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सोमवार, 14 जुलाई 2014

तुम्हारा " मैं "


सुना है 
माता पिता के गुणसूत्रों से ही 
शिशु का निर्माण होता है 
और आ जाते हैं उसमें 
मूलभूत गुण अवगुण स्वयमेव ही 

और हम हैं 
तुम्हारी ही रचना 
तुम्हारा ही प्रतिरूप 
तो कैसे संभव है 
तुम्हारे गुणों अवगुणों से 
मुक्त होना हमारा 

क्योंकि तुम्ही ने कहा है गीता में 
प्राणिमात्र का बीज हूँ " मैं " 
मैं ही सभी प्राणियों 
स्थावर , जंगम जड़ चेतन 
सभी का आदि मध्य व् अंत हूँ 
मैं ही मैं व्याप्त हूँ 
हर रूप में हर कण में 
फिर दैत्य हों या दानव 

हर जगह गीता में तुमने बस 
खुद को ही सिद्ध किया 
हर सोच में " मैं " 
हर  विचार में " मैं " 
हर क्रिया कलाप में " मैं " 
सिद्ध कर स्वयं के होने को 
प्रतिपादित किया 

यहाँ तक की ब्रह्मा को जब 
चतुश्श्लोकी भागवत सुनाई 
वहां भी इसी सिद्धांत का प्रतिपादन किया 
ब्रह्मा जब तुम नहीं थे 
तब भी मैं था 
जब तुम नहीं रहोगे 
तब भी मैं रहूँगा 
और ये जो तुम सब तरफ देख रहे हो 
ये है मेरी माया 
अर्थात मेरी इच्छा से उत्पन्न सृष्टि 
उसके भी तुम कर्ता नहीं 
इस सब में भी " मैं " ही व्याप्त हूँ 
हर जगह तुमने सिर्फ 
अपने मैं को  पोषित किया 

यहाँ तक कि 
जिसने तुम्हें अपना सर्वस्व माना 
अपना मैं भी तुम्हारे चरणों में 
समर्पित किया 
और जिसने तुम्हारी सत्ता नकारी 
तुम्हारा " मैं " न स्वीकार किया 
जिन्होंने माना और  जिन्होंने नकारा 
दोनों का तभी उद्धार किया 
जब तुम्हारा " मैं " पोषित हुआ 

तभी तो गीता के अंत में कह देते हो 
तू सरे धर्म छोड़ मेरी शरण  में आ जा 
" मैं " मुक्त पापों से करूंगा 
तू न कोई चिंता कर 
अर्थात 
जिसने तुम्हारे " मैं " रुपी दासता को स्वीकारा 
उसे तुमने उसकी भक्ति और प्रेम नाम दे उद्धार किया 
या जिसने  मैं को पोषित किया 
अपने बल और बुद्धि को ही सर्वस्व माना 
फिर वो रावण हो , हिरण्यकशिपु हो या कंस 
उनका तुमने संहार कर 
खुद के  " मैं " को पोषित किया 

अर्थात 
जब माधव 
तुम ही अपने " मैं " से मुक्त नहीं 
जब तुम ही अपनी " प्रशंसा " चाहते हो 
बस सब तुम्हारे होने को ही स्वीकारें 
तो बताओ भला कैसे संभव है 
आम मानव या प्राणी का 
" मैं " के व्यूह्जाल से मुक्त होना 
क्योंकि 
आखिर बीज तो तुम ही हो 
फिर फसल तो वैसी ही उपजेगी 
" मैं " का पोषण चाहने वाली 
आखिर तुम्ही हो माता पिता तुम तुम्ही हो 
तो कैसे मुक्त हो सकते हैं हम 
तुम्हारे द्वारा हस्तांतरित 
गुणसूत्रों के अवगुणों से भी 

एक अपने अहम के पोषण के लिए 
कितना बड़ा संसार रच देते हो 
सोचना ज़रा तो कैसे मुक्त हो सकता है 
मानव तुम्हारी दी इस सौगात से 
जिसके अंदर शामिल हैं 
इन्द्रियजनित काम क्रोध लोभ मोह भी अहंकार के साथ 

जब तुम सृष्टि निर्माण और विध्वंस का 
खेल बना सकते हो 
फिर मानव तो जो इस गंदले  सलिल में अटा पड़ा है 
 कैसे हो सकता है मुक्त 
या सोच सकता है कुछ अच्छा 
क्योंकि 
फर्क है तुममे और उसमें 
जैसा तुम कहते हो 
तुम निर्विकार हो और वो विकारी 
जबकि अहम के विकार से तो तुम भी नहीं हो मुक्त 
तब वो तो पांच पांच विकारों से ग्रस्त है 
और तुम एक से 
तुम्हारा एक विकार 
जन्म जन्मांतरों तक बंधन में 
भटकाए रखता है 
तो फिर जिसके अंदर पांच हों 
उसकी क्या हो सकती है 
कोई सीमा तय 
सोचना ज़रा 
तब पाप पुण्य आदि की 
परिभाषा तय करना 
तुम्हारे " मैं " से हमारे " मैं " तक के सफर में !!!

मंगलवार, 24 जून 2014

धर्म ----- एक यंत्र ?



विविधताओं से भरे हमारे देश में धर्म को एक ऐसा यंत्र बना दिया गया है जिसके दम पर जैसा चाहे धार्मिक उन्माद पैदा किया जा सकता है । आज लोग जानते ही नहीं कि धर्म का वास्तविक अर्थ है क्या बस दो धर्मों में बाँटकर लोगों की भावनाओं से खेलना भर इनका मकसद रह गया है । यदि देखा जाए तो किसी भी धर्म में धर्म की सिर्फ़ एक व्याख्या मिलेगी कि किसी भी तरह इंसान को इंसान बनकर , मिलजुल कर रहना आ जाए , उसमें से ईर्ष्या , द्वेष , लोभ , मोह और अहंकार की प्रवृत्तियाँ दूर हो जाएं । कोई धर्म ये नहीं कहता कि यदि मनुष्य दूसरे धर्म को मानता है तो वो गलत है । सबसे ऊँचा धर्म इंसानियत और मानवता की सेवा है और आज कुछ धर्म के ठेकेदार एक बार फिर देश में धार्मिक उन्माद फ़ैलाने की कोशिश में हैं सिर्फ़ ये कहकर कि साईं भगवान नहीं थे या उन्हें भगवान मानना पाप है या उनकी पूजा पाप है । ऊपर से कहते हैं कि वो मर चुके हैं वो तो इन्सान थे तो  अब उन्हें भगवान क्यों माना जाए । 

कोई इनसे पूछे यदि ऐसा ही है तो हिन्दू धर्म में भी तो राम हों या कृष्ण ये भी इंसान ही थे तो इन्हें क्यों भगवान माना जाए ? 

क्यों ये धर्म के ठेकेदार बडे बडे पदों पर विराजमान होकर राम भजो कृष्ण भजो का उपदेश देते हैं ? 

क्या इन्हें ये नहीं सोचना चाहिये जो बात एक धर्म के लिए लागू होती है वो ही दूसरे पर भी लागू होगी । तुम्हारे तो इंसान रूप में जन्मे भगवान नहीं और हमारे भगवान , ये कैसे संभव है ? 

दूसरी बात धर्म तो आस्था और विश्वास का संगम होता है उसके लिए किसी को कहना नहीं पडता कि इस धर्म को मानो उसे नहीं । ये तो मानव की स्वतंत्रता है कि उसकी आस्था कहाँ परिपक्व होती है । धर्म मनवाए नहीं जाते जबरदस्ती धार्मिक होना एक भावना है और वैसे भी भाव में ही भगवान बसते हैं फिर कोई किसी भी रूप में पूजे तभी तो आज पत्थर में भगवान पूजे जाते हैं , वृक्षों में भगवान पूजे जाते हैं तो क्या किसी ने इन्हें देखा है ? नहीं न मगर इंसान की आस्था है जो उन्हें प्रेरित करती है लेकिन आज के कुछ धर्म के ठेकेदार जाने क्या सिद्ध करना चाहते हैं जो इस तरह के बेबुनियाद प्रचार कर जनमानस की भावनाओं से खेल रहे हैं । 

मेरे ख्याल से तो उन्हें ही धर्म के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान नहीं क्योंकि वैसे भी हिन्दू धर्म में कहीं नहीं कहा गया कि गैर धर्म को मानना गलत है जबकि सांई बाबा ने न तो स्वंय कभी कहा कि वो भगवान हैं सिर्फ़ एक शब्द कहते थे सबका मालिक एक अर्थात उनसे ऊपर कोई शक्ति है जिससे समस्त संसार संचालित होता है फिर उन बातों को तोड मरोड कर गलत अर्थ देने का क्या औचित्य ? 

क्या यही धर्मगुरु अपने उपदेशों में कबीर और रहीम की वाणी नहीं सुनाया करते ? 

क्या कबीर और रहीम दूसरे धर्म के नहीं थे ? 

अरे ईश्वर का प्यारा सबका प्यारा होता है और ईश्वर को तो अपने सभी बच्चे प्यारे हैं ऐसे में कैसे इंसान उन्हें धर्म के नाम पर बाँट सकता है । आज ये समझना बहुत जरूरी है कि ये धर्म के ठेकेदार इंसान को हमेशा बाँटते आये हैं और हम इनके कुचक्रों में न फ़ँसकर अपनी आस्था के साथ जीवन यापन करते रहें क्योंकि यहाँ तो साफ़ नज़र आ रहा है सारा चक्कर ट्रस्ट की सम्पत्ति का है और उस पर उनकी निगाह है इसलिये ये सारा बवाल पैदा किया जा रहा है जबकि यदि देखा जाए तो हिन्दुओं के भगवानों के भी ट्रस्ट हैं और वहाँ का पैसा कितनी जगह तो मुसलमानों के पास ही जाता है क्योंकि उन्होने ही खोजे थे हमारे भगवान फिर वैष्णों देवी हों या अमरनाथ सुना है कि उनकी पीढी में ही जाता है फिर वो उसका प्रयोग चाहे जैसे करें यानि लोगों की भलाई मे या जैसे चाहे । यदि उस वक्त उन्होने नहीं बताया होता तो क्या हमें पता चलता आज तक भी कि माता वैष्णों देवी या अमरनाथ के बारे में मगर जाने क्यों हमारे हिन्दू धर्म के पुरोधा अपना कौन सा स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं और आम लोगों की भावनाओं को भडकाना चाहते हैं । 

जनता को चाहिये कि इनकी बातों में न आये और अपने विवेक से सोचे सही और गलत के बारे में ये नहीं कि जिसने जिस दिशा में हाँक दिया चल दिए बल्कि आज की जनता बहुत जागरुक हो गयी है इसलिये जरूरी है कि वो इन बेबुनियाद फ़तवों पर ध्यान न दे और सही निर्णय ले जिससे देश और समाज की शांति भंग न हो । 

अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए जनता की भावनाओं से खेलना क्या धर्म के ठेकेदारों को शोभा देता है ? ये एक विचारणीय प्रश्न है क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि जब इनके चेहरों से एक एक करके नकाब उतरते दिखें तो लोगों का इन पर से विश्वास ही उठ जाए फिर वो आसाराम हों या शंकराचार्य । कोई भी कार्य या संदेश ऐसा नहीं होना चाहिये जो मानव की धार्मिक आस्था पर प्रहार करे क्योंकि ये जनता तभी तक साथ है जब तक आप उसकी भावनाओं से नहीं खेल रहे जिस दिन कुछ तथाकथित ऐसा करने लगेंगे और जनता की भावनाओं से खेलेंगे इन्हें कहीं जगह नहीं मिलेगी फिर कहाँ चलायेंगे ये अपने धर्म की ठेकेदारी ? अब इन्हें ये भी समझना जरूरी है । 

आज जरूरत है इन तथाकथितों को समझने की सबसे पहले धर्म के वास्तविक अर्थ को फिर उपदेश दें यूँ ही नहीं बेबुनियाद बात कर लोगों की आस्था से खेलें। 


हमें चाहिए कि हम धर्म को कुछ कठमुल्लाओं के हाथ का यंत्र नहीं बनने दें और अपने विवेक को जागृत रखें वरना सभी जगह सिर्फ़ धर्म को लेकर युद्ध होते रहे हैं और उसमें नुकसान सिर्फ़ आम जनता का ही हमेशा हुआ है । 

बुधवार, 18 जून 2014

कभी गुजरना शून्य से


ना शब्द ना भाव
ना रूप ना रंग
संज्ञाशून्य हो जाना
अपलक शून्य मे ताकना
और अन्तस मे
शून्य की परिधि से बाहर
निकलने की खोज का जारी रहना
किसी खगोलीय घटना की तरह
कभी गुजरना शून्य से
तब जानोगे शून्यबोध की व्यथा ……एक अन्तर्कथा निर्विकार निर्लेप सी

सोमवार, 2 जून 2014

असार में फिर सार कहाँ ढूंढते हो ?

आकंठ डूबने के बाद 
सूख गयी नदी 
वाष्पित हो गया 
उसका सारा जल 
बची रही जलती रेत 
रेत पर छितरायी 
आड़ी तिरछी  धारियाँ 
जो चिन्हित करती रहीं 
कभी बहा करती थी 
एक मदमाती लहराती बलखाती 
उच्छ्रंखल नदी इस प्रदेश में 

जहाँ एक उम्र के बाद
बचती नहीं निशानियाँ भी 
सूख जाता है सकोरे का सारा पानी 
और उग आती हैं कँटीली झाड़ियाँ 
वहाँ 
सिर्फ निशानदेहियों पर ही 
उगाई जाती हैं नयी सभ्यताएं 
बिना जाने कारण और निवारण 
नदियों के गुप्त हो जाने का 


उसी तरह 
जीवन से एक उम्र के बाद 
क्या प्रेम के अणु भी इसी तरह विध्वंसित होते हैं 
और होते रहते हैं निशानदेही पर पुनः पुनः निर्माण 
बिना जाने कारण और निवारण 
सृष्टि चक्र का चलते जाना अनवरत 
किस बात का सूचक है 

क्या सिर्फ इतना भर कि 
'प्रेम'  महज एक जीवनयापन का दिशासूचक भर है 
बंधु 
असार (संसार) में फिर सार कहाँ ढूंढते हो ?




सोमवार, 26 मई 2014

आत्मसंतुष्टि या विचलन ?

मैं रहूँ न रहूँ क्या फ़र्क पडता है 
दुनिया न रुकी है न रुकेगी 
फिर पहचान चिन्हित करने भर से क्या होगा 
क्या मिलेगी मुझे आत्मसंतुष्टि 
क्या देख पाऊँगी मैं अक्स आईने में 
सुना है 
मिट जाने के बाद आईने टूट जाया करते हैं 
फिर किस प्रतिबिंब की तलाश में भटकन जारी है 
फिर पगडंडियाँ जो छुट गयीं पीछे 
कितनी ही पुरजोर कोशिश करूँ 
क्या संभव होगा पहचानना उन्हें 
क्या संभव होगा पहचानना अपने ही  पदचिन्हों को 
स्वप्न में जो दिखे तो कम से कम याद तो रहता है 
मगर 
अस्तित्व के मिटने पर कैसे संभव है 
खंगालना चेतना के अंश को 
इसलिए लगता है 
आत्मसंतुष्टि महज कोरा लफ्ज़ भर है 
जिस के हर ओर छोर पर भी 
एक व्याकुलता का विचलन जारी रहता है 
जब तक न प्रमाणिकता मिले स्वयं के होने की 
तब तक  
अवधारणाएं बदलती ही रहती हैं और जारी रहता है  ………… विचलन !

फिर आत्मसंतुष्टि हो या विचलन 
अमूर्त अवधारणायें हैं दोनों 
और मैं हूँ मूर्त 
फिर कैसे संभव है 
अमूर्त और मूर्त का सम्बन्ध 
ब्रह्म और जीव जैसे 
जब तक न खोज को व्यापक दिशा मिले 
और निराकार साकार हो जाए 
तब तक 
पहचान चिन्हित करना महज दिशाभ्रम भर ही तो है !

वक्त के तराजू में 
खुद को तोलती मैं 
पलड़ों का अनुपात देख रही हूँ 

शायद मिल जाए कहीं कोई संतुलन का काँटा भृकुटि के मध्य में .......... 

शनिवार, 17 मई 2014

कहो तो ओ कृष्ण



तुमने प्रेम भी दिया और ज्ञान भी 
फिर भी रही मैं मूढ 
क्या वैराग्य का सम्पुट अधूरा रहा 
या मेरे समर्पण में कमी रही 
जो रहे अब तक दूर ......कहो तो ओ कृष्ण 

तेरी सोन मछरिया तडप रही है 
भटक रही है 
न कर निज चरणन से दूर

प्रेमरस के प्यासों का इतना इम्तिहान भी अब ठीक नहीं मोह्न !

मंगलवार, 6 मई 2014

आस्था के जंगल में……एक कशमकश उत्तर की चाहत में भटकती है!!!


आस्था के जंगल में उगा 
विश्वास का वटवृक्ष 
जब धराशायी होता है 
जाने कितने पंछी 
बेघर हो जाते हैं 
जाने कितने घोंसले टूट जाते हैं 
जाने कितनी मर्यादाएं भँग हो जाती हैं 
छितरा जाता है पत्ता पत्ता 
और बिखर जाता है जंगल के कोने कोने में 
कभी न जुड़ने के लिये 
फिर कभी न शाख पर लगने के लिये 

विश्वास के टूटते ही 
धूमिल हो जाती हैं 
सभी संभावनाएं भविष्य की 
और आस्था बन कर रह जाती है 
महज ढकोसला 
जहाँ चढ़ते थे देवता पर 
फूल दीप और नैवैद्य 
वहीँ अब खुद की अंतश्चेतना 
धिक्कारती है खुद को 
झूठ और सच के पलड़े 
लगते हैं महज 
आस्था का बलात्कार करने के उपकरण 

 धर्मभीरु मानव मन
नहीं जान पाता सत्य के 
कंटीले जंगलों का पता 
जहाँ लहूलुहान हुये बिना 
पहुंचना सम्भव नहीं 
और दूसरी तरफ़ 
झूठ करता है अपनी 
दूसरी परंपरा का आह्वान 
तो सहज सुलभ हो जाती है आस्था 
मानव मन का कोना 
'चमत्कार को नमस्कार '
करने में विश्वास करने वाला 
चढ़ जाता है आस्था की वेदी पर बलि 
मगर नहीं कर पाता भेद 
नहीं कर पाता पड़ताल 
कैसे दीवार के उस तरफ़ 
कंक्रीट बिछी है 
और उसकी आस्था ठगों के 
हाथों की कठपुतली बनी है 
वो तो बस महज एक वाक्य को 
मान लेता है ब्रह्मवाक्य 
क्योंकि ग्रंथों पुराणों मे वर्णित है 
इसलिए धर्मभीरुता का लाभ उठा 
हो जाता है शोषित कुछ ठगो की 
जो बार बार यही समझाते हैं 
यही बतलाते हैं 
गुरु से बढ़कर कोई नही 
दीक्षा गुरु सिर्फ़ एक ही है होता 

प्रश्न यहीं है खड़ा होता 
आखिर वो कहाँ जाये 
किससे  कहे अपने मन की व्यथा 
जब दीक्षा गुरु ही 
विश्वास के वृक्ष पर 
अपनी हवस की कुल्हाड़ी से वार करे 
अपनी कामनाओं की तलवार से प्रहार करे 
पैसा पद और लालच के लिये 
अपने अधिकारों का दुरूपयोग करे 
तब कहाँ और किससे कोई शिकायत करे 
कैसे उसे गुरु स्वीकार करे 
जिसने उसकी आस्था के वृक्ष को 
तहस नहस किया 
कैसे उसके लिये मन में पहले सा 
सम्मान रख प्रभु सुमिरन किया करे 

क्या सम्भव है उसे गुरु स्वीकारना 
क्या सम्भव है पुराणों की इस वाणी को मानना 
कि दीक्षा गुरु तो सिर्फ़ एक ही हुआ करता है 
जो कई कई गुरु किया करते हैं 
घोर नरक मे पड़ा करते हैं 
मगर कही नहीं वर्णित किया गया 
यदि गुरु ने जघन्य कर्म किया 
तो कैसे उसके द्वारा दिये मन्त्र में 
शक्ति हो सकती है 
जो खुद ही गलत राह का राही हो 
उसकी बात मे कहाँ दम हो सकता है 

जिसकी आस्था एक बार खंडित हो गयी हो 
कैसे उसकी नये सिरे से जुड़ सकती है 
कैसे किसी पर फिर विश्वास कर 
एक और आस्था के वटवृक्ष को 
उगाया जा सकता है 
गर कोशिश कर किसी पर 
विश्वास कर नये सिरे से कोई जुड़ता है 
तो पुराणों मे वर्णित प्रश्न उठ खड़ा होता है 
'एक ही दीक्षा गुरु होता है '
ऐसे में 
साधक तो भ्रमित होता है 
कहाँ जाये 
किससे मिले सही उत्तर 

प्रश्न दस्तक देता प्रहार कर रहा है 
क्या पुराण में जो पढ़ा सुना 
उसे माने या 
जो आँख से देख रहा है 
और जिसे उसकी अंतरात्मा 
नहीं स्वीकारती 
उस पर चले 
ये कैसा धर्म  के नाम पर 
होता पाखण्ड है 
जिसने मानवता को किया हतप्रभ है 

सुना है 
धर्म तो सत्य का मार्ग दिखलाता है 
फिर ये कैसा मार्ग है 
जहाँ आस्था और विश्वास से परे 
मानवता ही शोषित होती है 
और उस पर चलने वाले को 
धर्मविरुद्ध घोषित करती है 

सोच का विषय बन गया है 
चिंतन मनन फिर करना होगा 
धर्म की परिभाषाओं को फिर गुनना होगा 
वरना 
अनादिकाल से चली आ रही 
संस्कृति से हाथ धोना होगा 


झूठ सच 
धर्म आस्था विश्वास 
गुरु शिष्य संबंध 
महज आडम्बर न बन जाये 
वो वक्त आने से पहले 
विश्लेषण करना होगा 
और धर्म का पुनः अवलोकन करना होगा 
उसमे वर्णित संस्कारों को 
पुनः व्यख्यातित करना होगा 


तर्क और कसौटियों की गुणवत्ता पर 
खरे उतरे जाने के बाद 
फिर शायद एक बार फिर आस्था का वृक्ष अपनी जड़ें जमा सके 
और मेरे देश की संस्कृति और संस्कार बच सकें 

एक कशमकश उत्तर की चाहत में भटकती है ………

शुक्रवार, 2 मई 2014

आवाज़ दे कहाँ है ..........




मैं तो भयी रे बावरिया
बनी रे जोगनिया
श्याम तेरे नाम की
श्याम तेरे नाम की
आवाज़ दे कहाँ है
दीवानी तेरी यहाँ है ...........

गली गली ढूँढूँ

अलख जगाऊँ
तेरे नाम पर
मिट मिट जाऊँ
मैं हो के बावरिया
आवाज़ दे कहाँ है
दीवानी तेरी यहाँ है ...........

आँगन बुहारूँ 

या चूल्हा जलाऊँ
नित नित तेरा
दर्शन पाऊँ
मैं तो बन के दिवानिया
आवाज़ दे कहाँ है
दीवानी तेरी यहाँ है ...........

एक आस ही

जिला रही है
ये संदेसा पहुँचा रही है
तेरे चरणों से
लिपट लिपट जाऊँ
मैं बन के धूल के कणिया
आवाज़ दे कहाँ है
दीवानी तेरी यहाँ है ...........


(अपने चरण कमल दरस दीवानी का 
बिहारी जी यहीं से नमन करो स्वीकार )

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

अब कौन रंग रांचू रे…




मनमोहक रूप नैनों में समाया
देख तेरे लिए मैंने जग को बिसराया
अब तू भी अपना बना ले मुझे
देख तेरे लिए मैंने खुद को भुलाया 


मै तो हो गयी श्याम की दीवानी अब कौन रंग रांचू रे……



हाय मोहन ! तुम ऐसे ही बस जाओ ना नैनन मे 

मै बावरी तुम्हें निहारूँ नित नित मन कुंजन मे


देखूं छवि चहुँ ओर तिहारी मै मन वृन्दावन मे 

हाय श्याम!क्यों मिल नही जाते बृज गलियन मे


 दृग चातक भये राह तकत श्याम 

अब बसो मेरे पलकन की ओटन मे


मै मीरा सी नाचूँ दीवानी भीज श्याम रंगन मे 


तुम्हरे प्रेम की बनूँ मै मूरत तिहारे मन दर्पण मे 


मै तो हो गयी श्याम की दीवानी अब कौन रंग रांचू रे……

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ …………"दर्द "हो मोहन !


5) 

यहाँ तक कि
 
मीरा के प्रेम की तो
सभी दुहाई देते हैं
मगर उसे भी
ना तु्मने बख्शा
मीरा तुम्हारा नाम ले
गली गली भटकती रही
मगर चैन की सांस ना ले सकी
कभी विष का प्याला
तो कभी सांप पिटारा
उसे भेंट मिला
तो कभी देश निकाला
कहो तो मीरा का
कौन सा क्षण था जो
सुखकर रहा
मगर वो प्रेम दीवानी
प्रेम की घूँट भर चुकी थी
अपना सर्वस्व तुम्हें
मान बैठी थी
इसलिये उफ़ नहीं करती थी
मगर थी तो आखिर
इंसान ही ना
आखिर कब तक
लड सकती थी
क्योंकि
तुमने तो ठान रखी थी
इसे चैन से नही रहने दूँगा
और तब तक उसे दर्द देते रहे
जब तक कि  उसकी
दर्द सहने की शक्ति ना चुक गयी
तब कही जाकर
अन्त मे मीरा की कारुणिक पुकार पर
और खुद को प्रमाणित करने को
स्वंय को सिद्ध करने को
तुमने उसे खुद मे समाहित किया
ताकि तुम्हारे नाम का
गुणगान होता रहे
मगर सोचना ज़रा
ये कैसा प्रेम का बन्धन हुआ
जिसमे सिर्फ़ इकतरफ़ा प्रेम
ही नि्भाया गया
मगर तुम पर ना कोई
असर हुआ
तुम तो आखिरी पडाव पर
ही आते हो
और अपने अस्तित्व को बचाते हो
वरना तो उम्र भर
तुम दर्द और पीडा की
अभिव्यक्ति बन
नसों मे रम जाते हो


6)
 

ये तो तुमने भक्तों का हाल किया
 
और जो अभक्त थे
जिन्होने ना कभी
तुम्हारा नाम लिया
जिन्होने ना कभी
तुम्हारा गुणगान किया
सदा द्वेष मे ही जीवन जीया
कोई भी ना पुण्य कर्म किया
उन्हें एक पल में
दर्शन दे देते हो
और जीवनमुक्त कर देते हो
ये तो भेदभाव ही हुआ
जिसने तुम्हें चाहा
उसने दर्द पाया
और जिसने नही चाहा
वो ही मुक्त हुआ
फिर चाहे वो अजामिल हो
या गज और ग्राह हो

अजामिल को देखो
 
तुमने कैसे तारा
जो सारी उम्र
पाप कर्म मे लिप्त रहा
जिसने हर बुरा कर्म किया
सिर्फ़ एक नाम उसने लिया
वो भी अपने बेटे को पुकारा
तो भी तुमने उसे तार दिया
क्या तुम नही जानते थे
कि इसने अपने पुत्र को
है पुकारा
मगर खुद को  सिद्ध करने के लिये ही
तुमने उसका उद्धार किया
और जिसे युगों बीत गये पुकारते
उसका ना उद्धार किया
और दूसरी तरफ़ देखो
उस गज को
जो वासनाओं मे लिप्त
महाकामी हाथी था
उसे भी तुमने
उसकी एक पुकार पर
ग्राह से छुडाया था
और दोनो का उद्धार किया था
तो इससे कहो तो मोहन
क्या सिद्ध होता है
जो तु्म्हें चाहता है
वो ही दर्द पाता है
और जो नहीं चाहता
वो भवसागर पार
यूँ ही हो जाता है
और ज़िन्दगी भी
खुशी से गुजारता है
ये कैसा तुम्हारा खेल हुआ
जो भक्त की पीडा से आरम्भ हुआ
और पीडा पर ही अन्त हुआ

अब इससे बढकर 

और क्या प्रमाण दूँ तुम्हें
बस चाहने वालों के प्रेम से ही
अलंकृत हो तुम
आज मैं भी तुम्हें अलंकृत करती हूँ
यूँ तो दुनिया ने तुम्हे
बहुत नाम दिये
मगर एक नाम
मैं भी देती हूँ
जो किसी ने नहीं दिया होगा
ओ चाहने वालों को
पीडा देने वाले
निष्ठुर, निर्मोही
तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ …………"दर्द "हो मोहन !

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

सखि री ,बस नैनों से नीर बहे


मन के पनघट सूखे ही रहे 
सखि री ,बस नैनों से नीर बहे 

न कोई अपना न कोई पराया 
जग का सारा फ़ेरा लगाया 
सूनी अटरिया न कोई पी पी कहे 
सखि री ,बस नैनों से नीर बहे 

इक बंजारे का भेस बनाया 
जाने कौन सा चूल्हा जलाया 
खा खा टुकडा कबहूँ न पेट भरे  
सखि री ,बस नैनों से नीर बहे 

जोगन का जब जोग लिया 
तन मन उस रंग रंग लिया 
इक  बैरागन भयी बावरी 
प्रीत अटरिया न श्याम बंसी बजे 
सखि री ,बस नैनों से नीर बहे

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ …"दर्द "हो मोहन …4


और तो और 

देखो जरा
भरत की
निस्वार्थ प्रीती
कैसे प्रेम का स्वरूप
उन्होने पाया था
जिसे देख प्रेम भी
लजाया था
जिसने तुम्हारे लिये
सारा राज -पाठ
ठुकराया था
यहाँ तक कि
अपनी जननी को भी
ना अपनाया था
और उसे भी उसके
माँ होने के अधिकार के सुख 
से वंचित किया
कैसा वो वियोगी बना
जिसके आगे
प्रेम का स्वरूप भी
छोटा पडा
नवधा भक्ति का
पूर्ण रूप जिसमे समाया
उसके प्रेम का भी
ना तुमने सत्कार किया
तुम तो फिर भी
अपनी पत्नी और भाई के साथ
वन मे रहे
और कन्द मूल फ़ल
खाते रहे
ॠषि मुनियों से मिलते रहे
मगर भरत ने तो
एकान्तवास किया
पत्नी परिवार का त्याग किया
मुनि वेश धारण कर
14 वर्ष जमीन मे
गड्ढा खोदकर
उसमे शयन किया
क्योंकि पृथ्वी पर तो
तुम सोते थे
और सेवक का धर्म
यही कहता है
स्वामी से नीचे
उठना बैठना और सोना
बस वो ही तो
उन्होने व्यवहार किया
खाने मे भी
उन्होने घोडों की लीद में
जो जौ के दाने मिलते थे
उन्हें धोकर सुखाकर
फिर उनका भोजन बनाते थे
और उसका सेवन करते थे
स्वामीभक्ति का ना
ऐसा कोई उदाहरण होगा
ऐसी प्रेम की जीवन्त मूर्ति
ना किसी ने देखी होगी
पर तुम्हें ना कोई असर हुआ
तुम तो अपने कर्तव्य पथ पर चलते रहे
भावनाओं प्रेम का ना
कोई मोल रहा
विरह जन्य दुख से
भरत का ह्रदय कातर हुआ
ज़िन्दगी भर सिर्फ़ और सिर्फ़
दुख ही दुख सहा
ये भी कोई प्रेम परीक्षा
लेने का ढंग हुआ
मगर तुम तो इसी मे
आनन्दित होते हो
फिर भाई हो या पत्नी
निष्कलंक सीता पर भी तो
तुमने आक्षेप लगा त्याग दिया
जिसने उम्र भर
पत्नीधर्म निभाया
दुख सुख मे साथ दिया
जो चाहती तो
महलों मे रह सुख
भोग सकती थी
क्योंकि वनवास तो
सिर्फ़ तुम्हें मिला था
मगर अपने प्रेम के कारण
उसने तुम्हारा साथ दिया
वन वन तुम्हारे साथ भटकी
यहाँ तक कि
अपह्रत भी हो गयी
फिर भी ना शिकायत की
वहाँ भी तुम्हारे नाम की रटना
वो लगाती रही
तब भी तुमने उसकी
अग्निपरीक्षा ली
चलो ये ली सो ली
मगर उसके बाद
किस दोष के कारण
तुमने उसका त्याग किया
महज स्वंय को ही
सिद्ध करने के लिये ना
स्वंय को ही प्रमाणित करने
के लिये ही ना
तुमने सीता का त्याग किया
ताकि तुम्हारा वैभव बना रहे
फिर चाहे तुम्हारे कर्म से
आने वाली कितनी ही
सीताओं की दुर्दशा बढे
मगर तुम पर ना कभी असर हुआ 

आज घर घर में सीता दुत्कारी जाती है 
तुम्हारी बिछायी नागफ़नियों पर 
लहूलुहान की जाती है
तुमने तो सिर्फ़
अपना मनचाहा ही किया
फिर चाहे उससे
कोई कितना ही पीडित हुआ
कैंसर के दर्द से भी भयंकर
तुमने दर्द का टीका दिया
जिसे भी हर प्रेमी ने
खुशी खुशी संजो लिया
भला बताओ तो
कैसे कह सकते हो तुम
कि तुम सुखस्वरूप हो
जबकि तुम तो सदा
परपीडा में ही आनन्दित हुए

कहो मोहन अब कैसे कहूँ तुम्हें आनन्दघन
मेरे लिये तो 
तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ दर्द हो मोहन 

क्रमश : ……………

बुधवार, 19 मार्च 2014

ए री अब कैसे धरूँ मैं धीर



कर दिया खुद को खोखला 
अब जो चाहे भर दो पोर पोर में 
बन गयी हूँ तुम्हारी बाँसुरी श्याम 
अब चाहे  जैसे बजा लेना 
बस इक बार अधरों से लगा लेना 
मेरी कोरी चुनरिया 
प्रेम रंग में रंगा देना 
श्याम चरणों से अपने लगा लेना
ऐसी रंगूँ श्याम रंग में 
बस मुझे दर्पण अपना बना लेना 
अधरों पे श्याम सजा लेना 


ए री 
अब जिया ना धरत है धीर 
मेरे ह्रदय में उठत है पीर 
कित खोजूँ मैं ध्याम धन को
अब नैनन से बहत है नीर 


ए री
कोई खबर ले आओ 
कोई श्याम से मिलाओ 
कोई मुझको जिलाओ 
मेरा जिया हुआ है अधीर 


ए री 
अब कैसे धरूँ मैं धीर 

किस बैरन संग छुपे हैं सांवरिया 
लीन्ही ना कोई मोरी खबरिया 
मोरा जिया धरत नाहीं धीर 

ए री 
अब कैसे धरूँ मैं धीर 


जब से भाँवर डाली श्याम संग 
तब से रंग गयी उनके ही रंग 
कह तो सखी अब कैसे बदलूँ चीर 


ए री 
अब कैसे धरूँ मैं धीर 

रस की धार बहती जाये 
तन मन मेरा रंगती जाये 
अब दिन रैन जिया में उठती है पीर 

ए री 
अब कैसे धरूँ मैं धीर 

सोमवार, 10 मार्च 2014

तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ …"दर्द "हो मोहन ......3



3) 
चलो ये छोडो
माँ यशोदा का
क्या दोष हुआ
तुमसे उसने
निस्वार्थ प्रेम किया
अपना वात्सल्य
तुम पर लुटा दिया
पहले तो
बुढापे मे तुमने जन्म लिया
और फिर भी
ना उसके प्रेम का
तुम पर असर हुआ
जो तुम्हारे लिये ही जीती थी
तुम्हारे लिये ही सांस लेती थी
जिसका दिन
तुम्हारी खिलखिलाहट
से शुरु होता था
और तु्म्हारे सोने पर
रात्रि होती थी
उस माँ के भी
 निस्वार्थ प्रेम की
ना तुमने कद्र की
तुम्हें पल नहीं लगा
उसे छोडकर जाने में
कैसी विरह व्यथा में
वो माँ रही
कैसी उसने पीर सही
कि आँखों से अश्रु
इतना बहे कि
एक पतनाला ही
बहने लगा
जब उद्धव ने बृज में
नन्द के घर का पता पूछा
तो बताने वाले ने
यही कहा
ये जो पतनाला बह रहा है
इसके किनारे किनारे चले जाओ
और जहाँ पर इसका सिरा मिले
वो ही नन्द बाबा का घर
इसका उदगम स्थल है
कभी सोचा तुमने
उस माँ के विरह की व्यथा को
जो उम्र भर
पालने में सिर्फ़
तुम्हारा ही अक्स देखती रही
उधो को भी चुप
जिसने करा दिया
चुप हो जाओ उधो
देखो मेरा लाल सोता है
कैसे तुम्हारे प्रेम में
बावरी हो गयी
जिसकी भूख नींद प्यास
सब तुम्हारे साथ ही गयी
फिर भी ना तुमने
पीडा देने मे कोई
कसर छोडी
जो एक बार गये
तो ना मुडकर देखा
उस माँ के प्रेम की
कितनी कठिन
परीक्षा तुमने ली
कि मिले भी तो तब
जब 100 साल बाद
कुम्भ का मेला हुआ
और ये मिलन भी
कोई मिलन हुआ
ये तो सिर्फ़ तुमने
स्वंय को सिद्ध करने के लिये
और अपने वचन को
प्रमाणित करने के लिये
भरम पैदा किया
क्योंकि वचन दिया था तुमने
"मैं मिलने जरूर आऊँगा"
बस हर जगह
सिर्फ़ स्वंय को प्रमाणित
करने के लिये
तुमने दरस दिया
वरना तो किसी की पीडा
या दर्द से ना
तुम्हारा ह्रदय
व्यथित हुआ
जब एक करुणामूर्ति
माँ के लिये
ना तु्म्हारा ह्र्दय पसीजा
तो कैसे तुम्हें सुख स्वरूप कहूँ
क्योंकि
तुम तो परपीडा मे ही
आनन्दित होते हो
और उसे दर्द ही दर्द देते हो 


क्रमश: ………

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ ……"दर्द "हो मोहन ……2



1) 
अब देखो
गोपियों ने कितना
तुम्हें चाहा
अपना माना
अपने आप को
मिटाया
पर तब भी
अन्त में तुमने
उन्हें क्या दिया
सिवाय और सिवाय
दर्द के
विरह के
यहाँ तक कि
आँख के आँसू भी
उनके सूख गये
सोचना ज़रा
द्रव्यता का हर
स्रोत सूख गया जिनका
उन्हें भी नहीं
तुमने बख्शा
यहाँ तक कि
यदि धडकनों के धडकने से भी
जिनका ध्यान च्युत
हो जाता था
तो वो उन्हें भी
रोकने को उद्यत हो जाती थीं
ऐसी परम स्नेहमयी
गोपियों की पीडा को भी
ना तुमने उचित मान दिया
एक बार गये तो
मुड्कर भी नहीं देखा
प्रेम का प्रतिकार तो
तुम क्या देते
कभी उन प्रेम प्यासी
मूर्तियों को ना
अपना दरस दिया
बस जोगन बना
वन वन भटकने को छोड दिया
ना मिलने आये
ना उन्हें बुलाया
फिर भी ना उन्होने
तुम्हें चाहना छोडा
प्रेम शब्द भी
जिनके आगे छोटा पडा
ऐसे प्रेम को भी तुमने
सिर्फ़ दर्द ही दर्द दिया
बस विरह की ज्वाला में
ही दग्ध किया
इससे बढकर और क्या
तुम्हारा दर्दीला स्वरूप होगा


2)
 
चलो ये छोडो
दूसरा चरित्र पकडो
सुदामा तुम्हारा परम मित्र
प्रशान्त आत्मा
जिसमें कोई चाहना नहीं
ईश्वर से भी कोई शिकायत नहीं
निसदिन अपने धर्म पर
अडिग रहने वाला
तुम्हारा भजन करने वाला
तुमसे भी कुछ ना चाहने वाला
भला ऐसा मित्र भी कोई होगा
क्योंकि
इस दुनिया में तो
स्वार्थ के वशीभूत ही सब
एक दूजे से प्रीती करते हैं
मगर तुमने भी
उसकी परीक्षा लेने में
कोई कसर ना छोडी
लोग तो एक दिन
व्रत ना रख पाते हैं
मगर उसके तो
कितने ही दिन
फ़ाकों पर गुजर जाते हैं
गरीबी की इससे
बढकर और क्या
इंतिहाँ होगी
कि एक साडी मे
उसकी बीवी भरी सर्दी में
गुजारा करती है
मगर दोनो दम्पत्ति
ना उफ़ करते हैं
फिर भी ना शिकायत करता है
फिर भी ना तुम्हें कुछ कहता है
ना तुमसे कोई आस रखता है
यहाँ तक कि
पत्नी , बच्चों की
भूख की पीडा से भी
ना विचलित होता है
ऐसे अनन्य भक्त
मित्र की कारुणिक दशा से
कैसे तुम अन्जान रहे
ज़िन्दगी भर उसे
दुख पीडा के
गहरे सागर में
डुबाते उतराते रहे
अगर उसने अपना
मित्र धर्म निभाया
और ना तुम्हें पुकारा
तो क्या तुम्हारा फ़र्ज़
नही बनता था
मगर तुम तो
यही कहते रहे
बस एक बार वो
मुझे पुकार ले
एक बार वो मेरे
पास आ जाये
तब मैं उसे
सर्वस्व दे दूँगा
अरे ये कौन सा
मोहन तुम्हारा
मित्र धर्म हुआ
क्योंकि
जब बुढापा उसका आया
तब कहीं जाकर
स्वंय के अस्तित्व को
बचाने के लिये
स्वंय को मित्र सिद्ध करने के लिये
तुमने कृपा का उदाहरण पेश किया
जब स्वंय को सिद्ध करने की
बात जहाँ आयी
वहीं तुमने स्वंय को प्रकट किया
क्योंकि लोग ये ना कह दें
हरि मित्र दुखी
ये कलंक कैसे सहूँगा
बस सिर्फ़ अपने पर कलंक ना लगे
स्वंय को बचाने हेतु
तुमने ये सब उपक्रम किया
वरना तो ता-उम्र
दुख, दर्द, विपत्ति देना
ही तुम्हारा परम कर्म हुआ
और इसी मे तुम्हें आनन्द मिला
कहो फिर कैसे ना कहूँ
तुम हो दुखस्वरूप

क्रमश: …………

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

तुम सिर्फ़ और सिर्फ़ "दर्द "हो मोहन !………भाग 1


दर्द का 
रूप नही 
रंग नहीं 
आकार नहीं 
फिर भी भासता है 
अपना अहसास कराता है 
और इस तरह कराता है 
कि सहने वाला छटपटा जाता है 
बस वो ही तो हो तुम भी 
न रूप 
न रंग 
न आकार 
मगर फिर भी हो
और होकर न होना 
और ना होकर होने के बीच 
जो खेल खेलते हो 
उससे जो सहने वाला 
छटपटाता है 
उसे जानते हो 
मगर फिर भी 
सामने नही आते
तुम्हें चाहने वाले 
तुम्हें मानने वाले
जब तुम्हारी चाहत में
खुद को मिटा देते हैं
बस तुझे ही अपना
सब कुछ मान बैठते हैं
तब भी कितने निष्ठुर हो ना तुम
जब चाहे उसकी
अग्निपरीक्षा ले लेते हो
अरे ! जिसने 
सिर्फ़ तुम्हें चाहा
तुम्हें माना
अपना आप मिटा दिया
उसकी भी अग्निपरीक्षा लेना
कहाँ का न्याय हुआ
नहीं! तुम्हें कैसे 
सुख स्वरूप कह दूँ 
तुम तो पीडा हो
ऐसी पीडा जिसमें
सिर्फ़ पीडित ही
मजबूर होता है
वैसे देखा जाये
तुम अपने चाहने वालों को
और देते ही क्या हो
सिवाय दर्द के
छटपटाहट  के 
पता नहीं कैसे
कह देते हैं तुम्हें …सुख स्वरूप
मैं तो तुम्हें अब 
यही कहूँगी
तुम हो दर्दस्वरूप
एक तरफ़ तो तुम
जो तुम्हें नही मानता 
नास्तिक हो
उसके सामने बिना कारण ही
स्वंय को 
प्रकट कर देते हो
बिना उसके पुकारे
बिना उसके चाहे
जैसे बस तुम्हारा सब कुछ
वो ही हो
फिर चाहे वो 
तुम्हारी कितनी ही 
अवहेलना करे
तो दूसरी तरफ़ 
जो रात दिन
तुम्हें पुकारा करते हैं
तुम ही जिनकी
आस हो, विश्वास हो
जीवन आधार हो
जिन्हें तुम्हें पुकारते पुकारते
एक जन्म नहीं
युग युगान्तर बीत गये
उनकी पुकार का
तुम पर ना असर होता है
तुम तो स्वंय में 
निमग्न रहते हो
और 
विपत्तियों को आदेश देते हो
बस इसके घर से 
ना डेरा हटाना
इसने मुझे चाहा है ना
तो इसका फ़ल यही देता हूँ
इसका सब कुछ हर लेता हूँ
दुख पीडा का 
सारा साम्राज्य 
इसके अर्पित करता हूँ
यही तुम्हारा परम
उद्देश्य बन जाता है
मगर उसके सामने 
ना आते हो
उसकी चाह ना पूरी करते हो
और मन ही मन मुस्काते हो
और सिद्ध करने के लिये बता दूँ
उदाहरण सहित 
फिर चाहे परम मित्र
सुदामा हो या गोपियाँ
भरत हों या माँ यशोदा
गज हो या ग्राह
अजामिल हो या मीरा
एक एक कर 
सबका आख्यान करती हूँ
और इसे प्रमाणित करती हूँ
कि तुम हो दर्दस्वरूप मोहन!

क्रमश: ……………

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

अपरिचित हूँ मैं .........

ना जाने कैसे कह देते हैं
हाँ , जानते हैं हम 
खुद  को या फ़लाने को
मगर किसे जानते हैं
ये भेद ना जान पाते हैं
कौन है वो ?
शरीर का लबादा ओढ़े 
आत्मा या ये शरीर
ये रूप
ये चेहरा -मोहरा
कौन है वो
जिसे हम जानते हैं
जो एक पहचान  बनता है
क्या शरीर ?
यदि शरीर पहचान है तो
फिर आत्मा की क्या जरूरत
मगर शरीर निष्क्रिय है तब तक
जब तक ना आत्मा का संचार हो
एक चेतन रूप ना विराजमान हो
तो शरीर तो ना पहचान हुआ 
तो क्या हम
आत्मा को जानते हैं
वो होती है पहचान 
ये प्रश्न खड़ा हो जाता है
अर्थात शरीर का तो 
अस्तित्व ही मिट जाता है
मगर सुना है
आत्मा का तो 
ना कोई स्वरुप होता है
आत्मा नित्य है
शाश्वत है
उसका ना कोई रूप है
ना रंग
फिर क्या है वो
एक हवा का झोंका 
जो होकर भी नहीं होता
फिर कैसे कह दें
हाँ जानते हैं हम
खुद को या फ़लाने को
क्योंकि ना वो आत्मा है
ना वो शरीर है
फिर क्या है शाश्वत सत्य
और क्या है अनश्वर
दृष्टिदोष तो नहीं
कैसे पृथक करें 
और किसे स्थापित करें
द्वन्द खड़ा हो जाता है
शरीर और आत्मा का 
भेद ना मिटा पाता है
कोई पहचान ना मिल पाती है
ना शरीर को
ना आत्मा को
दोनों ही आभासी हो जाते हैं
शरीर नश्वर 
आत्मा अनश्वर 
फिर कैसे पहचान बने
विपरीत ध्रुवों का एकीकरण 
संभव ना हो पाता है 
फिर कैसे कोई कह सकता है
फलाना राम है या सीता
फलाना मोहन है या गीता
ये नाम की गंगोत्री में उलझा 
पहचान ना बन पाता है
ना शरीर है अपना ना आत्मा
दोनों हैं सिर्फ आभासी विभूतियाँ
मगर सत्य तो एक ही
कायम रहता है
सिर्फ पहचान देने को
एक नाम भर बन जाने को
आत्मा ने शरीर का
आवरण ओढा होता है
पर वास्तविकता तो 
हमेशा यही रहती है
कोई ना किसी को जान पाता है
खुद को भी ना पहचान पाता है
फिर दूसरे को हम जानते हैं
स्वयं को पहचानते हैं 
ये प्रश्न ही निरर्थक हो जाता है
ये तो मात्र दृष्टिभ्रम लगता है
जब तक ना स्वयं का बोध होता है 
तो बताओ ,
कैसे परिचय दूं अपना
कौन हूँ
क्या हूँ
ज्ञात नहीं
अज्ञात को जाने की 
प्रक्रिया में हूँ तत्पर
परिचय की ड्योढ़ी पर
दरवाज़ा खटखटाते हुए
अपरिचित हूँ मैं ..........