पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

सोमवार, 2 जून 2014

असार में फिर सार कहाँ ढूंढते हो ?

आकंठ डूबने के बाद 
सूख गयी नदी 
वाष्पित हो गया 
उसका सारा जल 
बची रही जलती रेत 
रेत पर छितरायी 
आड़ी तिरछी  धारियाँ 
जो चिन्हित करती रहीं 
कभी बहा करती थी 
एक मदमाती लहराती बलखाती 
उच्छ्रंखल नदी इस प्रदेश में 

जहाँ एक उम्र के बाद
बचती नहीं निशानियाँ भी 
सूख जाता है सकोरे का सारा पानी 
और उग आती हैं कँटीली झाड़ियाँ 
वहाँ 
सिर्फ निशानदेहियों पर ही 
उगाई जाती हैं नयी सभ्यताएं 
बिना जाने कारण और निवारण 
नदियों के गुप्त हो जाने का 


उसी तरह 
जीवन से एक उम्र के बाद 
क्या प्रेम के अणु भी इसी तरह विध्वंसित होते हैं 
और होते रहते हैं निशानदेही पर पुनः पुनः निर्माण 
बिना जाने कारण और निवारण 
सृष्टि चक्र का चलते जाना अनवरत 
किस बात का सूचक है 

क्या सिर्फ इतना भर कि 
'प्रेम'  महज एक जीवनयापन का दिशासूचक भर है 
बंधु 
असार (संसार) में फिर सार कहाँ ढूंढते हो ?




4 टिप्‍पणियां:

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

असार = संसार, जानकारी में नहीं था।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (03-06-2014) को "बैल बन गया मैं...." (चर्चा मंच 1632) पर भी होगी!
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Shalini Rastogi ने कहा…

संसार की इसी असारता में ही समस्त सार छिपा है ... और प्रेम उस सारता का सूचक है ... गहन दर्शन को समेटे सुन्दर भावाभिव्यक्ति !

Ankur Jain ने कहा…

उसी तरह
जीवन से एक उम्र के बाद
क्या प्रेम के अणु भी इसी तरह विध्वंसित होते हैं
और होते रहते हैं निशानदेही पर पुनः पुनः निर्माण
बिना जाने कारण और निवारण
सृष्टि चक्र का चलते जाना अनवरत
किस बात का सूचक है

क्या सिर्फ इतना भर कि
'प्रेम' महज एक जीवनयापन का दिशासूचक भर है
बंधु
असार (संसार) में फिर सार कहाँ ढूंढते हो ?

जीवन के बेहद गहन मर्म को व्यक्त करती सुंदर रचना।।।