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सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

हाय ! ये कैसा बसंत आया री

हाय ! ये कैसा बसंत आया री
जब सब सुमन मन के कुम्हला गए
रंग सारे बेरंग हो गए

किसी एक रूप पर जो थिरकती थी
उस पाँव की झाँझर टूट गयी
जिस आस पर उम्र गुजरती थी
वो आस भी अब तो टूट गयी
अब किस द्वार पर टेकूं माथा
किस सजन से करूँ आशा
जब मन की बाँसुरी ही रूठ गयी

हाय ! ये कैसा बसंत आया री
जब मन की कोयलिया ही न कुहुकी
सरसों की सुवास न ह्रदय महकी
एक पिया बसंती के जाने से
मेरी सुबह साँझ न चहकी

कह सखि
किस आस की बदरिया पर कहूँ -
आया बसंत, उमग उमग हुलसो री
मन मयूर झूमो री
जब श्रृंगार सारे रूठ गए
उनसे मिलन के शहर सारे छूट गए

हाय ! ये कैसा बसंत आया री
अब के बरस न मेरे मन भाया री

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (12-02-2020) को    "भारत में जनतन्त्र"  (चर्चा अंक -3609)    पर भी होगी। 
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'