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बुधवार, 18 मार्च 2015

चलो महफ़िल सजा लूँ



शाम होने को आई 

चलो महफ़िल सजा लूँ

पलकों की ओट कर पर्दा लगा लूँ

क्यूंकि 

बड़ा शर्मीला मेरा यार है 

बड़ा रंगीला मेरा प्यार है




अब तो चले आओ 

सारा आलम बना दिया 

रतजगे के लिए दिल पर साँसों का पहरा बिठा दिया 

कि

आ जाओ अब तो आखों का खुमार बन कर 

ओ रंगीले छबीले मेरे श्याम बांसुरी की तान बनकर 

कि

अँखियाँ तरस रही हैं जलवा जरा दिखा जा 

निर्मोही श्याम बस इक बार गले लगा जा 

कि

प्रीत बावरिया पुकारे है 

रस्ता तेरा निहारे है 

ये प्रेम के सूने पंथों पर 

मेरी आस को मोहर लगा जा 

श्याम बस मुझे अपना बना जा 

बस इक बार 

मेरे मन वृन्दावन में रास रचा जा 

श्याम मेरी प्रीत अटरिया चढ़ा जा 

मुझे प्रेम का अंतिम पाठ पढ़ा जा 

कि

तुझ बिन अब रहा न जाए श्याम ये बिरहा सहा न जाए

3 टिप्‍पणियां:

दिलबागसिंह विर्क ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19 - 03 - 2015 को चर्चा मंच की चर्चा - 1922 में दिया जाएगा
धन्यवाद

बेनामी ने कहा…

बहुत ही शानदार और सार्थक रचना प्रस्‍तुत करने के लिए धन्‍यवाद।

Unknown ने कहा…

बहुत ख़ूब.............
http://savanxxx.blogspot.in