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शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

कृष्ण लीला ……भाग 57



कार्तिक सुदी दशमी को
नन्दबाबा ने एकादशी व्रत किया
द्वादशी मे व्रत का पारण करने हेतु
पहर रहते यमुना मे प्रवेश किया
वरुण देवता के दूत पकड कर ले गये
इधर सुबह हुयी तो
नन्दबाबा ना कहीं मिले
सारे मे हा-हाकार मचा
तब कान्हा ने यमुना मे प्रवेश किया
इधर वरुण देवता ने
नन्दबाबा को अपने सिंहासन पर बैठा
स्वागत सत्कार किया
और कृष्ण अपने पिता को लेने आयेंगे
इस बहाने हमे भी
उनके दर्शन होंगे
ये आस लगाये बैठ गया
प्रभु सीधे वरुण लोक मे पहुँच गये
उन्हे देख वरुण देव अगवानी को गये
प्रभु को रत्नजडित सिंहासन पर बैठा
चरण धो विधिवत पूजन अर्चन किया
मनचाही इच्छा पूर्ण कर जन्म सफ़ल किया
प्रभु से कर जोड प्रार्थना करने लगा
प्रभु मेरे दूत से गलती हुयी
पर यही गलती से मेरे
पुण्य उदय हुये
जो आपके चरण यहाँ पडे
हम सबने दर्शन पाया है
ये सब चरित्र नन्दबाबा ने देखा
और परब्रह्म ने मेरे घर अवतार लिया
ये सोच हर्षाने लगे
वापस आ सब गोपों को सारा हाल सुनाया
ये सुन गोपों ने कृष्ण को घेर लिया
कन्हैया वो तुम्हारे पिता हैं
इसलिये उन्हे वैकुण्ठ के दर्शन कराये हैं
क्या हम तुम्हारे कुछ नही लगते
सब शिकायत करने लगे
तब कन्हैया ने सबको
आँखें बंद करने को कहा
आँखे बंद करते ही
सारा दृश्य बदल गया
प्रभु की संकल्प शक्ति से ही तो
इस संसार का निर्माण हुआ
फिर वैकुण्ठ दर्शन कौन सी बडी बात थी
वहाँ जाकर गोपों ने देखा
सभी चतुर्भुजी रूप हैं
सबकी वेशभूषा , शक्ल आदि
कान्हा का ही रूप थीं
सब कान्हा की सेवा करते थे
वहाँ शान्त रस समाया था
जैसे ही गोप ग्वालों ने
कान्हा को देखा
और आवाज़ देना चाहा
वैसे ही वहाँ सबने
इशारों से चुप कराया
वहाँ तो बोलना मना था
शान्त रस मे तो
इक के मन की बात
दूजे को समझ आ जाती है
वहाँ बिना कहे सुने ही बात हो जाती है
 ये देख गोपवृंद घबरा गए
कर जोड़ प्रार्थना करने लगे
हमें तो अपना ब्रज की प्यारा  है
कम से कम वहाँ हमारा
कान्हा तो हमारा है
जिससे जैसे चाहे हम
लड़ते और खेलते हैं
यदि ये ही वैकुण्ठ है
जिसने हमें हमारे कान्हा से
है दूर किया
तो नहीं चाहिए हमें
ये वैकुण्ठ का भोग विलास
जैसे ही सबने प्रार्थना की
वो दृश्य लोप  हुआ
और घबराकर सबने
चक्षुओं को खोल दिया
सामने कान्हा को
उसी रूप में देखा
जैसे रोज देखा करते थे
और जैसे  ही उस छवि को देखा
सारे ग्वाल बाल लिपट गए
और कान्हा से बोले
भैया हमें ना अब  भरमाना
हमें नहीं चाहिए तुम्हारा वैकुण्ठ
हमें  तो इसी रूप में है तुम्हें पाना
कुछ मोहन ने अपनी मोहिनी डाली
और पल में सब कुछ भुला डाला
इधर नंदबाबा ने भी
वरुनलोक का हाल
स्वप्नवत जाना
और सारा ब्रह्मज्ञान
प्रभु लीला से भूल गए
और कान्हा को वैसे ही
पुत्रवत समझने लगे 
 
क्रमश:………

11 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कृष्ण जो न कर दें वो थोड़ा है .... ग्वालो का प्रेम उनके प्रति देखते ही बनता है ॥सुंदर प्रस्तुति

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

महाकाव्य की एक और कड़ी... बहुत सुद्नर... जय श्री कृष्ण

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

लीलाधारी कृष्ण कन्हैया..

Rakesh Kumar ने कहा…

बोलो कृष्ण कन्हैया की जय.
लगता है वंदना जी आपको भी
वैकुण्ठ दर्शन जरूर हुए हैं.

पर व्रज की महिमा निराली है जी.

ऋता शेखर मधु ने कहा…

बिन कान्हा स्वर्ग भी स्वीकार्य नहीं...बहुत सुंदर !!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (21-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

RITU ने कहा…

सुन्दर..! अद्भुत !

RITU ने कहा…

सुन्दर..! अद्भुत !

kshama ने कहा…

Is Mahakavyke bareme mujh jaisi kya kah saktee hai?

Shanti Garg ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग

विचार बोध
पर आपका हार्दिक स्वागत है।

संगीता पुरी ने कहा…

गोकुल वासियों को तो अपना कृष्‍ण उसी रूप में चाहिए ..

बढिया प्रसतुति !!