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रविवार, 19 जनवरी 2014

अदभुत आनन्दमयी बेला


अद्भुत आननदमयी बेला सखि री 
अद्भुत निराली छटा 
ना नाम ना धाम ना काम कोई 
भूल गयी मै कौन भयी 
कैसी निराली थी वो घटा 
सखि री अदभुत आनन्दमयी बेला 

इक क्षण में थी घटना घटी 
न आवाज़ हुयी न बिजली चमकी 
वो तो ज्योतिपुंज बन प्रकट हुयी 
और कर गयी मुझे निहाल सखी री 
 अदभुत आनन्दमयी बेला 

अब आनंद सिंधु बन गयी 
अपनी सुध बुध भूल गयी 
ऐसी थी वो श्यामल छटा 
कर गयी आत्मविभोर सखी री 
 अदभुत आनन्दमयी बेला 

3 टिप्‍पणियां:

Vaanbhatt ने कहा…

गहन अभिव्यक्ति...

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (20-01-2014) को चर्चा कथा में चर्चाकथा "अद्भुत आनन्दमयी बेला" (चर्चा मंच अंक-1498) पर भी होगी!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सूबेदार जी पटना ने कहा…

भाव विभोर करने वाली
बहुत सुंदर कबिता--।