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शुक्रवार, 7 मई 2010

अश्क कैसे बहाऊँ?

तेरी याद में
जब अश्कों का 
दरिया बहता था
तब अंतस में
बैठा तू ही तो 
तड़पता था
आज तेरा 
ये अंदाज़ 
समझ आया है
जब मैं और तू
दो रहे ही नहीं 
जब तू ही वजूदमें समाया है 
हर ओर तेरा ही
नूर समाया है
जहाँ मेरा "मैं"
ना नज़र आता है
 जब एकत्व को
अस्तित्व प्राप्त
हो गया है
फिर बता साँवरे
अश्क अब
कैसे बहाऊँ?
तुझे अब कैसे
और तडपाऊँ?

21 टिप्‍पणियां:

महफूज़ अली ने कहा…

बहुत सुंदर शब्दों में ...... बहुत सुंदर कविता.....

kunwarji's ने कहा…

वाह!आत्मविश्लेषण की बेहतरीन प्रस्तुति!

बहित ही सुन्दर....

कुंवर जी,

sangeeta swarup ने कहा…

जब बजूद में ही समां जाए तो फिर " मैं " कहाँ बचता है.....और ना ही तड़पाने की ख्वाहिश...

खूबसूरत अभिव्यक्ति

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

bas vandana ji...
mat tadpaao..

bahut achhi rachna..

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

अति सुन्दर अभिव्यक्ति...

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

वंदना जी,

बहुत गहरी बात कही है, बस इसको समझने की जरूरत है.

kshama ने कहा…

Kitni saraltase likh deti ho..!Koyi taamjhaam nahi...bas bhavna se bharpoor!

SANJEEV RANA ने कहा…

अति सुंदर रचना. इसके लिए आभार

कविता रावत ने कहा…

जब एकत्व को
अस्तित्व प्राप्त
हो गया है
फिर बता साँवरे
अश्क अब
कैसे बहाऊँ?
... ek honi hi mein purnata hai. esi aapne bakhubi abhivykt kiya hai.. bahut shubhkamnayne

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

बहुत सुंदर,खूबसूरत भाव

Fauziya Reyaz ने कहा…

pyaari aur sachhi rachna...waah

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

भिन्नता के सारे बंधन ,,,,
यूँ टूटे ,,,,,
अभिन्न एकत्व दिख रहा है ,,,,
मै एक रंगी हो गया हूँ ,,,
हर ओर तेरा ही तो प्रभुत्त्व दिख रहा है

दिलीप ने कहा…

bahut sundar...

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

सुन्दर रचना अच्छे भावो के साथ ....

Shri"helping nature" ने कहा…

bhav sahi pr prastuti aur auchhi ho skti thi

aap ki sb kavitaon k bhav auchhe lge pr ye kavita se pratit na ho kr kuch aur se pratit hote hai

Renu Sharma ने कहा…

han ji
jo dil main samaya hai use kaise dard diya ja sakta hai,
bahut khoob

Babli ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना ! बधाई!

hem pandey ने कहा…

जब एकत्व को
अस्तित्व प्राप्त
हो गया है
फिर बता साँवरे
अश्क अब
कैसे बहाऊँ ?

-सुन्दर.

अरुणेश मिश्र ने कहा…

प्रशंसनीयं ।

अरुणेश मिश्र ने कहा…

प्रशंसनीय ।

राकेश कुमार ने कहा…

आपकी कविता अन्तस को छु गयी, एक प्रेमी और प्रेयसी के बीच के प्रेम की पराकाष्ठा को अभिव्यक्त करती आपकी कविता की हरेक पन्क्तिया प्रेम की उच्च स्वरूप को अभिव्यक्त करती है जिसमे प्रेमी और प्रेयसी आपस मे एक स्वरूप को प्राप्त कर लेते है. इस सन्दर्भ मे किशन जी और राधा के बीच का प्रसन्ग मुझे याद आता है जिसमे राधा जे एकिशन जी से पूछती है कि हे किशन -तुम कैसे हो, क्या यह अनुचित नही कि तुमने विवाह किसी और से किया और शादी किसी और से रचा ली?
तब किशन जी कहते है कि हे राधिका विवाह के लिये दो लोगो की आवश्यकता होती है जिसमे एक पुरूष और दूसरी स्त्री होती है, तुम बताओ कि हममे से दूसरा कौन है? और जब हम दोनो मे दूसरा कोई है ही नही तो फिर विवाह किससे?

प्रेम की पराकाष्ठा औरप्यार का उच्चतम स्वरूप, शायद आपने यही रेखान्कित करने का प्रयास किया है. राकेश