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बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

अनूठा परिवर्तन्………क्या आप भी ऐसा सोचते हैं?

आज एक सोच ने जन्म लिया है यार , पता नहीं तू या दुनिया उसे कैसे ले मगर सोचता हूँ कि काश ऐसा हो सके तो आधे से ज्यादा परिवार सुख शांति का जीवन बसर कर सकें ........कहते कहते राकेश  सोच में डूब गया .

अरे ऐसी कौन सी सोच ने तुझे जादू की पुडिया थमा दी कि तू दुनिया की मुश्किलात का हल ढूँढने लगा ...........बोल ना राकेश ..........अबे साइंटिस्ट कहाँ खो गया , अब कुछ बोल भी , कहते हुए विनीत राकेश को देखने लगा .

हलकी सी मुस्कान बिखेरता हुआ , आँखों में गहराई लिए राकेश बोला ,देख विनीत , आधे से ज्यादा रिश्ते आपस में आई दूरी की वजह से टूट जाते हैं खास तौर से पति पत्नी का रिश्ता ...........दोनों एक उम्र तक तो एक दूसरे को झेल लेते हैं मगर उसके बाद जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तब दोनों में एक ठंडापन सा आने लगता है , एक दूसरे से कटने लगते हैं , छोटी छोटी बातें   इतना उग्र रूप धारण कर लेती हैं कि परिवार बिखर जाते हैं मगर कोई भी उस मोड़ पर अपनी हार स्वीकार नहीं करना चाहता ..........इसे ज़िन्दगी का अहम् बना लेता है और अपने अहम् से कोई नीचे नहीं आना चाहता , एक पल के लिए रुकते हुए राकेश बोला ,"ऐसे में अगर कुछ ऐसा हो जाये जिससे ज़िन्दगी में नयी ऊर्जा का संचार हो जाए तो क्या वो रिश्ते जो इतने सालों से एक दूसरे से बंधे थे , टूटने से बच ना जाएँ .

इतना सुनकर विनीत बोला," बात तो सही है मगर महाराज ये भी बताइए कि कैसे होगा ये सब ? कौन सा जादू का मंतर फेर कर रिश्तों को टूटने से बचाया जा सकता है ."


देख, आज कल ज्यादातर रिश्ते किसी दूसरे के ज़िन्दगी में आने से टूटते हैं , ये तो मानता है ना तू .ज्यादातर मामले ये ही होते हैं . अनैतिक सम्बन्ध भी ज्यादातर एक उम्र के बाद ही पनपते हैं जब रिश्तों में बासीपन महसूस होने लगता है या दोनों अपनी ही दुनिया में मस्त होजाते हैं और दूसरे से अपेक्षा रखते हैं कि वो उन्हें अब तक नहीं समझा तो ऐसे रिश्ते का बोझ क्या ढोना ?तब इंसान दूसरी तरफ , जहाँ उसकी सोच और उसे समझने वाला कोई मिलता है तो उसकी तरफ उसका रुझान बढ़ने लगता है और कब ऐसे रिश्ते मर्यादा की सीमाएं पार कर लेते हैं और फिर अच्छा भला  घर कब टूट जाता है, पता भी नहीं चलता . मगर अपने जीवन साथी से कोई कुछ नहीं कहता कि एक दूसरे से वो क्या चाहते हैं और शायद दोनों में से कोई एक दूसरे से इतने वर्ष साथ रहने का बाद कहने की इच्छा भी नहीं रखता ये सोचकर कि जो अब तक नहीं समझा वो अब कहने पर क्या समझेगा ? और बस आपस में दूरियां बढ़ने लगती हैं और फिर धीरे धीरे जब  किसी का जीवन में प्रवेश होता है तो वो उसे अपना सा लगने लगता है ...........और यहीं घर परिवार टूटने लगता है.


हाँ , आजकल तो यही देखने में ज्यादा आ रहा है वरना तो ज़िन्दगी कभी हँसते तो कभी रोते सभी गुजार ही लेते हैं मगर किसी दूसरे का दखल अपनी शादी शुदा ज़िन्दगी में कोई नहीं चाहता .


तो फिर सोच अगर ये दखल एक सकारात्मक रूप ले ले तो ?


अरे वो कैसे? चौंकता हुआ विनीत बोला .


तब राकेश हँसता हुआ बोला.........देख हम सभी की ज़िन्दगी में ये क्षण आते ही हैं मगर हर कोई उसका डटकर मुकाबला नहीं कर पाता  सिर्फ कुछ दृढ निश्चयी  लोग होते हैं जो इस फेज  से गुजर जाते हैं मगर बाकी की ज़िन्दगी अस्त व्यस्त हो जाती है ............ऐसे में अगर वो इस रिश्ते को सिर्फ एक ऐसे रूप में लें जैसे राधा कृष्ण का था , जैसे वहाँ वासना का कोई स्थान नहीं था मगर रिश्ता इतना गहरा था कि जितना कृष्ण की पत्नियाँ भी कृष्ण को नहीं जानती थीं उतना राधा जानती थी ..........इतना पवित्र , पावन रिश्ता हो और सबसे बड़ी बात ये दोनों को पता भी हो चाहे पति हो चाहे पत्नी , किसी का भी रिश्ता हो मगर पता दोनों को हो कि वो उसे चाहता है या चाहती है मगर उस चाहत में वासना नहीं है सिर्फ एक दूसरे को समझने की शक्ति है जो उनके अहसासों को  समझते हैं , उनकी अनकही बातों को दिशा देने वाला कोई है उनके जीवन में , वो बातें  जो कोई भी पति या पत्नी कई बार एक दूसरे से नहीं कह पाता वो एक अनजान जो उन्हें भावनात्मक स्तर पर समझता है उससे कह देता है और फिर वो अपने को कितना हल्का महसूस करने लगता है और ज़िन्दगी दुगुने जोश से जीने लगता है क्योंकि सिर्फ एक यही अहसास काफी होता है कई बार जीने के लिए कि कोई है जो उसे उससे ज्यादा समझता है, जिससे वो अपने दिल की उन सब बातों को कह सकता है जो अपने साथी से नहीं कह पाता  ..........इसी से ज़िन्दगी में आशा और उर्जा का संचार होने लगता है और ज़िन्दगी एक नयी करवट लेने लगती है ..........बस सबसे बड़ी बात ये हो कि पति और पत्नी दोनों को एक दूसरे पर इतना विश्वास जरूर हो कि वो इस सम्बन्ध को अपनी मर्यादा से आगे नहीं लाँघेगा .............फिर देखो ज़िन्दगी कितनी हसीन हो जाएगी .............बशर्ते वहाँ भाव प्रधान हों वासना नहीं ...........कहकर राकेश चुप हो गया और विनीत खिलखिलाकर हँस पड़ा और बोला, "बेटे , ये दुनिया अभी इतनी बोल्ड नहीं हुई है जिसने आज तक राधा कृष्ण के सम्बन्ध को नहीं स्वीकारा उस पर भी आक्षेप लगाती रहती है उसमे कहाँ ये उम्मीद करता है कि इस बात को स्वीकार करेगी ............अरे ऐसे रिश्ते की आड़ में ना जाने कौन कैसे खेल खेल जाएगा ..........वैसे मैं तेरी बात भी समझ रहा हूँ मगर सिर्फ मेरे समझने से क्या होगा ............शायद तेरा ख्याल समाज को एक नयी दिशा दे मगर इतना बड़ा दिल कहाँ से लायेगा कोई ?जो सुनेगा हंसेगा या पागल कह देगा और वैसे भी कानून में भी इसे मान्यता नहीं मिलेगी ............अभी सोच में इतने बदलाव नहीं आये हैं ........अब मुझे ही देख , यदि तू कहे कि मैं तेरी बीवी को तुझसे ज्यादा जानता हूँ और जो वो महसूस करती है उसका मुझे ज्यादा पता है तो इतना सुनते ही मैं आग बबूला हो जाऊँगा और शायद कोई गलत कदम भी उठा लूं या तुझसे हमेशा के लिए नाता तोड़ लूं ...........मैं ये मानता हूँ कि दूसरे के लिए कहना आसान है मगर व्यावहारिकता में लाना उतना ही मुश्किल ..........जब मैं तेरी बात मानकर भी नहीं मानना चाहता तो सोच ये दुनिया कैसे इसे स्वीकार कर सकती है? कहकर विनीत राकेश का मुँह देखने लगा और राकेश एक गहरी सोच में डूब गया और बोला ............परिवर्तन के लिए एक बार तलवार का दंश खुद ही झेलना पड़ता है , गोली अपने सीने पर ही खानी पड़ती है.........अब देख आज समाज ने कितने परिवर्तन स्वीकार कर ही लिए ना जैसे लिव इन रिलेशन हो या गे , धीरे धीरे सब स्वीकार्य कर ही लेता है समाज क्योंकि सब अपने मन के मालिक है और व्यस्क हैं तो कोई किसी पर उस हद तक दबाब बना ही नहीं पाता  ............बेशक कदम क्रांतिकारी है मगर सबके मन को एक बार सोचने पर मजबूर तो करेगा ही आखिर कौन चाहेगा कि आपसी ठंडेपन के कारण उनकी बसी बसाई  गृहस्थी उजड़ जाए .........कई बार कहा भी जाता है ना कि कुछ दिन एक दूसरे से दूर रहो और फिर महसूस करो कि तुम दोनों के जीवन में  एक दूसरे के लिए कितनी अहमियत है बस उसी अहमियत का अहसास बिना दूर जाये भी बना रहेगा अगर रिश्ते को थोड़ी स्पेस देने लगें हम  और अपने विचारों में थोडा खुलापन ला सकें और एक दूसरे को उसके अंदाज़ में जीने की थोड़ी सी स्वतंत्रता देने लगें मगर मर्यादा में रहकर ही तो देखना दुनिया में ज्यादातर घर कभी टूटें ही ना .........उनके घरोंदे हमेशा आबाद रहें .............सिर्फ ज़रा सा सोच में परिवर्तन करने से और देखना एक दिन आएगा विनीत जब दुनिया इस बात को भी स्वीकारेगी और मुझे उस दिन का इंतज़ार है और देखना , जो सकता है इसकी पहल मुझे  ही करनी पड़े .......कहकर राकेश अपने विचारों की दुनिया में खो गया .

राकेश द्वारा दिया विचार क्या समाज स्वीकार कर पायेगा?
क्या रिश्तों को इस रूप में नयी दिशा दी जा सकती है?
क्या आप अपने जीवन साथी की ज़िन्दगी में किसी और का प्रवेश भावनात्मक स्तर पर स्वीकार कर सकते हैं ?
अपनी गृहस्थी बचाए रखने के लिए ऐसे स्वस्थ परिवर्तन को मान्यता दी जानी चाहिए ........जहाँ साथ रहना आसान भी ना हो और अलग भी नहीं होना चाहते हों उस स्थिति में क्या ये परिवर्तन सुखद नहीं होगा?


आप क्या सोचते हैं?

19 टिप्‍पणियां:

ajit gupta ने कहा…

परिवार में इतने रिश्‍ते होते हैं कि व्‍यक्ति को भावनात्‍मक रूप से जुड़ने की लिए पर्याप्‍त होते हैं। यदि व्‍यक्ति अपने मन की बात के कारण ही तनाव अनुभव करता है तब वह हमेशा ही करेगा। अभिव्‍यक्ति आनी चाहिए। आज परिवार से इतर भी अनेक रिश्‍ते होते हैं जिनसे हम अपनी बातें शेयर करते हैं, इसलिए कोई एक ही हो, यह कतई आवश्‍यक नहीं है।

योगेन्द्र पाल ने कहा…

मैं भी अजित गुप्ता जी की बात से सहमत हूँ, आपने जो लिखा है उसे पढकर मुझे "कभी अलविदा ना कहना" फिल्म की याद आ गयी, जिसका कथानक मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं आया था, क्यूंकि जो आपने लिखा है शायद में उसको स्वीकार नहीं कर सकता, और मेरा तजुर्बा(जो आपके बहुत कम है) कहता है कि अपने तो अपने होते हैं, सिर्फ उनको ही अपने मन की बात बतानी चाहिए नहीं तो सिर्फ तुम्हारा मजाक बनेगा और कुछ भी हाशिल नहीं होगा|

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

कोई भी रिश्ता अपनी राह तलाश ही लेता है वंदना जी!
अच्छा लेख लिखा आपने, साझा करने के लिए शुक्रिया!

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

नई सोच है.. लेकिन ऐसा होने में बहुत वक्त लगना है... मुश्किल भी है..

Arvind Mishra ने कहा…

मानवीय रिश्तों की बातें बहुत जटिल होती हैं ....आपने एक अच्छा विवेचन किया

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

मानवीय सम्बन्धों पर प्रकाश डालती सुन्दर कथा!
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....हाँ , आजकल तो यही देखने में ज्यादा आ रहा है वरना तो ज़िन्दगी कभी हँसते तो कभी रोते सभी गुजार ही लेते हैं मगर किसी दूसरे का दखल अपनी शादी शुदा ज़िन्दगी में कोई नहीं चाहता .
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कहानी का निचोड़ तो इसी वाक्य में छिपा है!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

itne soch samajhker rishte ban jayen ... mumkin nahi

Atul Shrivastava ने कहा…

मैं अजीत जी की बातों से सहमत हूं। साथ ही यह भी कि आपने जो लिखा है, वह बात नई जरूर है लेकिन उसे धरातल में आने में वक्‍त लगेगा।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

तनाव अन्दर से आता है, रिश्ते तो सहलाने की क्षमता रखते हैं।

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

नहीं वंदना जी, यह आइडिया वेस्टर्न वर्ल्ड में नहीं सफल हो पाया तो यह तो इंडिया है ! वैसे, ऐसा ही कुछ कुछ मिलता जुलता एक आइडिया आजकल अपनी मार्केटिंग स्ट्रेटीजी के तहत भारत मैट्रिमोनियल ने क्वारों के लिए 'वर्चुअल वाइफ ' के नाम से भी अपनी वेब साईट पर चला रखा है !

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

प्रेक्टिकली संभव नहीं है । स्वयं पति व पत्नि के मध्य भी ये स्थिति और अधिक कडवाहट व गलतफहमियां ही बढाएंगी ।

ZEAL ने कहा…

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बहुत से अन्य तरीके भी हैं स्वयं कों तनाव मुक्त करने के लिए । किसी तीसरे व्यक्ति पर निर्भरता parasite बनाती है । अपने spouse कों थोडा space दें और खुद कों emotionally strong बनाएं , ये एक बेहतर विकल्प होगा।

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Udan Tashtari ने कहा…

रिश्तों की डोर बड़ी नाजुक होती है..बहुत सहेजना होता है.

अकड़न के स्थान पर दोनों ही के समर्पण की दरकार होती है. एक विश्वास की जरुरत होती है, फिर तो दोस्ती या अन्य कोई रिश्ता, सभी सहज और सरल हो जाता है.

राज भाटिय़ा ने कहा…

पति पत्नी का रिश्ता बच्चो के बडे होने के बाद ओर भी पक्का हो जाता हे,क्योकि वो दोनो एक दुसरे को बहुत अच्छी तरह से पहचानने लगते हे, इस लिये किसी वो* की जरुरत ही नही पडती, जब इतने साल पति पत्नी साथ रह कर एक दुसरे को समझ नही सके तो राधा आ कर क्या कर लेगी?

Rakesh Kumar ने कहा…

'Kasme,vade pyar vafa sub baate hai,baato ka kya.Koi kisi ka nahi yahan per nate hai nato ka kya'
Nata koi bhi ho,man se man ka nata
hi santusti de sakta hai.Banavti nahi.Jin nato ko samaj ki manyta
prapt ho jaye to ve nibhane me bhi aasan ho jate hai.
Aapka lekh vicharniya hai.
Maine apne blog"Mansa vacha Karmna"
per likhna shuru kiya hai.Apne bahumulya sujavo se avgat karaye.

निर्मला कपिला ने कहा…

मै अजित जी और ज़ील से सहमत हूँ।

G.N.SHAW ने कहा…

gupta ji, aap ke post par , shayad pahali baar aaya hun. padhane ke baad aisa laga ki aap ne jo likha hai ,wah kisi bhi sanskarik samaj ( bharat men ) me nahi milega. meri raay se yah sab wahi milega , jis pariwar me aisa hota aaya hoga. agar maine kuchchh galat kaha ho to usake liye kshama prarthi hun. dhanyabad.

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही जटिल विषय पर अच्छी तरह प्रकाश डाला है.

बेनामी ने कहा…

RELATION.HAAAAA? YU AAP SB EK DUSRE KO MURKH BANA RAHE HO?
WHY U DONT TALK ABT SEX IN THAT DAYS / BIBI, TV, MOBILE AND AUTO MOBALE PADOSI KA SABKO ACHHA LAGTA HAI . BAT TO HANSI KI HAI BUT AAP SABKO JABAB BHI HAI
ITS ONLY ATTRACTION NOT LOVE OR RELATION EVERY BODY LIKE O HAVE CHANGE IN SEX LIFE TO RENOVATE . IF PASSIBLE WITHOUT ANY TRAMOUR THEN NO PROBLME. AJKAL TO BAHUT SE CENTRE BHI KHUL GAYE HAI PATI PATNI DONO KE CONSENT SE LOG JOIN KAR RAHE HAI AUR PHYSICAL LIFE ENJOY KAR RAHE HAI, BUT ITS NOT IN NORMAL COURSE IN INDIA .
DR BN SINGH PSYCHOLOGIST