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मंगलवार, 1 मार्च 2011

वक्त वक्त की बात है

अरे शिखा कहाँ भागी जा रही है ? ढंग से चप्पल तो पहन ले और फिर बैठकर आराम से नाश्ता कर ले. ये क्या तरीका है भागते- भागते एक कौर मूंह  में और एक हाथ में और दूसरे हाथ में सामान. ये कोई तरीका है कितनी बार कहा है आराम से बैठकर खाया कर मगर तू तो सुनती ही नहीं है. उमा बोले जा रही थी और शिखा फटाफट काम करती जा रही थी और हंसती जा रही थी, अरे माँ, क्यूँ परेशान हो रही हो ? मैंने खा लिया है तुम्हें तो पता है न देर हो रही है और देर से ऑफिस जाउंगी तो डांट पड़ेगी शिखा कहती रही मगर उमा तो अपने ही ख्यालों में थी . बोली , "न जाने क्या होगा तेरा मुझे तो समझ ही नहीं आता, कैसे तेरा गुजारा होगा ? अरे पराये घर भी जाना है , यहाँ तो मैं हूँ सब कुछ पका -पकाया तैयार मिलता है वहां तो तुझे ही सब करना भी पड़ेगा और खुद को जाना भी होगा तब कैसे करेगी"? 
शिखा बोली,"ऐसा कुछ नहीं होगा ,देख लेना, सभी तो होंगे , मिलजुलकर करेंगे तो जल्दी से हो जायेगा सुनते ही उमा बोली , कौन से ख्वाब में जी रही है मेरी बिटिया , आज तक तो मैंने देखा नहीं एक भी ऐसा घर, बस घर की बहू ही सबके लिए काम करे और कमाकर भी लाये . इस पर शिखा बोली, माँ तुम देखना, अब ऐसा कुछ नहीं होने वाला . आज सब  अपना- अपना काम खुद  करते हैं और वहां भी सभी को करना होगा . वो किसी अनोखी मिटटी के नहीं बने जैसे मैं वैसे वो. और फिर आजकल काफी से ज्यादा काम तो मशीनों से ही हो जाते हैं . तुम चिंता मत करो. इस पर उमा बोली , "चिंता ! तेरी तो सबसे ज्यादा चिंता है . खुद को कुछ आता है नहीं कैसे सबको खुश रखेगी? और पति का भी ध्यान रखना पड़ेगा तुझे ही .....सुनते ही शिखा खिलखिलाकर हंस पड़ी और बोली, "मैं ख्याल रखूँगी "? क्यूँ क्या वो कोई दूध पीता बच्चा होगा? सुनकर उमा बोली, " कैसी बात करती है ? पति की जरूरतों का ध्यान रखना ही तो पत्नी का फ़र्ज़ होता है . उसके काम तो करने ही पड़ते हैं".
इतना  सुनना था कि शिखा तिलमिला कर बोली , क्यूँ उसके काम करूँगी, मैं क्या कोई उसकी गुलाम होंगी जो काम करूँगी. अरे माँ, ये बताओ मुझमे क्या कमी है जो मैं घर और बाहर दोनों जगह अपने को पीसती रहूँगी . अच्छे ओहदे पर हूँ , अच्छी तनख्वाह है , किस बात की कमी है मुझमे. और फिर आजकल पति और पत्नी दोनों को मिल जुलकर ही काम करना पड़ता है और करना भी चाहिए तभी ज़िन्दगी आराम से गुजरती है . 
सुनकर उमा बोली , कैसी बातें करती है शिखा , मुझे तो कभी -कभी डर लगता है पता नहीं तेरी कैसे निभेगी? बराबरी  करने से  कुछ नहीं होता .......कितना भी ऊँचा ओहदा हो हर औरत को घर के कामकाज , देखभाल करनी ही पड़ती है . आखिर वो भी तो पैसा  लाता  है घर में  और उसका घर होता है तो क्यूँ नही चाहेगा तुम से ऐसी अपेक्षा कहकर उमा शिखा का मुँह ताकने लगी. माँ , पैसे लाने से ही सब कुछ नहीं होता मैं भी तो लाती हूँ . बराबर के अधिकार और कर्त्तव्य होते हैं दोनों के. कोई छोटा बड़ा नहीं होता पति- पत्नी के रिश्ते में . अब ये बताओ तुमने अपनी बेटी में ऐसी कौन सी कमी देखी जो वो किसी के आगे झुकेगी. जितना वो अपने बेटे पर पैसा खर्च करते हैं क्या तुमने उससे किसी भी तरह कम पैसा खर्चा किया है क्या ? क्या उन लोगों से कम शिक्षा दिलवाई है ? या मुझमे किसी तरह की कोई कमी है ? जब मुझमे कोई कमी नहीं है तो तुम क्यों चिंता करती हो . अब वो ज़माने नहीं रहे . आज स्त्री और पुरुष दोनों कदम से कदम मिलाकर चलते हैं तभी सफलता पाते हैं और तुम देखना मेरे साथ ऐसा ही होगा और बहुत खुशहाल जीवन होगा हमारा . तुम निश्चिन्त रहो , इतना कहकर शिखा तो चली गयी मगर उमा अपनी ही उधेड़बुन में पड़ी रही . उसे चिंता सताती कि इसके ऐसे विचारों के कारण न जाने कैसे इसकी निभेगी ?

मगर वक्त अपनी रफ़्तार से चलता है . शिखा ने जो कहा वो ही करके दिखाया  भी . आज शिखा और रोहित दोनों ही खुशहाल जीवन जी रहे हैं . मिलबाँट कर काम करते हैं बच्चों को भी अच्छी परवरिश दे रहे हैं ये देखकर उमा ख़ुशी से फूली नहीं समाती और सोचती वक्त के साथ सब बदलता है फिर चाहे  सामाजिक मान्यताएं हो या इंसानी सोच. उनके वक्त में तो ऐसा सोच भी नहीं सकते थे मगर आज की पीढ़ी काफी व्यावहारिक हो गयी है और एक दूसरे की जरूरतों को समझती है तभी इतनी कुशलता से घर , ऑफिस , बच्चों और समाज में तालमेल बैठा लेती है . आज की पीढ़ी की कार्यकुशलता , ऊर्जा और हिम्मत देख उमा की सारी सोच को विराम मिल गया था और भविष्य के प्रति वो आश्वस्त हो चुकी थी.

30 टिप्‍पणियां:

शिवकुमार ( शिवा) ने कहा…

बहुत सुंदर रचना .

रश्मि प्रभा... ने कहा…

waqt ko yun hi badalna bhi hota hai...

निर्मला कपिला ने कहा…

sundar prerak kahaanee hai| badhaaI|

anshumala ने कहा…

वंदना जी

हा ये सही है की आज के युवा पत्नी को सहयोग देने के मामले में काफी आगे है किन्तु ज्यादा परेशानी वहा होती है जो युवा ये सोच नहीं रखते है या जहा पर पति के साथ पूरा संयुक्त परिवार होता है | पति तो पत्निका साथ दे देता है किन्तु परिवार के बाकि सदस्य नहीं कर पाते है |

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

Ye Shikha kaun hai:) kahin "Spandan" se naam to nahi chura liya aapne:)

bahut khub!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत ही प्रेरक रचना।

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

सुखद अंत अच्छा लगा वरना हकीकत कुछ और है
दोहरी भूमिका या भूमिका द्वंद्व का चुनाव अभी कामकाजी महिलाओं की व्यथा कथा है

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

शिक्षित महिलाओं की आधुनिक सोच को उजागर कर रहा है यह प्रसंग ! अपने कुछ परिचित अमेरिका में है जब कभी मुलाक़ात होती है तो वे भी बिलकुल यही बात कहते है ! वहाँ इतनी आसानी से कोई नौकर या फिर मेड नहीं मिलती दोनों ही जाने आपस में मिलकर घर का काम करते है !

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही प्यारी सी कहानी...आजकल ऐसा ही हो रहा है..बदलाव धीरे है..पर आ रहे हैं.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपाधापी की जिन्दगी में जीवन जीने का ढंग सिखाती सुन्दर पोस्ट!

Sachi ने कहा…

कहानी बहुत सुंदर है, मगर यथार्थ इतना सुंदर नहीं है। कैसे हम लोग इतने सपनों में जीते हैं?

राजीव तनेजा ने कहा…

समय के साथ हर एक को बदलना पड़ता है...
प्रवाहमयी रचना

Sunil Kumar ने कहा…

kahani ka ant sukhad raha , bhagvan ko dhanyvad nahi kalpna kuchh aur hi thi ,

kshama ने कहा…

Kaisa jeevan hoga ye...ek sundar sane jaisa!

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर

दीर्घतमा ने कहा…

बैचारिक लेख प्ररक अच्छा लगा .

Udan Tashtari ने कहा…

प्रेरक कहानी है.

सदा ने कहा…

बेहतरीन ।

एस.एम.मासूम ने कहा…

हकीकत के करीब. एक बेहतरीन रचना

राजेश उत्‍साही ने कहा…

आधी हकीकत है आधा फसाना।

शोभना चौरे ने कहा…

शिक्षाप्रद कहानी ऐसे सुखद परिवर्तन हो रहे है और ऐसे विचारो का दिन प्रतिदिन प्रवाह होता रहे तो सोच में परिवर्तन अवश्यम्भावी है |

Ajit Pal Singh Daia ने कहा…

बहुत सुंदर रचना .Keep it up Vandana ji.

ZEAL ने कहा…

सुन्दर , सार्थक और प्रेरणादायी कहानी । कहानी की पात्र शिखा का चरित्र बहुत ही impressive लगा ।

Shah Nawaz ने कहा…

पति-पत्नी दोनों बराबर मेहनत करते है, दोनों का हक भी एक-दुसरे पर बराबर है... जब दोनों एक गाडी के दो पहियों जैसे है तो छोटे-बड़े पहियों का सवाल ही पैदा नहीं होता है, क्योंकि छोटे-बड़े पहियों से तो वैसे भी गाडी नहीं चलती है...

शोभना चौरे ने कहा…

वंदना जी
बहुत बहुत धन्यवाद मेरी पोस्ट को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए |चर्चा मंच खुल ही नहीं रहा है आपका संदेस पढ़ते हुए यहाँ आपका शुक्रिया अदा करती हूँ |
आभार |

Manpreet Kaur ने कहा…

bouth he aacha post hai aapka... nice blog

visit plz friends...
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Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

रोचक कहानी ....साधुवाद!

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

बेहद प्रेरक.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज कल काफी बदलाव हो रहा है ...और बदलना भी चाहिए ...अच्छी प्रेरक कहानी

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

ye parvartan kuchh metropolitan cities tak hi simit hain. kaash aisa badlaav har jagah dekhne ko mile.

sunder, prerak kahani.