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शुक्रवार, 2 मई 2014

आवाज़ दे कहाँ है ..........




मैं तो भयी रे बावरिया
बनी रे जोगनिया
श्याम तेरे नाम की
श्याम तेरे नाम की
आवाज़ दे कहाँ है
दीवानी तेरी यहाँ है ...........

गली गली ढूँढूँ

अलख जगाऊँ
तेरे नाम पर
मिट मिट जाऊँ
मैं हो के बावरिया
आवाज़ दे कहाँ है
दीवानी तेरी यहाँ है ...........

आँगन बुहारूँ 

या चूल्हा जलाऊँ
नित नित तेरा
दर्शन पाऊँ
मैं तो बन के दिवानिया
आवाज़ दे कहाँ है
दीवानी तेरी यहाँ है ...........

एक आस ही

जिला रही है
ये संदेसा पहुँचा रही है
तेरे चरणों से
लिपट लिपट जाऊँ
मैं बन के धूल के कणिया
आवाज़ दे कहाँ है
दीवानी तेरी यहाँ है ...........


(अपने चरण कमल दरस दीवानी का 
बिहारी जी यहीं से नमन करो स्वीकार )

4 टिप्‍पणियां:

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति.
इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 03/05/2014 को "मेरी गुड़िया" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1601 पर.

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

नमस्ते जी।
सुप्रभात।
शनिदेव आपका कल्याण करें।
आपका दिन मंगलमय हो।
--
अच्छी प्रस्तुति।

राकेश श्रीवास्तव ने कहा…

सुंदर रचना.

आशीष भाई ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना व लेखन , आ. वंदना जी धन्यवाद इस प्यारी सी रचना के लिए !
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