पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

शनिवार, 7 नवंबर 2009

यादों के झरोखे से भाग २ ...................

ज़िन्दगी धीरे- धीरे ढर्रे पर आने लगी । दोनों ही अपनी- अपनी तरफ़ से उस दुखद पल को भुलाने की कोशिश करने लगे मगर कहीं एक चुभन शायद दोनों के ही दिलों में कहीं बहुत गहरे बैठ गई थी। फिर भी दोनों ज़िन्दगी जीने की कोशिश में लग गए थे। आत्मग्लानि की वजह से रवि अपने को ज्यादा ही व्यस्त रखने लगा। वो अधिक से अधिक काम की वजहों से टूर पर जाने लगा और साथ ही उसकी महत्वाकांक्षाएं बढ़ने लगी थीं , कुछ पाने की , कुछ बनने की उसकी चाह जोर उठाने लगी थी। इधर मैंने भी अपनी पी० एच० डी ० पूरी करने की सोची और मैं भी ज़िन्दगी में एक मुकाम पाने की दिशा की ओर अग्रसर हो गई । शायद ख़ुद को व्यस्त रखकर हम दोनों ही सच से दूर भाग रहे थे या शायद अपने- अपने अहम् को संतुष्ट कर रहे थे। हम दोनों साथ थे मगर अपनी -अपनी दुनिया में व्यस्त रहने लगे। समय अपनी गति से खिसकता रहा । उसके बाद हमारी चार सालगिरह और आई मगर अब उनमें वो गर्माहट न होती । अब उत्साह ठंडा पड़ चुका था क्यूंकि भूतकाल की कटु याद जेहन में एक बार फिर डंक मारने लगती । हम साधारण तरीके से सालगिरह मनाते जैसे कोई औपचारिकता पूरी कर रहे हों।
वक्त के साथ मेरी पी ० एच ० डी ० पूरी हो चुकी थी और मैं अब कॉलेज में लेक्चरार लग गई थी। अब तो मुझे अपने आप पर एक गर्व महसूस होने लगा था और मैं अपनी सफलता के नशे में डूबने लगी थी । मेरे पैर जमीन पर नही पड़ते थे जैसे न जाने मैंने कौन सा गढ़ जीत लिया हो । शायद सफलता का नशा ऐसा ही होता है जो इंसान के सिर चढ़कर बोलता है । उधर रवि भी तरक्की की सीढियाँ चढ़ते हुए अपनी कंपनी का सी०ई०ओ० बन गया था। अब हमारे रहन सहन का स्तर बदल चुका था । आए दिन घर में पार्टियाँ होती थीं , बड़ी बड़ी बिज़नस मीटिंग्स होती थी। हम दोनों के पास बाकी सब कामों के लिए वक्त था बस अगर नही था तो एक दूसरे के लिए। दोनों ही सफलता के घोडे पर सवार आगे ही आगे बढ़ने की धुन में एक दूसरे को नज़रंदाज़ करते गए। कभी भी एक दूसरे का साथ निभाने या दूसरे को पुकारने की कोशिश ही नही करते । दोनों के अहम हमारे जेहन पर हावी हो गए थे। एक दूसरे की भावनाओं का कोई मोल नही रह गया था , कभी वो वक्त था जब हम सिर्फ़ एक दूसरे के लिए जीते थे और अब ये वक्त आ गया था कि दोनों सिर्फ़ अपने लिए ही जीने लगे। अगर रवि चाहता कि मैं उसके साथ कहीं घूमने जाऊँ या कोई फ़िल्म देखने चलूँ तो मुझे कोई न कोई काम होता और जब मैं चाहती तो रवि के पास वक्त न होता। हम दोनों ही शायद अपनी इस ज़िन्दगी से सामंजस्य नही बैठा पा रहे थे ............या शायद कोशिश ही नही करना चाहते थे । वक्त ने शायद हमारे बीच सदियों के फासले बो दिए थे जिन्हें सींचना अब नामुमकिन -सा होता जा रहा था। शायद सफलता के एक मुकाम पर आकर उसे बनाये रखना और भी मुश्किल होता है और उसकी कीमत भी हमें ही चुकानी पड़ती है। हम दोनों साथ रहकर भी अजनबियों सी ज़िन्दगी जीने लगे थे। आज एक- दूजे की भावनाओं की हमें कोई क़द्र ही नही रह गई थी । कितने संवेदनहीन हो गए थे हमारे ह्रदय।
धीरे- धीरे हमारे अहम् टकराने लगे.सिर्फ़ अपनी बात मनवाना चाहते थे एक दूसरे से, उसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े ,हम करते थे , धीरे- धीरे यही छोटी -छोटी बातें हमारी ज़िन्दगी में खाई बनने लगीं. बात -बात पर हम दोनों एक -दूसरे को तानाकशी करने लगे और हालत बद से बदतर होने लगे । और फिर एक दिन जब मेरी और रवि दोनों की ही सहनशीलता जवाब दे गई तो मैं रवि को छोड़कर अपने मायके आ गई। घर वाले इस अप्रत्याशित घटना से परेशान हो गए। रवि और मेरे घरवालों ने बहुत कोशिशें की कि हम दोनों एक- दूसरे को समझें क्यूंकि कोई भी समस्या ऐसी नही होती जिसका हल नही होता मगर हमारे अहम् सबसे ऊपर थे उस वक्त इसलिए हम दोनों में से किसी ने भी समझौता करने की नही सोची । और फिर एक दिन हमने तलाक लेने की सोची और आपसी सहमति से तलाक ले लिए। ज़िन्दगी के एक स्वर्णिम अध्याय का ऐसा अंत .......कभी स्वप्न में भी नही सोचा था..........................

क्रमशः ............................

7 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

दुखद ! शायद कभी कभी सब जानते हुए भी कुछ चीजे बियोंड कंट्रोल हो जाती है !

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

महफूज़ अली ने कहा…

Ego ........sach mein bahut kharaab cheez hoti hai......... par kai baar haalaat aise ho jaate hain ki un par hamara control nahi hota....... ab tak ke kahani bahut achchi lagi hai........ baandh kar rakha hai....... aapne ....yahi art hoti hai......... ki aap paathak ko baandh kar saken......... achchi lag rahi hai......... kahani ..........


ab aage ka besabri se intezaar hai......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इस कड़ी का अन्त अच्छा नही रहा!
मगर कहानी तो कहानी है। देखते हैं अगली कड़ी में क्या मोड़ आता है..........???

M VERMA ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति
कौतूहल बरकरार है

MANOJ KUMAR ने कहा…

रचना मर्मस्पर्शी है

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

ना जाने कितनी ही कहानिया है जो प्यार से शुरू होती है,पर अपनी गलतियों से प्यार पर ख़त्म नहीं हो पाती ..!अपने अहम् का तो ये हाल है की----तुमने मुअड़ के नहीं देखा,और हमने पुकारा भी नहीं !इस तरह अपनी अपनी अकड़ में कितने ही रिश्ते टूट जाते है,बिखर जाते है...एक दिल छु लेने वाली रचना...