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बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

ऐसा आखिर कब तक ?

गतांक से आगे ..................

जैसे ही आकाश ने अपने घर में दीप्ति के बारे में बताया तो उसके माता- पिता बहुत खुश हुए। वो तो कब से इस दिन का इंतज़ार कर रहे थे इसलिए उसी दिन रिश्ता लेकर दीप्ति के घरवालों के पास गए मगर वहाँ जब पता चला कि दीप्ति छोटी जाति की है और आकाश राजपूत तो आकाश के माता -पिता उलटे पैर वापस आ गए । उन्हें अपने से छोटी जाति की लड़की से अपने बेटे का विवाह मंजूर ना था। आकाश ने लाख समझाया ,अपने प्यार की दुहाई दी मगर उसके माता -पिता अपनी बात से टस से मस ना हुये । उन्हें अपने समाज , अपनी बिरादरी सब से ऊपर लगती थी और अपनी इज्ज़त की खातिर उन्होंने आकाश का दिल तोडना उचित समझा क्यूँकि वो समझते थे कि प्यार- व्यार कुछ नही होता महज शारीरिक आकर्षण है जो दूसरी जगह शादी होने के बाद अपने आप खत्म हो जायेगा और वो ये सब कुछ भूल जायेगा। आकाश की सबसे बड़ी विडंबना यही थी कि वो अपने माता- पिता की इकलौती संतान था इसलिए उसका फ़र्ज़ भी बनता था कि कुछ भी ऐसा ना करे जिससे उनका दिल दुखे क्यूँकि उन्होंने उसे बहुत ही लाड -प्यार से पाला था तो क्या वो सिर्फ अपने स्वार्थ की खातिर अपने माता- पिता को दुखी कर दे और इस कारण उन्हें छोड़ भी नही सकता था और दीप्ति के बिना रह भी नही सकता था । उसने अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश की मगर नतीजा शून्य ही रहा और इसी जद्दोजहद में २ साल निकल गए । उधर दीप्ति भी बहुत दुखी थी मगर वो सिवाय इंतज़ार के कर भी क्या सकती थी. इधर जब २ साल निकल गए और कोई हल ना निकला समस्या का तब एक दिन आकाश के माता -पिता ने दीप्ति को बुलाया क्यूँकि उन्हें लगता था कि दीप्ति के कारण ही उनका बेटा शादी नही कर रहा है इसलिए यदि वो ही उसे कहेगी तभी आकाश शादी के लिए राजी होगा इसलिए उन्होंने दीप्ति पर अपने प्यार,त्याग और तपस्या की दुहाई देकर दबाब बनाया कि आकाश उनकी इकलौती संतान है और उसकी खुशियाँ देखने के लिए ही तो वो जिंदा हैं इसलिए अगर दीप्ति कहे तो आकाश मान जायेगा और दूसरी जगह शादी कर लेगा । बहुत गहरा धक्का लगा था दीप्ति को उस दिन। एकदम आसमान से धरती पर आ गयी थी आंखों के आगे अँधेरा छा गया था मगर किसी तरह खुद को सँभाल कर और अपने आँसुओं को आँखों में ही दफ़न करके वो वहाँ से वापस आई। सारी रात रोती रही क्यूँकि उसे एक विश्वास था कि शायद कुछ दिन में आकाश के माँ -बाप का दिल पिघल जायेगा अपने बेटे की हालत देखकर तो मान जायेंगे मगर नतीजा कुछ नही निकला बल्कि उसे ही बलि की वेदी पर बिठा दिया गया कितना स्वार्थमय है ये संसार । किसी के अरमानो की चिता जलाकर हाथ सेंकना ही आता है शायद सबको मगर फिर आकाश के बारे में सोचकर , उसकी जिम्मेदारियों , कर्तव्यों के बारे में सोचकर उसने आकाश को समझाने के फैसला लिया क्यूँकि उसने सोचा यदि वो खुश नही रह सकती तो कम से कम किसी को तो ख़ुशी के कुछ पल ही दे दे कम से कम कुछ और ज़िंदगियाँ बर्बाद होने से तो बच जाएँगी। अपने प्यार की दुहाई देकर किसी तरह दीप्ति ने आकाश को मना लिया और दोनों ने एक -दूसरे से एक अच्छे दोस्त की तरह विदा ली। दीप्ति को सुकून था कि चलो उसे आकाश तो नही मिला मगर उसका प्रेम तो हमेशा उसका ही रहेगा और वो ही उसके जीवन का सबसे अनमोल तोहफा होगा तथा आकाश और उसके माता- पिता एक खुशहाल जीवन तो जी सकेंगे। चाहे उसकी मोहब्बत को मुकाम नही मिला मगर सुकून तो मिला। इस प्रकार दीप्ति ने खुद को तसल्ली देकर कभी विवाह ना करने का फैसला कर लिया और अपना ट्रान्सफर उस शहर से दूसरे शहर में करवा लिया और उस दिन के बाद आज आकाश को इस हालत में अपने शहर में भटकते पाया तो उसका दिल दहल गया । उसे समझ ही ना आया कि ऐसा क्या हो गया आकाश के साथ जो उसकी ये हालत हो गयी थी क्या इसी दिन के लिए उसने अपनी मोहब्बत कुर्बान की थी ।अब उसे सुबह का इंतज़ार था जब आकाश उठे तो उससे जाने उसके अतीत के बारे में ।
अगले दिन सुबह जब आकाश उठा तो उसने अपने आप को एक अजनबी घर में बिस्तर पर लेटा पाया तो हडबडाकर उठ बैठा। उसे समझ नही आ रहा था कि वो कहाँ है तभी दीप्ति हाथ में चाय की ट्रे लेकर कमरे में दाखिल हुई और जैसे ही आकाश ने दीप्ति को देखा तो उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही ना हुआ । उसे लगा कि वो कोई सपना देख रहा है मगर जब दीप्ति ने आकाश का हाल पूछा तो उसे यकीन आया कि जो सामने है वो भी हकीकत ही है । थोड़ी देर के लिए दोनों के बीच ख़ामोशी पसर गयी। मगर इस बार दीप्ति ने ख़ामोशी को तोडा और आकाश से उसके बारे में पूछा । उसका ये हाल कैसे हुआ सब जानना चाहती थी दीप्ति । सारी रात उसने इसी उधेड़बुन में काटी थी मगर जैसे ही दीप्ति ने ये प्रश्न किया आकाश तिलमिला उठा जैसे जलते हुए तवे पर उसका पाँव पड़ गया हो सारे जहान का दर्द उसके चेहरे पर उतर आया था । ना जाने कौन सी पीड़ा समेटे था कि दीप्ति के पूछने पर वो एकदम फूट -फूटकर रोने लगा । दीप्ति के लिए ये एक अप्रत्याशित घटना थी । वो चेहरा जिसे उसने हमेशा हँसता -खिलखिलाता, जीवन की उमंगों से भरपूर देखा था वो आज उसके आगे रो रहा था । दीप्ति से बर्दाश्त नही हो रहा था मगर क्या करती किस तरह उसे सांत्वना दे उसे समझ नही आ रहा था । जब आकाश रोने के बाद कुछ हल्का हुआ तो उसने बताना शुरू किया ---------------क्रमशः .........................


8 टिप्‍पणियां:

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

कहानी में और रवानगी बढती जा रही है और हर पैर और सटीक और दर्द भरी हो रही है मन तो येसा चाह रहा है की पूरी पढ़ कर ही उठूँ मगर अपना बस कहाँ वो तो आप की मर्जी पर है बीच बीच में कई लायने यथार्त पे चोट करती है
बल्कि उसे ही बलि की वेदी पर बिठा दिया,,
गया कितना स्वार्थमय है ये संसार ।
किसी के अरमानो की चिता जलाकर हाथ
सेंकना ही आता है
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

कहानी अपनी दिशा में बिल्कुल सही चल रही है!
बहुत बढ़िया!
अगली कड़ी की प्रतीक्षा है!

संगीता पुरी ने कहा…

अभी दोनो कडियां पढी .. बहुत अच्‍छा लिखा है आपने .. यथार्थ का ही चित्रण है .. पांच वर्षों में आकाश के साथ क्‍या बीती .. जानने की इच्‍छा बलवती होती जा रही है !!

परमजीत बाली ने कहा…

बढ़िया कहानी है...अगली क्ड़ी की प्रतीक्षा रहेगी।

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

bahut achi kahaani padhne ko mili.....agli ki prateeksha hai...

Udan Tashtari ने कहा…

बढ़िया प्रवाह है..आगे इन्तजार!!

महफूज़ अली ने कहा…

कहानी बहुत अच्छी लग रही रही है...उत्सुकता बनी हुई है..... अब फिर आगे जानने की उत्सुकता है....

sangeeta swarup ने कहा…

आपको कहानी लिखने में भी महारत हासिल है....दोनों कड़ियाँ आज पढ़ीं....और उत्सुकता बढ़ गयी है कि अब आगे क्या होगा?

बढ़िया कहानी