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सोमवार, 13 मई 2013

आँख में पड़ी किरकिरी सा रडकता तुम्हारा वजूद


आँख में पड़ी किरकिरी सा रडकता तुम्हारा वजूद 
देखो तो कभी मोती बन ही नहीं पाया 
जानते हो क्यों .............
क्योंकि 
मैने सहेजा था सिर्फ़ प्रेम को और तुमने अपने अहम को 
सिर्फ मन रुपी माखन चुराना 
या प्रीत के नयन बाण चलाना ही काफी नहीं होता 
प्रीत निभाने के भी कुछ दस्तूर हुआ करते हैं ........मोहन ! 
अगर तुम हो तो ........

8 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कान्हा के मन की समझ पाना सदा ही कठिन रहा है।

Kailash Sharma ने कहा…

कान्हा के दस्तूर कान्हा ही समझ सकता है, हम सब तो कठपुतलियाँ हैं उसके हाथ की...

dr.mahendrag ने कहा…

ज़माने के दस्तूर निभाने कितने मुश्किल होते हैं,निभाने वाला ही जानता है मनोभावों को उकेरती अच्छी रचना.

dr.mahendrag ने कहा…

ज़माने के दस्तूर निभाने कितने मुश्किल होते हैं,निभाने वाला ही जानता है मनोभावों को उकेरती अच्छी रचना.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कान्हा आँख की किरकिरी बन कर भी शामिल हैं तुम में :):)

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

prem ko samajh pana bhi kahan aasan hota hai ...ati sundar ....

शोभना चौरे ने कहा…

kanha aik jgh khantikta hai?

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

बहुत सुंदर भाव.....