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गुरुवार, 30 सितंबर 2021

स्मृति का आकाश

 

मेरी स्मृति का आकाश अब रिक्त है
लिखनी होगी नयी इबारत फिर से


नव तरु नव पल्लव नव शिशु सम
मैं भी जी जाऊँ फिर से


अपने पुनर्जन्म की प्रक्रिया की साक्षी हूँ मैं
कर रही हूँ अपने आकाश का स्वयं निर्माण


प्रेम और शांति केवल दो विकल्पों से कर रही हूँ नया ब्रह्मांड तैयार


ये समय है 'स्व' के उत्स का
बिंदु से सिंधु
और
सिंधु से बिंदु
तक की यात्रा ही
मेरा परिमार्जन है
अब अनहद नाद से गुंजारित हैं मेरी दसों दिशाएं


हे पृथ्वी अग्नि जल वायु आकाश
समस्त ब्रह्मांड की चेतना का आधार मेरी पीठ है

5 टिप्‍पणियां:

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(०२-१०-२०२१) को
'रेत के रिश्ते' (चर्चा अंक-४२०५)
पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर

Rashmi B ने कहा…

सुन्दर !

दीपक कुमार भानरे ने कहा…

सुंदर रचना आदरणीय ।

मन की वीणा ने कहा…

वाह ! सुंदर आध्यात्मिक भाव ।
कर्म संदेश देती सुंदर रचना।

Kailash meena ने कहा…

वाह! कर्म संदेश देती हुई बहुत सुन्दर रचना,

मेरी स्मृति का आकाश अब रिक्त है
लिखनी होगी नयी इबारत फिर से


नव तरु नव पल्लव नव शिशु सम
मैं भी जी जाऊँ फिर से


अपने पुनर्जन्म की प्रक्रिया की साक्षी हूँ मैं
कर रही हूँ अपने आकाश का स्वयं निर्माण