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गुरुवार, 20 सितंबर 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी………भाग 68


विरह अगन में गोपियाँ पुकारने लगीं
मधुदूदन तुमने हमारे लिए
तो है अवतार लिया
प्रभु भला फिर क्यूँ हमसे
मुँह फेर लिया
ये बृज की भूमि तुम्हें बुलाती है
तुम्हारी चरण रज की प्यासी है
तुमने तो बृज की खातिर
लक्ष्मी को भी
दासी बना दिया
बैकुंठ को भी ठुकरा दिया
अब क्यों देर लगाते हो
मोहन क्यों छुप छुप जाते हो
हमारी रक्षा को ही तो तुमने
इतने असुरों का संहार किया
जो हमें छोड़कर जाना था
फिर क्यों
बकासुर, अघासुर, वृत्तासुर , पूतना , तृणावर्त से था बचाया
क्यों दावानल की अग्नि से
तो कभी कालिया के विष से
तो कभी इन्द्र के कोप से
तुमने था बचाया
देखो तुम्हारे विरह में हम
बावली हुई जाती हैं
और उलटे सीधे आक्षेप लगाती हैं
पर प्रेम में इतना तो अधिकार होता है
प्रीतम को मनाने का
ये ही तो तरीका होता है
हे प्राणनाथ ! तुम्हारी मंद मंद मुस्कान पर
हम बलिहारी जाती हैं
गोधुली वेला में अधरों पर
वंशी सजाये
मोर मुकुट धारण किये
मुरली बजाते जब तुम
प्रवेश करते हो
उसी मनमोहिनी छवि के दर्शन को तो
दिन भर हमारे नैना तरसते थे
तुम्हारी अद्भुत झांकी देख
ह्रदय ज्वाला शांत हो जाती थी
मगर हाय ! प्यारे अब हम कहाँ जायें
कहाँ तुम्हें खोजें
हमसे बड़ी भूल हुई
कह गोपियाँ पछताती हैं
हे श्यामसुंदर ! क्यों छोड़ चले गए
कैसे छुए छुपे फिर रहे हो
जिन चरणों को
लक्ष्मी भी अपनी छाया से दबाती है
वो चरण आज
कंकड़ पत्थरों से भरे
ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर चल रहे हैं
जिन चरणों से कालिया पर
नृत्य किया वो ही चरण
आज वनों की कंटकाकीर्ण
कुश, झाडी से लहूलुहान होते होंगे
हमारी गलती की सजा उन्हें मत दो
इन्हें चरण कमलों पर तो
हमारे नयन गड़े रहते हैं
आपकी हम चरण दासी हैं
हे स्वामी ! प्रकट हो जाओ
और अपने चरण कमल
हमारे वक्षस्थल पर रख
विरह ज्वाल शांत करो
हा गोपीनाथ! अपने नाम की लाज रखो
हा मदनमोहन ! यूँ कठोरता ना तुम्हें शोभा देती है
हम अपने बधू बांधव
पति बच्चे
सब छोड़ कर आई हैं
यूँ ना हमारा बहिष्कार करो
गर तुमने ठुकरा दिया तो कहाँ जाएँगी
तुम्हारे बिना तो हम
यूँ ही मर जाएँगी
जब मरने की गोपियों ने बात कही
तो कहीं से आवाज़ आई
तो फिर मर क्यों नहीं जातीं ?
इतना सुन गोपियाँ बोल पड़ीं
अरे चितचोर! मरना तो हम चाहती हैं
तुम बिन एक सांस भी नहीं लेना चाहती हैं
पर जैसे ही मरने को उद्यत होती हैं
वैसे ही तुम्हारा भेजा कोई
संत आ जाता है
और तुम्हारी मधुर मंगलकारी कथा
सुनाने लगता है
तुम्हारी कथा रुपी अमृत ही
हमें जिला देता है
वरना तो ये शरीर प्राण विहीन  ही रहता है
प्राण तो तुम्हारे साथ गए हैं
यहाँ तो बस मिटटी को रख गए हैं
तुम्हारे नाम का अमृत ही
मिटटी में प्राण फूंकता है
हा राधारमण! अब तो दर्श दो गिरधारी
हम हैं तुम्हारी बिना मोल की दासी
अपनी मधुर वंशी की धुन सुना दो
हमें भी अपनी वंशी बना
अधरों पर सजा लो
हे प्यारे ! हमें प्रेमामृत पिलाओ
अब जी सो की
आगे ना कोई गलती होगी
कह गोपियाँ करुण स्वर से विलाप करने लगीं
जब -जब वेदना चरम पर पहुँच गयी
तब -तब एक- एक ठाकुर का प्रकटीकरण हुआ
हा गोपीनाथ! हा राधारमण ! हा मदनमोहन !
ऐसे पांच बार जब
विरह वेदना हर सीमा को लाँघ गयी
और गोपियों ने पुकारा
तब पांच ठाकुर प्रकट हुए
जिनमे से तीन आज भी
वृन्दावन में आसान जमाये हैं
दो दूसरे राज्यों में पहुँच गए हैं


क्रमश:…………

6 टिप्‍पणियां:

Kuldeep Sing ने कहा…

जब भी कोई पौराणिक कथा पर रचना करता है तो मेरा मन बहुत गद्गद् हो उथता है। इतनी सुन्दर रचना, मन प्रसन्न हो गया। हो सके तो मेरे ब्लौग http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com पर भी पधारे। अच्छा लगेगा।

Kuldeep Sing ने कहा…

जब भी कोई पौराणिक कथा पर रचना करता है तो मेरा मन बहुत गद्गद् हो उथता है। इतनी सुन्दर रचना, मन प्रसन्न हो गया। हो सके तो मेरे ब्लौग http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com पर भी पधारे। अच्छा लगेगा।

ऋता शेखर मधु ने कहा…

तीन ठाकुर वृंदावन में हैं ,बाकी दोनों ठाकुर किस राज्य में हैं?
गोपियों की वेदना का सुंदर विश्लेषण!!

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

acchi bhavawyakti...

Rakesh Kumar ने कहा…

विरह वेदना को खूब चरम पर पहुँचाया है आपने
एक नही पांच पांच ठाकुरों को प्रकटाया है आपने

लगता है अगली कड़ी में आप पांच ठाकुरों
का राज जरूर खोलेंगी.

इन्तजार है वन्दना जी.

मनोज कुमार ने कहा…

रोचक अंक।