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गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

एक सत्य ---------५० वीं पोस्ट

प्यार
इश्क 
मोहब्बत
प्रेम 
सब 
कर 
लिया
मगर 
फिर
भी 
खुदा
ना मिला 
जब 
खुद 
को
नेस्तनाबूद 
किया
 तब
"मैं "
ना 
मिला
बस 
"खुदा "
ही 
था 
वहाँ

21 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

सही है !!

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

bhut sachhi baat kahi aapne jab tak mai ka saarajy rahta hai uska abhaas hota hai aur jab mai khatm hota hai uska ki vaas dikhta hai
saadar
praveen pathik
9971969084

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

सचमुच सत्य।
--------
गुफा में रहते हैं आज भी इंसान।
ए0एम0यू0 तक पहुंची ब्लॉगिंग की धमक।

महफूज़ अली ने कहा…

बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट....

राकेश कौशिक ने कहा…

comment moderation किसलिए

राकेश कौशिक ने कहा…

सोलह आने सही "अहम्" ख़त्म तो इंसान क्या ईश्वर से सरोकार भी संभव है

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

इस परम सत्‍य के लिए आभार.

50 वीं पोस्‍ट की शुभकामनांए.

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

बहुत खूब वंदना जी , और फिर ऐसा खुदा किस काम का ?

LIMTY KHARE लिमटी खरे ने कहा…

हा हा हा बहुत खूब क्‍या बात कही है बिल्‍कुल सोलह आने सत्‍य, बधाई

Shekhar Kumawat ने कहा…

badhai aap ko is ke liye

kshama ने कहा…

Vandana, bahut achhee,gahan rachna hai..aur yah meelka patthar..50...mubarak ho!

sangeeta swarup ने कहा…

सुन्दर भाव.....इस " मैं " को ही तो खतम करना बहुत मुश्किल है...

M VERMA ने कहा…

बहुत खूब
50वी पोस्ट -- इतनी जल्दी
मुबारक हो

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

"खुदा "
ही
था
वहाँ


सत्य का बोध कराती रचना!
50वीं पोस्ट के लिए बधाई!

Suman ने कहा…

nice

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

वाह.. क्‍या बात है वन्‍दना जी । आपने तो आज बहुत सुन्‍दर रहस्‍यवादी कविता कह दी जो बहुत ही अच्‍छी लगी । बधाई और साधुवाद ।।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

अपने भीतर का सत्य खोज पाना आसान नहीं....और इसे बाहर खोज लेना मुमकिन ही नहीं.
५० वीं पोस्ट की बधाई............लेखन को और पचासे प्रदान करें....
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

अति सुन्दर सत्य का बोध कराती एक अद्दभुत रचना

http://athaah.blogspot.com/

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

this is one of your best...

congrats for the 50th one.

Udan Tashtari ने कहा…

५० वीं पोस्ट की बहुत बधाई और नेक शुभकामनाएँ. जल्द ऐसे ही बेहतरीन रचनाओं के साथ शतक पूरा करें.

अरुणेश मिश्र ने कहा…

जो पार है
परे है
परात्पर है
वह क्या है ?
सब कुछ पा लेने के बाद
मिलता है
सब कुछ दे देने के बाद ।
वन्दना जी आपने असीम को छू लिया रचना मे ।