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शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

कुछ नहीं है

निर्मम छाया जीवन 
एकांत अंधकूप जीवन 
राहु केतु का ग्रास बना 
मन का तोरण 
हास परिहास उपहास का 
पात्र बना ये जीवन 
न काल से परे 
न काल के साथ 
निकला कोई औचित्य 
होने न होने की सूक्तियों पर 
न चला कोई  वक्तव्य 
तुम जहाँ थे 
जहाँ हो 
जहाँ रहोगे 
भेद विभेद की परिसीमा में 
प्रवेश क्रिया हुई वर्ज्य 
बस खुद का क्षरण हुआ त्याज्य 
तुम , मैं ,  वो 
पहले और बाद में 
कुछ नहीं है 
कुछ नहीं है 
कुछ नहीं है 
बस अग्नि लील रही है जीवन 

एक संग्राम का साक्षी भी अंततोगत्वा अदृश्य 
फिर भोजन का स्वाद कौन व्यक्त करे !!!

5 टिप्‍पणियां:

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत गहन अभिव्यक्ति...

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

WAAH..... Behtreen Chintan

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (09-08-2014) को "अत्यल्प है यह आयु" (चर्चा मंच 1700) पर भी होगी।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

राजेंद्र कुमार ने कहा…

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनायें।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

वाह!