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मंगलवार, 11 मई 2010

मन की थकान

तन की थकान 
तो उतर भी जाये 
मन की थकान
कहाँ उतारूँ
किस पेड़ को 
साया बनाऊँ
किस डाल पर
झूला डालूँ
कहाँ मैं यादों का 
घरौंदा  बनाऊँ
कौन सा अब
फूल खिलाऊँ 

किस देहरी पर 
माथा नवाऊँ
किस आँगन को
मैं बुहारूँ
किस मकां की 
दहलीज पर
मन की
रंगोली सजाऊँ


तन की टूटन
जुड़ जाएगी
मन की टूटन
कहाँ जुडाऊँ
किस थाली में
मन को परोसूँ
कौन सा मैं
दीप जलाऊँ
किस देवता का 
करूँ मैं  पूजन
किस श्याम की
राधा बन जाऊँ

तन की थकन तो उतर भी जाए 
मन की थकन उतारने को 
किस श्याम का काँधा पाऊँ 
कौन सा नेह दीप जलाऊँ 
कौन सी बाँसुरी बजाऊँ 
जो श्याम दौडे चले आयें 
मुझ बिरहन को गले से लगायें 
मेरी युगों की थकन मिटायें 

28 टिप्‍पणियां:

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत खूब क्या बात है , शब्दो को पिरोनां तो कोई आपसे सिखे , लाजवाब ।

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

waah bhut khub vandna ji prem rash se bhari hui bhut sundar kavita
saadar
praveen pathik
9971969084

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

तन की टूटन जुड़ जायेगी
मन की टूटन कहाँ जुडाऊ
बहुत खूब , वंदना जी

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

किस थाली में
मन को परोसूँ
कौन सा मैं
दीप जलाऊँ
किस देवता का
करूँ मैं पूजन
किस श्याम की
राधा बन जाऊँ

मन के हारे हार है,
मन के जीते जीत!

तन और मन का आपने बहुत ही
सघनता से विश्लेषण करके
बहुत ही सुन्दररूप में यह प्रश्नगीत रचा है!
बधाई!

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

अति सुन्दर।
--------
कौन हो सकता है चर्चित ब्लॉगर?
पत्नियों को मिले नार्को टेस्ट का अधिकार?

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

bahut hee badhiya dhang se sajaaya hai aapne isey...

kshama ने कहा…

Vandana ! Behad sundar rachana!

Kavita Rawat ने कहा…

किस थाली में
मन को परोसूँ
कौन सा मैं
दीप जलाऊँ
किस देवता का
करूँ मैं पूजन
किस श्याम की
राधा बन जाऊँ
,....मनोभावों की सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ

राजकुमार सोनी ने कहा…

रूह-आफजा से तो काम नहीं चलेगा इसके लिए आपको योग की शरण में जाना पड़ेगा। कविता अच्छी है।

Ra ने कहा…

सुन्दर रचना

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मन की टूटन का बहुत सटीक विश्लेषण किया है ..बहुत अच्छी रचना....

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

अति सुन्दर... मन को छू लेने वाली रचना...

Unknown ने कहा…

वंदना जी रचना हमेशा की तरह बेहतरीन लगी. ...आभार

kunwarji's ने कहा…

वाह!जितनी जटिल असमंजस थी उतनी ही सरलता से बता दी गयी!ये शब्दों के चित्र.....

अति सुन्दर!

कुंवर जी,

M VERMA ने कहा…

तन की टूटन
जुड़ जाएगी
मन की टूटन
कहाँ जुडाऊँ
मन टूटता है तो --- इसलिये टूटने ही न दें
बहुत सुन्दर रचना
भाव गाम्भीर्य

दिलीप ने कहा…

ati sundar...

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

सुंदर कविता...बहुत बढ़िया लगी...बधाई

एक बेहद साधारण पाठक ने कहा…

लाजवाब ... लाजवाब .... लाजवाब ......

Udan Tashtari ने कहा…

आनन्द आ गया, वन्दना जी.

Udan Tashtari ने कहा…

एक अपील:

विवादकर्ता की कुछ मजबूरियाँ रही होंगी अतः उन्हें क्षमा करते हुए विवादों को नजर अंदाज कर निस्वार्थ हिन्दी की सेवा करते रहें, यही समय की मांग है.

हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में आपका योगदान अनुकरणीय है, साधुवाद एवं अनेक शुभकामनाएँ.

-समीर लाल ’समीर’

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

वाह, बहुत सुन्दर कविता है !

SANJEEV RANA ने कहा…

वंदना जी बहुत सुंदर रचना.
इसके लिए आभार

ढपो्रशंख ने कहा…

ज्ञानदत्त ने लडावो और राज करो के तहत कल बहुत ही घिनौनी हरकत की है. आप इस घिनौनी और ओछी हरकत का पुरजोर विरोध करें. हमारी पोस्ट "ज्ञानदत्त पांडे की घिनौनी और ओछी हरकत भाग - 2" पर आपके सहयोग की अपेक्षा है.

कृपया आशीर्वाद प्रदान कर मातृभाषा हिंदी के दुश्मनों को बेनकाब करने में सहयोग करें. एक तीन लाईन के वाक्य मे तीन अंगरेजी के शब्द जबरन घुसडने वाले हिंदी द्रोही है. इस विषय पर बिगुल पर "ज्ञानदत्त और संजयदत्त" का यह आलेख अवश्य पढें.

-ढपोरशंख

Shri"helping nature" ने कहा…

bahut khub aapki prastuti auchhi lgi

nilesh mathur ने कहा…

सिर्फ एक शब्द, बेहतरीन !

Renu Sharma ने कहा…

achchha likha hai ji.

kavi surendra dube ने कहा…

वाह,बहुतअच्छा लिखा है आपने |आपकी प्रेमानुभूति स्तुत्य है क्योकि किसी का हो जाना या किसी को अपना बना लेना -ये दोनों घटनाएँ जीवन में दिव्यता सूचक हैं .

kavi surendra dube ने कहा…

वाह,बहुतअच्छा लिखा है आपने |आपकी प्रेमानुभूति स्तुत्य है क्योकि किसी का हो जाना या किसी को अपना बना लेना -ये दोनों घटनाएँ जीवन में दिव्यता सूचक हैं .