों पर चुम्बन अंकित करती है । उफ़ , सुधि ये तुमने मुझे जिलाया है या जीते जी मार दिया , नहीं जानता मगर अब मैं कौन हूँ , क्या करूँगा कुछ नहीं जानता , ऐसे अहसासों से भर उठा था । एक अर्ध विक्षिप्त सी दशा में मुझे छोड तुम चली गयीं और मैं न हँसने और न रोने की कगार पर खडा वो अक्स था जो खुद अपना पता पूछ रहा था ।



दूसरी हकीकत :
वक्त कब किसी का हुआ है जो मेरा होता । मुझे बहना था उसके साथ और मैं बहता जा रहा था बिना किसी उमंग के । हकीकत के धरातलों पर कालीन नहीं बिछे होते तो उसकी ऊबड खाबडता से मुझे रु-ब-रु तो होना ही था । माँ को मैने दिल्ली में अपने पास ही बुला लिया था और अब तो वैसे भी तुमसे बिछडे चार साल हो गये थे तो एक दिन माँ कुछ तस्वीरें लेकर आ गयी कि , “ देखो अब मुझसे अकेले काम नहीं होता मुझे कोई साथी चाहिए ।“

तो कल ही एक नौकर का इंतज़ाम करता हूँ माँ ।

अरे नहीं नौकरों के भरोसे कब घर चले हैं , मुझे तो कोई अपना सा चाहिए ताकि मुझे भी चैन मिले । ये देख तस्वीरें जो पसन्द हो बता दे उसी से तेरा ब्याह करा दूँ ।

माँ , मुझे नहीं करनी शादी - वादी ।

तो क्या संयासी बन जीवन गुजारना है ? और अब तो तुम्हारी उम्र भी सही है नौकरी करते भी इतना वक्त हो चुका है अब सही समय है तुम्हारा घर बस जाए और मुझे भी राहत मिले और देखो इस बार मैं न नहीं सुनूँगी और यदि नहीं माने तो गाँव वापस चली जाऊँगी , माँ ने अपना अंतिम हथियार आखिर चला ही दिया और सुमन मेरी ज़िन्दगी में आ गयी।

सुमन , मेरी पत्नी , जीवनसंगिनी का हर फ़र्ज़ बखूबी निभाती रही पर मैं कभी तुमसे खुद को अलग नहीं कर पाया । उसमें सदा तुम्हें ही खोजता रहा । पहलू में उसके होता और उसके शरीर में तुम्हारा अक्स ढूँढा करता मगर कभी तुम्हारा कोई छोर न पाता । कहाँ तुम और कहाँ वो बस तराजू के पलडे में दोनो शख्सियतों को तोलता रहा । जाने क्यूँ हमेशा यही लगता तुम होतीं तो आज ज़िन्दगी कुछ और ही होती । तुम्हारा दबंग स्वभाव उस पर इतनी समझदारी दोनो का सम्मिश्रण ही था जिसने मुझे तुमसे बाँधे रखा था वरना रूप का क्या है वो तो बहुत मिल जाते ज़िन्दगी में जितने चाहता । फिर भी एक प्यास कायम रही जिसे कभी लांघ नहीं पाया तभी तो सुमन का निश्चेष्ट शरीर मुझमें कभी उत्तेजना नहीं भर सका । कितनी बार चाहता था कि वो सैक्स के समय उन्मुक्त व्यवहार करे , कुछ आसन आजमाये , कभी अपने मन के उदगार कहे और मैं उसे वो असीम सुख देते हुए खुद को तृप्त महसूस करूँ मगर जाने क्या बात थी हर संभव कोशिश के बाद भी कभी उसे आंतरिक क्षणों में अपने पास नहीं पाया । कभी कभी ख्याल आता कि शायद हो उसकी ज़िन्दगी में भी कोई और तभी ऐसा व्यवहार करती है लेकिन फिर खुद को ही दुत्कार देता, पागल है , अपनी तरह मत सोच , सबके शरीर का सिस्टम अलग होता है हो सकता है उसमें न हों वो हारमोन जो उसे उत्तेजित कर सकते हैं । बेशक पत्नी जीवन का वो हिस्सा होती है जहाँ इंसान पूर्णता पा लेता है उसमें अपने सुख - दुख समो देता है दो जिस्म एक जान कहे जाने वाले रिश्ते में भी मुझे कभी ये अहसास नहीं हुआ हमेशा शरीर के स्तर पर आकर एक कुंठा मुझे छेदती रही , मेरी रूह को छलनी करती रही । जाने क्या पाना चाहता था मैं सुमन से ? ख्यालों की डुबकी जब लगाता तो लगता जैसे सुमन नहीं सुधि मेरे पहलू में लेटी है और अचानक ही उसने जैसे अपने अधर मेरे अधरों पर रखे हैं और मैं चेतनाशून्य होने लगा हूँ , कभी लगता अपनी ज़ुल्फ़ों के बादल मेरे चेहरे पर फ़हरा मुझे अपने आगोश में ले सुधि अपने साथ एक काल्पनिक संसार में ले गयी है और कह रही है , देखो शेखर , आखिर हम एक हो ही गये तन और मन दोनो से । और मैं तुम्हारे जिस्म की खोहों में अपना पानी खोजने लगता । भावों के आवेग संवेग में तुम संग संभोग करता , तुम्हारे जिस्म के महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं के स्पर्श पर जब तुम सिहर - सिहर उठतीं तब मानसिक के साथ शारीरिक तृप्ति पा जाने के उपरान्त जब हकीकत के धरातल पर उतरता तो वहाँ सुमन को देख एक वितृष्णा खुद के लिए ही उपजने लगती , आखिर मेरे साथ ऐसा होता क्यों है ? क्यों नहीं हकीकत के धरातल पर रहकर उसे स्वीकार कर पाता ? मिलता तो सुख मुझे सुमन के जिस्म से ही था मगर जाने क्यों ख्यालों में सुधि का रहना मुझमें ग्लानि उत्पन्न कर देता और मैं सुमन से कटा कटा रहता कि आखिर वो क्या सोचती होगी मेरे बारे में जबकि ये भी उतना ही बडा सच है कि उसे बिल्कुल नही पता सुधि और मेरे बारे में । एक अजीब तनी हुयी रस्सी हमेशा मेरे मन और जिस्म के बीच बनी रहती जिस पर चलते - चलते मैं थकने लगा था । जाने किन किन ख्यालों के भँवर में डूबता उतरता रहा और  उम्र का एक पडाव यूँ ही गुजर गया इस बीच दो प्यारे प्यारे बच्चों का पिता भी बन गया और अब वो ही मेरी ज़िन्दगी बन चुके थे जिनके लिए मैं सब कुछ करना चाहता था , सारे ज़माने की खुशियाँ उनके कदमों में डालना ही ज़िन्दगी का मकसद बना लिया था । इस बीच माँ भी छोडकर चली गयी उस जहान में जहाँ से कोई वापस नहीं आता और मैं एक बार फिर खुद को अकेला महसूसने लगा । धीरे धीरे ज़िन्दगी फिर पटरी पर आ गयी । मगर ज़िन्दगी के इम्तिहान न खत्म हुए । नौकरी और तबादलों का सिलसिला चलता रहा । और हर जगह तुम्हें खोजता रहा शायद कहीं किसी मोड पर मिल जाओ अचानक तो बताऊँ तुम्हें तुम्हारे बगैर कितना अधूरा हूँ मैं ।


तीसरा फ़साना :

वक्त ने एक बार फिर हाथ आजमाने शुरु कर दिए । मैं यूँ तो अपने काम में लगा रहता था मगर कवितायें कहानियाँ लिखने का शौक तो शुरु से था ही जब ब्लॉग का पता चला तो एक ब्लॉग़ बना लिया और वहाँ अपने दर्द को जगह देने लगा । मेरे लेखन में सदा सुधि की यादें समायी रहतीं और मैं प्रेमकवि के नाम से विख्यात होने लगा । मेरी कविताओं से जाने कितनी ही लडकियाँ स्त्रियाँ प्रभावित होतीं और मुझसे बात करतीं । मगर जाने कहाँ से एक हवा का जैसे कोई शीतल झोंका ज़ीवन में आया सुरभि के रूप में जिसने अपनी सुरभि से मेरे पलों को महका दिया । वो भी कवितायें ही लिखती थी , उसका भी प्रिय विषय प्रेम ही था तो हमारी ट्यूनिंग तो बैठनी ही थी । धीरे धीरे मेरी कविताओं का केन्द्र बिन्दु कब सुधि से सुरभि हो गयी मुझे भी पता न चला । अब जब तक उसका कमेंट न आता मुझे चैन न पडता । मैं उसे बडे - बडे कमेंट करने को कहता मगर वो भी अपने मन की एक ही थी वो तो मेरी कविताओं में कमेंट के बदले अपनी कोई कविता ही चिपका देती उस कविता के जवाब में और फिर मैं उस कविता का जवाब लिखता तो वो अगली कविता उसके जवाब में लिख देती । मुझमें एक बार फिर मोहब्बत का संचार होने लगा था , मैने सुरभि से इज़हार करना चाहा मगर वो तो मेरी आशाओं से विपरीत दिशा में बहती नदी थी जिसे पकड पाना मेरे लिए शायद संभव नहीं था । उसके लिए मैं सदा एक दोस्त ही रहा इससे अलग कुछ नहीं क्योंकि उसका भी अपना घर परिवार था और वो अपने परिवार में बेहद खुश थी तो उसे आखिर क्या जरूरत थी जो इस चक्कर में पडती मगर मैं प्रेम का प्यासा कुआँ था जो बिन पानी के सिसक रहा था जिसकी मेंड पर नहीं पडते थे अब रस्सियों के निशान । मैने जाने कितनी बार सुरभि से सिर्फ़ प्लैटोनिक लव के बारे में ही संबंध चाहे मगर वो भी अपनी धुन की एक ही पक्की थी , वो शायद मेरी दशा समझती थी तभी एक दिन उसने कहा :

शेखर , देखो तुम एक बहुत अच्छे कवि हो तो तुम्हें अपना सारा ध्यान अपने कैरियर और अपने परिवार की तरफ़ लगाना चाहिए । मैं नहीं चाहती हमारी एक अच्छी दोस्ती तुम्हारे बचकाना व्यवहार की भेंट चढ जाए । तुम तुम्हारा लेखन मुझे अच्छा लगता है इसका ये मतलब नहीं कि मैं तुम्हें चाहती हूँ या तुमसे किसी तरह का संबंध बनाना चाहती हूँ । मेरे लिए दोस्ती एक ऐसा जज़्बा है जिसमें इंसान अपने सभी सुख दुख यूँ बयाँ कर जाता है जैसे खुद से मुखातिब हो रहा हो और मैने तुममे एक ऐसा ही दोस्त देखा है फिर भी यदि तुम आगे इसी तरह का व्यवहार करते रहे तो मुझे तुमसे दोस्ती तोडनी पडेगी जिससे बेशक मेरा दिल बहुत दुखेगा मगर इसके सिवा दूसरा रास्ता तुम छोड नहीं रहे । प्रेम जीवन में हर  इंसान एक बार ही किया करता है उसके बाद तो हर छवि में उसका अक्स ही ढूँढा करता है और मुझे लगता है तुमने वो चोट खायी है इसीलिए तुम्हारे जीवन में ये भटकाव है अब तक वरना इतनी उम्र होने के बाद कहाँ इन बातों के लिए किसी के पास समय होता है बल्कि अपने परिवार की जिम्मेदारियों में इंसान इतना फ़ँसा होता है कि उसे इनके लिए वक्त ही नहीं मिलता ।

उसने जैसे मेरे भेद को पा लिया था , शायद वो समझ चुकी थी उस सत्य को जिसे मैंने सबसे छुपाया था और मैं उसे खोना नहीं चाहता था इसलिए कबूल ली हर बात ।

हाँ थी मेरी ज़िन्दगी में एक लडकी जो आज अपने पति और परिवार के साथ जाने कहाँ होगी , जानता भी नहीं , उसे मेरी याद कभी आती भी होगी या नहीं , नहीं जानता मगर मैं ज़िन्दगी में आज भी उसी मोड पर खडा हूँ जहाँ वो मुझसे विदा हुई थी , वो वक्त सिसकी भरता आज भी मेरी आँखों के सामने खडा रहता है , सुरभि तुम नहीं समझ सकतीं पहला प्यार और उसे खोने का दर्द क्या होता है और उसके बाद मुझे तुममें वो बात लगी जिससे मेरी ट्यूनिंग जमी इसी वजह से तुम्हारी तरफ़ आकर्षित हुआ मगर सच में तुम एक ऐसी सच्ची दोस्त हो जिसने मुझे वक्त रहते चेता दिया क्योंकि तुम्हारी दोस्ती खोकर शायद मैं अपने आप को ही खो बैठूँ । 

ज़िन्दगी में सब कुछ मिल जाता है मगर एक सच्चा दोस्त मिलना बहुत मुश्किल होता है और वो यदि कोई स्त्री हो तो नामुमकिन सा ही होता है उनका दोस्ती निभाना और ऐसे में यदि तुम निभा सकती हो तो मैं क्यों नहीं तुम्हारी मर्यादा की खींची लक्ष्मण रेखा को पार करूँ और तुमसा सच्चा मित्र खो दूँ । नहीं सुरभि अब मुझमें हिम्मत नहीं बची और कुछ खोने की ।

पर फिर भी रेत सी ज़िन्दगी हाथ से फ़िसलती रही और मेरे मन में कुछ अंगार दहकते रहे । जाने क्या बात थी मैं सुरभि से सैक्स संबंधी बात भी कर लिया करता था यानि उसे कहता तुम कुछ लिखो ऐसा जिससे स्त्री क्या महसूसती है वो पता चले उन पलों में , कैसे उत्तेजित होती है , कैसे हाव भाव होते हैं और पुरुष से वो क्या चाहती है और मैं पुरुष के भाव लिखता हूँ और फिर हम दोनो अपना एक संयुक्त संग्रह छपवाते हैं मगर उसने कभी इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई बल्कि किसी न किसी बहाने टालमटोल कर देती तो एक दिन मैने उससे पूछ ही लिया कि आखिर क्यों टाल रही हो ?

शेखर , मेरी ये राह नहीं , मैं स्वस्थ लेखन में विश्वास रखती हूँ और इस तरह सफ़लता पाना मेरा मकसद नहीं

मगर आज सभी करते हैं ऐसा लेखन , जरा पढो तो सही एक बार गूगल पर जाकर या बडे बडे राइटर्स की किताबें , सभी ने लिखा है तो क्या ऐसा लिखना गलत है ?
मैं नही जानती गलत है या सही मगर तुम जो बार - बार मुझे उस तरफ़ धकेलते हो मुझे अच्छा नहीं लगता । बहुत बार देखा है मैने कि तुमसे जब भी बात हुई तुम किसी न किसी बहाने सैक्स पर ले आते हो …… पूछ सकती हूँ आखिर क्यों ?

क्या तुम अपनी ज़िन्दगी में सैक्स लाइफ़ से संतुष्ट नहीं हो ?

सुरभि , क्या कहूँ अब तुम्हें , चलो छोडो

नहीं आज बात फ़ाइनल हो जानी चाहिए क्योंकि मैं नहीं चाहती कि तुम आज के बाद हमारे बीच इस तरह की बात लाओ

सुरभि तुम्हें मैने सब तो बता रखा है अपने जीवन के बारे में कैसे सुधि की यादों के साथ सुमन को सहेजा है फिर भी आज बताता हूँ और फिर मैने सब बता दिया उसे तो वो बोली

शेखर , शायद तुम्हें प्यार के अर्थ ही नहीं पता यदि पता होते तो इस तरह न भटके होते । प्यार और सैक्स दो अलग चीजें हैं और मुझे लगता है कि तुम सुमन में सुधि को खोजते रहे इसलिए कभी संतुष्ट नहीं हो सके और जानते हो सुधि को खोजना क्या सिद्ध कर रहा है कि तुम्हारा प्रेम अभी उथला था यदि गहरा होता तो वहाँ शरीर होता ही नहीं कहीं न कहीं तुममे सुधि के शरीर को लेकर एक वासना थी तभी तुम अपनी पत्नी में उसे खोजते रहे और जब वहाँ नही मिला तो मेरे साथ अपनी मानसिक संतुष्टि के लिए प्रयास करते रहे मगर शेखर , प्रेम आत्मिक होता है न मानसिक न शारीरिक और उस हद तक पहुँचने के लिए अभी तुम्हें वक्त लगेगा जब तक तुम खुद को नही समझोगे जानोगे कि आखिर तुम क्या चाहते हो खुद से , ज़िन्दगी से और रिश्तों से । शेखर जिसे तुम सुधि के लिए अपना प्रेम कह रहे हो वो वास्तव में प्रेम नहीं तुम्हारी वासना है क्योंकि जिस तरह तुम मुझे बता रहे हो कि सैक्स के वक्त तुम अपनी पत्नी नहीं मानो सुधि के साथ संभोग कर रहे होते हो तो ये तुम्हारी मानसिक कुंठा है न कि प्रेम । 

यदि मुझे सच्चा दोस्त मानते हो तो मैं तुम्हें बताना चाहूँगी बल्कि एक सलाह देना चाहूँगी कि तुम्हें किसी मनोचिकित्सक को दिखाना चाहिये जो तुम्हारी इस समस्या को समझे और उसका सही निदान बताये क्योंकि उम्र के आधे पडाव पर हो और फिर भी अब तक यदि तुम ख्यालों में या मानसिक रूप से संतुष्ट नहीं तो इसका सीधा अर्थ यही निकलता है कि तुम्हें डॉक्टरी सलाह की जरूरत है जिसे तुम प्यार कह रहे हो वो प्यार नहीं है क्योंकि प्यार में सिर्फ़ पवित्रता होती है , वहाँ शरीर बीच में नहीं आते और तुम अब तक सिर्फ़ शरीर तक ही सीमित रहे हो फिर चाहे मानसिक रूप से ही सही और जब एक जगह संतुष्टि नहीं मिली तो औरों में ढूँढने चल दिए मगर तुम तब तक संतुष्ट नहीं हो सकते जब तक जो मैने कहा है उस पर न ध्यान दोगे । वैसे बहुत ज्यादा कह दिया है मैने तुम्हें अपने अधिकार से ज्यादा मगर एक सच्चा दोस्त वो ही होता है जो अपने दोस्त को सही राह दिखाये बेशक इसके बाद तुम मुझसे दोस्ती न रखना चाहो तो मत रखना मगर फिर भी ये मेरा फ़र्ज़ था जब तुमने इतने खुले दिल से अपनी सारी बात बतायीं तो मुझे निष्पक्ष तौर से देखने पर यही उचित समाधान लगा। बाकी जो तुम ठीक समझो ।

उसके शब्द मेरे दिलो दिमाग पर दस्तक देते रहे मैं जाने कितने ख्यालों के सागर में हिचकोले भरता रहा , बेशक उसकी दी सलाह को मानने से परहेज करता रहा मगर उसके शब्द मस्तिष्क की शिराओं में टंकार करते रहे यूँ लगा जैसे किसी ने मुझे भरे बाजार वस्त्रहीन कर दिया हो , कोई किसी को किस हद तक जान सकता है सिर्फ़ बातों से ये मैने उस दिन जाना और निर्णय किया कि अपनी इस दोस्त को किसी कीमत पर खोने नहीं दूँगा आखिर उम्र के ऐसे पडाव पर था मैं जहाँ के बाद तो अर्धशतक होने में सिर्फ़ कुछ ही साल बचे थे और मैने यूँ ज़िन्दगी तबाह कर ली ।

और आज तक हमारी दोस्ती कायम है कितने साल बीत गये हिसाब नहीं रखा मगर जाने कौन सी कसक है जिसने मुझे न जीने दिया न मरने । मैं आज भी अपने मन के तिलिस्म में कैद किसी कैदी सा खुद से जिरह करता रहता हूँ । यूँ कभी कोई कमी भी नही रही मुझे सब कुछ तो मिला फिर भी एक कसक ने अपना हाथ मेरे दिल पर हमेशा रखा और उस कारण मेरी तीन चार कविताओं और कहानियों की किताबें भी आ चुकी हैं बहुत से पुरस्कारों से सम्मानित हो चुका हूँ  । इसके अलावा अच्छे संगीत से मुझे सदा लगाव रहा खासकर सूफ़ी संगीत से क्योंकि ओशो मेरे आदर्श रहे तो वहाँ ढूँढना चाहा अपनी प्यास के अंतिम छोर को मगर एक प्यासा सिरा हमेशा मेरे अस्तित्व को कुचलता रहा , मसलता रहा और मैं तीन चेहरों में भटकता रहा । किसी को भी न अपना कह सका । जो अपना था उसे अपना न सका और जो बेगाना था उसे अपना बना न सका , ये कैसी मेरे मन की ग्रंथि है जिसे मैने जितना सुलझाना चाहा उतना ही उसमें उलझता चला गया मगर कभी किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुँच सका । 

क्या भटकाव ही जीवन है ? क्या अतृप्ति ही तृप्ति का अंतिम छोर है ? क्या मन की मछली की आँख भेदना इतना कठिन है कि अर्जुन हो या कर्ण सबके तीर चूक गये यहाँ आकर ? एक उहापोह से ग्रसित मैं आज तक न समझ पाया आखिर मैने अपने जीवन से चाहा क्या और मेरी दिशा है क्या ? जो मिला उसे स्वीकारना क्या मजबूरी नहीं ? ये तो एक तरह से आत्महत्या है मेरी मेरे द्वारा ही क्योंकि बेमन से जीता आया हूँ आज तक । जो मिला स्वीकारता भी रहा मगर मुझमें “मैं “ कहीं ज़िन्दा भी हूँ ………… बस तब से आज तक यही ढूँढ रहा हूँ । कहीं मिले तो पूरा हो जाये 
घटनाक्रम और ज़िन्दगी भी तब तक अल्पविराम तो आते रहेंगे मगर पूर्णविराम अब भी एक प्रश्नचिन्ह सा मेरे दिल और दिमाग की कन्दराओं में दस्तक दे रहा है और पूछ रहा है ……… कौन हो तुम और आखिर क्या चाहते हो ?

ख्वाब हकीकत और फ़साने के बीच मैं आज तक न जान सका प्रेम का बीज वक्तव्य , शरीर का विज्ञान और आत्मिक प्रेम के सहचर बिन्दु फिर कैसे संभव है मेरा मेरी प्रेतयोनि से मुक्त होना …… हाँ प्रेत ही तो बन गया है मेरा अस्तित्व आज जिसे नहीं पता उसकी मुक्ति का मार्ग क्या है ?

यहाँ न कोई अपराध बोध है न वितृष्णा न मोह जो संगसार होने से बचने के उपाय करूँ फिर भी मुझमें मेरा “ मैं “ चिंघाडता है आखिर कैसे मिलेगी मुझे शांति ? या मैं ज़िन्दा शरीर की कब्र में यूँ ही दफ़न रहूँगा बिलबिलाता हुआ और कहता हुआ मन और मस्तिष्क के बेकाबू घोडों की रेस में खुद को हारती ये कैसी ज़िन्दगी है मेरी ???


एक ज़िन्दगी …………तीन चेहरे …………फिर भी अधूरे !!!

तो क्या मुझे सुरभि द्वारा दिखाये उपाय पर गौर करना चाहिए था ?

सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

जाने तेरे मन में क्या है समाया

कभी बासंती बयार सा उमड़ता है 
कभी पतझड़ी मौसम सा झरता है 
मेरे जीवन के हर आरोह अवरोह में 
कभी बांसुरी की तान सा लरजता है 

कहीं कृपा के खजाने खोल  देता है 
कहीं विष को भी अमृत कर देता है 
अजब तेरी माया अजब तेरी लीला 
कहीं गरीब की पांत में मुझे ही रखता है 

क्या मैं काबिल नहीं जो मेरी बारी 
अपनी  कृपा के रूप बदल देता है 
और एक प्रश्नचिन्ह की सलीब पर 
मेरा  ही अक्स टांग देता है 

जाने तेरे मन में क्या है समाया...........माधव !!!

शनिवार, 24 जनवरी 2015

माँ शारदे



विद्या की अधिष्ठात्री का आज करूँ आह्वान 
बैठो सबकी बुद्धि में करो निर्मल मन प्राण 

कलमकार की कलम सदा चलती रहे निर्बाध 
शब्द शब्द में झलके तुम्हारी महिमा अपार 

पीली सरसों सा खिल उठे हर मन 
पावन ऋतु बसंत सा हो हर आँगन 

कोयल की कुह कुह हो और पिया का संग 
राधा श्याम मयी हो अब हर प्रेमी का मन 

आओ करें सब मिलकर माँ शारदे को कोटि कोटि नमन 
बसंत पंचमी की शुभकामनाओं से खिले उठे  हर मन 


बुधवार, 21 जनवरी 2015

अतः सुबह होने को है ...........

घुटन चुप्पी की जब तोड़ने लगे 
शब्द भाव विचार ख्याल से 
जब तुम खाली होने लगो 

एक शून्य जब बनने लगे 
और उस वृत्त में जब तुम घिरने लगो 

न कोई दिशा हो न कोई खोज 
एक निर्वात में जब जीने लगो 

अंतर्घट की उथल पुथल ख़त्म हो जाये 
बस शून्य और समाधि के मध्य ही कहीं 
खुद को अवस्थित पाओ 

समझ लेना 
घनघोर अन्धकार सूचक है प्रकाश का 

अतः सुबह होने को है ...........

शनिवार, 17 जनवरी 2015

शब्द एक अर्थ दो

"मैं " शब्द एक अर्थ दो 
एक अर्थ मे " मैं " अहम को पोषित करता है 
तो दूजे में स्वंय की खोज करता है 
बस फ़र्क है तो सिर्फ़ उसके अर्थों में , 
उसे समझने में 
उसे जानने में 
और जिस दिन ये पर्दा हटता है 
जिस दिन द्वैत की चादर हटती है 
और मन की , आत्मा की खिडकी खुलती है 
वहाँ ना कोई " मैं " रहता है 
ना अहंकारी " मैं"  और ना सात्विक " मैं " 
सब आत्मविलास ही लगता है 
और जो इस " मैं " का सौन्दर्य होता है 
जो इस " मैं " की गहराई होती है 
वहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ आनन्दानुभूति ही होती है
जरूरत है तो बस अहम से पोषित " मैं " पर पुनर्चिन्तन करने की 






गुरुवार, 1 जनवरी 2015

जब भी निहारना हो खुद को





जब भी निहारना हो खुद को 
मेरे मन दर्पण में  
अक्स देख लेना 
खुद से कुछ
इस तरह मिल लेना 
बस यहीं तक है मेरा अधिकार 
और तुम्हारा इंतज़ार 

जरूरत नहीं तुम्हें 
कोई शुभ लग्न तिथि मुहूर्त या वार देखने की 
मेरे ह्रदय कमल खुला है 
चारों पहर आठों याम 

प्रेम भक्ति के भावों से भरे घर में 
स्वागत है तुम्हारा  
ओ कान्हा
२०१५ में मेरे घर आना 

नववर्ष मंगलमय हो कान्हा !!!

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

वो 22 दिन

बस यही है मेरी श्रद्धांजलि :

आज बाऊजी को संसार से विदा हुए 10 साल हो गए और वेदना का आकाश दर्द से इतना बेजार हुआ इस साल कि परत-दर-परत खोलने को बेचैन हो गया ……बाऊजी के जीवन के अंतिम क्षणों को ये सोचकर कलमबद्ध करने की कोशिश की ……शायद कुछ निजात पा सकूँ इस बेचैनी से  :  


वो 22 दिन
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किसे ज्यादा प्यार करती है मम्मी को या बाऊजी को ?

मम्मी को

एक अबोध बालक का वार्तालाप जिसे प्यार के वास्तविक अर्थ ही नहीं मालूम । जो सिर्फ़ माँ के साथ सोने उठने बैठने रहने को प्यार समझती है । उसे नहीं पता पिता के प्यार की गहराई , वो नहीं जानती कि ऊपर से जो इतने सख्त हैं अन्दर से कितने नर्म हैं , उसे दिखाई देता है पिता द्वारा किया गया रोष और माँ द्वारा किया गया लाड और जीने लगती हैं बेटियाँ इसी को सत्य समझ बिना जाने तस्वीर का कोई दूसरा भी रुख होता है । उन्हें दिखायी देता है तो सिर्फ़ पिता का अनुशासन बद्ध रखना और रहना , अकेले आने जाने पर प्रतिबंध मगर नहीं जान पातीं उनका लाड से खिलाये गये निवाले में उनका निश्छल प्रेम , उनकी बीमारी में , तकलीफ़ में खुद के अस्तित्व तक को मिटा देने का प्रण । उम्र ही ऐसी होती है वो जो सिर्फ़ उडान भरना चाहती है वो भी बिना किसी बेडी के तो कैसे जान सकती हैं प्रतिबंधों के पीछे छुपी ममता के सागर को । और ऐसा ही मैं सोचा करती थी और किसी के भी पूछने पर कह उठती थी , “ मम्मी से प्यार ज्यादा करती हूँ । “

प्यार के वास्तविक अर्थों तक पहुँचने के लिए गुजरना पडा अतीत की संकरी गलियों से तब जाना क्या होता है पिता का प्रेम जो कभी व्यक्त नहीं करते मगर वो अवगुंठित हो जाता है हमारी शिराओं में इस तरह कि अहसास होने तक बहुत देर हो चुकी होती है या फिर जब अहसास होता है तब उसकी कद्र होती है । नेह के नीडों की पहचान के लिए गुजरना जरूरी है उन अह्सासों से :

खुली स्थिर आँखें , एक - एक साँस इस तरह खिंचती मानो कोई कुयें से बहुत जोर देकर बडी मुश्किल से पानी की भरी बाल्टी खींच रहा हो और चेतना ने संसार का मोह छोड दिया हो और गायब हो गयी हो किसी विलुप्त पक्षी की तरह। वो 22 दिन मानो वक्त के सफ़हों से कभी मिटे ही नहीं , ठहर गये ज्यों के त्यों । कितनी ही आँख पर पट्टी बाँध लूँ मगर स्मृति की आँख पर नहीं पडा कभी पर्दा । हाँ , स्मृति वो तहखाना है जिसके भीतर यदि सीलन है तो रेंगते कीडे भी जो कुरेदते रहते हैं दिल की जमीन को क्योंकि आदत से मजबूर हैं तो कैसे संभव है आँखों के माध्यम से दिल के नक्शे पर लिखी इबारतों का मिटना ? एक अलिखित खत की तरह पैगाम मिलते रहते हैं और सिलसिला चलता रहता है जो एक दिन मजबूर कर देता है कहने को , बोलने को उस यथार्थ को जिसे तुमने अपने अन्तस की कोठरियों में बंद कर रखा होता है और सदियों को भी हवा नहीं लगने देना चाहते मगर तुम्हारे चाहे कब कुछ हुआ है । सब प्रकृति का चक्र है तो चलना जरूरी है तो कैसे मैं उससे खुद को दूर रख सकती हूँ , स्मृतियों ने अपने पट खोल दिए हैं और कह रही हैं ,
‘ आओ , देखो एक बार झाँककर , खोलो बंधनों को जिनमें बाँध रखा है खुद को , निकालना ही होगा तुम्हें तुम्हारा अवसाद , पीडा और दंश ‘ ।

बात सिर्फ़ 22 दिनों की नहीं है बात है एक जीवन की , एक सोच की , एक ख्याल की । कोमा एक अवस्था जिसमें जाने वाला छोड देता है सारे रिश्ते नाते जीते जी , तोड लेता है हर संबंध भौतिक जगत से विज्ञान के अनुसार और आप जा चुके थे उस अवस्था में । जाने कितनी पीडा अपने साथ ले गए । जाने किस अज्ञात सफ़र में थे जो किसी से नहीं रहा कोई नाता जैसे, यूँ तोड दिया पल में हर रिश्ता जबकि रिश्तों को सबसे ज्यादा आपने ही जीया । कितने फ़िक्रमंद हुआ करते थे घर के एक – एक प्राणी के लिए । प्राण बसा करते थे आपके हर रिश्ते में फिर माता पिता का हो या भाई बहन का या पत्नी और बच्चों का । भाई – बहनों से चाहे कितनी अनबन हो जाती मगर आपने कभी उनके लिए अपने मन में कटुता नहीं लायी बल्कि उनके हर दुख सुख में उनके साथ खडे रहते । दादी की बीमारी में अपनी सरकारी नौकरी तक की परवाह न कर चार महीने तक छुट्टी लेकर बैठे रहे ताकि आपकी माँ को जब आपकी जरूरत हो आप उपलब्ध हो सकें और उनका सही इलाज करवा सकें । बेटियाँ में तो मानो आपके प्राण ही बसा करते थे । बेशक आपका कठोर स्वभाव सबको रास नहीं आता था मगर नारियल के ऊपरी आवरण से परे उतने ही अन्दर से कोमल थे ये शायद ही कोई समझ पाया हो ।
उम्र का एक दौर हुआ करता है जिसमें हर लडकी अपनी इच्छाओं के पंखों पर सवार उडा करती है और माता पिता द्वारा की गयी बंदिशें उसे नागवार गुजरती हैं ऐसे में यदि पिता का रौबीला वर्चस्व आपके जेहन पर डर बनकर हावी रहे तो आप कैसे सहज रह सकते हैं कुछ ऐसा ही मैं महसूसा करती थी जब भी कहीं बाहर अकेले आना जाना होता या स्कूल से कहीं लेकर जाते तो आप नहीं भेजा करते जो मुझे अन्दर ही अन्दर आप से एक दूरी बनाने को मजबूर करता या एक डर आपका मेरे वजूद पर हावी रहता और मैं यदि कहीं जाती भी तो वक्त पर घर पहुंचने की कोशिश करती ये सोच आप परेशान हो जायेंगे क्योंकि वो मेरी सोच थी उस वक्त की मगर आज समझ सकती हूँ आपकी वो वेदना जो अपने बच्चे को जब बाहर हम भेजते हैं तो उनके ठीक ठाक घर पहुँचने के लिए कितने फ़िक्रमंद रहा करते हैं जबकि आज तो हर हाथ में मोबाइल है और उस वक्त तो किसी किसी के घर ही टेलीफ़ोन होते थे ऐसे में संदेश मिलने कितने मुश्किल होते हैं और बच्चे की चिन्ता में माता पिता क्या महसूसते होंगे आज समझ सकती हूँ लेकिन तब नहीं समझ सकती थी उस वक्त तक आप मेरे लिए सिर्फ़ एक डर का बायस थे , चिन्तातुर पिता से ज्यादा तो दूसरी तरफ़ मेरे लिए मुझे हमेशा आगे बढने को प्रेरित करते , किसी से भी न डरने की शिक्षा देते । आज भी याद है मुझे जब मैं सातवीं कक्षा में थी और आप ने एक इंग्लिश के प्रश्न का उत्तर मुझे लिखवाया और मैने वो ही उत्तर अपनी परीक्षा में लिखा जिसे मेरी टीचर ने काट दिया और उस पर रिमार्क लिखा जब मैने आपको बताया तो आपने एक पत्र मेरी प्रिंसिपल के लिए लिखा और मुझे कहा , जाकर अपनी प्रिंसिपल को दे आना । बाऊजी , मैं प्रिंसिपल के कमरे में कैसे जाऊँगी जब कहा तो बोले अरे डरने की क्या बात है , बेधडक जाओ और पत्र देकर आना कहना मेरे पिताजी ने भेजा है देखना कुछ नहीं कहेंगी और मैं डरते डरते प्रिंसिपल के पास वो पत्र दे आयी तो उस दिन मुझमें एक हौसले का संचार हुआ कि दुनिया में किसी से बिना बात डरना नहीं चाहिए , कदम आगे बढाना चाहिए ज्यादा से ज्यादा सामने वाला न ही तो कहेगा लेकिन आपकी बात भी उस तक पहुँच जाएगी फिर चाहे उस गलती के लिए मेरी टीचर ने मुझे अपने पास बुलाया और कहा कि बेटा तुम प्रिंसिपल के पास क्यों गयीं मुझे कह दिया होता , तुम्हारे पिताजी ने सही कहा यहाँ मेरी ही गलती थी , जब ये बात सुनी तो मेरा आत्मविश्वास बढा और शायद यहीं से मुझमें आपने एक हिम्मत की नींव डाल दी थी जो ज़िन्दगी भर मेरे काम आयी । यहाँ तक कि मैं आज बडे से बडे अफ़सर हो या मंत्री या नेता किसी से भी मिलने या बात करने में संकोच नहीं करती या कहीं जाना हो बेधडक चली जाती हूँ ।


मुझे आज भी याद है ये उसी हिम्मत का परिणाम था जब एक बार मम्मी अस्पताल में थीं और आपको वहाँ उनके साथ रहना था और मुझे घर वापस भेजना था जाने किस परेशानी से गुजरे होंगे ये आज अनुमान लगा सकती हूँ शायद उस वक्त तो समझ भी नहीं सकती थी क्योंकि आप का स्वभाव था ही ऐसा । सिर्फ़ पाँच मिनट देर हो जाती घर आने में तो आप मेरे कॉलेज पहुँच जाया करते थे या कोई सामान गली में लेने गयी हूँ और देर होने लगती तो ढूँढने निकल पडते कि आखिर इतनी देर कैसे हो गयी , इतने चिन्तातुर थे आप बाऊजी और उस दिन सरदारों का कोई जुलूस निकल रहा था तो सारे रास्ते बंद थे । आप और मैं दोनो विलिंगडन अस्पताल के बस स्टाप पर खडे रहे कि कोई बस मिल जाए जो उस तरफ़ जाए । 215 नम्बर का इंतज़ार करते करते जब काफ़ी देर हो गयी और लोगों ने बताया आज इधर वाहन आने बंद हैं न प्राइवेट बस मिलेगी न सरकारी और आपको मम्मी के पास भी जाना था , उन्हें ज्यादा देर अकेला छोड नहीं सकते थे और मुझे भी सुरक्षित बैठाना था वाहन में तो आपने एक थ्री व्हीलर वाले को रोका और मुझे कहा , बेटा इसमें जाओ और देखो पंचकुइयाँ से पहाडगंज का रास्ता ले लेंगे वहाँ से तुम सुरक्षित पहुँच जाओगी और घर पहुँचते ही मुझे अस्पताल के नम्बर पर फोन करना ।

सरदार जी , बच्ची को सही तरह पहुँचा देना ।

बिल्कुल बाऊजी , आप चिन्ता न करें ।मैं भी बाल बच्चों वाला इंसान हूँ । वो बोला ।

मैने भी ‘ठीक है बाऊजी ‘ कह तो दिया था मगर उससे पहले कभी इस तरह अकेले ऑटो में बाहर नहीं निकली थी । यदि निकली भी तो सिर्फ़ इतना कि घर से कॉलेज और कॉलेज से घर वो भी बंधी बंधाई बस में तो बाहर की दुनिया की कोई जानकारी ही नहीं थी । वैसे भी कोई कैसे विश्वास करेगा कि दिल्ली जैसे शहर में रहने वाली लडकियाँ भी ऐसी हुआ करती हैं मगर घर का माहौल ही कुछ ऐसा रहा कि कहीं भी बाहर आते - जाते तो घर के लोगों के साथ ही या फिर बाऊजी और मम्मी के साथ ही । ऐसे में हौसला करके ऑटो में बैठ तो गयी मगर जब उसकी शक्ल देखी तो घिग्गी बंध गयी । लाल - लाल आँख , चेचक के दाग से भरा सांवला चेहरा , बडी - बडी मूँछें , ऊपर से एक आँख से काना और बेहद सेहतमंद और फिर सरदार ।सरदार से डर इसलिए क्योंकि एक साल पहले ही इंदिरा गाँधी की हत्या सरदार द्वारा हुई थी तो उनके लिए मन में एक डर सा बैठ गया था । अन्दर ही अन्दर एक लडाई खुद से लडती रही । क्या हुआ जो अकेले जा रही हूँ । मैं कोई कमजोर थोडे हूँ । इसे बिल्कुल इल्म नहीं होने दूँगी कि मुझे रास्ते नहीं पता । नहीं तो क्या पता कहाँ ले जाए । इसलिये जैसे ही पहाडगंज पर आया तो उसे दिशा निर्देश देने लगी क्योंकि पहाड गंज से रास्ता पता था मगर उससे पहले का नहीं पता था क्योंकि उस रूट पर ही मेरा कॉलेज था ताकि उसे लगे कि इसे सब पता है । पता नहीं सामने वाले में कोई दोष होता भी है या नहीं मगर हमारे अन्दर बैठा डर का साँप हमें हर पल डँसता ही रहता है । मुझे सही सलामत पहुँचा दिया था उसने और अभी मैं घर भी नहीं पहुँची थी कि आपका फोन आ गया कि मैं पहुँची भी या नहीं । कितने चिन्तातुर थे आप , शायद सोच भी नहीं सकती थी उस वक्त । बेशक आज आपकी हर चिन्ता को समझ सकती हूँ ।
बेटी हो या बेटा आप हमेशा इसी तरह चिन्तित हो जाते और हमेशा समय पर आने के निर्देश देते और यहाँ तक कि शादी हो जाने के बाद भी हमेशा वाहन तक छोडने आते फिर चाहे आपसे दर्द के कारण चला जाता या नहीं, तो ये क्या था सिवाय स्नेह के ।आपके ये उसूल तो आपके जँवाइयों को भी पता थे इसलिए घर पहुँचते ही सबसे पहले आपको फोन करवाया करते कि बाऊजी चिन्ता कर रहे होंगे । ये सब आपका स्नेह ही तो था , वो निस्वार्थ प्यार था जिसे शायद जब तक इंसान खुद माता पिता नहीं बनता और उस दौर से नहीं गुजरता समझ ही नहीं सकता । वरना पहले आपका इस तरह चिन्तित होना यूँ लगता था मानो आपको हम पर विश्वास ही नहीं है मगर वो आपका हम पर अविश्वास नहीं आपका हमारे लिए निश्छल प्रेम था जिसे आज कितनी शिद्दत से सब महसूसते हैं ।

आज भी याद है वो शाम जब मम्मी का फोन आया ।
बेटा , जल्दी आ जाओ , तुम्हारे बाऊजी का लग रहा है अंत समय आ गया है, खाना पीना सब छुट गया है और निढाल हो गये हैं एक दम चुप , सबको अजनबियों की तरह देख रहे हैं ,बीपी हाई हो गया है और दिल में भी तकलीफ़ है , पैरों तले जमीन ही खिसक गयी थी और हम सभी बहनें दौडी दौडी अपने अपने बच्चों सहित पहुँच गयी थीं । बाऊजी से सबको आशीर्वाद दिलवाया एक - एक का परिचय देते हुए क्योंकि पहचान ही नहीं पा रहे थे किसी को ।

रात मानो इम्तिहान के शिखर पर थी । एक - एक पल घंटों में तब्दील हो चुका था । मैं आपके सिरहाने बैठी कोई ग्रन्थ पढ रही थी जब आपसे मेरी बात हुई शायद चेतना में आ गए थे आप उस वक्त या शायद तबियत कुछ सुधर गयी थी बाकि सब ऊंघ रहे थे उस समय । आपका जीवन से और ईश्वर से जाने कैसा संवाद चल रहा था , एक अतृप्ति की छाया ने आपको उस पल बेचैन कर दिया था जब आपने कहा ,

कुछ नहीं होता पूजा पाठ आदी से , आखिर क्या पाया मैने जीवन से ? सारी ज़िन्दगी यूँ ही घिसटते हुए बीती , क्या सुख पाया ? ज़िन्दगी भर दुख दर्द तकलीफ़ों को सहते ही तो बीती ? बताओ क्या मिला ज़िन्दगी से , सच्चाई और ईमानदारी से ? सब बेकार लगता है अब ।

स्तब्ध रह गयी मैं क्योंकि सारी ज़िन्दगी ईश्वर की अनथक अराधना करने वाले के मुख से ये बात निकले तो हैरान होना लाज़िमी था जिन्होने हम सबमें ईश्वर में आस्था का बीज बोया था जिन्होने दो वक्त मंदिर नियम से जाना नहीं छोडा फिर कितनी ही आँधी तूफ़ान आये मगर नियम नही टूटना चाहिए आज वो ईश्वर के होने पर प्रश्नचिन्ह खडा कर रहा था , अपने उसूलों , अपनी आस्था पर से विश्वास उठ रहा था ये क्या हुआ सोच मैने कहा ,

बाऊजी , ये कैसे कह रहे हो आप । बताइये आपको क्या कमी रही जीवन में , देखिए , थोडा बहुत संघर्ष तो सभी के जीवन में होता ही है और आपकी सारी बेटियाँ अपने अपने परिवार में सुखी हैं । उनका एक भरा पूरा परिवार है । और बेटियों से बढकर आपका आदर करने वाले और आपकी बेटियों को चाहने वाले उन्हें पति मिले हैं तो दूसरी तरफ़ कभी किसी के आगे आपका सिर नहीं झुका , हमेशा गर्व से सिर उठाकर जीवन जीया , किसी से कभी कोई उधार नहीं लिया , समाज मे आपकी मान प्रतिष्ठा है , ये सब किसकी देन है , आपकी सच्चाई , ईमानदारी और निष्ठा की ही न ।यहाँ तक कि सरकारी नौकरी होने के बावजूद तीन - तीन बेटियों का विवाह करना क्या आसान था ? फिर कैसे आप ज़िन्दगी या ईश्वर पर आक्षेप लगा रहे हैं । बल्कि हमेशा आपने हमें यही सब कहकर समझाया कि अच्छा करोगे तो जीवन में हमेशा तुम्हारे साथ अच्छा ही होगा तुम अपना सच्चाई का रास्ता कभी मत छोडना और ईश्वर में हमेशा विश्वास रखना कि वो जो करता है अच्छा ही करता है और हमने भी यही देखा कि आप पर चाहे कितनी मुसीबतें आयीं मगर आप हर बार उनमें से कुन्दन की तरह खरे निकलते रहे और चमकते रहे । बताइये क्या कमी रही जो आज आप इस तरह की बात कर रहे हैं । आपकी फ़ुलवारी के हर फ़ूल पर देखो कैसी बहार छायी है फिर ऐसी निराशाजनक बात क्यों कर रहे हैं , अपने विश्वास और अपनी आस्था को कमजोर न होने दो और आप का हर मुसीबत मे मुस्कुराता चेहरा ही तो हमारा संबल रहा है और फिर यदि आप ऐसी बात करेंगे तो हमारा सबका क्या होगा । और मुझे तो ऐसा नहीं लगता कि आपके जीवन में कोई कमी रही। हाँ, संघर्ष बेशक रहा मगर हर संघर्ष के बाद जीवन और निखरा ही ।

और आप चुप हो गये मेरी बातें सुनकर और मैं आपके सिरहाने बैठी रही । रात अपनी गति से सरकती रही और आपको भी उसके बाद नींद आ गयी मगर मैं सोच में पड गयी आखिर ऐसा क्यूं हुआ आपके साथ ? आपका विश्वास क्यों डोला ? क्या अन्तिम समय ऐसा ही होता है सोच सिहर उठी । मगर तकदीर पर छायी छाया से मुक्त कर दिया सुबह की पहली किरण ने । सुबह डॉक्टर को दिखा दिया तो उसने कहा बस कल की रात भारी थी अब चिन्ता मत करो मगर उसके बाद आपने खाना नहीं खाया सिर्फ़ लिक्विड पर ही रहने लगे । अन्न छुट ही गया मगर हमारे लिए राहत थी कि अब आप खतरे से बाहर हैं ।

जीवन फिर ढर्रे पर चलने लगा था । जब एक दिन फिर तकरीबन दो सवा दो महीने बाद आपकी हालत फिर बिगडी तो आपको नर्सिंग होम में दाखिल करवाना पडा , बैड पर ही सारे नित्यकर्म करवाने पडते , आपका शरीर आपका साथ छोड रहा था , न खडे हो पाते थे न बैठ पाते यहाँ तक कि अपने दस्तखत भी नहीं कर पा रहे थे तो आपके अंगूठे के निशान को मान्यता दी बैंक ने मगर अब तो कुछ भी संभव नहीं रहा था इतनी हालत बिगड चुकी थी ।कफ़ वात और पित्त का प्रकोप , मशीनों से खींच - खींच कर कफ़ निकाला जाता , दिल ने तो कब से अपना अलार्म बजा रखा था मगर उसमें भी आप कितने चिन्तातुर रहते थे ये मुझसे बेहतर कौन जान सकता है , बेशक बोल नही पाते थे मगर इशारों से मुझे समय से घर जाने को कहते क्योंकि मेरे बच्चे छोटे थे और सुबह से मैं वहीं आपके पास रहा करती थी ।

एक - एक करके सारे घर के लोग आपसे मिलकर जा चुके थे और एक दिन मेरे पति भी आपसे मिलने आये तो उन्होने मम्मी और मुझे घर भेज दिया ये कहकर ,
तुम लोग जाओ और फ़्रैश होकर आ जाओ कुछ खा पीकर , मैं बाऊजी के पास हूँ ।
ठीक है , बाऊजी हम थोडी देर में आते हैं कहकर हम घर आ गये ।
मगर हमें नहीं पता था कि वो हमारी आखिरी बात थी जो उनसे हमने कही थी क्योंकि आने के बाद पता चला कि वो तो कोमा में चले गए हैं ।
डॉक्टर अपनी हर संभव कोशिश कर रहे थे मगर जब 7-8 दिन हो गए तो उन्होने कहा कि अब कोई उम्मीद नहीं है । लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम लगाओ या नहीं इन्हें फ़र्क नहीं पडने वाला , ये तो अब कोमा में हैं । आप चाहें तो घर भी ले जा सकते हैं यहाँ तो बस बिल बढता रहेगा , अब हम भी कुछ नहीं कर सकते , जितनी साँसें हैं उतनी बस पूरी करेंगे , अब ये नहीं कह सकते कितने दिन ।

मम्मी से पूछ कर और उन्हे सारी सिचुएशन बताकर हमने निर्णय लिया कि घर ले जाया जाए क्योंकि मम्मी को लगा कि बेटियाँ आखिर कब तक रोज - रोज आती रहेंगी अपने बच्चों को सबको छोडकर । घर पर तो वो सारा वक्त उनकी देखभाल कर लेंगी और हम सब आपको घर ले आए।

अब एक - एक दिन गुजरने लगा मगर आपकी हालत में न सुधार हुआ बल्कि घर आने पर तो आपकी आँखें खुल कर स्थिर हो गयीं और आप एक - एक साँस इस तरह लेते खींचकर कि हमारा दिल दहल उठता जाने किससे संघर्ष कर रहे थे और जब बर्दाश्त से बाहर हुआ तो ताऊजी के बेटे से बात हो रही थी तो वो बोले ‘ ईश्वर की सत्ता पर विश्वास कर बेटा , ये तो कर्मभोग हैं भोगने ही पडते हैं , और चाचाजी ने तो उम्रभर ईश्वर को इतना पूजा है तो हो सकता है अब इसके बाद उनका जन्म ही न हो इसलिए इतना कष्ट उठा रहे हैं ‘ ।

भभक उठी थी मैं सुनकर , बर्दाश्त नहीं हो रही थी आपकी तकलीफ़ और भाईसाहब से ही अड गयी कि
कैसा ईश्वर है वो भाईसाहब , जो अपने ही भक्तों को इतना दुख देता है और वो भी उस हालत में जब वो निसहाय है , उसे अपना होश भी नहीं । डगमग़ा गयी थी मेरी आस्था उस दिन , बहुत कोसा था ईश्वर को और समझ आयी थी आपकी बेचैनी उस रात वाली जब आपने भी ईश्वर और अपने जीवन की तपस्या पर प्रश्न उठाया था । एक आह निकली थी उस दिन और कह उठी थी ,
भाईसाहब यदि ईश्वर है न तो मैं एक बेटी होकर कहती हूँ इतनी तकलीफ़ देने से बेहतर है वो उन्हें उठा ले । सह लेंगे उनका न रहना मगर नहीं देखी जा रही उनकी तकलीफ़ कह फ़फ़क फ़फ़क कर रो पडी थी ।
बात न बहस की थी न विश्वास की । बात थी प्रेम की , हमारे रिश्ते की , पिता और पुत्री के उस रिश्ते की जिसका मैं खुद एक अंश थी वहाँ कैसे संभव था अपने ही किसी हिस्से को तकलीफ़ में देख पीडारहित होकर रह सकना ।

हर साँस अपनी जद्दोजहद खुद बयाँ कर रही थी। बहुत मुश्किल से साँस खींचते और फिर 10 – 12 सैकेंड को रुक जाती तो लगता बस यही आखिरी है अगली आयेगी भी या नहीं , दिल हलक में आकर अटक जाता वो दस बारह सैकेंड मानो बरस जितने लम्बे हो जाते , एक उहापोह की स्थिति में जाने कितने बिच्छु पीडा के डंक मार जाते और फिर साँस छोडते मानो रुकी तो कह रहे हों नहीं , अभी नहीं जाऊँगा और दूसरी तरफ़ मृत्यु अपने सारे हथियार आजमा रही हो अपने साथ ले जाने के लिए अपनी हर संभव कोशिश कर रही हो । जाने क्या था और क्यों था ऐसा कोई समझ नहीं पा रहा था ।

रोज कोई न कोई रिश्तेदार देखने आता ही था एक दिन बाऊजी की एक सत्संगी बहन आयीं और उन से भी जब उनकी तकलीफ़ नहीं देखी गयी तो बोलीं , बेटा , पता है ये क्यों नहीं जा रहे ?
कहिये मौसी , क्यों ?
क्योंकि इन्हे इस हाल में भी तुम्हारी माँ की चिन्ता है कि मेरे बाद इसका क्या होगा ? ये किसके सहारे रहेगी ? तुम तीन बेटियाँ हो अपने घर की तो फिर कैसे जीयेगी ये ? नहीं तो अब तक इनकी मुक्ति हो गयी होती । ये इतनी तकलीफ़ सिर्फ़ इन्ही के लिए सह रहे हैं और खुद को आज़ाद नहीं कर रहे ।जिस वक्त ये इनकी चिन्ता से मुक्त हो जायेंगे देखना इस संसार को छोड जायेंगे ।
बेटा तू एक काम कर ,
जी कहिए मौसी
इनके कान के पास जाकर कह , बाऊजी आप मम्मी की चिन्ता मत करो , मैं मम्मी का ख्याल रखूँगी और उन्हें अपने साथ रखूँगी ।
सुनकर आश्चर्य हुआ और मैने बताया
मौसी , बाऊजी कोमा में हैं , इन तक हमारी बात नहीं पहुँचेगी ।
जरूर पहुँचेगी , तू कहकर तो देख ।
नहीं होगा ऐसा , कोमा मे गया इंसान कभी कुछ भी नही सुन पाता मौसी मगर उन्होने एक न सुनी बल्कि बोलीं
बेटा , शरीर क्या है मिट्टी न , चलता किससे है ? अन्दर की चेतना से न , तो वो चेतना तो जागृत है न तभी तो साँस ले रहे हैं और ज़िन्दा भी हैं , तू दे वचन उन्हें देख मुक्त हो जायेंगे , अन्दर की चेतना कभी निष्क्रिय नहीं होती , वो हमेशा जागृत होती है , उसी के होने से ही सारी क्रियायें होती हैं और जब उस तक तेरी आवाज़ पहुँचेगी देखना मुक्त हो जायेंगे ।

विश्वास ऐसी बातों पर भला आज के साइंस के युग में कौन कर सकता है फिर भी मौसी की आस्था और विश्वास के लिए मैने जैसा उन्होने कहा वैसा ही किया । बाऊजी के कान के पास जाकर बोली ,
बाऊजी , बाऊजी
उफ़ ! ‘बाऊजी’ की आवाज़ देते ही उनकी स्थिर आँखें फ़िरीं और शरीर और सिर एक दम चौंक कर हिला इस तरह जैसे मेरी आवाज़ सुनी हो उन्होने , मैं आश्चर्य में डूबी बोल उठी ,
बाऊजी , आप मम्मी की चिन्ता मत करो , मैं हूँ न , मैं ख्याल रखूँगी उनका , मेरे साथ रहेंगी वो , आप इतनी तकलीफ़ मत उठाओ , जाओ आप , मुक्त करो खुद को इस देह की कैद से कहते कहते रो उठी ।

हाय ! कैसी बेटी हूँ जो अपने ही पिता को कह दिया इस तरह जैसे उनसे कोई नाता ही न हो मगर मौसी ने ढाँढस बँधाया और बोलीं बेटा ये शरीर तो एक दिन जाना ही है सभी का मगर क्या तू खुश है उन्हें इस तरफ़ तकलीफ़ में देखकर
नहीं मौसी
तो फिर चुप हो जा और उनकी आत्मा की मुक्ति के लिए प्रार्थना कर और मम्मी को कहा
तुम अपने सारे जीवन की तपस्या का फ़ल इन्हें दो
और मम्मी ने उनके कहने पर जो सारी उम्र पूजा पाठ , व्रत इत्यादि किये सबका फ़ल बाऊजी के निमित्त कर दिया ।

जाने कितना बडा पत्थर उन्होने दिल पर रखकर ये सब किया होगा इसका तो मैं अन्दाज़ा भी नहीं लगा सकती मगर शायद यही होता है शाश्वत निस्वार्थ प्रेम जो एक स्त्री अपने पति से करती है सिर्फ़ उसे तकलीफ़ से मुक्ति मिल जाए फिर चाहे उसे वैधव्य का दुशाला ही क्यों न ओढना पडे । ये होती है एक पतिव्रता की दृढता ।

मौसी तो चली गयीं ये सब कराकर और मम्मी ने भी कहा देखो बेटा , तुम सब रोज आती हो और देखो अभी पता नहीं तुम्हारे बाऊजी के ऐसे जाने कितने दिन बीतें । देखो मुझे कुछ भी तो करना नहीं होता , और तुम भी तो सिर्फ़ आकर बैठती ही हो अब कोई काम तो है नहीं इसलिए अपना - अपना घरबार देखो और ऐसा करो एक दिन छोडकर एक दिन आ जाया करो बारी - बारी से ।

हमें भी सबको लगा कि शायद मम्मी का कहना सही है और हम सब अपने - अपने घर आ गयीं ये सोच कि अब कल नही जायेंगे परसों कोई भी एक या दो हो आयेंगी।

अभी घर आये मुश्किल से दो घंटे भी नहीं बीते थे कि मम्मी का फोन आया ।
बेटा , तेरे बाऊजी के तो पैर नीले पड गये हैं और जाने कहाँ से इतनी चींटियाँ बिस्तर पर आ गयी हैं लगता है कल डॉक्टर को दिखाना पडेगा फिर से ।

तुम चिन्ता मत करो मम्मी हम कल आ जायेंगे।

रात किसी तरह काटी और सुबह फिर उसी तरह रोज की सारी तैयारी कर दी सबके खाने की लंच पैक कर दिए और निकलने से पहले मैं नाश्ता करने बैठी तो एक भी कौर गले से नीचे न उतरे और लगे अब यदि खाकर नहीं गयी तो पता नहीं सारा दिन कैसे निकले और कहाँ , क्योंकि बाऊजी को लगता है अस्पताल फिर ले जाना पडे तो कुछ तो जबरदस्ती खाना ही पडेगा वरना कैसे भाग दौड कर पाऊँगी । किसी तरह 2-4 कौर मुँह में डाले । इतने में मम्मी का फोन आया तो मेरे पति ने उठाया और उनसे मम्मी की बात हुई तो उन्होने कहा वो आ रही है और मैं भी आता हूँ ।

मुझसे बोले तुम ऐसा करो कुछ पैसे रख कर ले जाओ न जाने कहाँ क्या काम आयें । मैं बच्चों की सैटिंग करके पहुंचता हूँ और तुम ऑटो करके जल्दी से पहुँचो ।

मैंने वैसा ही किया जैसा उन्होने कहा था । वो ही मौसी मुझे ऑटो से उतरते ही मिलीं तो उन्हें बताया कि ये हो रहा है तो बोलीं चिन्ता न कर , अब जल्दी ही मुक्ति हो जायेगी उनकी ।
मैं अविश्वास की पोटली थामे जल्दी - जल्दी घर की ओर बढने लगी और जैसे ही गली के नुक्कड पर पहुँची तो देखा ताऊजी के बेटे की बहू ने बाहर ईँटें फ़ेंकी हैं । सन्देह का कीडा कुलबुलाने लगा और मैं डरते - डरते एक - एक कदम बढाती जैसे ही दहलीज में घुसी तो चौक में सामने ही जमीन पर बाऊजी को लेटे देखा और ………… हंस उड चुका था ।

उस दिन हो गया था मेरा दाह संस्कार और आपका पुनर्जन्म आपकी विशिष्टताओं के साथ जब ये जाना मैने कि :

कितने चिन्तातुर थे आप उस अवस्था में भी जिसमें जाने के बाद सुना है इंसान और उसकी चेतना सब शून्य में स्थित हो जाती हैं मगर ये शायद आपके निस्वार्थ प्रेम की ही बानगी थी जो बता रही थी कि कितना स्नेहमयी व्यक्तित्व था आपका हर शख्स के लिए प्रगाढ स्नेह वो भी इतना कि मृत्यु से भी लड गये और वो भी हाथ बाँधे मानो इसी इंतज़ार में खडी रही कि कब आज्ञा हो और वो अपना कर्तव्य पूरा कर सके । मानो एक बार फिर भीष्म का जन्म हुआ हो और वो प्रतिज्ञा बद्ध हों कि जब तक हस्तिनापुर को चहुँ ओर से सुरक्षित न देख लूँ प्राण नहीं छोडूँगा और मानो आपने आत्मसात कर लिया हो उस चरित्र को पूरे का पूरा और दिया हो एक वचन खुद को “जब तक अपनी अर्धांगिनी के भविष्य के प्रति निश्चिंत नहीं हो जाऊँगा तब तक इस संसार से विदा नहीं लूँगा फिर उसके लिए चाहे मृत्यु से संघर्ष ही क्यों न करना पडे , फिर चाहे उसके लिए अपनी एक – एक साँस के लिए लडना पडे ,”  यूँ लगा आप भी भीष्म की तरह शर शैया पर लेटे हों और मौत हुँकार भरती जाने कितने अपने डंक चुभो रही हो और आप एक – एक साँस का कोई कर्ज़ उतार रहे हों , ऐसा था स्नेहमयी ममतामयी व्यक्तित्व ।

 अब इसे ईश्वर का चमत्कार कहो , उसमें आस्था कहो या प्रकृति या इंसान की प्रबल इच्छाशक्ति का कमाल मगर मैने ये तब जाना क्योंकि मेरे वचन देने के बाद आपने चौबीस घंटे भी नहीं लिए खुद को मुक्त करने को जो पिछले 22 दिनों से आप संघर्षरत थे ईश्वर से , प्रकृति से या कहो खुद से ।

तब अहसास हुआ कि कोमा में गए हुए इंसान की चेतना तक जरूर पहुँचती है बात बेशक वो जवाब न दे सके मगर यदि उसके अन्दर कोई इच्छा या लालसा बची होती है तो शुरु हो जाता है एक संघर्ष मृत्यु से । मानो मृत्यु अपने सभी उपकरण लगा रही हो प्राण खींचने के और इंसान की प्रबल इच्छाशक्ति विवश कर रही हो उसे ठहरे रहने को , कितना कठिन संघर्ष करना पडता होगा ये तो कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है मगर उस दिन लगा इंसान की इच्छा शक्ति के आगे प्रकृति भी विवश हो सकती है ।
जाने क्यों आपके जाने के बाद अब तक आपकी वो दशा स्मृति से हटती ही नहीं और एक अपराध बोध से ग्रसित हो जाती हूँ क्योंकि उस वक्त जैसा डॉक्टर ने कहा वैसा ही हमने किया था क्योंकि हमें लगता था डॉक्टर जो कह रहा है सही कह रहा है मगर आज मेरी आत्मा मुझे धिक्कारती है और अन्दर से एक आवाज़ उभरती है कि हमें डॉक्टर के उस निर्णय को नहीं मानना चाहिए था कि लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम हटा दिये जायें क्योंकि कम से कम तब आप एक एक साँस के लिए शायद इस तरह नहीं लडते बेशक ये बात आज तक किसी को नहीं कही न बतायी मगर मेरे अन्दर मेरी आत्मा मुझे धिक्कारती है क्योंकि जिस दिन से ये अहसास हुआ कि कोमा में भी आपकी चेतना जागृत थी उस दिन से यूँ लगा जैसे हम ही आपके सबसे बडे दुश्मन बन गए थे । कैसे अपने लोग ही अन्जाने में अपनों की तकलीफ़ का हिस्सा बन जाते हैं कभी सोच भी नहीं सकती थी और अब ये निर्णय लिया है कि कभी किसी की भी ज़िन्दगी में यदि ऐसी कोई स्थिति आयी तो कभी ऐसा निर्णय नहीं लेंगे क्योंकि अह्सास हो चुका है बेशक मस्तिष्क शून्य हो जाए मगर चेतना तो सब भोगती ही है ,सुनती भी है बस उत्तर ही नहीं दे पाती । ये फ़ाँस शायद ज़िन्दगी भर मेरे ह्रदय में चुभती रहेगी जाने कभी इससे निजात मिलेगी भी या नहीं , नहीं जानती । अब तो सिर्फ़ उस दर्द , उस पीडा को महसूस कर मानो हर पल अंगारों पर लोटती हूँ ।
आपका व्यक्तित्व मेरा आदर्श बना और आज मैं खुद में आपको देखती हूँ ।
अब ढूँढती हूँ खुद को तो कहीं नहीं मिलती …………मिलते हैं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ आप ………क्या इसी तरह होता है हस्तांतरण प्रकृति का ?