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शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

कृष्ण लीला………भाग 21







गोपियाँ रात रात भर
जाग जाग कर
प्रात: की बाट जोहा करतीं
जल्दी जल्दी दधि मथकर
माखन निकाल छींके पर
रखा करतीं
और कान्हा की बाट जोहतीं
कब कान्हा आयेगे
और उसका माखन खायेंगे
उसका जीवन सफ़ल बनायेंगे
और जब दिन बीता जाता था
तब गोपी का मन घबराता था
बार बार दरवाज़े पर जाती थी
श्याम से आस लगाती थी
कब आओगे मोहन प्यारे
इतनी देर कहाँ लगा दी
दासी का घर
पवित्र ना हो पाया है
कहीं यशोदा ने तो ना रोक लिया है
उनके नौ लाख गऊयें है
माखन की क्या कमी होगी
पर मेरे घर तो वो
कृपा करने को आते हैं
ये सोच खुद को तसल्ली देती है
कान्हा तो बृजवासियों को
सुख देने आये थे
गोपियों की लालसा पूर्ण
करने को ही
माखन चुराकर खाते थे
यह कोई चोरी नही थी
वास्तव मे ये तो गोपियों की
पूजा पद्धति थी जिसे
कान्हा बडे प्रेम से स्वीकारते थे
भगवान की इस दिव्य लीला को
कुछ लोग आदर्श विपरीत बताते हैं
पर नही जानते चोरी का
अर्थ होता है क्या
चोरी वो जो किसी की जानकारी
के बिना अन्जाने मे की जाये
मगर यहाँ तो गोपियो की
जानकारी मे , उनके देखते देखते ही
माखन का भोग लगाते हैं
फिर कहाँ ये चोरी हुई
दूसरी बात
चोरी दूसरे की वस्तु की की जाती है
मगर जब सारा संसार ही
कृष्ण का है तो कोई
अपनी चीज़ की चोरी कैसे करे
माखन चोरी तो प्रभु की
दिव्य लीला है
खुद को भक्तो की
प्रेम अधिकता मे
चोर कहाया है
और ऐसे प्रेम का बंधन निभाया है

16 टिप्‍पणियां:

ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…

माखन चोरी तो
प्रभु की दिव्य लीला है
खुद को भक्तो की
प्रेम अधिकता मे
चोर कहाया है और
ऐसे प्रेम का बंधन निभाया है

हृदयस्पर्शी भावाभिव्यक्ति...बहुत सुन्दर|

कुमार राधारमण ने कहा…

महंगाई का आलम यह है कि माखन कहीं कविता-कहानियों में ही सिमट कर न रह जाए!

kshama ने कहा…

Har baar kee tarah...kamaal kee rachana!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

माखन चोरी तो प्रभु की दिव्य लीला है खुद को भक्तो की प्रेम अधिकता मे चोर कहाया है और ऐसे प्रेम का बंधन निभाया है ...tabhi to sab kayal hain

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रेमी प्यारा,
कान्हा न्यारा।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मनोरम प्रस्तुति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

कल के चर्चा मंच पर, लिंको की है धूम।
अपने चिट्ठे के लिए, उपवन में लो घूम।।

आशा जोगळेकर ने कहा…

माखन चोर का नटखट पन भी गोपियों को बहुत भाता था और यशोदा से शिकायत भी झूट मूट की होती थी । आपके इस लेख ने गोकुल में पहुंचा दिया । सुंदर ।

मनोज कुमार ने कहा…

हम तो कृष्ण लीला को एक बार फिर से यहां पढ़ रहे हैं।

SAJAN.AAWARA ने कहा…

makhan chor nanadlala ki jai ho...
maja aa gaya..
jai hind jai bharat

चन्दन भारत ने कहा…

बहुत सही तरीके से भगवान की लीला को समझा दिया है|
सच है जब सब कुछ भगवान का ही है तो वो चोरी कहाँ कर रहे थे |
जय श्री कृष्णा!

चन्दन भारत ने कहा…

सच है जब सब कुछ भगवान का ही है तो चोरी कैसी?
जय जय श्री कृष्णा !!

Babli ने कहा…

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने जो प्रशंग्सनीय है! बधाई !
मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/

Vaanbhatt ने कहा…

सब प्रभु की लीला है...सबको खुश रखना आसन नहीं है...

dheerendra ने कहा…

सुंदर ह्रदयस्पर्शी कृष्ण लीला
मनोरम प्रस्तुति,मनभावन पोस्ट ...
मेरे नए पोस्ट में आपका स्वागत है ...

Rakesh Kumar ने कहा…

चोरी दूसरे की वस्तु की की जाती है मगर जब सारा संसार ही कृष्ण का है तो कोई अपनी चीज़ की चोरी कैसे करे माखन चोरी तो प्रभु की दिव्य लीला है खुद को भक्तो की प्रेम अधिकता मे चोर कहाया है और ऐसे प्रेम का बंधन निभाया है

वाह! चोरी की लीला तो अदभुत है.
तभी तो चोरी के जुल्म में कृष्ण
को आजीवन दिल में कैद कर लिया जाता है.
और कृष्ण की याद में कैद करने वाला ही छटपटाता है.