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मंगलवार, 4 सितंबर 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी………भाग 65


जब प्रभु ने देखा
हाँ----ये सिर्फ मेरे लिए आई हैं
इनमे संसार की ना कोई
तुच्छ वासना रही है
अपना सर्वस्व मुझे ही
समर्पित  है किया
तब मनमोहन ने
महारास का उद्घोष किया
सभी गोपियों ने  योगमाया कृत
दिव्य वस्त्र  आभूषणों   से श्रृंगार किया
प्रभु ने अनेकों रूप बनाये
जितनी गोपियाँ
उतने कृष्ण नज़र आने लगे
मगर दूसरी को ना पता चलता था
हर गोपी को यही लगता था
कृष्ण सिर्फ मेरे संग रास रचाते हैं
कभी एक गोपी बीच में
और चारों तरफ कृष्ण
तो कभी चारों तरफ गोपियाँ
और बीच में कृष्ण
अद्भुत रूप बनाते हैं
रास रंग रचाते हैं
नृत्य गायन वादन से
इक दूजे को रिझाते हैं
कोई गोपी मुरली छीन
अपने अधरों पर रख लेती है
तो कोई गोपी गले में हाथ ड़ाल
प्रभु संग झूला, झूला करती है
अद्भुत दिव्य आनंद समाया है
कभी गोपी कृष्ण तो
कभी कृष्ण को गोपी बनाया है
प्रभु ने सभी के मनानुसार
अपना रूप बनाया है
ह्रदय से लगा सबके ह्रदय की
विरहाग्नि को बुझाया है
कभी मधुर रागिनी बजाते हैं
तो सबकी सुध बुध खो जाती है
कभी  नैन मटकाते हैं
कभी  तिरछी चितवन से
वार करते हैं
तो कभी किसी गोपी की
सुन्दरता पर मोहित होने
का स्वांग भरते हैं
मगर अपने निजरूप में
एकरस रहते हैं
ये तो गोपियों को
दिव्य आनंद देने को
मन बनाया था
वरना तो प्रभु में
मन ने ना स्थान पाया था
क्योंकि पंचतत्वों से बना ना उनका विग्रह  था
जब प्रभु गोपियों के मनानुसार
चेष्टाएं करने लगे
तब गोपियों के मन में अभिमान के
अंकुर का स्फुरण हुआ
मनहरण  प्यारे देखो हमारी
सुन्दरता पर कैसे रीझे जाते हैं
कैसे हमारे इशारों पर नाचा करते हैं
हमारे बराबर सुन्दरी तो
कोई दूसरी नहीं होगी
अब हमारी आज्ञा बिना
ना कोई कार्य करेंगे
जब गोपियों के मन में
ये अभिमान जगा
तभी प्रभु ने सारा हाल जान लिया
जब प्रभु ने देखा
गोपियाँ धर्म लज्जा छोड़
पाप दृष्टि  से देखने लगी हैं
अज्ञानता से मुझे अपना पति
समझ अंग लिपटाती हैं
तब प्रभु ने विचार किया
ये तो मेरी परम भक्त हैं
ऐसे अभिमान का बीज
यदि छोड़ दिया

जिसे जड़ से ना उखाड़ा जाए
तो कल ना जाने
कितना बड़ा वटवृक्ष बन जाये
इसे तो अभी नष्ट करना होगा
क्योंकि मुझे बाकी सब है प्रिय
सिर्फ अभिमानी ही नहीं प्रिय
ये सोच प्रभु गोपियों के
बीच से अंतर्धान हुए
गोपियाँ मोहपाश में बंधी 
ना सोच पाती थीं
जिसमे से सारे जग की
सुन्दरता निकली हो
वो कैसे उन पर रीझ सकता था
उसके प्रकाश से ही तो
उनका रूप प्रकाशित होता था
जिसकी भृकुटी के इशारे पर
ब्रह्मांड नाचा करता है
वो कैसे उनकी उँगलियों पर नाच सकता है
ये तो प्रभु  की परम
भक्त वत्सलता थी
अपने भक्त का मान रखने को
प्रभु अपने स्वामी के रूप से
नीचे उतर आये थे
और आम इन्सान बन
हास विलास करते थे
मगर गोपियाँ कुछ समय के लिए
इस सत्य को भूल गयी थीं
और गर्व कर बैठी थीं
जिसे मिटाना जरूरी था
इसलिए प्रभु राधा जी संग
अंतर्धान हुए
ये देख गोपियों के तो होश उड़े
अरे कृष्ण कहाँ गए
अभी तो यहीं थे
अरे कृष्ण कहाँ गए
अभी तो यहीं थे
इक दूजे से  पूछती फिरती थीं
जैसे मणिधर सर्प की मणि
किसी ने छीन ली हो
जैसे मीन जल बिन मचल रही हो
यूँ गोपियाँ व्याकुल  होने लगीं
जैसे किसी धनवान का सारा धन छिन गया हो
इस महादुख से गोपियाँ बौरा गयीं
इक दूजे से मनहर प्यारे का पता पूछने लगीं
कभी विरह वेदना में
दग्ध हुई जाती हैं
और कान्हा को बारम्बार बुलाती हैं
हम  तुम्हारी बिना मोल की दासी हैं
मनसा वाचा कर्मणा तुम पर न्योछावर हुई हैं
फिर कहाँ जा छुपे हो
किससे पता तुम्हारा पूछें
प्रेमाश्रु बहाती हैं 


क्रमश:………

8 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हर जगह कृष्ण..लीलाधर..

kshama ने कहा…

kab 65 bhaag ho gaye pata hee nahee chala!

ऋता शेखर मधु ने कहा…

कृष्ण की लीला निराली...दिव्य रास का मनोहारी वर्णन !!

कुश्वंश ने कहा…

krishn hi krishn har taraf wah...

Kalipad Prasad ने कहा…

krishna lila ka madhur chitran..wah

Kalipad Prasad ने कहा…

krishna lila ka madhur chitran...wah

Kalipad Prasad ने कहा…

krishna ras lila amrit gatha..sundar

Rakesh Kumar ने कहा…

मति भ्रम सा हो रहा है,वन्दना जी.

कृष्ण हुए गोपी,या गोपियाँ हुईं कृष्ण

अदभुत है महारास का चित्रण.