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बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया



शब्दहीन, भावहीन ,स्पंदनहीन ह्रदय को
और दिमाग को कुंद औ मूढ बना दिया
सांवरे तूने ये क्या किया , ये क्या किया

ना रसधारा बहती है

ना नामोच्चार होता है
बस ये विग्रह निर्लेप सा रहता है
अब कौन दिशा है जाना
सबको भ्रमित बना दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

ना ह्रदय द्रवित होता है

ना अश्रु  नैनो से ढलते हैं
बस निर्विकारता छा जाती है
निर्जीव इस विग्रह पर
ये कैसा कुहासा छा दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

ना मै अब मै रही

ना तू ही मुझे मिला
एक तत्व भी अज्ञात रहा
ये कैसा द्वंद समा गया
जो मुझे प्रश्नसूचक बना दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

ना प्रेम का छोर मिला

ना कोई उस ओर मिला
बस प्रेमाभक्ति का ह्रास रहा
ये कैसा रोग लगा दिया
भरा, पूजा का थाल लौटा दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

अब ना दिशा का बोध रहा

ना अपना ही होश रहा
जब से तुझमे खुद को मिला दिया
तेरी चाह को परवान चढा दिया
और खुद को भी मिटा दिया
फिर भी ना तेरा दरस हुआ
और चौखट से जो अपनी
तूने खाली हाथ लौटा दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया


तेरे हाथ बिके बेमोल

अब किधर जायेंगे
जो तूने हमे रुसवा किया
तेरे कूचे मे ही ना मर जायेंगे
मगर  ना कहीं कोई ठौर पायेंगे
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

9 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सांवरे के रंग में डूबी सुंदर प्रस्तुति

रश्मि प्रभा... ने कहा…

इतनी पुकार पर भी न पसीजो तो कहाँ जाएँ - तू ही बता

Kuldeep Sing ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति... आप का श्याम के प्रति प्रेम झलकता है... एक और प्रेम के दर्शन यहां करें... http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

एक अजब प्रभाव डाल दिया है तूने..

मनोज कुमार ने कहा…

मन पर चढ़े आध्यात्मिक रंग में रगी-पगी बेहतरीन रचना।

Rakesh Kumar ने कहा…

सांवरे तुने ये क्या किया,ये क्या किया
'मनसा वाचा कर्मणा' को ही भुला दिया
खैर, जैसी तेरी मर्जी.
तेरी रजा में ही मेरी रजा.
आभार,वंदनाजी.

bhola.krishna@gmail .com ने कहा…

मेरे श्याम .
"तूने क्या किया ये बता तो सही
मेरा चैन गया मेरी नींद गयी"
लगभग अर्ध शतक पूर्व एक भजनीक संत से यह भजन सुना था ! सुनकर रो पड़ा था !वर्षों गुनगुनाता रहा वह अधूरा गीत ही!
आज पुनः उसी प्रेमाभक्ति भाव में ओतप्रोत आपकी यह रचना सन्मुख आई !इससे कुछ भाव चुरा कर पुनः गाने को जी करता है ! इस अस्वस्थ तन से ये हो पायेगा ? यह तो "वह" ही जाने ! -

कविता रावत ने कहा…

सांवरे के रंग में डूबकर मनुहार करती बहुत सुन्दर रचना