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सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

जाने तेरे मन में क्या है समाया

कभी बासंती बयार सा उमड़ता है 
कभी पतझड़ी मौसम सा झरता है 
मेरे जीवन के हर आरोह अवरोह में 
कभी बांसुरी की तान सा लरजता है 

कहीं कृपा के खजाने खोल  देता है 
कहीं विष को भी अमृत कर देता है 
अजब तेरी माया अजब तेरी लीला 
कहीं गरीब की पांत में मुझे ही रखता है 

क्या मैं काबिल नहीं जो मेरी बारी 
अपनी  कृपा के रूप बदल देता है 
और एक प्रश्नचिन्ह की सलीब पर 
मेरा  ही अक्स टांग देता है 

जाने तेरे मन में क्या है समाया...........माधव !!!

4 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

बहुत अच्छा !
गोस्वामी तुलसीदास

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

यही तो ईश्वर की अलौकिकता है जिसे समझ पाना कठिन है।

Kailash Sharma ने कहा…

उसकी मर्जी को समझना बहुत कठिन है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

Rs Diwraya ने कहा…

बहुत सुन्दर
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