पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

न कोई गाँव न कोई ठाँव

न कोई गाँव न कोई ठाँव 
फिर भी मुसाफ़िर 
चलना है तेरी नियति

अंजान दिशा अंजान मंज़िल
फिर भी मुसाफ़िर
पहुँचना है तेरी नियति 

देह के देग से आत्मा के पुलिन तक ही है बस तेरी प्रकृति

7 टिप्‍पणियां:

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

चरवेति! चरवेति!

Kavita Rawat ने कहा…

जीवन चलने का नाम
चलते रहो सुबह शाम..
बहुत बढ़िया

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बृहस्पतिवार (16-10-2014) को "जब दीप झिलमिलाते हैं" (चर्चा मंच 1768) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सु..मन(Suman Kapoor) ने कहा…

bahut sunder

Rs Diwraya ने कहा…

बहुत सुन्दर
धन्यवाद
आमँत्रित

Lekhika 'Pari M Shlok' ने कहा…

Bahut sunder rachna !

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बहुत सुन्दर