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शनिवार, 26 जनवरी 2013

योगक्षेम वहाम्यहम तुमने ही तो कहा ना ………



जब आत्मज्ञान मिल जाये
उसमे और खुद में ना
कोई भेद नज़र आये 
बस तब साक्षी भाव से 
दृष्टा बन जाओ 
और देखो उसकी लीला 
हाथ पकडता है या छोडता 
पार उतारता है या डुबोता 
कर दिया अब सर्वस्व समर्पण 
फिर कैसा डर ……… 
योगक्षेम वहाम्यहम तुमने ही तो कहा ना ………
तो अब तुम जानो और तुम्हारा काम 
ना मेरी जीत इसमे ना हार
जो है प्रभु तुम्हारा ही तो है
जीव हूँ तो क्या 
घाटे का सौदा कैसे कर सकता हूँ 
आखिर तुम्हारा ही तो अंश हूँ 


अब देखें क्या होता है 

वो कौन सी नयी लीला रचता है

घट - घट वासी 

कब घट को समाहित करता है 

जहाँ ना घट हो ना तट हो
 
बस एक आनन्द का स्वर हो



बस उसी का इंतज़ार है 


जहाँ दूरियाँ मिट जायें 

इक दूजे मे समा जायें 

भेद दृष्टि समता मे बदल जाये 

वो वो ना रहे 

मै मै ना रहूँ 

कोई आकार ना हो 

बस एक ब्रह्माकार हो 

आनन्दनाद हो

सब अन्तस का विलास हो

जब शब्द निशब्द जो जाये 


अखंड समाधि लग जाये 

आनन्द ही आनन्द समा जाये 

ज्योति ज्योतिपुंज मे समा जाये 

बस वो तेजोमय रूप बन जाये 

ये धारा ऐसी मुड जाये 

जो खुद राधा बन जाये 

तो कैसे न कृष्ण मिल जाये 

वो भी उतना खोजता है 

जितना जीव भटकता है 

वो भी उतना तरसता है 

ब्रह्म भी जीव मिलन को तडपता है

जब आह चरम को छू जाये 

वो भी मिलन को व्याकुल हो जाये 

तो कैसे धीरज धर पाये 

खुद दौडा दौडा चला आये

यूँ  मिलन को पूर्णत्व मिल जाये ………




देखें क्या होता है ? कब वो भी मिलन को तरसता है कब हमारे भाव उसे

 विचलित करते हैं………बस उस क्षण का इंतज़ार है।



रविवार, 20 जनवरी 2013

ये तो था परदे के सामने का सच ……………


दिशाहीन सडकें , दिशाहीन राहें और चलना उम्रभर का । एक सी दिनचर्या ………वो ही खाना , पीना और सोना …………कुछ नही हो करने को ………ऐसे मे माध्यम बना सोशल मीडिया । चल पडी वो उस डगर पर खुद को अभिव्यक्त करने ………शुरुआत लडखडाते कदमों से , संभल - संभल कर जैसे कोई बच्चा पहली बार खडे होकर आगे कदम रखने की कोशिश करता हो …………बार- बार गिरना, ठोकर खाना और संभलना बिल्कुल ज़िन्दगी की तरह …………और एक दिन दौडने लगी ………छपास के रोग से पीडित हो गयी ………आये दिन छपने लगी, सराही जाने लगी क्योंकि सोच तो समय से परे थी , क्योंकि ठाठें मार रहा था एक सागर उसके सीने में अभिव्यक्त होने को, क्योंकि सच कहती थी चाहे कडवा होता था, क्योंकि खुद उस पीडा से गुजरती थी , खौलती थी , खदकती थी तब कहीं दे पाती थी शक्ल किताब को , तब कहीं जाकर फ़ूँक पाती थी प्राण निर्जीव शब्दों में और यही उसके लेखन की सबसे बडी उपलब्धि थी जिसके कारण एक छोटी पहचान बना पायी थी  मगर फिर भी कुछ कमी सी थी जो अन्दर ही अन्दर खा रही थी वजूद को घुन की तरह …………शायद सोशल मीडिया माध्यम हो सकता है मगर मंज़िल नही ये समझ आ गया था और यहाँ भी तो जीवन एकतरफ़ा सा ही हो गया था उस मछली की तरह जिसे ज़ार मे डालो तो लगता है यही समुन्द्र है और बडे होने पर तालाब में डालो तो उसे लगता है यही सागर है मगर कुछ और बडा होने पर नदी मे डालो तो फिर उसी को सागर समझ बैठती है तब तक जब तक सागर मे नही उतरती है ………मगर वहाँ तक पहुँचने से पहले जरूरत है उसे उसके काबिल बनने की और यही वो घुन है जो उसकी छोटी- छोटी उपलब्धियों मे घुन बनकर बैठ गया है…………संतुष्ट नहीं है ………नहीं चाहियें उसे सिर्फ़ अपने सिर के ऊपर वाला आकाश, नही चाहिये उसे सिर्फ़ अपने घर के ऊपर वाला आकाश जो सीमित है उसकी निगाह की दूरी तक ………उसे तो चाहिए सारा आकाश जो असीमित है, अपरिमित है ………पह्चान की सीमा तक, उपलब्धि के आकाश तक ……


तब तक विद्रोह जारी है मेरे आकाश में …………मुझसे मेरा विद्रोह …………क्या पायेगा मुकाम………प्रश्नचिन्ह बन खडा है सम्मुख …………और मैं निरुत्तर हूँ …………भाग रही हूँ खुद से………और उपलब्धियों के आकाश का जगमगाता सितारा मैं नहीं ……मैं नहीं ………मैं नहीं ……

सोचते सोचते शुभ्रा हताशा के गहन अन्धकार मे डूब गयी………विलीन हो गयी सागर मे बूँद सी ………हमेशा हमेशा के लिये।

ये तो था परदे के सामने का सच ……………

मगर परदे के पीछे के सच को जानने के लिये खुद को बेपर्दा करना पडता है इसलिये वो नहीं कर पायी समझौता खुद से, आज की होड भरी दुनिया से, आज के दोगले चेहरों से, साहित्य के घटा जोड से, विवादों के दामन से, साहित्य के नाम पर फ़ैली दु्श्चरित्रता से, पैसे और पहुँच के दम पर सम्मान पाने के गुणा भाग से , खुद को प्रसिद्धि तक पहुँचाने के लिये अपनाये जाने वाले हथकंडों से फिर चाहे उसके लिये खुद की ही छीछालेदार क्योँ ना करवानी पडे या दूसरों एक चरित्र के बखिये ही क्यों ना उधेडने पडें या कुछ विवादास्पद ही क्यों ना लिखना पडे उन सी ग्रेड हीरोइनों की तरह जो जिस्म के बल पर पहचान बनाती हैं कुछ उसी तरह का लिखना नहीं लिख पायी , नही कर पायी समझौते उस आदिम सोच से जहाँ स्त्री होकर इतना कडवा सच उसने कैसे लिख दिया इसे उसे साबित करना पडे वो भी इस पुरुष सत्तात्मक साहित्यिक समाज में जिस पर सिर्फ़ उसका एकाधिकार है , कैसे उसकी कलम चल गयी बोल्ड विषयों पर और खोल दिये उसने सारे भेद जो बेशक पहले भी कहे गये हैं मगर हमेशा एक पुरुष द्वारा ही फिर चाहे कामसूत्र हो या उर्वशी या मेघदूत आखिर उसकी हिम्मत कैसे हुयी बोल्ड विषय पर लिखने की ……नहीं उतर पायी वस्त्रहीनता की आखिरी हद तक , नहीं अपना पायी ऐसे हथकंडे प्रसिद्धि के जंगल के ………क्योंकि
नही चुरा सकती थी वो सत्य से आँख
यदि चुरा लेती तो उम्र भर
नहीं मिला सकती थी खुद से आँख़

और इस तरह परदे के पीछे के भयावह सच के कारण एक उभरता सितारा हमेशा के लिये लुप्त हो गया और दे गया सूरज अपना ये आखिरी पैगाम अस्त होने से पहले ……

क्या किया ज़िन्दगी में
कुछ भी तो नहीं
क्या पाया ज़िन्दगी में
कुछ भी तो नहीं
क्या रही ज़िन्दगी की उपलब्धि
कुछ भी तो नहीं

ज़िन्दगी को जिया
बिना लक्ष्य
जो भी मिला
सब अनचाहा
खुद की चाहत क्या
पता नहीं या मिलती नहीं

अजीब उहापोह में भटकती है ज़िन्दगी
सिर्फ खाना , पीना और सोना
उससे इतर भी कुछ है
जिसकी हसरत में भटकती है ज़िन्दगी
मगर क्या ............यही नहीं जान पाते

अपनी पहचान क्या
कुछ भी तो नहीं
एक अदद पहचान के लिए
जूझती है ज़िन्दगी
मगर हर किसी को न मिलती है ज़िन्दगी

तलाश में हूँ ...............
भटकाव जारी है ..............
जाने किस पैमाने में जाकर छलकेगी ज़िन्दगी
तब तक
हाशिये पर खड़ी है ज़िन्दगी

पहचाने पाने को आतुर उपलब्धिहीन वजूद चिने हैं वक्त की सीमेंटिड दीवारों में …………

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम



मैं राख का अंतिम श्वास बन जाती .......जो तुम होते
मैं मुखाग्नि का अंतिम कर्म बन जाती .......जो तुम होते
मैं कच्चे घड़े संग चेनाब पार कर जाती .......जो तुम होते
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


जो तुम होते ........एक श्वास धरोहर बन जाती
जो तुम होते ........एक कर्म की मुक्ति हो जाती
जो तुम होते ........एक मोहब्बत परवान चढ़ जाती
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम


हो सकता ऐसा मुमकिन .........गर हम होते
ऋतु बसंत  भी मदमाती .........गर हम होते
एक दीपशिखा जल जाती ........गर हम होते
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


अश्रुबिंदु ना कभी ढलकाते ...........जो प्रियतम होते
विरह अगन ना कभी सताती ........जो प्रियतम होते
इश्क की ना दास्ताँ बन पाती ........जो प्रियतम होते
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


ना तुम होते ना हम होते ........ये सृष्टि किस पर मदमाती
ना तुम होते ना हम होते .......ये प्यास अधूरी रह जाती
ना तुम होते ना हम होते .......तो प्रेम में अपूर्णता रह जाती
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


अच्छा हुआ जो ना मिले कभी .........खोजत्व पूर्ण हो जाता
अच्छा हुआ जो ना मिले कभी .........निजत्व पूर्ण हो जाता
अच्छा हुआ जो ना मिले कभी .........शिवत्व पूर्ण हो जाता
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम


अधूरी प्यास, अधूरा तर्पण , अधूरा जीवन .........जरूरी था
जीवन की इकाइयों दहाइयों में अधूरापन ..........जरूरी था
प्रेम का अपूर्ण ज्ञान , अपूर्ण आधार .............जरूरी था
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 


अपूर्णता में सम्पूर्णता का आधार ही तो 

व्याकुलता को पोषित करता है .......सत्य था , है , रहेगा
जन्म जन्म की प्यास का अधूरापन ही तो 

घूँट भरने को लालायित करता है .......सत्य था , है , रहेगा
मिलन पर विरह का स्वाद ही तो 

ह्रदय रुपी जिह्वा को आनंदित करता है...........सत्य था , है , रहेगा
ओह ! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

हाय! कैसी है ये प्रेम के बाजूबंद की अठखेलियाँ…………


धडकनों के मौन आकाश पर
गुंजित तुम्हारा प्रेमराग
स्पन्दित कर नव चेतना भर गया
और शब्द झंकृत हो गये
भाव निर्झर बह गये
हाय! कैसी है ये प्रेम के बाजूबंद की अठखेलियाँ……………मोहन !

प्रीत की पौढी पर
अंकित तुम्हारे पाद पद्म
ह्रदयांगन अवलोकित कर गये
और तरंगें प्रवाहित हो गयीं
प्रीत अमरबेल सी सिरे चढ गयी
हाय! कैसी हैं ये मन मधुप की चिरौरियाँ ……………मोहन !


तुम्हारे प्रेम मे
नील वसना धरा बन
श्यामल चादर ओढ गयी
और देखो तो ज़रा अब
मैं भी श्यामल हो गयी
श्याम मन
श्याम तन
श्याम रंग
श्याम नयन
श्याम वसन
सुबह शाम सब श्याममय हो गये
हाय! कैसी हैं ये श्याम की श्यामल छवियाँ …………मोहन !

सोमवार, 7 जनवरी 2013

मेरी अँखियाँ हैं नीर भरी



मेरी अँखियाँ हैं नीर भरी
बिहारी जी अब क्या और अर्पण करूँ
मेरी अँखियाँ ......................

सुना है तुम हो दया के सागर
फिर क्यों रीती मेरी गागर
मेरी तो आस है तुम्ही से बंधी
बिहारी जी अब क्या और अर्पण करूँ
मेरी अँखियाँ .......................

दरस को अँखियाँ तरस गयी हैं
बिन बदरा के बरस रही हैं
और कैसे मैं तुम्हें प्रसन्न करूँ
बिहारी जी अब क्या और अर्पण करूँ
मेरी अँखियाँ.....................

सुना है तुम हो श्याम सलोना
मेरे मन में क्यूँ ना बनाया घरौंदा
अब कैसे मैं धीर धरूँ
बिहारी जी अब क्या और अर्पण करूँ
मेरी अँखियाँ ....................

जन्म जन्म की मैं हूँ प्यासी
तेरे चरनन की मैं हूँ दासी
मेरी बारी ही क्यों देर करी
बिहारी जी अब क्या और अर्पण करूँ
मेरी अँखियाँ हैं नीर भरी.............

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

है ना अचरज ...........



मेरे पास
कुरान की आयतें नहीं
जो बांच सकूँ
गीता का ज्ञान नहीं
जो बाँट सकूँ
शबरी के बेर नहीं
जो खिला सकूँ
मीरा का प्रेम नहीं
जो रिझा सकूँ
राधा सा समर्पण नहीं
जो अपना बना सकूँ
फिर भी तुम अपना बना लेते हो
है ना अचरज ...........मोहन !

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

सिर्फ़ एक झलक दिखा जाओ


सुना है कान्हा
निधि वन मे रास रचाते हैं
गोपियों को नाच नचाते हैं
मै गोपी बन कर आ गयी
मुझे मिले ना श्याम मुरारी
मेरी चुनर रह गयी कोरी
श्याम ने खेली ना प्रीत की होरी
ललिता से प्रीत बढाते हैं
राधा संग पींग बढाते हैं
हर गोपी के मन को भाते हैं
पर मुझसे मूँह चुराते हैं
और मुझे ही इतना तडपाते हैं
ये कैसा रास रचाते हैं
जिसमे मुझे ना गोपी बनाते हैं
मेरी प्रीत परीक्षा लेते है
पर अपनी नही बनाते हैं
और मधुर मधुर मुस्काते हैं
अधरों पर बांसुरी लगाते हैं
मुझे ना बांसुरी बनाते हैं
सखि री
वो कैसा रास रचाते हैं
मुझे मुझसे छीने जाते हैं
पर दूरी भी बनाते हैं
पल पल मुझे तडपाते हैं
उर की पीडा को बढाते हैं
पर पीर समझ ना पाते हैं
हाय्………श्याम क्यों मुझसे ही रार मचाते हैं
बृज गोपिन की धूल भी
न मुझे बनाते हैं
लता पता ही बना देते
कुछ यूं ही अपना मुझे बना लेते
मेरी चूनर मे अपनी
प्रीत का दाग लगा देते
मै भी मतवारी हो जाती
चरण कमल मे खो जाती
उनकी दीवानी हो जाती
इक मीरा और  बना देते
मुझे श्याम रंग मे समा लेते
तो उनका क्या घट जाना था
मान ही तो बढ जाना था
और मुझे किनारा मिल जाना था
अब कश्ती भंवर मे डोल रही है
मनमोहन को खोज रही है
आ जाओ हाथ पकड लो सांवरिया
मै तो हो गयी तेरी बावरिया
मुझे अपनी जोगन बना जाओ
प्रीत मे अपनी भिगा जाओ
एक झलक दिखा जाओ
सिर्फ़ एक झलक दिखा जाओ
हर आस को पूरण कर जाओ
प्रेम परिपूरण कर जाओ
प्रीत को परवान चढा जाओ
श्याम बस इक बार झलक दिखा जाओ……………।

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

" नदी हूँ फिर भी प्यासी "

 
ए .....ले चलो 
मुझे मधुशाला  
देखो
कितनी प्यासी है मेरी रूह
युग युगांतर से
पपडाए चेहरे की दरारें
अपनी कहानी आप कर रही हैं
कहीं तुमने अपनी आँखों पर
भौतिकता का चश्मा
तो नहीं लगा लिया
जो आज तक तुम्हें
मेरी रूह की सिसकती
लाश का करुण  क्रंदन
न सुनाई दिया 
और मैं
युगों युगों से
जन्म जन्म से
अपनी रेत के
तपते रेगिस्तान में 
मीन सी तड़प रही हूँ
प्यास पानी की होती
तो शायद
रेगिस्तान में भी
कोई चश्मा ढूंढ ही लेती
मगर तुम जानते हो
मेरी प्यास
उसका रूप उसका रंग
निराकार होते हुए भी
साकार हो जाती है
और सिर्फ यही इल्तिजा करती है
ए .........एक बार सिर्फ एक बार
प्रीत की मुरली बजाते
मेरी हसरतों को परवान चढाते 
इस राधा की प्यास बुझा जाओ
हाँ ..........प्रियतम
एक बार तो दरस दिखा जाओ
बस .............और कुछ नहीं
कुछ नहीं चाहिए उसके बाद 
तुम जानते हो अपनी इस नदी की प्यास को
फिर चाहे कायनात का आखिरी लम्हा ही क्यों न हो
बस तुम सामने हो ..........और सांस थम जाए 
इससे ज्यादा जीने की चाह नहीं ...........
ए ...........एक बार जवाब दो ना
क्या होगी मेरी ये हसरत पूरी ........... रेगिस्तान की इस रेतीली नदी की

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

इकतरफ़ा प्रेम के स्वामी


इकतरफ़ा प्रेम के स्वामी
करते हो अपनी मनमानी
राधे को आधार बनाया
यूँ अपना पिंड छुडाया
सभी गोपियन को भरमाया
कैसा तुमने जाल बिछाया

सही कहा ………इकतरफ़ा प्रेम के स्वामी

क्या नही हो मोहन?
तुमने तो प्रेम करना जाना ही नहीं
बस सब तुम्हें चाहें
और तुम ना किसी को चाहो
उस पर तुर्रा ये कि
सिर्फ़ मुझे चाहो
बाकी सारी दुनिया छोड दो
वाह रे गुरुघंटाल
खूब धमाचौकडी तुमने मचायी है
पहले खुद संसार रचाया
उसमें इंसान बनाया
उसे कर्म का पाठ पढाया
भाईचारे की शिक्षा दी
और जब उसने वो मार्ग अपनाया
तब तुमने अपना रंग दिखलाया
मुझे चाहना है तो सबको छोड दो
वाह ……क्या कहने तुम्हारे
और तब भी तुम मिलो ना मिलो
ये भी तुम्हारी मर्ज़ी
तुम दरस दो ना दो
ये भी तुम्हारी मर्ज़ी
जब सब तुम्हारी ही मर्ज़ी से होना है
तो क्यों इंसान पर दोष लगाते हो
वो तो तुम्हारी तरफ़ आता है
फिर उसे पुआ हाथ मे ले
बार - बार दिखाते हो
जो जब तुम्हारी तरफ़ आता है
तो संसार मे फ़ंसाते हो
उसके प्रलोभन दिखाते हो
और जब तुमसे दूर जाता है
तो अपनी तरफ़ बुलाते हो
अजब ढंग तुमने अपनाये हैं
मोहन ये कैसे खेल रचाये हैं
बस तुम्हें तो खेल खेलना है
खिलौना हमें बनाये हो
तभी तो इकतरफ़ा प्रेम में फ़ंसाये हो
मगर खुद नहीं फ़ँसते हो …………जादूगर !
बस यही तुम्हारा तिलिस्म है
यही तुम्हारा जादू है
सब भ्रमित रहते हैं
तुम्हारे मोहजाल मे फ़ंसते हैं
और तुम्…………नटवर !
नट की तरह करतब दिखाते हो
और प्रेमी को
इकतरफ़ा प्रेम की सूली पर चढाते हो
यहाँ तक कि
राधा को भी भरमाते हो
तुम्हें सर्वस्व बनाया राधे
जो तुम्हें पूजेगा वो ही मुझे पायेगा
आहा! क्या भ्रमजाल फ़ैलाया
सबको एक ही जाल मे उलझाया
और खुद सारी डोरियाँ हाथ में पकडे
सारथि बने प्रेम के घोडों को
ऐंड लगाते कैसे मुस्काते हो
मोहन ! ये चित्ताकर्षक मुस्कान बिखेरे
तुम खेल तो खूब रचाते हो
मगर देखो ……
पकडे भी जाते हो ……पकडे भी जाते हो ……है ना :)

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

मैं शून्यकाल का अगीत …………



मैं शून्यकाल का अगीत
तुम हो मोहन मेरे मीत


नृत्य करूँ या झांझर बजाऊँ
कहो तो मोहन कैसे रिझाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


बन मीरा गली गली अलख जगाऊँ
या राधा सी बावरिया बन जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


देहपुंज को कैसे बिसराऊँ
तुम पर कैसे वारी जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


कौन सी कहो महावर रचाऊँ

जो तुम्हारे साधिकार दर्शन पाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………

कैसे आँख का अंजन बन जाऊं

जो तेरे नैनों की शोभा बढ़ाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …

कौन सा वो हार बन जाऊँ

जो तेरे गले से मैं लिपट जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …

कौन सा वो बांस बन जाऊँ

जो मुरली बन अधरों से लिपट जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …

कहो तो चरणों की रज बन जाऊँ

पायलिया बन उनसे लिपट जाऊँ
अब तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


अंधेरी राह का दीप बन जाऊँ
निराकार को साकार बनाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


ह्रदय वेदना कैसे बुझाऊँ
कहो मोहन कौन सी गंगा नहाऊँ
जो तेरे दर्शन मैं पाऊँ
अब तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


मोहिनी मूरत पर वारी जाऊँ

श्याम तुम पर बलिहारी जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


कैसे माया का पर्दा गिराऊँ
जो तुझे साकार मैं पाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


कैसे अपना आप मिटाऊँ
जो तुझमे खुद को समाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


कह निर्झर बहता दरिया बन जाऊँ
बस ह्रदय कुंज मे तुम्हें बसाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


सुधि ना तेरी कभी बिसराऊँ
बस श्याम नाम के ही गुण मैं गाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


रसना को नाम का चस्का लगाऊँ
बस सांसों की सरगम पर रटना लगाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


जब भी तेरी गली का फ़ेरा लगाऊँ
बस सलोने मुखडे के दर्शन पाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


एक शून्य मे तुम मिल जाओ
तुम्हें पाकर एक शून्य मै बन जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


दृष्टि सृष्टि विलीन हो जाये
एक तेरा ही अक्स रह जाये
जिसमे मै एकाकार हो जाऊँ
अब तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


आकुलता व्याकुलता का चरम हो
वो क्षण जीव का परम हो
जब तेरे दिव्य दर्शन पाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


कालगति भी वहीं ठहर जाये
जब परमसत्य मे मैं मिल जाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …………


कैसे घट को घट में समाऊँ

घटाकाश को व्यापक बनाऊँ
कुछ तो बोलो मेरे मनमीत
मै शून्यकाल का अगीत …

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

मीरा होना आसान नही



मीरा होना आसान नही
मीरा बन जाओ तो बताना
देखो तुम्हे एक दिन है दिखाना
मीरा यूँ ही नही बना करतीं
श्याम को पति यूँ ही वरण नही किया करतीं
प्रेम दीवानी , मतवाली बन
गली गली यूँ ही अलख नही जगाया करती
मीरा बनने से पहले
खुद को मिटाना होगा
मीरा बनने से पहले
श्याम को रिझाना होगा
मीरा बनने से पहले
विष पी जाना होगा
ना केवल पीने वाला
बल्कि सांसारिक कटु
आलोचनाओं का विष
संबंधियों द्वारा ठुकराये जाने का विष
अपनों के विश्वास के
उठ जाने का विष
क्या तैयार हो तुम
ए कर्मभूमि के वासियों
मीरा बनने के लिए........
जहाँ पति को पत्नी में
सिर्फ औरत ही दिखती है
जहाँ औरत में समाज को
एक अबला ही दिखती है
जहाँ सिर से पल्लू उतरने पर
बवाल मच जाया करता है
जहाँ कन्याओं को गर्भ में ही
मार दिया जाता है
तो कभी चरित्रहीन करार
दिया जाता है
तो कभी प्रेम करने के जुर्म में
ऑनर किलिंग की सजा का
हकदार बना दिया जाता है
तो कभी अकेली स्त्री से
व्यभिचार किया जाता है
फिर चाहे वो किसी भी उम्र की क्यों ना हो
बच्ची हो या बूढी या जवाँ
सिर्फ लिंग दोहन की शिकार होती है
और उफ़ करने की भी
ना हक़दार होती है
क्या ऐसे समाज में
है किसी में हिम्मत मीरा बनने की
गली गली विचरने की
है मीरा जैसा वो पौरुष
वो ललकार , वो आत्मसमर्पण
जिसने अपना सर्वस्व श्याम को अर्पित कर दिया
और निकल पड़ी हाथ में वीणा संभाले
जिसे ना संसार में श्याम के अलावा
दूजा पुरुष दिखा
ऐसा नहीं कि उस वक्त राहें सरल थीं
शायद इससे भी गयी गुजरी थीं
नारी के लिए तो हमेशा समाज की दृष्टि
वक्र ही रही है
तो क्या मीरा ने ये सब ना झेला होगा
जरूर झेला होगा
किया होगा प्रतिकार हर रस्म-ओ-रिवाज़ का
और दिया होगा साथ अपने श्याम का
फिर कैसे वो विमुख रह सकते थे
कैसे ना वो मीरा का योगक्षेम वहन करते
लेकिन सर्वस्व समर्पण सा वो भाव
आज तिरोहित होता है
बस हमारा ये काम हो जाये
हमारा वो काम हो जाए
इसी में हम जीवनयापन करते हैं
तो कैसे मीरा बन सकते हैं
कैसे श्याम को रिझा सकते हैं
मीरा बनने के लिए मीरा भाव जागृत करना होगा
और मीरा भाव जागृत करने के लिए
मीरा को आत्मसात करना होगा
और मीरा को आत्मसात करने के लिए
खुद को राख बनाना होगा
और उस राख का फिर तर्पण करना होगा
तब कहीं जाकर मीरा का एक अंश प्रस्फुटित होगा
तब कहीं जाकर मीरा भाव से तुम्हारा ह्रदय द्रवीभूत होगा
यूँ ही मीरा नहीं बना जाता
यूँ ही नहीं श्याम को रिझाया जाता


मंगलवार, 27 नवंबर 2012

क्योंकि अगर होती सच्चाई तो देते जवाब जरूर ................


इबारतों के बदलने का समय यूँ ही नहीं आता
एक जूनून से गुजरना पड़ता है इतिहासकारों को
और तुमने मुझे विषय सबसे दुरूह पकड़ा दिया
देखती हूँ
कर जाते हो कानों में सरगोशी सी और
मैं ढूंढती रहती हूँ उसके अर्थ
क्या कहा था
कहीं गलत तो नहीं सुन लिया
क्या चाहा  तुमने
कभी कभी पता ही नहीं चलता
आज भी तुमने कुछ कहा था
तब से बेचैन हूँ
पकड़ना चाह  रही हूँ सिरा
बात प्रेम की थी
तुम्हारे खेल की थी
कैसे भूलभुलैया में डाला है तुमने
मुझसे प्रेम करो
मगर मैं न तुम्हें चाहूँगा
और तुम करो निस्वार्थ प्रेम
वैसे सोचती हूँ कभी कभी
यदि निस्वार्थ प्रेम करना ही है
तो तुमसे ही क्यों
सुना है प्रेम प्रतिकार चाहता है
प्रेमी भी चाहत की परिणति चाहता है
अच्छा बताओ तो ज़रा
कैसा खेला रचाया है तुमने
बस मुझे खोजो
कोई चाहत न रखो
निस्वार्थ चाहो
अब मेरी मर्ज़ी
मैं मिलूँ या नही
दिखूं या नहीं
ये ज्यादती नहीं है क्या
कोई तुमसे करे तो ............
मगर तुमने प्रेम किया ही नहीं कभी
किया होता तो दर्द को जाना होता
और हम मूढ़ हैं न कितने
बिना तुझे देखे तेरे दीवाने हो गए
और अब तुम अपनी चलाते हो
अजब मनमानी है
तुम पर कोई है नहीं न
कान उमेठने के लिए
एक तरफ भुलावे में रखते हो
कर्त्तव्य को ऊंचा बताते हो
दूसरी तरफ कहते हो
मानव मात्र से प्रेम करो
और जब वो प्रेम करता है
तो उसे कहते हो
आपस में प्रेम नहीं
दिव्य प्रेम करो
अरे ये क्या है
है न तुम्हारी दोगली नीति
कैसे संभव हो सकता है ऐसा
जो संस्कार बचपन से पड़े हों
उनसे कैसे छूट सकता है इन्सान
जिसने सदा प्रेम का पाठ  पढ़ा हो
कैसे इन्सान से विमुख हो सकता है
और सिर्फ तुम्हें चाह सकता है
जिसे कभी देखा नहीं
बस सुना है तुम्हारे बारे में
क्या प्रेम खिलवाड़ है तुम्हारे लिए
कि तुम्हें तो बिना देखे करे
और जिनके साथ
बचपन से लेकर एक उम्र तक
तक साथ निभाया हो
उन्हें भूल जाए उनसे प्रेम न करे
और उस पर कहते हो
अब सबसे मुख मोड़ लो
क्या इतना आसान हो सकता है
सब जानते हो तुम
बस हमें ही गोल - गोल
अपनी परिधि में घुमाते हो
लगता है तुमने ऐसा
अपनी सहूलियत के लिए किया है
तभी सामने नहीं आते
बस भरमाते हो
दिव्य प्रेम के नाम पर
क्योंकि सामने आने पर
प्रेम का उत्तर प्रेम से देने पर
घाटे  का सौदा कर लोगे
और रात  दिन सबकी
चाहतों को  पूरा करने में ही लगे रहोगे
आम इन्सान की तरह
और तुम्हें आम इन्सान बनना पसंद नहीं है
तभी खास बने रहते हो
डरते हो तुम
और देखो हमें
कैसे दो नावों की सवारी कराते हो
सोचो ज़रा
दो नावों का सवार कब सागर के पार उतरा है
ये जानते हो तुम
इसलिए अपने मायाजाल में उलझा रखा है
और खुद तमाशा देखते हो
ओ उलझनों के शहंशाह
या तो बात कर
सामने आ
और प्रेम का अर्थ समझा
मगर यूँ कानों में
हवाओं में
सरगोशियाँ मत किया कर
नहीं समझ पाते हम
तेरी कूटनीतिक भाषा
अगर इंसानी प्रेम से ऊंचा तेरा प्रेम है
तो साबित कर
आ उतरकर फिर से धरती पर
और दे प्रेम का प्रतिकार प्रेम से
रहकर दिखा तू भी हमारी तरह
दाल रोटी के चक्कर में फंसकर
और फिर दे प्रेम का उत्तर प्रेम से
और करके दिखा निस्वार्थ प्रेम
गोपी सा प्रेम, राधा सा प्रेम, मीरा सा प्रेम
तब रखियो ये चाहत
कि  प्रेम करो तो निस्वार्थ करो
या दिव्य प्रेम करो
कभी कभी तुम्हारी ये बातें कोरी  भावुकता से भरी काल्पनिक लगती हैं
क्योंकि अगर होती सच्चाई तो देते जवाब जरूर ................

शनिवार, 24 नवंबर 2012

क्या करते हो तुम ऐसों का ?


देखो प्रभु
सुना है तुमने 
दीनों को है तारा
बडे बडे पापियों 
भी है उबारा
जो तुम्हारे पास आया
तुमने उसका हाथ है थामा
और जिसने तुम्हें ध्याया
उसके तो तुम ॠणी बन गये
जन्म जन्मान्तरों के लिये
तुम खुद कहते हो
फिर चाहे गोपियाँ हों या राधा
तुम उनके प्रेमॠण से 
कभी उॠण नही हो सकते
ये तुमने ही कहा है
मगर मेरे जैसी का क्या करते हो

देखो मै तो नही जानती कोई
पूजन, अर्चन, वन्दन
मनन, संकीर्तन
ना ही कोई 
व्रत , उपवास , नियम करम करती
ना दान  पुण्य मे विश्वास रखती
ना दीनों पर दया करती
क्यूँकि खुद से दीन हीन किसी को ना गिनती
तुम्हारे बताये किसी मार्ग पर नहीं चलती
ना सुमिरन होता
ना माला जपती
ना तुम्हें पाने की लालसा रखती
ना तुम्हे बुरा भला कहती
ना ही गुण है कोई मुझमें
और अवगुणों की तो खान हूँ
बेशक अत्याचार नही करती
मगर तुम्हें भी तो नही भजती
ना मीरा बनती ना राधा
ना शबरी सी बेर खिलाती
ना विदुरानी से प्रेम पगे केले खिलाती
ना बलि सा तुम्हें बांधने 
का प्रयत्न करती
ना भाव विभोर होकर
नृत्य करती
ना पीर इतनी ऊँची करती
जो तुझसे ट्करा जाये
ना ही वन वन भटकती
ना कोई तपस्या करती
ना पाँव मे छाले पड्ते
ना जोगन बनती
और गली गली भटकती
ना तुम्हें बुलाती
ना तुम्हारे पास आती
ना तुम्हारा कहा कुछ सुनती
ना ही तुम्हारा कहा मानती
अपनी ही मन मर्ज़ी करती
बताओ तो ज़रा मोहन प्यारे
ऐसों के साथ तुम क्या करते हो?

क्या मिले हैं तुम्हें
मुझे जैसे भी कोई
जो तुमसे कोई 
आस नही रखते
और ना ही तुम्हें भजते 
क्या करते हो तुम ऐसों का
क्योंकि सुना है
जो जैसे भी तुम्हारे पास आया
चाहे प्रेम से
चाहे मैत्री से
चाहे शत्रुता से
चाहे किसी भी भाव से
चाहे तुम्हें सखा बनाया
चाहे पति या पिता
चाहे बालक या माँ
तुमने सबका उद्धार किया
शत्रु भाव रखने वाले को भी
तुमने तार दिया
अपना परम धाम दिया
मगर मै तो ना तुम्हारे 
पास आती हूँ
ना तुमसे कुछ चाहती हूँ
तो बताओ ना मोहन
मुझ जैसों का तुम क्या करते हो?

क्या मुझ जैसों को भी
वो ही गति देते हो
या दे सकते हो
और खुद को सबका 
हितैषी सुह्रद सिद्ध कर सकते हो
वैसे सुना तो नहीं
ना कहीं पढा
कि तुमने बिना कारण 
किसी को तार दिया हो
और मेरी जैसी
अकर्मण्य तुम्हें 
दूसरी नही मिलेगी
जो तुम्हारी सत्ता को ही
चुनौती देती है

हाँ ---आज कहती हूँ 
नही कर सकती
मैं तुम्हारा श्रृंगार
ना है मेरे पास 
आंसुओं की धार
नही कर सकती
अनुनय विनय
क्या फिर भी कर सकते हो
तुम मुझे भवसागर पार
मोहन हो इस प्रश्न का जवाब
तो जरूर देना
मुझे इंतज़ार रहेगा
क्योंकि 
बिना कारण के कार्य नही होता
और मैने ना कोई 
तुम्हारे अनुसार कार्य किया
हो यदि ये चुनौती स्वीकार
तो सिर्फ़ एक बार
तुम जवाब देने जरूर आना
क्योंकि
कोई परीक्षा देने का
मेरा कोई इरादा नहीं है
ना ही तुमसे कोई
वादा लिया है
बस आज तुम्हें ये भी
चैलेंज दिया है
ये भाव यूँ ही नही 
उजागर हुआ है
कोई तो इसका कारण हुआ है
शायद
तभी आज तुम्हारे चमन पर
बिजलियों का पहरा हुआ है
बच सको तो बच जाना …………

शनिवार, 17 नवंबर 2012

अरे मैं कौन ?


अरे मैं  कौन 
सब  उसी  का  है 
सबमे  उसी  का  वास  है 
वो  ही  प्रस्फुटित  होता  है  शब्द  बनकर

अंतर्नाद जब बजता है
सुगम संगीत का प्रवाह 
मन तरंगित करता है 
इसमें भी तो 
वो ही निवास करता है 
हर राग में
हर तरंग में 
हर ध्वनि में 
वो ही तो प्रस्फुटित होता है सरगम बनकर 

प्रणव कहूं या मैं कहूं
उच्चारित तो वो ही होता है 
ना मैं का लोप होता है
ना मैं का अलोप होता है
हर निर्विकार में 
हर साकार में
सिर्फ उसी का आकार होता है 
फिर कैसे ना कहूं 
ब्रह्मनाद के आनंद में
वो ही तो आनंदित होता है आनंद बनकर 

कहो अब 
किसका दर्शन होता है
कौन सा दृश्य होता है
कौन द्रष्टा होता है
सब दृष्टि का विलास होता है
वास्तव में तो 
ब्रह्म में ही ब्रह्म का वास होता है ब्रह्म बनकर .....ज्योतिर्पुंज बनकर 

बुधवार, 14 नवंबर 2012

निर्मोही !मेरा श्याम कितने रंग बदलता है



निर्मोही !मेरा श्याम
कितने रंग बदलता है
कभी मीरा बन संवरता है
कभी राधा बन हँसता है
यूँ भी कभी अकडता है
बिन माखन ना पिघलता है
देख तो सखी!
निर्मोही !मेरा श्याम
कितने रंग बदलता है

पिताम्बरी ओढा करता है
कनेर का फूल लगाया करता है
अधरों पर बांसुरी को
सजाया करता है
अपनी तिरछी चाल से
सबको लुभाया करता है
देख तो सखी
निर्मोही !मेरा श्याम
कितने रंग बदलता है

जन्म जन्म की दासी हूँ
उसके दरस की प्यासी हूँ
ये सब वो जाना करता है
फिर भी छुपा फ़िरता है
विरहाग्नि बढाता है
लुकाछिपी का खेल उसे
बहुत भाता है
देख तो सखी
निर्मोही !मेरा श्याम
कितने रंग बदलता है

छलिया छल छल जाता है
फिर भी सबको लुभाता है
बस यही रंग तो उसका भाता है
जो उसकी तरफ़ दिल खिंचा खिंचा जाता है
देख तो सखी
निर्मोही !मेरा श्याम
कितने रंग बदलता है

बावरिया बनाया करता है
जोग दिलाया करता है
प्रेम का रोग लगाया करता है
देख तो सखि फिर कैसे
इठलाया फ़िरता है
निर्मोही !मेरा श्याम
कितने रंग बदलता है


यही तो अदा निराली है
जिस पर हर गोपी बलि्हारी है
कहने से ना चूकती है
वो सिर्फ़ मेरा है
जबकि जानती है बावरी
वो या तो किसी का नहीं
या फिर सबका है
कैसे कैसे बावरा बना नचाता है
अद्भुत खेल दिखाता है
तभी तो नटवर कहलाता है
देख तो सखि
निर्मोही !मेरा श्याम
कितने रंग बदलता है

शनिवार, 10 नवंबर 2012

समर्पण ,प्रश्नोत्तरी ------पुकार, उलाहना ……3


ये तीसरा भाव
उलाहना

सभी गोपियाँ तुझे हैं प्यारी
वंशी की धुन ऐसी बजायी
सारी गोपियाँ दौड़ी आयीं
मेरी बारी श्याम क्यों देर लगायी
कब से तुमसे टेर लगायी
अंखिया मेरी राह तकत हैं
जन्म जन्म से बाट जोहत हैं
फिर क्यूँ ना प्रेम धुन मुझे सुनाई
क्यूँ ना वंशी ने आवाज़ लगायी
मेरी याद ही क्यूँ बिसरायी
माना हूँ मैल की गागर
भक्ति का ना लगाया काजल
फिर भी आस जोह रही हूँ
सुना है तुम हो दया के सागर
दीन हीन पापियों को सदा है तारा
फिर मेरी बार क्यूँ मुँह है मोड़ा
वंशी तुम्हारी सभी को बुलाती
नाम ले लेकर आवाज़ लगाती
क्या मेरा नाम भूल गए हो
या रास्ता अपना पलट गए हो

ना जाने कौन सा शास्त्र लिखवा रहे हो
जो उहापोह में फँसा रहे हो
कभी अमावास का चाँद बन जाते हो
कभी पूनम सा खिल जाते हो
कभी संदेहास्पद बन जाते हो
कभी उत्तरपुस्तिका बन जाते हो
मोहन ना जाने कौन से खेल रच जाते हो
मेरी पीड़ा जो इतनी बढ़ाते हो
अपना आप भी खो बैठती हूँ
तुम्हें ही झिलकारे देती हूँ
फिर भी तुम मुस्काते हो
ना जाने श्याम ये कौन सी लीला दिखाते हो
जब मन बुद्धि चित रूप में
तुम ही व्यापते हो
फिर ये कौन से खेल रचते हो
जो जीव को भ्रमित करते हो
जानती हूँ 
जब सर्वस्व समर्पण किया हो
वहाँ ना किसी चाह का जन्म हुआ हो
फिर भी प्रश्न रूप में
तो कभी संदेह रूप में
आ खड़े होते हो
ये कैसे -कैसे रूप तुम धरते हो
जीव को मायाजाल में उलझाते हो
ये कैसा मिथ्याजाल बिछाते हो
क्या है ये मोहन
कभी लगता है
ये भी तुम्हारी ही चाहत है
जो मेरे मन में उठती है
क्यूँकि बिना तुम्हारी चाह के
ना कोई भावना उठ सकती है
पर दूसरी तरफ तुम ही कहते हो
चाह को प्रबल करो
तभी तुम मिलते हो
मगर मोहन
जिसने अपनी चाह
तुम में मिला दी हो
वो कैसे तुमसे विलग हो
फिर कैसे तुमसे अलग हो
क्यों द्वैत में फंसाते हो
ये भ्रमजाल भ्रमित करता है
जब तुम पूर्ण कहाते हो
तो जिसने स्वयं को समर्पित किया हो
तेरी रज़ा में अपनी रज़ा मिला दी हो
उसकी कहो तो कौन सी चाह बची हो
कभी लगता है 
कोई सूक्ष्म चाह बची है
तभी ये मची खलबली है
गर ऐसा कुछ बचा है 
तो उसे भी मिटा देना
मेरा वासना रुपी वस्त्र हर लेना
मगर श्याम तुम मूँह ना मोड़ लेना
स्वयं में मिलाकर
मुझ अपूर्ण को पूर्ण कर देना
देखो मुझसे उम्मीद मत करना
मेरा वश तो यहीं तक चलता है
अब सब तुम्हारी कृपा पर ही 
निर्भर करता है
ना पहले उद्योग किया
ना अब कर सकती हूँ
तुम सब जानते हो
जैसी भी अधम पापिन हूँ
बस तुम्हारी ही हूँ
इसे स्वीकार कर लेना
श्याम इस जीव का भी उद्धार कर देना
तुम्हारा कुछ ना घटेगा
बस एक नाम और तुम्हारे यश में जुड़ेगा
मगर इस जीव का उद्धार हो जायेगा
इसका भी बेडा पार हो जायेगा

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

समर्पण ,प्रश्नोत्तरी ------पुकार, उलाहना……2

वो तो हुआ एक भाव ………अब दूजे भाव का है क्या कोई जवाब



प्रश्नोत्तरी ------पुकार

 मेरी बेबसी पर 
अट्टहास करते हो
या तुम भी 
मेरी तरह दुखी होते हो
इम्तिहान लेते हो
या इम्तिहान स्वयं देते हो
मुझे अपराधी ठहराते हो
या स्वयं कटघरे में खड़े होते हो
कभी- कभी समझ नहीं आता
कौन सा न्यारा खेल खेलते हो

मेरी दशा से तुम अन्जान नहीं
तुम्हारी दशा की मुझे पहचान नहीं 
ये भटकाव है या ठहराव
अरे तुम हो कारण
और मैं तुम्हारा कार्य
फिर कहाँ रहा भेद
कहो कैसे हो निवारण
जब तुम में और मुझमे भेद नहीं
फिर कौन किस पर अट्टहास करे
तुम्हारा रचाया खेल
तुम ही इसके सूत्रधार
बताओ फिर कौन और करे उद्धार
तुम ही कारण तुम ही निवारण
तुम ही फूल तुम ही सुगंध
तुम ही बीज तुम ही वृक्ष
तुम ही दृश्य तुम ही दृष्टा
फिर बताओ और कौन है सृष्टा 
एक तुम ही तुम व्यापते हो
हर रूप में
हर भाव में 
हर क्रोध में
हर हँसी में
इर्ष्या, द्वेष, अहंकार
क्षमा, दया, तप
कहो तो किस रूप में तुम नहीं
फिर कौन किससे विलग है
मन , बुद्धि , चित
अहंकार सा रूप ना तुम्हारा है
और जब इस मन में
संकल्प - विकल्प उठते हैं
तो वो रूप भी तो तुम्हारा ही तो हुआ ना
तुमने ही तो कहा ना
हर भाव में मैं ही हूँ
सृष्टि का आदि - अनादि कारण भी मैं ही हूँ
तो फिर अच्छा हो या बुरा
सब तुम्हारा ही तो रूप हुआ 
फिर क्यूँ महामायाजाल में उलझाया है
क्यों प्राणी को इसमें फंसाया है
माना ये रूप भी तुम्हारा है
तो क्यों संकल्पों- विकल्पों का 
तूफ़ान मन में उठाया है
ये मन रुपी भंवर में
जीव को क्यों उलझाया है
ओ मोहन मुक्त करो
इन विकल्पों से हमें दूर करो
अपनी मायाजाल को 
तुम ही समेटो
मत लो ऐसे इम्तिहान
जिसने अपने हर शब्द
हर भाव , हर रूप को
हर सोच को 
तुम्हें ही समर्पित किया हो
और यदि कोई 
खेल खेलना ही है तो
उससे भी तुम ही उबारना
मगर इस जीव को बस
द्रष्टा ही बना कर रखना
उसके मन पर माया का
आवरण ना डालना
प्यारे बस इतनी सी अरज सुन लेना
हम जन्म जन्मान्तरों से भटके जीव
बडी मुश्किल से तुम्हारा पता पाये हैं 
अब तुम्हारी शरण में आये हैं
हमारा उद्धार करो
कल्याण करो
या नैया डुबा दो
सबमे तुम्हारा ही गौरव होगा
मगर जीव का तो अंतिम आसरा
सिर्फ तुम्हारे चरण होगा

क्रमश:………



शनिवार, 3 नवंबर 2012

समर्पण ,प्रश्नोत्तरी ------पुकार, उलाहना……1




समर्पण

प्रभु
ना पुकार में दम है
ना मेरी चाहत प्रबल है
पूजन अर्चन वंदन
सबको त्यागा है
क्या करूँ
कोई राह नहीं दिखती
तुम भी नहीं मिलते
तुम तक पुकार भी नहीं पहुँचती
फिर और किससे उम्मीद करूँ
जब तुम ही नहीं मेरे
फिर संसार तो बेगाना है
इसे कैसे अपना मानूँ
कैसे इससे उम्मीद करूँ
तुझे भी नहीं चाह पाती ना
देख चाह होती
तो ह्रदय फट जाता
तेरे लिए विकल हो जाता
मगर चाहत मेरी 
कमजोर रही
दिन रात अब मैं तड़पती हूँ
श्याम तुझ बिन भटकती हूँ
अब कोई अर्ज नहीं करती हूँ
पापी हूँ जान गयी हूँ
तेरे धाम से तभी तो वंचित हूँ
मेरी व्यथा ना कोई जाना
श्याम तू भी ना मन पहचाना
हम तेरी मायाजाल में 
फँसे नराधम
बता कहाँ जाएँ
किसे पुकारें
कौन सुने
अब पीर हमारी
श्याम मैं ना 
बन सकी तेरी राधा प्यारी 
विरह का व्याकरण 
मैं ना जानी
मीरा सा गायन वादन 
नृत्य कर तुझे रिझाना 
मुझे नहीं आया
शबरी सा निर्मल प्रेम 
ना मैंने जाना
शिकवा शिकायत
करना ना आया
ना तू  ना संसार 
मन को भाया
तभी तो ना तू आया
तेरे फैलाये जाल के 
हम फडफडाते पंछी
तड़पते हैं
मगर जाल ना काट पाते हैं
जब तक ना 
तेरी कृपा पाते हैं
कहीं कोई ठौर दिखे
कहीं कोई आस मिले
उम्मीद की कोई किरण तो दिखे
मगर तुम तो 
छुपे फिरते हो
मुझको ना कहीं दीखते हो
हे नाथ 
अधूरी हूँ
अधूरी ही रहूँगी
जान गयी हूँ
पहचान गयी हूँ
तुम्हारे लायक ना बनी हूँ
शिकवा नहीं
शिकायत नहीं
तड़प नहीं 
चाहत नहीं
अब मेरे पास श्याम कुछ भी नहीं
तुम्हारे चक्रव्यूह में फँस गयी हूँ
तुम्हारे बिछाए जाल में उलझ गयी हूँ
तेरी रज़ा में अपनी रज़ा मिला दी जबसे
श्याम मेरी वाणी ही मूक हो गयी तबसे
बता अब कैसे पुकारूँ
किसे पुकारूँ
कैसे तुझसे शिकायत करूँ श्याम
अब तुम जानो तुम्हारा काम
जी रही हूँ बस लेकर तेरा नाम 
अब अपना बनाओ या ठुकराओ
फिर संसार जाल में उलझाओ
या अपने चरणों में लगाओ
चित को मेरे चुराओ या
चित मेरा भटकाओ
इसे अपने पांसों में उलझाओ
या जीत की बाजी दोहराओ
गंदगी में डु्बोओ या बंदगी की राह चलाओ 
श्याम अब ये तुम ही जानो
डुबाओ या उबारो
मेरी प्रश्नोत्तरी सुलझाओ 
या स्वयं उत्तर बन 
मेरे जीवन में उतर आओ
जीत करो या हार
सब तुम्हारा तुमको ही 
अर्पण करती हूँ
श्याम सर्वस्व समर्पण करती हूँ
अब तुम्हारी बारी है ......श्याम 
मैं तो ये ज़िन्दगी तेरे नाम पर वारी है