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शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

पता तो होगा तुम्हें



मन का मरना
मानो निष्प्राण हो जाना
जानते तो हो ही

अब सावन बरसे या भादों
जो मर जाया करते हैं
कितना ही प्राण फूँको
हरे नहीं होते

जब से गए हो तुम
मन प्राण आत्मा रूह
कुछ भी नाम दे लो
रूठा साज सिंगार
वो देह का विदेह हो जाना
वो आत्मा के नर्तन पर
आनंद का पारावार न रहना
जाने किस सूखे की मार पड़ी
ठूंठ हो गयी हर कड़ी

सुना है आज हरियाली तीज है
और तुम झूलोगे हिंडोलों में
हो सके तो इतना करना
एक पींग हमारे नाम की भी भर लेना
शायद
आखिरी सांस सी एक हिचकी आ जाए
और
तुमने याद किया मुझे
अहसास हो जाए

बाकी
मन का क्या है
उसे तो तुमने बिरहा का गीत सुनाया है जब से
सुलग रहा है दावाग्नि सा
चलो सुना दूं तुम्हें एक हिंडोला मैं भी
'हिंडोले पर झूलें नंदलाल श्यामा जू के संग
सखी मेरी झोटे देत रहीं
वो तो रहते सुखधाम में
मुझसे ही बैरन ओट रही'
 
चलो खुश रहो 
हमारा मरना जीना तो चलता ही रहेगा 
एक मेरे न होने से 
तुम्हें फर्क भी क्या पड़ता है 

सिर्फ साँसों का चलना जीना नहीं होता ......पता तो होगा तुम्हें मोहन




1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (07-08-2016) को "धरा ने अपना रूप सँवारा" (चर्चा अंक-2427) पर भी होगी।
--
हरियाली तीज और नाग पञ्चमी की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'