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सोमवार, 23 नवंबर 2009

श्रीमद्भागवद्गीता से ......................

श्रीमद्भागवद्गीता के ७ वें अध्याय के २४ वें श्लोक की व्याख्या स्वामी रामसुखदास जी ने कुछ इस प्रकार की है जिससे परमात्मा के साकार और निराकार स्वरुप की सार्थकता समझ आती है ।

श्लोक
बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ परमभाव को न जानते हुए अव्यक्त (मन - इन्द्रियों से पर ) मुझ सच्चिदानंदघन परमात्मा को मनुष्य की तरह शरीर धारण करने वाला ही मानते हैं।

व्याख्या
जो मनुष्य निर्बुद्धि हैं और जिनकी मेरे में श्रद्धा भक्ति नही है वे अल्पमेधा के कारण अर्थात समझ की कमी के कारण मेरे को साधारण मनुष्य की तरह अव्यक्त से व्यक्त होने वाला अर्थात जन्मने मरने वाला मानते हैं । मेरा जो अविनाशी अव्यय भाव है अर्थात जिससे बढ़कर कोई दूसरा हो ही नही सकता और जो देश , काल , वस्तु व्यक्ति आदि में परिपूर्ण रहता हुआ इन सबसे अतीत सदा एकरूप रहने वाला ,निर्मल और असम्बद्ध है ------ऐसे मेरे अविनाशी भाव को वे नही जानते इसलिए वे मेरे को साधारण मनुष्य मानकर मेरी उपासना नही करते प्रत्युत देवताओं की उपासना करते हैं ।
मेरे स्वरुप को न जानने से वे अन्य देवताओं की उपासना में लग गए और उत्पत्ति विनाशशील पदार्थों की कामना में लग जाने से वे बुद्धिहीन मनुष्य मेरे से विमुख हो गए । यद्यपि वे मेरे से अलग नही हो सकते तथा मैं भी उनसे अलग नही हो सकता तथापि कामना के कारण ज्ञान ढक जाने से वे देवताओं की तरफ़ खिंच जाते हैं । अगर वे मेरे को जान जाते तो केवल मेरा ही भजन करते ।
१) बुद्धिमान मनुष्य वे होते हैं जो भगवान के शरण होते हैं । वे भगवान को ही सर्वोपरि मानते हैं।
२)अल्पमेधा वाले मनुष्य वे होते हैं जो देवताओं के शरण होते हैं । वे देवताओं को अपने से बड़ा मानते हैं जिससे उनमें थोड़ी नम्रता , सरलता रहती है।
३)अबुद्धि वाले मनुष्य वे होते हैं जो भगवान को देवता जैसा भी नही मानते , किंतु साधारण मनुष्य जैसा ही मानते हैं । वे अपने को ही सर्वोपरि , सबसे बड़ा मानते हैं ।
यही तीनो में अन्तर है ।
भगवान कहते हैं कि मैं अज रहता हुआ ,अविनाशी होता हुआऔर लोकों का ईश्वर होता हुआ ही अपनी प्रकृति को वश में करके योगमाया से प्रकट होता हूँ ------------इस मेरे परमभाव को बुद्धिहीन मनुष्य नही जानते। कहने का तात्पर्य है की जिसको क्षर से अतीत और अक्षर से उत्तम बताया है अर्थात जिससे उत्तम दूसरा कोई है ही नही ऐसे मेरे अनुपम भाव को वे नही जानते।
जो सदा निराकार रहने वाले मेरे को केवल साकार मानते हैं , वे निर्बुद्धि हैं क्यूंकि वे मेरे अव्यक्त, निर्विकार और निराकार स्वरुप को नही जानते । ऐसे ही मैं अवतार लेकर तेरा सारथि बना हूँ -------ऐसे मेरे को केवल निराकार मानते हैं वे निर्बुद्धि हैं क्यूंकि वे मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी भाव को नही जानते।
उपर्युक्त दोनों अर्थों में से कोई भी अर्थ ठीक नही है कारण कि ऐसा अर्थ मानने पर केवल निराकार को मानने वाले साकाररूप की और साकार रूप के उपासकों की निंदा करेंगे और केवल साकार मानने वाले निराकार रूप की और निराकार रूप के उपासकों की निंदा करेंगे । यह सब एकदेशियपना है।
पृथ्वी , जल तेज़ आदि जितने भी विनाशी पदार्थ हैं वे भी दो -दो तरह के होते हैं --------सूक्ष्म और स्थूल । जैसे स्थूल रूप से पृथ्वी साकार है और परमाणु रूप से निराकार है , जल बर्फ , बूँद , बादल रूप से साकार है और परमाणु रूप से निराकार है तेज काठ और दियासलाई में रहता हुआ निराकार है और प्रज्वलित होने पर साकार है आदि। इस तरह से भोतिक सृष्टि के भी दोनों रूप होते हैं और दोनों होते हुए भी वास्तव में दो नही होती । साकार होने पर निराकार में बाधा नही होती और निराकार होने पर साकार में बाधा नही लगती तो फिर परमात्मा के साकार और निराकार दोनों होने में क्या बाधा है ? अर्थात कोई बाधा नही है । वे साकार भी हैं और निराकार भी हैं , सगुण भी हैं और निर्गुण भी। गीता साकार और निराकार दोनों को मानती है। भगवान कहते हैं कि मैं अज होता हुआ भी प्रगट होता हूँ , अविनाशी होता हुआ भी अंतर्धान हो जाता हूँ और सबका ईश्वर होता हुआ भी आज्ञापालक बन जाता हूँ । अतः निराकार होते हुए साकार होने में और साकार होते हुए निराकार होने में भगवान में किंचिन्मात्र अन्तर नही आता।

9 टिप्‍पणियां:

महफूज़ अली ने कहा…

bahut achcha laga padh kar.....

bahut kuch jaanne ko mila....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

Bahut chhota sa comment.
NICE.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Sundar vyaakhya ...

अर्शिया ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
निर्मला कपिला ने कहा…

वाह वन्दना तो आज कल अध्यात्म शुरू हो गया/ बहुत सुन्दर व्याख्या है बधाई

अर्शिया ने कहा…

सुंदर एवं सार्थक प्रयास।
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सांसद/विधायक की बात की तनख्वाह लेते हैं?
अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद कैसे सफल होगा ?

Ashish (Ashu) ने कहा…

बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए....
मन को छू गये आपके भाव।
इससे ज्यादा और क्या कहूं।
बहुत कुछ चन्‍द शब्‍दों में व्‍यक्‍त किया, आभार ।

Kavi Kulwant ने कहा…

आध्यात्म के इस ऊंचे स्तर पर आप कैसे पहुंचीं?

देवसूफ़ी राम बंसल ने कहा…

मनुष्य को किसी भगवान की आवश्यकता ही नहीं है यदि वह केवल मनुष्य बनकर जिए. भगवान वैसे तो भोजन को कहते हैं, किंतु आधुनिक अर्थों में यह एक व्यावसायिक वास्तु है जिसकी खरीद फ़रोख़्त इस देश कॅया एक बड़ा और कपटी वर्ग कर रहा है, इसके नाम पर मानशी जाती को डरा रहा है.