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मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

ये किस मोड़ पर ?.............भाग ४

गतांक से आगे .........................
निशि ने राजीव से वादा लिया कि वो उसकी पूरी बात ध्यान से सुनेगा और उसे समझने की कोशिश करेगा , उसके बाद कोई फैसला लेगा और फिर निशि ने दिल पर पत्थर रखकर , अकेलेपन से उपजी त्रासदी की पूरी दास्ताँ राजीव को सुना दी , निशि का एक- एक शब्द पिघले सीसे की तरह राजीव के कानों में उतरा , उसे यूँ लगा जैसे हजारों बम एक साथ उसके सर पर फोड़ दिए गए हों. सारी बात सुनकर राजीव सन्न रह गया. वो तो सपने में भी नहीं सोच सकता था कि निशि उसके साथ ऐसा भी कर सकती है. वो तो बेफिक्र होकर काम पर चला जाता था ताकि अधिक से अधिक सुख -सुविधाएं अपने परिवार को दे सके. क्या निशि पर विश्वास करके उसने ठीक नहीं किया? क्या पति -पत्नी  के रिश्ते की डोर इतनी कमजोर होती है कि एक ही आंधी उसे उडा ले जाये ?क्या उसकी निशि के ख्यालों में उसके सिवा किसी और का भी स्थान है ---------इन बातों  ने तो जैसे राजीव के मन पर ना भरने वाला घाव कर दिया. उसकी तो वो हालात हो गयी कि जैसे एक ही पल में उसे किसी ने राजा से रंक बना दिया हो . राजीव समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे. उसके प्यार में कहाँ कमी रह गयी थी कि निशि दिल-ओ-जान से चाहने वाले पति से भी बेवफाई कर बैठी. इसके बाद कई दिन तक निशि और राजीव के बीच ख़ामोशी छाई रही और इसी हालत में दोनों वापस आ गए. 
निशि खुद अन्दर ही अन्दर छटपटा रही थी  . उसे समझ नहीं आ रहा था कि अगर ये बात उसके जवान होते बच्चों को पता चल गयी तो वो उनसे निगाह कैसे मिलाएगी. बच्चे तो सिर्फ माँ बीमार है -------इतना ही जानते थे . अब तो निशि  आत्मग्लानि के बोझ तले और भी ज्यादा दब गयी. उधर राजीव उससे कोई बात ही ना करता. घर का माहौल देखने में तो शान्तिपूर्ण था मगर भीतर ही भीतर लावा धधक रहा था बस ज्वालामुखी के विस्फोट का इंतज़ार था.
और फिर एक दिन राजीव कुछ कागज़ लेकर निशि के पास आया और उससे दस्तखत करने को कहा . जब निशि ने कागज़ खोले तो उन्हें पढ़ते ही उसे लगा जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली हो. वो तलाक के कागज़ थे. निशि वहीँ कटे पेड़ सी गिर पड़ी. काफी देर बाद जब उसे होश आया तो वो खूब रोई , गिडगिडायी  , काफी माफ़ी मांगी राजीव से मगर राजीव ने उसकी एक ना सुनी. वो कहते हैं ना विश्वास की डोर बहुत ही कच्चे धागे की बनी होती है और एक बार यदि टूट जाये तो जुड़ना मुमकिन नही होता. निशि की बेवफाई से आहत राजीव अब निशि के साथ नहीं रहना चाहता था और ना ही किसी तरह का शोर -शराबा करना चाहता था बस शान्तिपूर्वक निशि से अलग हो जाना चाहता था. वो नहीं चाहता था कि इस बात का किसी को पता चले और जग- हंसाई हो और उसके बच्चों पर बुरा असर पड़े. वो निशि के रहने -खाने की भी भरपाई करने को तैयार था बस तैयार नहीं था तो सिर्फ साथ रहने के लिए. राजीव चाहता तो माफ़ कर भी देता निशि को मगर निशि की बेवफाई उसे एक पल भी चैन से जीने ना देती और पल- पल मरने से अच्छा है उस रिश्ते की आहुति दे दी जाये क्यूंकि जब भी निशि सामने आती उसे वो बातें याद आ जातीं और वो भी अपना चैन खो बैठता और फिर बच्चे कौन संभालता , यही सोचकर राजीव ने तलाक का फैसला लिया. निशि को अपने किये पर इतना पछतावा था कि वो राजीव से नज़रें भी नहीं मिला पा रही थी और उस पर तलाक के कागजों ने तो उसकी रही सही हिम्मत भी तोड़ दी. 
क्रमशः ..........................

10 टिप्‍पणियां:

LIMTY KHARE लिमटी खरे ने कहा…

अरे भई अब जल्‍दी से पूरी की पूरी कहानी लगा भी दीजिएगा, हर बार सस्‍पेंस ही ससपेंस, कब तक करना होगा इंतजार यह भी तो बता दें, पर कहानी वाकई बहुत अच्‍छी और बांध कर रखने वाली है, बहुत बहुत बधाई स्‍वीकार करें

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

वाह वंदना जी कहानी और ज्यादा भावुक होती जा रही है,,, निशि की हालत पर तरस आ रहा है ,,,,, मगर मनोज की भी मनोस्थिति समझ सकता हूँ ,,, तभी तो कहते है की व्यक्ति को अपनी मर्यादाये साध कर चलना चहिये और हमारी परिवार व्यवस्था इन्ही पर तो टिकी है ,,, जिनके खत्म हो ते ही यह तास के पत्तो की तरह ढह जाति है
सादर
प्रवीण पथिक
९९७१९६९०८४

Shekhar kumawat ने कहा…

bahut khub

मीत ने कहा…

कहानी ने मोड़ अच लिया है लेकिन निशि और राजीव के दिलों के हाल को हम यहाँ तक महसूस कर रहे हैं...
उम्मीद है की अंत अच्छा ही होगा...
मीत

वाणी गीत ने कहा…

कहानी बहुत ही रोचक अंदाज में आगे बढ़ रही है ....आज एक साथ सारी कड़ियाँ पढ़ी ...निशि और राजीव दोनों के लिए ही इस स्थिति से उबरना मुश्किल रहा होगा ....
अभी सस्पेंस बना हुआ है ...!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपका एक प्रयास तो काफी सफल हो रहा है!
यह कहानी इसकी सफलता की साक्षी दे रही है!

Suman ने कहा…

nice

Udan Tashtari ने कहा…

जिस बात का मुझे डर था, वही हुआ.

आगे बताओ अब!!

sangeeta swarup ने कहा…

कहानी के चरों अंक पढ़े.... ओह कितना कुछ हो जाता है इस आभासी दुनिया में...ज़रूरत है खुद को जागृत रखने की....बहुत मार्मिक कहनी बन पड़ी है....नया मोड बहुत से प्रश्न ले कर आया है....दोनों ही पत्रों के साथ सहानुभूति होती प्रतीत होती है....काश नायक खुले दिल से निशि की पहली खता को माफ कर सके.....अब देखना है आगे क्या होता है.....???

बहुत अच्छी कहानी चल रही है...कहानी से पाठक बंधा रहता है अंत तक ...बहुत बढ़िया

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

wah....