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रविवार, 6 अगस्त 2017

मित्रता किसने किससे निभाई

 
मित्रता किसने किससे निभाई
ये बात कहाँ दुनिया जान पाई
निर्धन होते हुए भी
वो तो प्रेम का नाता निभाता रहा
अपनी गरीबी को ही बादशाहत मानता रहा
उधर
सम्पन्न होते हुए भी
अपने अहम के बोझ तले
तुमने ही आने/अपनाने में देर लगाई
 
तुम्हारे लिए क्या दूर था और क्या पास
मगर ये सच है
नहीं आई थी तुम्हें कभी उसकी याद
वर्ना न करते इतने वर्षों तक इंतज़ार 
 
इकतरफा मित्रता थी ये
जिसका मोल तो सिर्फ वो ही जानता था
तभी न कभी उसने गुहार लगाई
तुम्हारी ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी जताई
फिर कैसे कहूँ
जानते हो तुम मित्रता की सच्ची परिभाषा ......कान्हा 
 
डिसक्लेमर :
ये पोस्ट पूर्णतया कॉपीराइट प्रोटेक्टेड है, ये किसी भी अन्य लेख या बौद्धिक संम्पति की नकल नहीं है।
इस पोस्ट या इसका कोई भी भाग बिना लेखक की लिखित अनुमति के शेयर, नकल, चित्र रूप या इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रयोग करने का अधिकार किसी को नहीं है, अगर ऐसा किया जाता है निर्धारित क़ानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
©वन्दना गुप्ता vandana gupta  
 

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (07-08-2017) को "निश्छल पावन प्यार" (चर्चा अंक 2698 पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
बाई-बहन के पावन प्रेम के प्रतीक रक्षाबन्धन की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा!!