पेज

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

मंगलवार, 24 जून 2014

धर्म ----- एक यंत्र ?



विविधताओं से भरे हमारे देश में धर्म को एक ऐसा यंत्र बना दिया गया है जिसके दम पर जैसा चाहे धार्मिक उन्माद पैदा किया जा सकता है । आज लोग जानते ही नहीं कि धर्म का वास्तविक अर्थ है क्या बस दो धर्मों में बाँटकर लोगों की भावनाओं से खेलना भर इनका मकसद रह गया है । यदि देखा जाए तो किसी भी धर्म में धर्म की सिर्फ़ एक व्याख्या मिलेगी कि किसी भी तरह इंसान को इंसान बनकर , मिलजुल कर रहना आ जाए , उसमें से ईर्ष्या , द्वेष , लोभ , मोह और अहंकार की प्रवृत्तियाँ दूर हो जाएं । कोई धर्म ये नहीं कहता कि यदि मनुष्य दूसरे धर्म को मानता है तो वो गलत है । सबसे ऊँचा धर्म इंसानियत और मानवता की सेवा है और आज कुछ धर्म के ठेकेदार एक बार फिर देश में धार्मिक उन्माद फ़ैलाने की कोशिश में हैं सिर्फ़ ये कहकर कि साईं भगवान नहीं थे या उन्हें भगवान मानना पाप है या उनकी पूजा पाप है । ऊपर से कहते हैं कि वो मर चुके हैं वो तो इन्सान थे तो  अब उन्हें भगवान क्यों माना जाए । 

कोई इनसे पूछे यदि ऐसा ही है तो हिन्दू धर्म में भी तो राम हों या कृष्ण ये भी इंसान ही थे तो इन्हें क्यों भगवान माना जाए ? 

क्यों ये धर्म के ठेकेदार बडे बडे पदों पर विराजमान होकर राम भजो कृष्ण भजो का उपदेश देते हैं ? 

क्या इन्हें ये नहीं सोचना चाहिये जो बात एक धर्म के लिए लागू होती है वो ही दूसरे पर भी लागू होगी । तुम्हारे तो इंसान रूप में जन्मे भगवान नहीं और हमारे भगवान , ये कैसे संभव है ? 

दूसरी बात धर्म तो आस्था और विश्वास का संगम होता है उसके लिए किसी को कहना नहीं पडता कि इस धर्म को मानो उसे नहीं । ये तो मानव की स्वतंत्रता है कि उसकी आस्था कहाँ परिपक्व होती है । धर्म मनवाए नहीं जाते जबरदस्ती धार्मिक होना एक भावना है और वैसे भी भाव में ही भगवान बसते हैं फिर कोई किसी भी रूप में पूजे तभी तो आज पत्थर में भगवान पूजे जाते हैं , वृक्षों में भगवान पूजे जाते हैं तो क्या किसी ने इन्हें देखा है ? नहीं न मगर इंसान की आस्था है जो उन्हें प्रेरित करती है लेकिन आज के कुछ धर्म के ठेकेदार जाने क्या सिद्ध करना चाहते हैं जो इस तरह के बेबुनियाद प्रचार कर जनमानस की भावनाओं से खेल रहे हैं । 

मेरे ख्याल से तो उन्हें ही धर्म के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान नहीं क्योंकि वैसे भी हिन्दू धर्म में कहीं नहीं कहा गया कि गैर धर्म को मानना गलत है जबकि सांई बाबा ने न तो स्वंय कभी कहा कि वो भगवान हैं सिर्फ़ एक शब्द कहते थे सबका मालिक एक अर्थात उनसे ऊपर कोई शक्ति है जिससे समस्त संसार संचालित होता है फिर उन बातों को तोड मरोड कर गलत अर्थ देने का क्या औचित्य ? 

क्या यही धर्मगुरु अपने उपदेशों में कबीर और रहीम की वाणी नहीं सुनाया करते ? 

क्या कबीर और रहीम दूसरे धर्म के नहीं थे ? 

अरे ईश्वर का प्यारा सबका प्यारा होता है और ईश्वर को तो अपने सभी बच्चे प्यारे हैं ऐसे में कैसे इंसान उन्हें धर्म के नाम पर बाँट सकता है । आज ये समझना बहुत जरूरी है कि ये धर्म के ठेकेदार इंसान को हमेशा बाँटते आये हैं और हम इनके कुचक्रों में न फ़ँसकर अपनी आस्था के साथ जीवन यापन करते रहें क्योंकि यहाँ तो साफ़ नज़र आ रहा है सारा चक्कर ट्रस्ट की सम्पत्ति का है और उस पर उनकी निगाह है इसलिये ये सारा बवाल पैदा किया जा रहा है जबकि यदि देखा जाए तो हिन्दुओं के भगवानों के भी ट्रस्ट हैं और वहाँ का पैसा कितनी जगह तो मुसलमानों के पास ही जाता है क्योंकि उन्होने ही खोजे थे हमारे भगवान फिर वैष्णों देवी हों या अमरनाथ सुना है कि उनकी पीढी में ही जाता है फिर वो उसका प्रयोग चाहे जैसे करें यानि लोगों की भलाई मे या जैसे चाहे । यदि उस वक्त उन्होने नहीं बताया होता तो क्या हमें पता चलता आज तक भी कि माता वैष्णों देवी या अमरनाथ के बारे में मगर जाने क्यों हमारे हिन्दू धर्म के पुरोधा अपना कौन सा स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं और आम लोगों की भावनाओं को भडकाना चाहते हैं । 

जनता को चाहिये कि इनकी बातों में न आये और अपने विवेक से सोचे सही और गलत के बारे में ये नहीं कि जिसने जिस दिशा में हाँक दिया चल दिए बल्कि आज की जनता बहुत जागरुक हो गयी है इसलिये जरूरी है कि वो इन बेबुनियाद फ़तवों पर ध्यान न दे और सही निर्णय ले जिससे देश और समाज की शांति भंग न हो । 

अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए जनता की भावनाओं से खेलना क्या धर्म के ठेकेदारों को शोभा देता है ? ये एक विचारणीय प्रश्न है क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि जब इनके चेहरों से एक एक करके नकाब उतरते दिखें तो लोगों का इन पर से विश्वास ही उठ जाए फिर वो आसाराम हों या शंकराचार्य । कोई भी कार्य या संदेश ऐसा नहीं होना चाहिये जो मानव की धार्मिक आस्था पर प्रहार करे क्योंकि ये जनता तभी तक साथ है जब तक आप उसकी भावनाओं से नहीं खेल रहे जिस दिन कुछ तथाकथित ऐसा करने लगेंगे और जनता की भावनाओं से खेलेंगे इन्हें कहीं जगह नहीं मिलेगी फिर कहाँ चलायेंगे ये अपने धर्म की ठेकेदारी ? अब इन्हें ये भी समझना जरूरी है । 

आज जरूरत है इन तथाकथितों को समझने की सबसे पहले धर्म के वास्तविक अर्थ को फिर उपदेश दें यूँ ही नहीं बेबुनियाद बात कर लोगों की आस्था से खेलें। 


हमें चाहिए कि हम धर्म को कुछ कठमुल्लाओं के हाथ का यंत्र नहीं बनने दें और अपने विवेक को जागृत रखें वरना सभी जगह सिर्फ़ धर्म को लेकर युद्ध होते रहे हैं और उसमें नुकसान सिर्फ़ आम जनता का ही हमेशा हुआ है । 

8 टिप्‍पणियां:

Shoonya Akankshi ने कहा…

Vandana Gupta जी,
मैंने ' शून्य चौरा ' के अंतर्गत अभी एक रचना लिखी थी, आपकी टिप्पणी पढ़कर मुझे लगा कि आपकी बात भी पढ़नी चाहिए …… पढ़कर बहुत ख़ुशी हो रही है कि धर्म के ठेकेदारों के खिलाफ आपने भी बहुत बेबाकी से कलम चलाई है । मैंने जो कुछ पद्य के माध्यम से लिखने की कोशिष की लगभग वही उसी अंदाज में आपने गद्य में विस्तार से लिखा है । अब मैं आश्वस्त हूँ कि जब आप जैसी लेखिका मौजूद हैं तो हिन्दुओं को ये ठेकेदार इतनी आसानी से अपना पिछलग्गू नहीं बना सकते । इतना सुन्दर और सार्थक लेख लिखने के लिए आपको बधाई ।
सप्रेम
शून्य आकांक्षी

सूबेदार जी पटना ने कहा…

आप यही बात इस्लामिक देशो मे कहे तो अच्छा रहेगा केवल हिन्दुओ को मानता का उपदेश देकर देश को बाटने का प्रयत्न मत करिए। देश बहुत इस्लामिक अत्याचारों को सह चुका है और इस समय भी देश इनसे परेशान है

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

Sanju ने कहा…

बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
बधाई

नई पोस्ट
पर भी पधारेँ।

Neeraj Kumar Neer ने कहा…

सुन्दर आलेख, वैसे भी इनकी बातें सुनता कौन है.. इनके शिष्य महा आदरणीय श्श्री श्री दिग्विजय सिंह और उनके कारनामों से तो विश्व परिचित ही हो चुका है. चुनाव के पहले भी ये सज्जन अपनी आड़ी तिरछी टिप्पणियों के लिए चर्चा में आ चुके हैं. कोई इनसे पूछे ईश्वर क्या है और उसका manifestation अगर कभी होता है तो किस रूप में होता है..

कालीपद प्रसाद ने कहा…

आपने सही क़हा , वास्तव में धर्म ठेकेदारों को धर्म का सही अर्थ या तो पता नहीं या जानबुझ कर गलत अर्थ लगाकर जनता को गुमराह किया जाता है ताकि उनकी दुकानदारी चलती रहे |धर्म वे करनीय कर्म हैं जिससे ईश्वर तक पहुंचा जा सके|जिसे वे धर्म कहकर दूकान की तरह चला रहे है ,ये तो अलग अलग मत है या रास्ता है |अब साईं बाबा के बताये रास्ते में अधिक लोग चलने लगे तो शकाराचार्य को तो ईर्षा होना स्वाभाविक है | उनकी धंधा को खतरा पैदा हो गया है |आखिर वह भी तो एक इंसान है | बहुत अच्छा लिखा ,सटीक लिखा आपने |
उम्मीदों की डोली !

Vaanbhatt ने कहा…

समझने की आवश्यकता है कि...हम हैं तो खुदा भी है...

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति