पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

सोमवार, 16 मार्च 2020

पहन लूँ मुंदरी तेरे नाम की


उलझनों में उलझी इक डोर हूँ मैं या तुम
नही जानती
मगर जिस राह पर चली 
वहीँ गयी छली
अब किस ओर करूँ प्रयाण
जो मुझे मिले मेरा प्रमाण

अखरता है अक्सर अक्स
सिमटा सा , बेढब सा
बायस नहीं अब कोई
जो पहन लूँ मुंदरी तेरे नाम की
और हो जाऊँ प्रेम दीवानी
कि
फायदे का सौदा करना
तुम्हारी फितरत ठहरी
और तुम्हें चाहने वाले रहे
अक्सर घाटे में

यहाँ कसौटी है
तुम्हारे होने और न होने की
तुम्हारे मिलने और न मिलने की
रु-ब-रु
कि तत्काल हो जाए पूर्णाहूति

प्रश्न हैं तो उत्तर भी जरूर होंगे
कहीं न कहीं
तुम महज ख्याल हो या हकीकत
कि
इसी कशमकश में अक्सर
गुनगुनाती हूँ मैं

तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं
तेरे बिना ज़िन्दगी भी लेकिन ज़िन्दगी तो नहीं...माधव

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

हाय ! ये कैसा बसंत आया री

हाय ! ये कैसा बसंत आया री
जब सब सुमन मन के कुम्हला गए
रंग सारे बेरंग हो गए

किसी एक रूप पर जो थिरकती थी
उस पाँव की झाँझर टूट गयी
जिस आस पर उम्र गुजरती थी
वो आस भी अब तो टूट गयी
अब किस द्वार पर टेकूं माथा
किस सजन से करूँ आशा
जब मन की बाँसुरी ही रूठ गयी

हाय ! ये कैसा बसंत आया री
जब मन की कोयलिया ही न कुहुकी
सरसों की सुवास न ह्रदय महकी
एक पिया बसंती के जाने से
मेरी सुबह साँझ न चहकी

कह सखि
किस आस की बदरिया पर कहूँ -
आया बसंत, उमग उमग हुलसो री
मन मयूर झूमो री
जब श्रृंगार सारे रूठ गए
उनसे मिलन के शहर सारे छूट गए

हाय ! ये कैसा बसंत आया री
अब के बरस न मेरे मन भाया री