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गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

"मै" और" मेरा"

अहंकार के दो बच्चे
"मै" और" मेरा"
खूब फ़ले फ़ूले
अहंकार की चाशनी मे
बहुत मीठे लगे
वक्त के साथ
परवान चढते रहे
अहंकार के शिखर
तक पहुंच गये
और फिर लगी
इक ठेस
और धरातल भी
नसीब ना हुआ
"मै" तो पल मे
चकनाचूर हुआ
दर्प अहंकार का
नेस्तनाबूद हुआ
जब "मेरा" ने
उसे दुत्कार दिया
"मै" ने "मेरा" को
कुछ ऐसे पोषित किया
"मेरा" ने "मै" का
सब कुछ छीन लिया
अब ना "मै" है
ना "मेरा" है
जीवन मे आया
नया सवेरा है
छोड दिया "मै" ने
"मेरा" को और
ओढ ली चादर
हरि नाम की
तन राखा संसार मे
मन कर दिया अर्पण
कृपानिधान को

33 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

मेरा" ने "मै" का
सब कुछ छीन लिया
अब ना "मै" है
ना "मेरा" है,,,, bahut badhiyaa

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

अहंकार के दो बच्चे
"मै" और" मेरा"
खूब फ़ले फ़ूले
अहंकार की चाशनी मे
बहुत मीठे लगे...
--
बहुत सुन्दर!
सारा झगड़ा तो मैं और मेरा का ही है!

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बढ़िया बिम्ब है अहम् का.. सुन्दर कविता बन गई है..

Satish Saxena ने कहा…

आजकल लग रहा है आप अनूप जलोटा को अधिक सुन रही हैं ! शुभकामनायें !!

Rakesh Kumar ने कहा…

मेरा और तेरा ने ही महाभारत को जन्म दिया.
आपने अपनी सुन्दर प्रस्तुति द्वारा ज्ञान का संचार किया है .इसके लिए बहुत बहुत आभार आपका.
कृपया ,मेरे ब्लॉग पर आयें,नई पोस्ट जारी की है

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कितना कुछ छीन लेता है, मैं और मेरा।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मैं और मेरा से अब तेरा हो गया ...बहुत अच्छी प्रस्तुति

राज भाटिय़ा ने कहा…

अहंकार के दो बच्चे
"मै" और" मेरा"
खूब फ़ले फ़ूले
अहंकार की चाशनी मे
बहुत मीठे लगे
कविता मे बहुत सुंदर संदेश मिला, धन्यवाद

Sushil Bakliwal ने कहा…

ज्ञान के प्रकाश में आध्यात्मिकता की शुरुआत...

अजित गुप्ता का कोना ने कहा…

अहम से वयम तक की यात्रा ही सफलता का सूत्र है।

ZEAL ने कहा…

वंदना जी बहुत पसंद आई ये रचना।

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (23.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:-Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (23.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:-Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

sunder or mithi prastuti !

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

ओढ ली चादर
हरि नाम की
तन राखा संसार मे
मन कर दिया अर्पण
कृपानिधान को....

बहुत सुन्दर दार्शनिक कविता...
बहुत गहराई है भावों में...

kunwarji's ने कहा…

बहुत बढ़िया और सच्चा खेल दिखाया 'मै' और 'मेरा' का!यही तो जड़ बतायी गयी है..

कुँवर जी,

udaya veer singh ने कहा…

adhyatm ka dhyan ,shreshthhata ki pahchan . suner manohari rachana .badhayiyan ji .

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

"मै" और" मेरा" को सहज ढंग से व्याख्यायित किया है आपने अपनी इस कविता में....

हार्दिक बधाई !

Anupama Tripathi ने कहा…

"मै" ने "मेरा" को
कुछ ऐसे पोषित किया
"मेरा" ने "मै" का
सब कुछ छीन लिया

बहुत सुंदर लिखा है ...!!
सटीक ज्ञानवर्धक सुंदर अभिव्यक्ति .....!!

Anita ने कहा…

बहुत सुंदर भावों को पिरोये अनुभव से उपजी कविता !

दिगंबर नासवा ने कहा…

Sach hai ye baisaakhi raaste mein hi toot jaati hai ... bas hari maan hi saath rahta hai ..

धीरेन्द्र सिंह ने कहा…

दुनियादारी से दियानतदारी के बीच उलझा इंसान जब जीवन की गंभीरता को समझने लगता है तब मैं और मेरा से निकलना चाहता है. इसी भाव को बखूबी दर्शाती हुयी सुन्दर रचना.

Amrita Tanmay ने कहा…

बहुत पसंद आई ...मैं और मेरा का ही है सारा झगड़ा...शुभकामनायें

Unknown ने कहा…

अहंकार के दो बच्चे
"मै" और" मेरा"
खूब फ़ले फ़ूले
अहंकार की चाशनी मे
बहुत मीठे लगे...

क्या बात कही है वंदना जी...लोग व्यर्थ में इसे पाले रहते है...बहुत खूब

Vandana Ramasingh ने कहा…

मैं और मेरा छूटने के बाद ही इश्वर के निकट पहुंचा जा सकता है ...बहुत अच्छे विचार ..बधाई
और साथ ही आपकी टिप्पणियों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद जो समय समय पर ऊर्जा प्रदान करती हैं

Rahul Singh ने कहा…

मीरामय भाव.

M VERMA ने कहा…

सुन्दर बिम्बात्मक रचना

बेनामी ने कहा…

its really nice poem
hame dusaro k liye sochna chahiye hamesha apane liye nahi
superb poem
http://iamhereonlyforu.blogspot.com/

vinod ने कहा…

behad khoobsurat.....

Yashwant Mathur ने कहा…

कल 03/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Saras ने कहा…

मैं का दर्प इंसान को अँधा , बहरा, संवेदनशून्य बना देता है .....लेकिन जब वह चूर होता है .....तो मात्र इश्वर की शरण ही रह जाती है ....बहुत सुन्दर भाव !

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

मर्म अलौकिक समझा जाना। बिना अहं जग स्वर्ग समाना।।

सुंदर कविता....
सादर।

Unknown ने कहा…

'मैं' और 'मेरा' ... क्या बात ... !!