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शनिवार, 30 सितंबर 2017

अपने पक्ष में

राम
जाने क्यों हम तुम्हें मानव ही न मान पाए
महामानव भी नहीं
ईश्वरत्व से कम पर कोई समझौता कर ही न पाए
शायद आसान है हमारे लिए यही
सबसे उत्तम और सुलभ साधन

वर्ना यदि स्वीकारा जाता
तुम्हारा मानव रूप
तो कैसे संभव था
अपने स्वार्थ की रोटी का सेंका जाना ?

आसान है हमारे लिए ईश्वर बनाना
क्योंकि
ईश्वर होते हैं या नहीं, कौन जान पाया
हाँ, ईश्वर बनाए जरूर जाते हैं
क्योंकि तब आसान होता है
न केवल पूजना बल्कि पुजवाना भी
हथियार उठाना भी
बबाल मचाना भी
धर्म की वेदी पर नरसंहार शगल जो ठहरा मानव मन का

आस्था अनास्था प्रतीकात्मक धरोहर सी
ढोयी जाने को विवश हैं
धर्म की ठेकेदारी के लिए जरूरी था तुम्हारा ईश्वरीय रूप
वर्ना देखने वाले देख भी सकते थे
और समझ भी सकते थे
मानव सुलभ कमजोरियों से घिरे कितना असहाय थे तुम भी

यहाँ बलि देकर ही पूजे जाने का रिवाज़ है
फिर वो पशु की हो या इंसान की
वाल्मीकि के राम से तुलसी के राम तक का सफर
अपनी विभीषिका के साथ चरम पर है
यहाँ ईश्वर स्वीकारा जाना आसान है बनिस्पत मानव स्वीकारे जाने के

अब मारना ही होगा हर साल तुम्हें सबका मनचाहा रावण
कि युग परिवर्तन का दौर है ये
तुम्हारे होने न होने
तुम्हारे माने जाने न माने जाने से परे
हम जानते हैं भुनाना अपने पक्ष में हर चीज को
फिर वो ईश्वर हो या मानव


3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (02-010-2017) को
"अनुबन्धों का प्यार" (चर्चा अंक 2745)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Praveen Pandey ने कहा…

आदर्शों की पराकाष्ठा है, राम का जीवन चरित्र, मानव की पहुँच के बाहर।

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर