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मंगलवार, 20 सितंबर 2011

कृष्ण लीला …………भाग 14

भोलेनाथ को देख 
प्रभु ने रुदन बन्द किया
दर्शन पाकर भोलेनाथ
का जीवन सफ़ल हुआ 
लाला का रुदन बंद देख मैया 
तुरंत योगी के चरणों में झुक गयी
और कान्हा का सिर भी
योगी के चारों में झुका दिया
ये देख भोलेनाथ को दुःख हुआ
मेरे प्रभु मेरे चरणों में शीश झुकाते हैं
कैसे इससे उॠण हुआ जाये
कोई उपाय अब किया जाये
अभी जोगी सोच में था
तभी मैया बोल पड़ी
बाबा तुम तो अंतर्यामी हो
जब से लाला हुआ
रोज संकट आते हैं
जरा इसका भाग्य बांच देना
सुन योगी ने प्रभु के
कोमल हाथों को स्पर्श किया
और उस कोमलता के सागर में डूब गया
जिस ब्रह्म का पार समाधि में
भी नहीं पाता हूँ
आज उन्हें बाल रूप में पाया है
ये देख जोगी का ह्रदय भर आया है
फिर खुद को सावधान किया
और कहने लगे
मैया तेरा बालक साधारण नहीं
ये तो साक्षात् भगवान का अवतार है
तुम ना कोई चिंता करना
सब संकट मिट जायेंगे
माओं की जो सोच होती है
उसी अनुसार मैया बोली
बाबा ये बताओ मेरा लाला
कुछ पढ़ेगा लिखेगा या नहीं
और ये इतना काला है
कोई दुल्हन भी इसे
मिलेगी या नहीं
तब भोलेनाथ बोल उठे
मैया ये तो सभी
गुणों की  खान है
सारी विद्याओं में निपुण होगा
और तुम इसके विवाह की तो
बस पूछो ही नहीं
तुम एक की बात करती हो
इसके तो विवाह अनेक होंगे
सुन मैया बोली बाबा
क्यूँ ठिठोली करते हो
माना बूढी हूँ मगर तुम्हारी बातों में नहीं आउंगी
मैया क्या जाने ये त्रिकालदर्शी बैठे हैं
उसने तो इक साधारण बाबा जाना है
मगर भोलेनाथ बोल पड़े
विश्वास नहीं तो कोई बात नहीं
जब बड़ा होगा तब याद करना मेरी बातें
अब हमें जाना होगा
सुन मैया बोल पड़ी
बाबा बड़ी कृपा करी
लाला को चुप करा दिया
उसका भाग्य भी बता दिया
अब ये बताओ
फिर तो ना ये ऐसे रोयेगा
इतना सुनते ही भोलेनाथ को
उपाय मिल गया
बोले मैया ये तो तभी होगा
जब तुम्हारे लाला के चरण
मेरे सिर पर होंगे
सुन मैया घबरा गयी
बोली ऐसा पाप नहीं कर सकती
साधू की चरण धूलि हम
गृहस्थों का जीवन धन है
उनके सिर पर लाला का
पाँव नहीं रख सकती
बात बिगडती देख भोलेनाथ बोल उठे
अरे नहीं री मैया , तू बड़ी भोली है
ये बात नहीं है
मेरे बालों में एक बूँटी है
जिसके छूने से लाला की
हर विपदा टल जाएगी
मगर मेरे बालों की
कैसे जटायें बनी हैं
वो उसमे फँसी पड़ी है
मैं निकाल ना पाऊंगा
इसलिए कहता हूँ मान जाओ
इससे तुम्हें पाप नहीं चढ़ेगा
ये तो औषधि का स्थान है
रोगी की बीमारी का यही निदान है

सुन मैया ने सोचा
होगी सो देखी जायेगी
मगर मेरा लाला तो 
फिर से ना रोवेगा
चाहे पाप कितना सिर पर
चढ जाये पर
लाला मेरा हँस जाये
उसके लिये तो 
हर पाप सिर पर लूँगी
बाबा दोबारा नही मिला
तो कहाँ फिर खोजूँगी
ये सोच
मैया ने बाबा के सिर पर
कान्हा के चरण छुआ दिए
प्रभु के चरणों का स्पर्श पा
भोलेनाथ प्रसन्न हुए
आनंदातिरेक से भर गए
आज्ञा ले वहाँ से फिर
भोलेनाथ ने प्रस्थान किया
प्रभु के दर्शन पा जीवन धन्य किया 





क्रमश:---------

15 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

कृष्ण भक्ति की यह शृंखला बहुत अच्छी चल रही है!
--
यह स्रजन भी बहुत अच्छा है!

रेखा ने कहा…

भावविह्वल करता हुआ सुन्दर प्रसंग .....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

नन्द जसोदा सुत पावनकारी।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

adbhut , rochak, manmohak

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर और रोचक प्रस्तुति..

Rakesh Kumar ने कहा…

योगी के चारों में झुका दिया

चारों मतलब चरणों ?

आखिर आपने मैय्या को हरवा ही दिया न.

मैं सोच रहा था कुछ रस्सा कसी होगी मैय्या
और भोले भंडारी के बीच.

पर मैय्या भोली भाली
चालाक रहे भोले भंडारी.

सुन्दर कथा आगे बढती हुई अच्छी लग रही है.

बहुत बहुत आभार,वंदना जी.

kshama ने कहा…

Vandana! Kitnee bhee taareef kee jaye kam hai!

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) ने कहा…

बड़ा ही रोचक प्रसंग.अगले भाग की प्रतीक्षा रहेगी.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रोचक कथा ... नयी नयी जानकारी मिल रही है ..

वाणी गीत ने कहा…

भावपूर्ण!

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

शोधपरक कृष्णलीला .. बहुत सुन्दर

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता वन्दना जी बधाई और शुभकामनाएं

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता वन्दना जी बधाई और शुभकामनाएं

mahendra srivastava ने कहा…

अच्छी रचना।
अच्छा प्रसंग
बेहतर प्रस्तुति

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

प्रबंध काव्य की धारा निर्मल और पूरे आवेग में है निर्बाधिता बनाये रखें