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मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

श्रीमद्भागवद्गीता से ....................

श्रीमद्भागवद्गीता के सातवें अध्याय के २३ वे श्लोक की व्याख्या स्वामी रामसुखदास जी ने कुछ इस प्रकार की है...............

श्लोक

परन्तु उन अल्पबुद्धि वाले मनुष्यों को उन देवताओं की आराधना का फल अन्तवाला(नाशवान) ही मिलता है । देवताओं का पूजन करने वाले देवताओं को ही प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मेरे को ही प्राप्त होते हैं।

व्याख्या


देवताओं की उपासना करने वाले अल्पबुद्धि मन्ष्यों को अन्तवाला अर्थात सीमित और नाशवान फल मिलता है। यहाँ शंका होती है कि भगवन के द्वारा विधान किया हुआ फल तो नित्य ही होना चाहिए फिर उसको अनित्य फल क्यूँ मिलता है? इसका समाधान ये है कि एक तो उनमें नाशवान पदार्थों की कामना की और दूसरी बात , वे देवताओं को भगवान से अलग मानते हैं । इसलिए उनको नाशवान फल मिलता है । परन्तु उनको दो उपायों से अविनाशी फल मिल सकता है ------एक तो वे कामना न रखकर देवताओं की उपासना करें तो उनको अविनाशी फल मिल सकता है और दूसरी बात ,वे देवताओं को भगवान से भिन्न न समझकर , अर्थात भगवत्स्वरूप ही समझकर उनकी उपासना करें तो यदि कामना रह भी जायेगी तो भी समय पाकर उनको अविनाशी फल मिल सकता है अर्थात भगवत्प्राप्ति हो सकती है ।

फल तो भगवान का विधान किया हुआ है मगर कामना होने से वो नाशवान हो जाता है । कहने का तात्पर्य ये है कि उनको नियम तो अधिक धारण करने पड़ते हैं पर फल सीमित मिलता है परन्तु मेरी आराधना में इन नियमों की जरूरत नही है और फल भी असीम और अनंत मिलता है । इसलिए देवताओं की उपासना में नियम अधिक और फल कम और मेरी आराधना में नियम कम और फल अधिक और कल्याणकारी हो , ऐसा जानने पर भी जो मनुष्य देवताओं की उपासना में लगे रहते हैं वो अल्पबुद्धि हैं।

देवताओं की उपासना करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरी उपासना करने वाले मेरे को इसका अर्थ है कि मेरी उपासना करने वालों की कामना पूर्ति भी हो सकती है और मेरी प्राप्ति भी हो सकती है अर्थात मेरे भक्त सकाम हों या निष्काम , वे सब के सब मेरे को ही प्राप्त होते हैं परन्तु भगवान की उपासना करने वालों की सब कामना पूर्ण हो जायें ऐसा नियम नहीं है । भगवान उचित समझेंगे तो पूरी कर देंगे अर्थात जिसमें भक्त का हित होगा वो तो पूरा कर देंगे और अहित होने पर जितना भी रो लो , पुकार लो वो उसे पूरा नही करते।
भगवान का भजन करने वाले को भगवान की स्मृति रहती है क्यूंकि ये सम्बन्ध सदा रहने वाला है अतः भगवान को प्राप्त करने पर फिर संसार में लौट कर नही आना पड़ता परन्तु देवताओं का सम्बन्ध सदा रहने वाला नही है क्यूंकि वह कर्मजनित है। इसलिए संसार में फिर लौटकर आना पड़ता है।

सब कुछ भगवत्स्वरूप ही है और भगवान् का विधान भी भगवत्स्वरूप है ----------ऐसा होते हुए भी भगवान से भिन्न संसार की सत्ता मानना और अपनी कामना रखना --------ये दोनों ही पतन के कारण हैं। इनमें से यदि कामना का सर्वथा नाश हो जाए तो संसार भगवत्स्वरूप दिखने लग जाएगा और यदि संसार भगवत स्वरुप दिखने लग जाएगा तो कामना मिट जायेगी।

11 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

ACHCHHA LAGA APAKA YAH ANDAJ BHI!

AlbelaKhatri.com ने कहा…

साधु ! साधु !

बहुत ही अर्थपूर्ण और निर्मल पोस्ट ...

आपका धन्यवाद !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर उपदेश है।
आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

sada ने कहा…

बहुत ही अच्‍छा प्रयास है और प्रस्‍तुति भी, बधाई ।

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

-एक तो वे कामना न रखकर देवताओं की उपासना करें !!
lekin ismein bhi ek catch hai....
...wo ye ki !!
agar hum ye kaamna rakhein ki kya pata koi kaamna na rakhne se meri kaamna poori ho jaiye? baat atpati lag sakti hai aapko par jaara soochein to mantavya samajh jaiyenge....

Baanki post main kya comment karoon?
bus kho sa gaya hoon kahin !!
teesri baar padhoon to chain mile ....
hahahaha

रंजना ने कहा…

Is kalyaankari chintan ki prastuti ke liye kotishah aabhar...

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

भगवद गीता जी के इस श्लोक की व्याख्या सटीक है .. | ये श्लोक महत्वपूर्ण है ... पर इसका सही अर्थ सब जगह नहीं मिल पाता है ...
बहुत बहुत धन्यवाद... सटीक व्याख्या पढने को मिली ...

अर्शिया ने कहा…

इस ज्ञानवर्द्धक के लिए आभार।
--------
स्त्री के चरित्र पर लांछन लगाती तकनीक।
चार्वाक: जिसे धर्मराज के सामने पीट-पीट कर मार डाला गया।

Prem Farrukhabadi ने कहा…

aap ka yah prayaas sachmuch safal prayas hai.badhai!!

Rakesh Kumar ने कहा…

अति सुन्दर व्याख्या की है आपने.आपकी कृपा से सुन्दर ज्ञान प्राप्त हुआ है मुझे.मै तो आपकी इस पोस्ट से बिलकुल अनजान था. भला हो आपका जो आपने यहाँ तक मुझे पहुँचाया.बहुत बहुत आभार.

B.P.Taneja ने कहा…

good better best
it is a great pleasure to read SwamiRaamSukhDaas ji Maharaaj,
but
how many readers have understood it
or how many are trying to understand it
I am trying to understand it
HariBol