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सोमवार, 14 अगस्त 2017

घरों में मातम और जन्मोत्सव?

पूछना तो नहीं चाहिए
लेकिन पूछ रही हूँ
क्या जरूरी है हर युग में
तुम्हारे जन्म से पहले
नन्हों का संहार ...कंसों द्वारा
कहो तो ओ कृष्ण
जबकि मनाते हैं हम तुम्हारा जन्म प्रतीक स्वरुप

सोचती हूँ
यदि सच में तुम्हारा जन्म हो फिर से
तो जाने कितना बड़ा संहार हो
सिहर उठती है आत्मा
क्या तुम नहीं सिहरते
क्या तुम्हारा दिल नहीं दुखता
क्या जरूरी है हर बार ये आक्षेप अपने सिर पर लेना

कभी तो विचार लो इस पर भी
कि
सृष्टि में तुम्हारे आगमन पर संहार के बीज जो बोये हैं
वो कैसे खिलखिला रहे हैं
मगर जाने कितने घरों में मातम पसरा है
क्या जरूरी है चली आ रही परंपरा का ही वाहक बनना?

जन्मोत्सव कैसे स्वीकार सकते हो तुम बच्चों की चिता पर
अबूझ रहस्य है
गर संभव हो तो सुलझा देना जरा
सुना है
तुम करुणा के सागर हो
द्रवित हो उठते हो किसी की जरा सी पीड़ा पर
तो इस बार क्या हुआ?

इस बार करो कुछ ऐसा
कि
सार्थक हो जाए तुम्हारा जन्मोत्सव
तुम्हारी भृकुटी के विलास से भला क्या संभव नहीं ?
 
डिसक्लेमर :
ये पोस्ट पूर्णतया कॉपीराइट प्रोटेक्टेड है.इस पोस्ट या इसका कोई भी भाग बिना लेखक की लिखित अनुमति के शेयर, नकल, चित्र रूप या इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रयोग करने का अधिकार किसी को नहीं है, अगर ऐसा किया जाता है निर्धारित क़ानूनों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
©वन्दना गुप्ता vandana gupta  
 

रविवार, 6 अगस्त 2017

मित्रता किसने किससे निभाई

 
मित्रता किसने किससे निभाई
ये बात कहाँ दुनिया जान पाई
निर्धन होते हुए भी
वो तो प्रेम का नाता निभाता रहा
अपनी गरीबी को ही बादशाहत मानता रहा
उधर
सम्पन्न होते हुए भी
अपने अहम के बोझ तले
तुमने ही आने/अपनाने में देर लगाई
 
तुम्हारे लिए क्या दूर था और क्या पास
मगर ये सच है
नहीं आई थी तुम्हें कभी उसकी याद
वर्ना न करते इतने वर्षों तक इंतज़ार 
 
इकतरफा मित्रता थी ये
जिसका मोल तो सिर्फ वो ही जानता था
तभी न कभी उसने गुहार लगाई
तुम्हारी ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी जताई
फिर कैसे कहूँ
जानते हो तुम मित्रता की सच्ची परिभाषा ......कान्हा 
 
डिसक्लेमर :
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©वन्दना गुप्ता vandana gupta  
 

बुधवार, 2 अगस्त 2017

अब तुम्हारी बारी है ...

तुम थे
तो जहान में सबसे धनवान थी मैं
अब तुम नहीं
तुम्हारी याद नहीं
तुम्हारा ख्याल तक नहीं
तो मुझ सा कंगाल भी कोई नहीं

वो मोहब्बत की इन्तेहा थी
ये तेरे वजूद को नकारने की इन्तेहा है
जानते हो न
इसका कारण भी तुम ही हो
फिर निवारण की गली मैं अकेली कैसे जाऊँ?

मुझे जो निभाना था , निभा चुकी
सच और झूठ के पलड़ों में
तुम्हारे होने और न होने के पलड़ों में
अब तुम्हारी बारी है ... यदि हो तो ?

आस्था विश्वास और अविश्वास के मध्य
महीन सी लकीर
तुम्हारा कथ्य तोल रही है

जानते हो न
बदले बेशक जाएँ
टूटे तार फिर जुड़ा नहीं करते ...