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मंगलवार, 23 मई 2017

संवाद के आखिरी पल

संवाद के आखिरी पलों में
नहीं झरते पत्ते टहनियों से
नहीं करती घडी टिक टिक
नहीं उगते क्यारियों में फूल

रुक जाता है वक्त
सहमकर
कसमसाकर
कि
नाज़ुक मोड़ों पर ही अक्सर
ठहर जाती है कश्ती

कोई गिरह खुले न खुले
कोई जिरह आकार ले न ले
बेमानी है
कि
हंस ने तो उड़ना ही अकेला है

ये तमाशे का वक्त नहीं
ये माफीनामे की कवायद नहीं
ये धीमे से गुजरने की प्रक्रिया है
जहाँ
साँस रोके खडी होती है हवा भी
कि
हिलने से न हो जाए कहीं तपस्या भंग

संवाद के आखिरी पल
किसी कृष्ण का मानो प्रलय में पत्ते पर अंगूठा चूसते हुए मुस्कुराना भर ही तो है

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

खजुराहो की तलाश में

जाने किस खजुराहो की तलाश में
भटकती है मन की मीन
कि एक घूँट की प्यास से लडती है प्रतिदिन

आओ कि घूँघट उठा दो
जलवा दिखा दो
अभिसार को फागुन भी है और वसंत भी

द्वैत से अद्वैत के सफ़र में
प्रीत की रागिनी हो तो
ओ नीलकमल !
मन मीरा और तन राधा हो जाता है

अलौकिकता मिलन में भी और जुदाई में भी
कहो कि कौन से घट से भरोगे घूँट ....साँवरे पिया !!!

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

मैं बंजारन

 
 
मैं बंजारन
आधी रात पुकारूँ
पी कहाँ पी कहाँ

वो छुपे नयनन की कोरन पे
वो लुके पलकों की चिलमन में
वो रुके अधरों की थिरकन पे

अब साँझ सवेरे भूल गयी हूँ
इक पथिक सी भटक गयी हूँ
कोई मीरा कोई राधा पुकारे
पर मैं तो बावरी हो गयी हूँ

प्रेम की पायल
प्रीत के घुँघरू
मुझ बंजारन के बने सहाई
अब तो आ जाओ मोरे कन्हाई
कि
इश्क मुकम्मल हो जाए
बंजारन को उसका पी मिल जाए 
 
जानते हो न
ये आधी रात की आधी प्यास है .........गोविन्द