पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लॉग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जायेये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

कृष्ण लीला .........भाग 28





दधि मथती मैया का
मोहन ने हाथ पकड लिया
मैया की गोद मे बैठ गये
दुग्धपान को मचल गये
मैया प्रेम से दुग्धपान कराने लगी
और मन्द मन्द मुस्कुराने लगी
इतने मे प्रभु ने विचार किया
ये मैया सच मे मुझे बुलाती थी
या यूँ ही आवाज़ लगाती थी
ये सोच प्रभु ने लीला करी
अंगीठी पर रखे दूध मे उबाल आया
जिसे देख यशोदा कान्हा को
गोद से उतार
दूध बचाने चली
जिसे देख कान्हा के
होंठ फ़डकने लगे
मैया को मुझसे ज्यादा
दूध है प्यारा
इसलिये गुस्से मे आ
मथानी और दधि की मटकी
फ़ोड दीन्ही
ग्वाल बालो को बुला
दूसरे कमरे मे जा
माखन लुटाने लगे
ये दूध उबलने और गिरने का भी
इक कारण था
पदमगन्धा गाय का दूध
उबल रहा था
दूध ये सोच रहा था
मेरा जीवन व्यर्थ ही रहा
जो श्याम सुन्दर् ने मुझे ना चखा
ये तो मैया का
दुग्धपान किया करते हैं
फिर भी ना तृप्त होते हैं
ऐसे मे मेरी ओर क्यों निहारेंगे
ऐसे जीवन से मरण अच्छा
श्यामसुन्दर की आँख के आगे
आग मे कूद गया
दयार्द्र मां के नेत्र वहाँ पहुँच गए
और मोहन को अतृप्त छोड
दूध के बलिदान को देख
माँ बचाने पहुँच गयी
मैया का अद्भुत स्नेह देख
दूध शर्म से गढ गया
मेरी रक्षा को मैया ने
मोहन को अतृप्त किया
धिक्कार है मेरे जीवन पर
सोच दूध उफ़नना बंद कर 
अपने स्थान पर बैठ गया।




इधर मोहन ने सोचा
माँ ने गोद मे नही बिठाया
तो मै किसी खल की गोद  मे
जा बैठूँगा
मानो यही सोच कान्हा
ऊखल पर बैठ गये
और सब ग्वाल बालो को बुला
माखन खिलाने लगे
जब मैया ने आकर देखा
मटकी टूटी पडी थी
दधि मटठे की कीच मची थी
यशोदा समझ गयी थी
मन ही मन हँ स रही थीं
अभी तो छोटा सा है
पर कितना गुस्सा आया है
मैया सब जान गयी थी
पर बिगड ना जाये
इसलिये हाथ मे छडी पकड ली थी
और कान्हा को ढूँढने चली थी
अन्दर जाकर देखा
ऊखल पर खडे हुये हैं
बंदरो और ग्वालो को माखन खिला रहे हैं
जैसे ही पीछे जाकर खडी हुयी मैया
कान्हा ने देख लिया
डर कर ओखली से कूद पडे
और डर कर भागने लगे
भीत भगवान की झांकी
अपूर्व बनी है
मानो ऐश्वर्य को कान्हा ने
ब्रजक्षेत्र से बाहर फ़ेंक दिया है
मातृ सौंदर्य पर न्यौछावर किया है
कोई असुर होता तो
सुदर्शन चक्र का स्मरण करते
पर मैया की प्रेम मयी छडी
का निवारण ना कर पाते हैं
माधुर्य शक्ति ने यहाँ
अपना कब्ज़ा ज़माया है
आखिर जिसे प्यार करने का हक है
तो उसे मारने का हक भी तो बनता है
यहाँ ऐश्वर्य शक्ति माधुर्य शक्ति के आगे नतमस्तक हुई
डर के मारे दौडे जाते हैं
मैया भी थक थक जाती है
पर पीछे पीछे दौडी जाती है
आज ब्रज की गलियों मे
आनन्दघन का डर कर भागना
सबको मोहित कर गया
देवता भी विस्मित हो रहे हैं
क्या सचमुच ये परब्रह्म परमेश्वर हैं जो
पिटने के डर से दौडे जाते हैं
और यशोदा के भाग्य की सराहना करते हैं
कौन सा इस ग्वालिन ने पुण्य किया
जिससे साक्षात ब्रह्म भी डर गया


क्रमशः ..................


शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

कृष्ण लीला ……भाग 27





इक दिन मैया
दधि मन्थन करने लगी
तभी आकर मोहन ने
मथानी पकड ली
मोहन मथानी पकड
मचलने लगे
जिन्हे देख देवताओं, वासुकि सर्प
मन्दराचल, शंकर जी के ह्रदय
कांपने लगे
वे मन ही मन प्रार्थना
ये करने लगे
प्रभो! मथानी मत पकडो
कहीं प्रलय ना हो जाये
और सृष्टि की मर्यादा मिट जाये
शंकर जी सोचने लगे
इस बार मंथन मे निकले विष का
कैसे पान करूँगा
अब किस कंठ मे धारण करूँगा
कष्ट के कारण समुद्र संकुचित हो गया
पर सूर्य को आनन्द हुआ
अब प्रलय होगी तो
मेरा भ्रमण बन्द होगा
और लक्ष्मी जी भी
ये सोच सोच मुस्काने लगीं
प्रभु से मेरा पुनर्विवाह होगा
प्रभु की इस लीला ने
किसी को सुखी तो
किसी को दुखी किया है
और प्रभु के मथानी पकडते ही
कैसा अद्भुत दृश्य बना है
पर मैया अति आनन्दित हुई है
जब दधि के छींटों को
प्रभु के मुखकमल पर देखा है
बार बार मैया से
माखन मांग रहे हैं
और मैया कह रही है
कान्हा पहले नृत्य तो करके दिखलाओ
और मोहन माखन के लालच मे
ठुमक ठुमक कर नाच रहे हैं
मैया के ह्रदय को हुलसा रहे हैं
जिसे देख सृष्टि भी थम गयी है
देवी देवता अति हर्षित हुये हैं
बाल लीलाओ से कान्हा ने
सबके मनो को मोहा है

मैया के मन में ख्याल आया
सबने मोहन को खुद है माखन खिलाया
आज उसके लिए मैं खुद 
माखन निकालूंगी 
अपने प्राण प्यारे को भोग लगूंगी 
ये सोच 
इक दिन मैया ब्रह्म मुहूर्त मे
दधि मन्थन करने बैठ गयी
दधि मन्थन करते समय
कान्हा का स्मरण करने लगी
हाथो से दधि को मथती है
और वाणी से गाती जाती है
सेवा तीन तरह की होती है
कायिक, वाचिक और मानसिक
आज मैया तीनो तरह की
सेवा कर रही है
प्रभु प्रेम मे झूम रही है
कमर मे रेशमी लहंगा पहन रखा है
ताकि कोई अपवित्रता ना मोहन को लग जाये
रेशमी वस्त्र पवित्रता का
द्योतक माना जाता है
अर्थात आलस्य , प्रमाद, असावधानी
ना चित्त मे आने पाये
सेवाकर्म मे पूरी तत्परता रहे
माता का ह्रदय स्नेह रस से भीग रहा है
कानो के कुण्ड्ल और हाथो के कंगन
झंकार कर धन्य हो रहे हैं
क्योंकि आज मैया के द्वारा
प्रभु के लिये दधि मन्थन हो रहा है
और हम भी प्रभु सेवा मे लगे हैं
हाथ वो ही धन्य कहाते है
जो प्रभु सेवा मे तत्पर रहते हैं
कान वो ही धन्य कहाते हैं
जो प्रभु के दिव्य गान सुनते हैं
वाणी वो ही पवित्र कहाती है
जो प्रभु की लीलाओ का
गुणगान किया करती है
दधिमन्थन करते करते
मैया के मुख पर
स्वेदकण छलक रहे हैं
और मालती के पुष्प
जूडे से नीचे गिर रहे हैं
मैया अपना श्रृंगार और शरीर
भूल चुकी है
यही प्रभु सेवा की
अति उत्तम रीति है
जिसमे शरीर की सुध भी
बिसरा जाती है
जब प्रेम चरम पर पहुंच गया
तब श्यामसुन्दर ने मैया की तरफ़
रुख किया..........



क्रमशः ..................

रविवार, 4 दिसंबर 2011

कृष्ण लीला………भाग 26






यही सवाल परीक्षित जी ने
शुकदेव जी से किया
तब शुकदेव जी ने
इक कथा का वर्णन किया


पिछले जनम मे इन दोनो ने
बहुत कठिन तप था किया
जब इनका विवाह हुआ
प्रथम रात्रि में 
तब इन्होने एक प्रण लिया
गृह्स्थ धर्म तभी निभायेंगे
जब तप करके प्रभु को मनायेंगे
पति ने पत्नि के प्रण का मान रखा
और वन मे जा घोर तप किया
जो भी खाने को मिलता
उससे पहले अतिथि को संतुष्ट करते
बाद मे स्वंय भोजन करते
इक दिन पति लकडी काटने गये हुये थे
और घनघोर बारिश हो रही थी
तभी इक ब्राह्मण ब्राह्मणी का जोडा आया
भोजन करने की इच्छा को बतलाया
सुन वो घबरा गयी
मगर उनका आतिथ्य सत्कार किया
सोचने लगी पतिदेव को ना जाने कितना समय लगे
कहीं अतिथि भूखे ना रह जायें
ये सोच उन्हे बिठा स्वंय
महाजन की दुकान पर गयी
जाकर उससे अनुरोध किया
भैया थोडा अन्न उधार देना
जैसे ही पतिदेव आयेंगे
तुम्हारे पैसे चुकायेंगे
मेरे यहाँ अतिथि आये हैं
इंतज़ार मे बैठे हैं
इतना सुन महाजन ने सिर ऊपर किया
और जैसे ही उसे देखा
एक प्रस्ताव रख दिया
महाजन की नीयत डोल रही थी
उधर युवती मे तप की शक्ति समायी थी
तप की शक्ति से रूप लावण्य दमक रहा था
बिन श्रृंगार के भी चमक रहा था
दिव्य रूप को देख
महाजन का दिल भटक रहा था
एक काम करो तो
तुम्हे ना कुछ देना होगा
युवती ने पूछा कहो क्या करना होगा
इतना सुन महाजन ने
उसके वक्षस्थल की तरफ़ इशारा किया
मुझे ये चाहिये ……कह दिया
सुन वो देवी सन्न रह गयी
बहुत मन्नत चिरौरी करने लगी
पर जब ना महाजन माना 
बोली मैने तुम्हे भैया कहा है
कम से कम उसकी तो लाज रखी होती
पर जब तूने कीमत मांग ही ली है
तो तुझे जरूर मिलेगी
पर जैसे तू चाहता है
वैसे ना मिल पायेगी
इतना कह उसने
चाकू से दोनो स्तनो को काट दिया
और महाजन के मूँह पर फ़ेंक दिया
अब सामान ले दौडी जाती थी
ब्राह्मण देवता मै आ रही हूँ …कहती जाती थी
वक्षस्थल से लहू के पतनाले बहे जाते थे
पर उस तरफ़ ना उसका ध्यान गया था
उसे एक ही चिन्ता सताती थी
अतिथि कहीं भूखे ना चले जायें
बार- बार बेहोश हुई जाती थी
होश मे आने पर एक ही बात दोहराती थी
ब्राह्मण देवता मै आ रही हूँ ....
जैसे तैसे गिरती पडती
कुटिया पर ये कहती पहुंच गयी
जाना नही देवता मै आ गयी हूँ
कहते कहते बेहोश हुई
जैसे ही होश मे आयी
खुद को अजनबी की बाहो मे पाया
क्रोध से मुख तमतमा गया
कैसे अन्य पुरुष ने स्पर्श किया
मगर जैसे ही मुख देखा
सारा क्रोध काफ़ूर हुआ
वो तो शिव पार्वती नज़र आने लगे
इतने मे वो महाजन मे रूप मे छुपे
विष्णु भी आ गये
कहा तीनो ने तुम्हारे तप ने
हमे परीक्षा लेने पर विवश किया
पर तुम्हारे समर्पण के आगे हम हार गये
कहो क्या तुम चाहती हो
इतने मे उसके पतिदेव भी आ गये
सुन दोनो ने वरदान मांगा
परमेश्वर मे हमारी अनन्य प्रीती हो
दोनो को वरदान दे उन्होने कहा
देवि तुम्हारा बलिदान व्यर्थ नही जायेगा
जैसा तुमने किया ऐसा ना
कभी कोई कर पाया है
तुम्हारे प्रेम का कर्ज़ चुका नही सकता
इसलिये बालरूप मे आऊँगा
और तब दुग्धपान कर
कुछ कर्ज़ चुकाऊंगा
अब भोले भंडारी बोले
मैया मै भी तेरे दर पर
फिर से भिखारी बन कर आऊँगा
पार्वती ने कहा मैया मै भी
शक्ति के रूप मे तेरे गर्भ से जनम लूंगी
वो ही माया के रूप मे
पार्वती ने जन्म लिया था
इतना कह तीनो अन्तर्धान हुये
उसी वरदान के प्रताप से
आज यशोदानन्दन पृथ्वी पर आये हैं
अपने बाल रूप के मैया को दर्शन कराये हैं


कमशः .................

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

कृष्ण लीला .........भाग २५





मैया को बातों का भुलावा दिया 
मीठी मीठी बातों से उसका तो मन मोह लिया 
मगर कान्हा कब मानने वाले थे
थोड़ी देर बाद ही फिर 
घर से निकल पड़े
और इक गोपी के 
पीछे पीछे चल पड़े
उसका पल्लू खींचने लगे
गोपी से मनुहार करने लगे
ए गोपी थोडा सा माखन खिला दे ना
ए गोपी देख तेरे माखन में 
कितना स्वाद है
इतना तो माँ यशोदा के 
माखन में भी नहीं है
ए गोपी सुन ना 
कह - कह पीछे पड़ गए
गोपी मन ही मन मुस्काती है
कान्हा की मीठी बातों पर
रीझी जाती है
मगर ऊपर से नखरे दिखाती है
कान्हा मान जाओ
ना तो मैया से जाकर कह दूंगी
तुम हमें तंग करते हो
तुम्हारे यहाँ इतना माखन है
वो क्यूँ नहीं खाते हो 
तुम्हारे माखन में मुझे
दिव्य आनंद आता है
अच्छा जो तुम कहोगी
मैं कर दूंगा
बस एक बार माखन खिला दो ना
जब कान्हा ने ये कहा
तो गोपी ने कान्हा से 
गोबर के उपले उठाने को कहा
जितने उपले तुम उठाओगे
उतने ही माखन के लड्डू खिलाऊँगी
मुझे कैसे पता चलेगा 
तुम बेईमानी कर जाओगी
कान्हा बोल पड़े
सुन गोपी बोली
जितने उपले उठाओगे
उतनी बिंदियाँ तुम्हारे गाल पर
गोबर के लगाती जाउंगी
फिर उतने लड्डू माखन के तुम खा लेना
अब कान्हा छोटे- छोटे हाथों से
उपले उठते जाते हैं
गोपी उनके मुख पर 
गोबर की बिंदियाँ लगाये जाती है
यूँ गोपी ने कान्हा का सारा मुख
गोबर की बिंदियों से भर दिया
जिसे देख गोपी का मन अति हर्षित हुआ
सुख के सागर में डूब गयी
ये कैसी छवि बन गयी
आज तो कान्हा गज़ब के लगते हैं
कैसे श्यामल सूरत पर 
गोबर के बिंदु चमकते हैं
ज्यूँ ओस कण पुष्प पर मचल रहे हों
इस तरह सबको सुख पहुंचाते हैं
क्यूँकि सुख पहुँचाने के लिए ही तो
कान्हा पृथ्वी पर आये हैं
गोपियाँ इसी छवि को देखने को तो तरसती हैं
तभी रोज कान्हा का आवाहन करती हैं 




इक दिन इक गोपी
चारपाई पर सोयी थी
नन्दलाला ने उसकी चोटी
चारपायी से बांधी थी
और ग्वालबालो संग
आनन्द से माखन खाया था
बर्तनो को फ़ोड डाला
आवाज़ सुन गोपी जाग गयी
पर चारपायी से उठ ना पायी
लेटे लेटे शोर मचाया
दूजी गोपी ने पकड लिया
यशोदा निकट ले आई
माखनचोर की करतूत बताई
कैसे घर के बर्तन फ़ोडा करता है
राह चलती गोपियों के
सिर से पल्लू खींचा करता है
कभी दधि की मटकी फ़ोडा करता है
हम राह चल नही पाती हैं
तुम्हारे लाल ने बडा उधम मचाया है
गोपियो की बाते मैया को सच्ची लगने लगीं
तब कान्हा को यशोदा कहने लगी
तुम चोरी क्यो करते हो
ये गन्दा काम कहाँ से सीखा
अगर नही मानोगे तो
घर मे बांध बिठा दूंगी
रोज ऐसी प्यारी प्यारी लीलाये करते है
मोहन गोपियो का मन हरते हैं
जिसे देख देख सुर भी लरजते हैं
और एक ही बात कहते हैं
कौन सा ऐसा पुण्य कर्म किया
जिसका पार वेदो ने भी ना पाया है
वो ब्रह्म साक्षात धरती पर उतर आया है


यही सवाल परीक्षित जी ने
शुकदेव जी से किया
तब शुकदेव जी ने
इक कथा का वर्णन किया


क्रमशः .............