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मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

सोच लो ?



जब दुःख पाना नियति है
चाहे तुम्हें की माने या नहीं
तो फिर क्यों
तुम्हें कोई भजे ?

जिसने जितना भजा
उतना ही दुःख पाया
और जिसने तुम्हारे
अस्तित्व पर ही प्रश्न खड़ा किया
सुखपूर्वक जीवन बिताया
तो बताओ कृष्ण
तुम्हारे होने का क्या औचित्य ?

अब तुम्हें हम माने या नहीं
क्या फर्क पड़ता है
क्योकि
दुःख हमारी नियति है
खासतौर से उस भक्त की
जो सब कुछ अपना तुम्हें मानता हो
और तुम्हारे दिए ज्ञान को आत्मसात करता हो
वो मान लेता है तुम्हारे गीता ज्ञान को
कर्म का लेखा मिटे न मिटाए
मगर
किसने देखा अगला पिछला जन्म ?

और कभी कभी तो प्रश्न उठता है
तुम हो भी या नहीं
या फिर हो महज वहम
एक मन बहलाने का साधन भर
एक खुद को ढाँढस बंधाने का जरिया भर
क्यंकि
यदि होते तुम हमारे माता पिता
जैसे कि तुम्हारे सभी ग्रंथों में कहा गया है
तो क्या अमरे दुखो पर
तुम मौन रह सकते थे
क्या तुम्हारा अंतस न चिंघाड़ता
हम भी माता पिता हैं
बच्चों की सिसकारी पर
जान देने को हाजिर हो जाते हैं
और उनका दुःख खुद सहने को इच्छुक हो जाते हैं
लेकिन तुम ---- तुम पर कोई असर नहीं होता
सारे संसार में व्याप्त
अन्धकार , व्यभिचार , दुःख तकलीफ , अराजकता से
नहीं होते तुम व्यथित 

स्त्री पुरुष बच्चे या तुम्हारी बनायी सृष्टि का कोई जीव हो 
जब रोता है , तुम्हें पुकारता है ये सोच 
सारा संसार बेशक छोड़ दे
तुम साथ जरूर दोगे
लेकिन हो ही जाता है अंततः निराश
क्योंकि तुम नहीं उतर सकते अपने आसन से नीचे
वर्ना सुन पाते अबलाओं बच्चों की चीख पुकार

तो फिर कैसे माने तुम्हें
हम अपना सर्वस्व या माता पिता
इतनी हृदयहीनता कैसे समाई है तुम में .......बताना तो जरा ओ कृष्ण ?


तब लगता है
नहीं हो तुम कहीं भी
तुम हो सिर्फ हमारी बनायी
एक ऐसी कृति
जिसे हमने अपने जीवन का
एक सहारा बनाया
एक अस्तित्वहीन विग्रह

आस्तिकता और नास्तिकता के
मध्य की एक महीन रेखा
जिसे यदि अब और खींचा
तो शायद अस्तित्व ही नकार दिया जाए तुम्हारा
और उग आये नास्तिकता का घनेरा जंगल
जिसमे तुम बिलबिलाओ एक दिन
ये मेरा आग्रह है न इल्तिजा
बस मन की विडंबना है
तुम्हें स्वीकारूँ या नकारुं अब ... सोच लो
क्योंकि
अंध श्रद्धा , अंध भक्ति की बलि नहीं चढ़ सकती मेरी चेतना

2 टिप्‍पणियां:

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 14 - 03 - 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2312 में दिया जाएगा
धन्यवाद

रश्मि शर्मा ने कहा…

उग आये नास्तिकता का घनेरा जंगल
जिसमे तुम बिलबिलाओ एक दिन
ये मेरा आग्रह है न इल्तिजा
बस मन की विडंबना है
तुम्हें स्वीकारूँ या नकारुं अब ..बहुत बढ़ि‍या