तब माधव बोला ,"सर , मैं आपका आभारी हूँ कि आपने मुझ जैसे भिखारी का शहर के इतने बड़े अस्पताल में इलाज करवाया. मेरे जैसे इंसान तो ऐसा कभी सपने में भी नहीं सोच सकते. अब आप अपने बारे में कुछ बताइए ताकि मैं आपका परिचय जान सकूँ "
अब आगे .........
ये सुनकर गाडी वाला मंद - मंद मुस्कान के साथ बोला , " माधव गलती मेरे ड्राईवर की थी और इस दुनिया में किसी को भी किसी की जान लेने का कोई हक़ नहीं है . जब नौकर गलती करे तो उसका जिम्मेदार उसका मालिक होता है . इसलिए अपने ड्राईवर की गलती के लिए , ये जो मैंने किया , उससे भी उस गलती की भरपाई नहीं हो सकती क्योंकि जो दुःख तकलीफ तुमने सही और तुम्हारा जो इतना लहू बहा क्या उसका इस संसार में कोई मोल है . हर इंसान को उतना ही दर्द होता है जितना खुद को लगने पर होता है . मैं तो अपने ड्राईवर के इस कृत्य पर शर्मिंदा हूँ और तुमसे इस भूल की क्षमा मांगने का भी अख्तियार नहीं रखता बल्कि ये चाहता हूँ कि तुम मुझे इसके लिए कोई सजा दो ".
बस इतना सुनते ही माधव तो जैसे भाव-विभोर हो गया . उसके जैसे कवि ह्रदय वाला व्यक्ति कहाँ इतनी विनम्रता सहन कर पाता. माधव की आँखें छलक आई थीं ये सोचकर कि आज के ज़माने में भी ऐसे इन्सान हैं. इसका मतलब इंसानियत अभी मरी नहीं शायद ऐसे इंसानों के कारण ही पृथ्वी टिकी हुई है.
फिर माधव बोला , "सर ये आपकी महानता है वरना तो लोग टक्कर मार कर रोंदते हुए गाड़ी भगा कर ले जाते हैं . एक पल ठहरते भी नहीं ये जानने के लिए कि जिसे टक्कर मारी है वो जिंदा भी बचा या मर गया और एक आप हैं जिनकी खुद की कोई गलती नहीं बल्कि ड्राईवर से गलती हुई उसके लिए भी मुझसे माफ़ी मांग रहे हैं ............आप जैसे लोग इस दुनिया में ऊँगली पर गिने जाने लायक ही होंगे. मैं आपकी विनम्रता , कृतज्ञता और महानता के आगे नतमस्तक हूँ. मुझे आपसे या आपके ड्राईवर से किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं है. आज मेरे सामने इस एक्सिडेंट के कारण ज़िन्दगी का एक नया पहलू सामने आया है."
इतना कहकर माधव ने गाडी वाले से जाने की आज्ञा मांगी मगर गाडी वाला तो अब तक हाथ जोड़े और सिर झुकाए आँखों से अविरल धारा बहाता हुआ उसके आगे खड़ा था. ये देखकर तो माधव के होश उड़ गए. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो किसी इन्सान को देख रहा है या साक्षात् भगवान उसके रूप में पृथ्वी पर अवतरित हो गए हैं क्योंकि आज के हालात में जब इन्सान ही इन्सान का सबसे बड़ा दुश्मन बना हुआ है उसमे किसी इन्सान को इस स्थिति में देखना तो ऐसा ही लगेगा कि जैसे या तो भगवान आ गए हैं या फिर वो कोई सपना ही देख रहा है , असल ज़िन्दगी में तो ऐसा संभव ही नहीं,फिर भी ये एक जीती -जागती हकीकत उसके सामने खडी थी . माधव की जुबान पर शब्द आकर रुके जा रहे थे और वाणी गदगद हो गयी थी .
कुछ देर में खुद को संयत करके माधव गाड़ी वाले के पैरों पर गिर पड़ा और बोला , " सर आप मुझसे बड़े हैं मेरे पिता के समान हैं और इस तरह हाथ जोड़े खड़े हैं ----मैं शर्मिंदा हो रहा हूँ ,आप ऐसा मत करिए".
जब गाड़ी वाले ने माधव को अपने पैरों पर गिरे देखा तो वो खुद को और लज्जित महसूस करने लगा . उसने माधव को उठाया और गले से लगा लिया .
गाडी वाला बोला , " बेटा मैं इस ग्लानि के कारण खुद को मूँह दिखाने के काबिल नहीं और तुम मुझे और शर्मिंदा कर रहे हो ".
तब माधव बोला ,"सर, बस अब और नहीं . आपको जो कहना था और करना था आप कर चुके हैं . अगर आपको इतना ही ये बात परशान किये जा रही है तो सिर्फ इतना बता दीजिये कि आप हैं कौन? आपका परिचय ही आपका प्रायश्चित होगा".
तब गाड़ी वाला बोला , " मैं इस शहर में एक अख़बार जन -जागरण का मालिक हर्षवर्धन हूँ ".
इतना सुनते ही माधव तो अचम्भित हो गया . वो तो सोच भी नहीं सकता था कि इतना बड़ा इन्सान आज उसके सामने इस तरह खड़ा है. माधव तो खुद को कृतज्ञ समझने लगा. अब माधव ने हर्षमोहन से जाने की इजाजत मांगी तो उन्होंने मना कर दिया और कहा कि तुम मेरे साथ मेरे घर चलोगे और जब तक पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते तब तक आराम करोगे. माधव की तो जुबान ही तालू से चिपक गयी थी . वो चुप खड़ा रहा .तब हर्षमोहन माधव का हाथ पकड़कर उसे अपनी गाडी में बैठाकर घर ले गए.
हर्षमोहन का घर था या एक राजमहल था . कितने नौकर- चाकर थे कोई गिनती नहीं . रात को भी घर ऐसा लगता जैसे दिन निकला हो. माधव खुद में सिमटता जा रहा था. उसने तो कभी सपने में भी ऐसा भव्य दृश्य नहीं देखा था. हर्षमोहन ने नौकरों से कहकर माधव के रहने और उसकी देखभाल का खास इंतजाम करवाया. भला ऐसे जन्नत जैसे माहौल में कोई कितने दिन बीमार रह सकता था सो ४-५ दिन में ही माधव भला -चंगा हो गया और फिर एक दिन उसने हर्षमोहन से जाने की इजाजत मांगी .
तब हर्षमोहन ने कहा ,"मुझे तुमसे जरूरी बात करनी है इसलिए अभी तुम नहीं जा सकते. बस शाम को आकर तुमसे बात करता हूँ . अभी आज एक जरूरी मीटिंग है वो निपटाकर आ जाऊं ".
माधव के पास रुकने के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं था..................
क्रमशः ......................
पेज
बुधवार, 1 सितंबर 2010
सोमवार, 30 अगस्त 2010
नई सुबह ---------भाग 1
माधव का नाम साहित्य जगत का एक जाना -पहचाना नाम था.उसकी कलम से निकला हर शब्द पढने वाले को सोचने पर मजबूर कर देता था ---------क्या श्रृंगार,क्या वियोग,क्या मानवता और क्या व्यंग्य ----------हर विधा का बेजोड़ लेखक था. हर शब्द में ऐसा जादू कि पढने वाले उसमे ही खो जाते थे शायद हर दिल की बात महसूस करने की कूवत थी उसमे तभी उसका हर शब्द हर शख्स को अपना सा लगता था. माधव जो लिखता उसके लिए एक पूजा थी और वो अपनी पूजा को बेचता नहीं था सिर्फ पूजा का प्रशाद ही सबमे बांटता था.अपनी कृतियों से प्राप्त पैसा वो अपने लिए प्रयोग नहीं करता था बल्कि सारा पैसा गरीब , नि:सहाय ,झुग्गी झोंपड़ी में रहने वालों पर खर्च कर देता था . उस कमाई का एक भी पैसा अपने पर खर्च ना करता. उसके चाहने वालों को पता भी ना था कि वो कहाँ रहता है और क्या करता है. एक गुमनाम सी ज़िन्दगी जीता था माधव.अपने जीवन का निर्वाह वो सिर्फ लालबत्ती पर प्राप्त पैसों से ही करता था . ऐसा था मस्त फक्कड़ माधव. जो रोज़ ज़िन्दगी के ना जाने कितने रंगों से सामना करता था और उसी को लफ़्ज़ो में उतार देता था. सारी दुनिया उससे मिलने को बेचैन रहती और शायद लोग उसके पास से गुजर भी जाते होंगे मगर फिर भी उसे पहचान ना पाने के कारण एक भिखारी समझ आगे बढ़ जाते होंगे. उसके संपादक उससे कितनी ही मिन्नतें करते मगर वो टस से मस ना होता. ना जाने क्यों वो गुमनामी के अंधेरों में ही खोया रहना चाहता था. ना जाने कौन सी खलिश थी जो उसे ऐसा जीवन जीने के लिए मजबूर कर रही थी.
आज के वक़्त में भी ऐसा इन्सान होना संसार के आठवें आश्चर्य से कम नहीं. आज के वक्त में ऐसा कौन इंसान होगा जो दौलत और शोहरत ना चाहता हो या ऐशोआराम की ज़िन्दगी जीना ना चाहता हो मगर माधव की सोच आज के ज़माने से बिलकुल हटकर थी. बेशक जीता आज के वक्त में था और लिखता भी आज के दौर का ही था तभी तो हर दिल की धड़कन बन गया था मगर फिर भी अपने उसूलों और आदर्शों से कभी समझौता नहीं करता था.
माधव के आस पास के भिखारी जो लालबत्ती पर होते थे कोई भी उसके दिल की बात नहीं जानता था. इतना तो था कि वो कभी कभी कुछ दार्शनिक बातें कहता तो अन्य लोगो के सिर के ऊपर से गुजर जाती और इसे ही पागल समझने लगते मगर उन में से कोई भी नहीं सोच सकता था कि उनके बीच गुदड़ी का लाल छुपा है .
एक दिन अचानक जब माधव लाल बत्ती पर खड़ा भीख मांग रहा था तभी पीछे से आती एक तेज़ रफ़्तार कार का बैलेंस बिगड़ जाने के कारण फुटपाथ पर खड़े माधव को उसने टक्कर मार दी और माधव अपने झोले के साथ लहूलुहान हो गया और उसके झोले में पड़े पैसों के साथ उसके कागज़ भी हवा में उड़कर तपती सड़क पर उसके ही लहू में भीग कर इधर -उधर बिखर गए जैसे किसी के सपनो को आँधी अपने साथ उडा ले गयी हो और सब तितर -बितर कर दिया हो.आप -पास लोगों का हुजूम इकठ्ठा हो गया और वो सब गाड़ी वाले के पीछे पड़ गए उसे पुलिस में ले जाने की धमकी देने लगे .कोई कह रहा था "गरीब आदमी क्या इन्सान नहीं होता जो इन गाड़ी वालो को दिखाई नहीं देता , गरीब का खून क्या खून नहीं होता या उसकी जान मुफ्त की होती है जो इतनी बेरहमी से बेचारे को मार दिया". ऐसे इंसानों को तो पकड़ कर पुलिस में दे देना चाहिए मगर इतने में जो गाडी में बैठा था वो उतर कर आया वो शहर का एक जाना माना शख्स था और गाडी उसका ड्राईवर चला रहा था . उसने कहा ,"भाइयो मेरी मदद करो और इसे जल्दी से गाड़ी में डालो मैं इसका इलाज करवाता हूँ . इतने में भीड़ में से कोई बोला ये सब बचने के उपाय हैं कोई इलाज नहीं करवाएगा हम तो अभी पुलिस का इंतज़ार करेंगे मगर गाडी वाला बोला अगर पुलिस का इंतज़ार करोगे तो उसके इलाज में देरी होने की वजह से वो मर भी सकता है देखो उसका कितना खून बह चुका है .एक बार इसे अस्पताल में दाखिल करवा दो फिर चाहे तो पुलिस में दे देना .कम से कम इसकी जान तो बच जाएगी. उसकी बात में दम देखकर लोगो न माधव और उसके झोले और कागजों को उसके साथ ही गाड़ी में रख दिया .
गाडी वाला माधव को अस्पताल ले गया और उसका इलाज शहर के सबसे बड़े अस्पताल में करवाया. पुलिस से निपटना वो अच्छी तरह जानता था और सबसे बड़ी बात कि उसने खुद उसका इलाज करवाया और सारा खर्चा उठाया तो पुलिस तो खुद इन सबसे हाथ झाडती फिरती है और वैसे भी उनका पेट भर ही चुका था गाडी वाला, तो वो क्यूँ कोई एक्शन लेती. दो ही दिन में माधव चलने -फिरने लायक हो गया तब एक दिन वो गाडी वाला उससे मिलने आया . माधव का हाल पूछा तो माधव ने अपने दार्शनिक अंदाज़ में कहा ,"बेरहम ज़िन्दगी एक बार फिर जीत गयी , मौत को भी धोखा दे आई , ना जाने अभी और कौन सा करम बाकी है ".ये सुनकर गाडी वाले के चहेरे पर लाचारगी का एक भाव आकर चला गया मगर माधव को महसूस भी नहीं हुआ.अब माधव को ख्याल आया कि उसने तो उस आदमी से उसका परिचय ही नहीं पुछा . तब माधव बोला ,"सर , मैं आपका आभारी हूँ कि आपने मुझ जैसे भिखारी का शहर के इतने बड़े अस्पताल में इलाज करवाया. मेरे जैसे इंसान तो ऐसा कभी सपने में भी नहीं सोच सकते. अब आप अपने बारे में कुछ बताइए ताकि मैं आपका परिचय जान सकूँ ".....................
क्रमशः ................
आज के वक़्त में भी ऐसा इन्सान होना संसार के आठवें आश्चर्य से कम नहीं. आज के वक्त में ऐसा कौन इंसान होगा जो दौलत और शोहरत ना चाहता हो या ऐशोआराम की ज़िन्दगी जीना ना चाहता हो मगर माधव की सोच आज के ज़माने से बिलकुल हटकर थी. बेशक जीता आज के वक्त में था और लिखता भी आज के दौर का ही था तभी तो हर दिल की धड़कन बन गया था मगर फिर भी अपने उसूलों और आदर्शों से कभी समझौता नहीं करता था.
माधव के आस पास के भिखारी जो लालबत्ती पर होते थे कोई भी उसके दिल की बात नहीं जानता था. इतना तो था कि वो कभी कभी कुछ दार्शनिक बातें कहता तो अन्य लोगो के सिर के ऊपर से गुजर जाती और इसे ही पागल समझने लगते मगर उन में से कोई भी नहीं सोच सकता था कि उनके बीच गुदड़ी का लाल छुपा है .
एक दिन अचानक जब माधव लाल बत्ती पर खड़ा भीख मांग रहा था तभी पीछे से आती एक तेज़ रफ़्तार कार का बैलेंस बिगड़ जाने के कारण फुटपाथ पर खड़े माधव को उसने टक्कर मार दी और माधव अपने झोले के साथ लहूलुहान हो गया और उसके झोले में पड़े पैसों के साथ उसके कागज़ भी हवा में उड़कर तपती सड़क पर उसके ही लहू में भीग कर इधर -उधर बिखर गए जैसे किसी के सपनो को आँधी अपने साथ उडा ले गयी हो और सब तितर -बितर कर दिया हो.आप -पास लोगों का हुजूम इकठ्ठा हो गया और वो सब गाड़ी वाले के पीछे पड़ गए उसे पुलिस में ले जाने की धमकी देने लगे .कोई कह रहा था "गरीब आदमी क्या इन्सान नहीं होता जो इन गाड़ी वालो को दिखाई नहीं देता , गरीब का खून क्या खून नहीं होता या उसकी जान मुफ्त की होती है जो इतनी बेरहमी से बेचारे को मार दिया". ऐसे इंसानों को तो पकड़ कर पुलिस में दे देना चाहिए मगर इतने में जो गाडी में बैठा था वो उतर कर आया वो शहर का एक जाना माना शख्स था और गाडी उसका ड्राईवर चला रहा था . उसने कहा ,"भाइयो मेरी मदद करो और इसे जल्दी से गाड़ी में डालो मैं इसका इलाज करवाता हूँ . इतने में भीड़ में से कोई बोला ये सब बचने के उपाय हैं कोई इलाज नहीं करवाएगा हम तो अभी पुलिस का इंतज़ार करेंगे मगर गाडी वाला बोला अगर पुलिस का इंतज़ार करोगे तो उसके इलाज में देरी होने की वजह से वो मर भी सकता है देखो उसका कितना खून बह चुका है .एक बार इसे अस्पताल में दाखिल करवा दो फिर चाहे तो पुलिस में दे देना .कम से कम इसकी जान तो बच जाएगी. उसकी बात में दम देखकर लोगो न माधव और उसके झोले और कागजों को उसके साथ ही गाड़ी में रख दिया .
गाडी वाला माधव को अस्पताल ले गया और उसका इलाज शहर के सबसे बड़े अस्पताल में करवाया. पुलिस से निपटना वो अच्छी तरह जानता था और सबसे बड़ी बात कि उसने खुद उसका इलाज करवाया और सारा खर्चा उठाया तो पुलिस तो खुद इन सबसे हाथ झाडती फिरती है और वैसे भी उनका पेट भर ही चुका था गाडी वाला, तो वो क्यूँ कोई एक्शन लेती. दो ही दिन में माधव चलने -फिरने लायक हो गया तब एक दिन वो गाडी वाला उससे मिलने आया . माधव का हाल पूछा तो माधव ने अपने दार्शनिक अंदाज़ में कहा ,"बेरहम ज़िन्दगी एक बार फिर जीत गयी , मौत को भी धोखा दे आई , ना जाने अभी और कौन सा करम बाकी है ".ये सुनकर गाडी वाले के चहेरे पर लाचारगी का एक भाव आकर चला गया मगर माधव को महसूस भी नहीं हुआ.अब माधव को ख्याल आया कि उसने तो उस आदमी से उसका परिचय ही नहीं पुछा . तब माधव बोला ,"सर , मैं आपका आभारी हूँ कि आपने मुझ जैसे भिखारी का शहर के इतने बड़े अस्पताल में इलाज करवाया. मेरे जैसे इंसान तो ऐसा कभी सपने में भी नहीं सोच सकते. अब आप अपने बारे में कुछ बताइए ताकि मैं आपका परिचय जान सकूँ ".....................
क्रमशः ................
सोमवार, 23 अगस्त 2010
उसका पता मिलता नहीं
अपना पता भूलती नहीं
उसका पता मिलता नहीं
नगरी नगरी , द्वारे द्वारे
खोजती फिरूँ प्यारे को
पर उसका ठिकाना मिलता नहीं
कमली बन कर डोलूँ
मन के वृन्दावन में खोजूँ
सांझ सकारे प्रीतम प्यारे
दर्शन को तरसे नैना हमारे
मैं खोजत खोजत हारी
मुझे मिले ना कृष्ण मुरारी
मुझे मुझसे मिला जाओ
इक बार दरस दिखा जाओ
अपना मुझे बना जाओ
प्यारे अपना पता बता जाओ
मुझे मेरा "मैं " भुला जाओ
इक होने का आनंद चखा जाओ
प्रेमानंद में डूबा जाओ
श्याम अपनी श्यामा बना जाओ
ह्रदय की तडपन मिटा जाओ
जन्मो की प्यास बुझा जाओ
सांवरिया इक बार तो आ जाओ
सांवरिया इक बार तो आ जाओ
उसका पता मिलता नहीं
नगरी नगरी , द्वारे द्वारे
खोजती फिरूँ प्यारे को
पर उसका ठिकाना मिलता नहीं
कमली बन कर डोलूँ
मन के वृन्दावन में खोजूँ
सांझ सकारे प्रीतम प्यारे
दर्शन को तरसे नैना हमारे
मैं खोजत खोजत हारी
मुझे मिले ना कृष्ण मुरारी
मुझे मुझसे मिला जाओ
इक बार दरस दिखा जाओ
अपना मुझे बना जाओ
प्यारे अपना पता बता जाओ
मुझे मेरा "मैं " भुला जाओ
इक होने का आनंद चखा जाओ
प्रेमानंद में डूबा जाओ
श्याम अपनी श्यामा बना जाओ
ह्रदय की तडपन मिटा जाओ
जन्मो की प्यास बुझा जाओ
सांवरिया इक बार तो आ जाओ
सांवरिया इक बार तो आ जाओ
रविवार, 8 अगस्त 2010
"मैं "का कोई अस्तित्व नहीं
मैं क्या हूँ ?
कुछ भी तो नहीं
ब्रह्मांड में घूमते
एक कण के सिवा
कुछ भी तो नहीं
अकेले किसी
कण की
सार्थकता नहीं
जब तक अणु
परमाणु ना बने
जब तक उसके
जीवन का कोई
प्रयोजन ना हो
उद्देश्यहीन सफ़र
को मंजिल
नहीं मिलती
हर डूबती लहर को
साहिल नहीं मिलता
और बिना बाती के
जिस तरह
दीया नहीं जलता
उसी तरह
"मैं "का कोई
अस्तित्व नहीं
तब तक ......
जब तक
अस्तित्व बोध
नहीं होता
कुछ भी तो नहीं
ब्रह्मांड में घूमते
एक कण के सिवा
कुछ भी तो नहीं
अकेले किसी
कण की
सार्थकता नहीं
जब तक अणु
परमाणु ना बने
जब तक उसके
जीवन का कोई
प्रयोजन ना हो
उद्देश्यहीन सफ़र
को मंजिल
नहीं मिलती
हर डूबती लहर को
साहिल नहीं मिलता
और बिना बाती के
जिस तरह
दीया नहीं जलता
उसी तरह
"मैं "का कोई
अस्तित्व नहीं
तब तक ......
जब तक
अस्तित्व बोध
नहीं होता
बुधवार, 4 अगस्त 2010
श्याम बिन ज़िन्दगी गुजरती नहीं है
श्याम बिन ज़िन्दगी गुजरती नहीं है
राधे नाम बिन ये सँवरती नहीं है
श्याम बिन .....................................
१) पीले पड़ गए हैं ये शाखों के पत्ते -२-
उजड़ गया है ये मधुबन सारा -२-
गोविन्द बिन कुछ भी सुहाता नहीं है
श्याम बिन ..........................................
२) पनघट भी सूने गलियाँ भी सूनी -२-
वो अमुआ के झूले वो मौसम भी भूले -२-
तेरे बिन सांवरिया हम मरना भी भूले
श्याम बिन ............................................
३) वो वंशी की ताने वो यमुना की बाहें -२-
वो कदम्ब की छाहें वो टेढ़ी निगाहें -२-
हर इक याद तेरी भुलाती नहीं है
श्याम बिन .............................................
राधे नाम बिन ये सँवरती नहीं है
श्याम बिन .....................................
१) पीले पड़ गए हैं ये शाखों के पत्ते -२-
उजड़ गया है ये मधुबन सारा -२-
गोविन्द बिन कुछ भी सुहाता नहीं है
श्याम बिन ..........................................
२) पनघट भी सूने गलियाँ भी सूनी -२-
वो अमुआ के झूले वो मौसम भी भूले -२-
तेरे बिन सांवरिया हम मरना भी भूले
श्याम बिन ............................................
३) वो वंशी की ताने वो यमुना की बाहें -२-
वो कदम्ब की छाहें वो टेढ़ी निगाहें -२-
हर इक याद तेरी भुलाती नहीं है
श्याम बिन .............................................
बुधवार, 14 जुलाई 2010
ए री मोहे मिल गये नन्द किशोर
ए री मोहे मिल गये नन्द किशोर
बाँह पकड़त हैं मटकी फोड़त हैं
करत हैं कितनी किलोल
ए री मोहे ......................................
कभी छुपत हैं कभी दिखत हैं
कभी रूठत हैं कभी मानत हैं
जिया में उठत हिलोर
ए री मोहे ........................................
रास रचावत हैं सबहों नचावत हैं
वेणु मधुर- मधुर ऐसी बजावत हैं
बाँध कर प्रेम की डोर
ए री मोहे .........................................
बाँह पकड़त हैं मटकी फोड़त हैं
करत हैं कितनी किलोल
ए री मोहे ......................................
कभी छुपत हैं कभी दिखत हैं
कभी रूठत हैं कभी मानत हैं
जिया में उठत हिलोर
ए री मोहे ........................................
रास रचावत हैं सबहों नचावत हैं
वेणु मधुर- मधुर ऐसी बजावत हैं
बाँध कर प्रेम की डोर
ए री मोहे .........................................
शनिवार, 10 जुलाई 2010
विरह- वियोग
शरीर रुपी पिंजरे में मेरा आत्मा रुपी पंछी फ़डफ़डा रहा है श्याम .............संसार के बन्धनों में जकड़ी हुई हूँ .........हरी मिलन को तरस रही हूँ .............जल बिन मीन सी तड़प रही हूँ..............पाप गठरी उठाये भटक रही हूँ ........जन्मों के फेरे में पड़ी हुई हूँ.......... फिर भी कान्हा......... तेरे वियोग में ह्रदय फटता नहीं है ..........पत्थर ह्रदय है ये प्रेम की बूँद पड़ी ही नहीं इस पर, वरना पिघल ना गया होता प्रेम की एक बूँद से .............सुना है प्रेम तो पत्थर को भी पिघला देता है और मेरा ये कठोर ह्रदय तेरे प्रेम वियोग से फटता ही नहीं .............ज्ञान की आँख मेरे पास नहीं और कोई उपाय आता नहीं .............सोचती थी प्रेम होगा मगर नहीं है अगर होता तो तू मुझसे दूर कब होता ............मुलाकात ना हो जाती ...........अब कौन जतन करूँ सांवरिया ..........सिर्फ नैनन का नीर ही मेरी थाती है बस वो ही अर्पण कर सकती हूँ मगर ना मालूम कितने जन्म लगेंगे तुझसे मिलने को.........तुझे पाने को..................तुझे तो अपना बना लिया मगर तेरी कब बनूँगी तू मुझे कब अपना बनाएगा ,किस जन्म में ये विरह वियोग मिटाएगा कान्हा ............इसी आस पर दिन गुजार रही हूँ ..............क्यूँ इस देह के पिंजरे में फँसा रखा है कान्हा .........अब तो अपने आनंदालय की एक बूँद पिला दे श्याम .............बस एक बार अपना बना ले...........अब विरह वियोग सहा नहीं जाता.........तुझ बिन रहा नहीं जाता..........श्याम ,अब तो बस अपनी गोपी बना ले एक बार .............जन्मों की प्यास मिटा जा श्याम बस एक बार अपना बना जा श्याम ..........बस एक बार.
रविवार, 4 जुलाई 2010
काहे भूल गए सांवरिया........
प्रियतम
प्राण प्यारे
नैना जोहते
बाट तिहारी
तुझ बिन तडपत
रैन हमारी
पी -पी पुकारत
सांझ सकारे
तुझको खोजत
नैन हमारे
आस की आस
भी छूटन लागी
प्रीत की प्यास
भी टूटन लागी
तुझ बिन प्यारे
बरसत हैं
सावन भादों हमारे
कोऊ ना सन्देश
पाऊं तिहारा
पाती भी
सूनी आ जाती
बिन संदेस के
संदेस दे जाती
भूल गए
प्राणाधार हमारे
प्रेम के वो
हिंडोले भूले
कर आलिंगन के
रस्ते भूले
तिरछी कमान के
तीर भी टूटे
अधरों के अवलंबन
भी छूटे
रूठ गए
सांवरिया मोसे
भूल गए वो
प्रेम बिछोने
खोजत- खोजत
मैं तो हारी
नैना भी
पथरा गए हैं
प्रीतम ,आने की
राह तकत हैं
क्यूँ भूल गए सांवरिया
सूनी पड़ी प्रीत अटरिया
काहे भूल गए सांवरिया........
प्राण प्यारे
नैना जोहते
बाट तिहारी
तुझ बिन तडपत
रैन हमारी
पी -पी पुकारत
सांझ सकारे
तुझको खोजत
नैन हमारे
आस की आस
भी छूटन लागी
प्रीत की प्यास
भी टूटन लागी
तुझ बिन प्यारे
बरसत हैं
सावन भादों हमारे
कोऊ ना सन्देश
पाऊं तिहारा
पाती भी
सूनी आ जाती
बिन संदेस के
संदेस दे जाती
भूल गए
प्राणाधार हमारे
प्रेम के वो
हिंडोले भूले
कर आलिंगन के
रस्ते भूले
तिरछी कमान के
तीर भी टूटे
अधरों के अवलंबन
भी छूटे
रूठ गए
सांवरिया मोसे
भूल गए वो
प्रेम बिछोने
खोजत- खोजत
मैं तो हारी
नैना भी
पथरा गए हैं
प्रीतम ,आने की
राह तकत हैं
क्यूँ भूल गए सांवरिया
सूनी पड़ी प्रीत अटरिया
काहे भूल गए सांवरिया........
शनिवार, 26 जून 2010
नमन
श्याम मोहन मदन मुरारी
राधे- राधे रटती प्यारी
कृष्ण केशव कुञ्ज बिहारी
रमता जोगी बहता पानी
आनंद कंद मुरली धारी
जमुना जी की महिमा न्यारी
गोविन्द माधव गिरिवरधारी
खोजत -खोजत सखियाँ हारी
आनंदघन अविनाशी त्रिभुवनधारी
कुञ्ज- कुञ्ज में बसे गिरधारी
नटवर नागर छैल बिहारी
रोम- रोम में रमे मुरारी
सुखधाम सुधासम कृष्ण मुरारी
कण -कण में रम रहे रमणबिहारी
राधे- राधे रटती प्यारी
कृष्ण केशव कुञ्ज बिहारी
रमता जोगी बहता पानी
आनंद कंद मुरली धारी
जमुना जी की महिमा न्यारी
गोविन्द माधव गिरिवरधारी
खोजत -खोजत सखियाँ हारी
आनंदघन अविनाशी त्रिभुवनधारी
कुञ्ज- कुञ्ज में बसे गिरधारी
नटवर नागर छैल बिहारी
रोम- रोम में रमे मुरारी
सुखधाम सुधासम कृष्ण मुरारी
कण -कण में रम रहे रमणबिहारी
गुरुवार, 17 जून 2010
दिव्य प्रेम
प्रेम प्रतिकार
नहीं मांगता
तुझसे तेरे
होने का हिसाब
नहीं मांगता
प्रेम तो
प्रेमी का
दीदार भी
नहीं मांगता
जो रूह
बन गया हो
जो साँसों में
समा गया हो
जो जिस्म के
रोएँ- रोएँ में
बस गया हो
फिर दीदार
किसका करे
और कौन करे
जब दो हों
तो दीदार हो
जब दो हों तो
प्रतिकार हो
जहाँ एकाकार
हो गया हो
प्रेम और प्रेमी का
वहाँ
कोई बँधन नहीं
कोई चाहत नहीं
वहाँ
पूर्णता में लिप्त
आनंद की
स्वरलहरियाँ
गुंजारित होती हैं
रोम- रोम
उल्लसित
पुलकित
प्रफुल्लित
कुसुम सा
महकता है
शरीर नगण्य
हो जहाँ
बस दिव्य प्रेम पनपता है वहाँ
नहीं मांगता
तुझसे तेरे
होने का हिसाब
नहीं मांगता
प्रेम तो
प्रेमी का
दीदार भी
नहीं मांगता
जो रूह
बन गया हो
जो साँसों में
समा गया हो
जो जिस्म के
रोएँ- रोएँ में
बस गया हो
फिर दीदार
किसका करे
और कौन करे
जब दो हों
तो दीदार हो
जब दो हों तो
प्रतिकार हो
जहाँ एकाकार
हो गया हो
प्रेम और प्रेमी का
वहाँ
कोई बँधन नहीं
कोई चाहत नहीं
वहाँ
पूर्णता में लिप्त
आनंद की
स्वरलहरियाँ
गुंजारित होती हैं
रोम- रोम
उल्लसित
पुलकित
प्रफुल्लित
कुसुम सा
महकता है
शरीर नगण्य
हो जहाँ
बस दिव्य प्रेम पनपता है वहाँ
गुरुवार, 10 जून 2010
प्रीत का रंग
प्रीत चदरिया ऐसी ओढ़ी
हो गयी मैं बेगानी
अपना पता खोजती डोलूं
बन के मैं दीवानी
बांसुरी की धुन पर
वन -वन खोजूं
बन के मैं मतवाली
श्याम प्रीत की
ओढनी ओढ़ के
हो गयीं मैं अनजानी
श्याम के रंग में
ऐसी रंग गयीं
हो गयी मैं भी कारी
श्याम रंग की चुनरिया
पर मैं जाऊं वारी -वारी
प्रीत की सब रीतें भुला दूँ
तन -मन की सुधि बिसरा दूँ
प्रेम धुन पर ऐसे
नाचूँ छम- छम
होकर मैं मतवाली
हो गयी मैं बेगानी
अपना पता खोजती डोलूं
बन के मैं दीवानी
बांसुरी की धुन पर
वन -वन खोजूं
बन के मैं मतवाली
श्याम प्रीत की
ओढनी ओढ़ के
हो गयीं मैं अनजानी
श्याम के रंग में
ऐसी रंग गयीं
हो गयी मैं भी कारी
श्याम रंग की चुनरिया
पर मैं जाऊं वारी -वारी
प्रीत की सब रीतें भुला दूँ
तन -मन की सुधि बिसरा दूँ
प्रेम धुन पर ऐसे
नाचूँ छम- छम
होकर मैं मतवाली
मंगलवार, 1 जून 2010
सखी री मेरे नैना भये चितचोर
सखी री मेरे
नैना भये चितचोर
श्याम को चाहें
श्याम को निहारें
प्रेम सुधा में
भीग- भीग जावें
मुझ बैरन के
हिय को रुलावैं
सखी री मेरे
नैना भये चितचोर
श्याम छवि पर
बलि -बलि जावें
मधुर स्मित पर
लाड- लड़ावें
मुझ बेबस की
एक ना मानें
सखी री मेरे
नैना भये चितचोर
श्याम पर रीझें
श्याम को रिझावें
मुरली की धुन पर
बरस- बरस जावें
मुझ बिरहन के
विरह को बढ़ावें
सखी री मेरे
नैना भये चितचोर
नैना भये चितचोर
श्याम को चाहें
श्याम को निहारें
प्रेम सुधा में
भीग- भीग जावें
मुझ बैरन के
हिय को रुलावैं
सखी री मेरे
नैना भये चितचोर
श्याम छवि पर
बलि -बलि जावें
मधुर स्मित पर
लाड- लड़ावें
मुझ बेबस की
एक ना मानें
सखी री मेरे
नैना भये चितचोर
श्याम पर रीझें
श्याम को रिझावें
मुरली की धुन पर
बरस- बरस जावें
मुझ बिरहन के
विरह को बढ़ावें
सखी री मेरे
नैना भये चितचोर
बुधवार, 26 मई 2010
श्यामा , अपना मुझे बना लेना
मैं भूल जाऊँ कान्हा , कुछ गम नहीं
पर तुम ना मुझको भुला देना
श्यामा , अपना मुझे बना लेना
१) मैं तेरी जोत जलाऊँ या ना जलाऊँ
पर तुम ना मुझे भुला देना
अपनी दिव्य ज्योति जगा देना
कान्हा , अपना मुझे बना लेना
२)मैं तुम्हें ध्याऊँ या ना ध्याऊँ
पर तुम ना मुझे भुला देना
मेरा ध्यान निज चरणों में लगा लेना
कान्हा , अपना मुझे बना लेना
३)मैं प्रीत निभाऊं या ना निभाऊं
तुम ना मुझे भुला देना
प्रीत की रीत निभा देना
श्यामा प्रेम का राग सुना देना
कान्हा, अपना मुझे बना लेना
पर तुम ना मुझको भुला देना
श्यामा , अपना मुझे बना लेना
१) मैं तेरी जोत जलाऊँ या ना जलाऊँ
पर तुम ना मुझे भुला देना
अपनी दिव्य ज्योति जगा देना
कान्हा , अपना मुझे बना लेना
२)मैं तुम्हें ध्याऊँ या ना ध्याऊँ
पर तुम ना मुझे भुला देना
मेरा ध्यान निज चरणों में लगा लेना
कान्हा , अपना मुझे बना लेना
३)मैं प्रीत निभाऊं या ना निभाऊं
तुम ना मुझे भुला देना
प्रीत की रीत निभा देना
श्यामा प्रेम का राग सुना देना
कान्हा, अपना मुझे बना लेना
मंगलवार, 11 मई 2010
मन की थकान
तन की थकान
तो उतर भी जाये
मन की थकान
कहाँ उतारूँ
किस पेड़ को
साया बनाऊँ
किस डाल पर
झूला डालूँ
कहाँ मैं यादों का
घरौंदा बनाऊँ
कौन सा अब
फूल खिलाऊँ
किस देहरी पर
माथा नवाऊँ
किस आँगन को
मैं बुहारूँ
किस मकां की
दहलीज पर
मन की
रंगोली सजाऊँ
तन की टूटन
जुड़ जाएगी
मन की टूटन
कहाँ जुडाऊँ
किस थाली में
मन को परोसूँ
कौन सा मैं
दीप जलाऊँ
किस देवता का
करूँ मैं पूजन
किस श्याम की
राधा बन जाऊँ
तन की थकन तो उतर भी जाए
मन की थकन उतारने को
किस श्याम का काँधा पाऊँ
कौन सा नेह दीप जलाऊँ
कौन सी बाँसुरी बजाऊँ
जो श्याम दौडे चले आयें
मुझ बिरहन को गले से लगायें
मेरी युगों की थकन मिटायें
तो उतर भी जाये
मन की थकान
कहाँ उतारूँ
किस पेड़ को
साया बनाऊँ
किस डाल पर
झूला डालूँ
कहाँ मैं यादों का
घरौंदा बनाऊँ
कौन सा अब
फूल खिलाऊँ
किस देहरी पर
माथा नवाऊँ
किस आँगन को
मैं बुहारूँ
किस मकां की
दहलीज पर
मन की
रंगोली सजाऊँ
तन की टूटन
जुड़ जाएगी
मन की टूटन
कहाँ जुडाऊँ
किस थाली में
मन को परोसूँ
कौन सा मैं
दीप जलाऊँ
किस देवता का
करूँ मैं पूजन
किस श्याम की
राधा बन जाऊँ
तन की थकन तो उतर भी जाए
मन की थकन उतारने को
किस श्याम का काँधा पाऊँ
कौन सा नेह दीप जलाऊँ
कौन सी बाँसुरी बजाऊँ
जो श्याम दौडे चले आयें
मुझ बिरहन को गले से लगायें
मेरी युगों की थकन मिटायें
शुक्रवार, 7 मई 2010
अश्क कैसे बहाऊँ?
तेरी याद में
जब अश्कों का
दरिया बहता था
तब अंतस में
बैठा तू ही तो
तड़पता था
आज तेरा
ये अंदाज़
समझ आया है
जब मैं और तू
दो रहे ही नहीं
जब तू ही वजूदमें समाया है
हर ओर तेरा ही
नूर समाया है
जहाँ मेरा "मैं"
ना नज़र आता है
जब एकत्व को
अस्तित्व प्राप्त
हो गया है
फिर बता साँवरे
अश्क अब
कैसे बहाऊँ?
तुझे अब कैसे
और तडपाऊँ?
जब अश्कों का
दरिया बहता था
तब अंतस में
बैठा तू ही तो
तड़पता था
आज तेरा
ये अंदाज़
समझ आया है
जब मैं और तू
दो रहे ही नहीं
जब तू ही वजूदमें समाया है
हर ओर तेरा ही
नूर समाया है
जहाँ मेरा "मैं"
ना नज़र आता है
जब एकत्व को
अस्तित्व प्राप्त
हो गया है
फिर बता साँवरे
अश्क अब
कैसे बहाऊँ?
तुझे अब कैसे
और तडपाऊँ?
रविवार, 2 मई 2010
"मोहब्बत " हो गयी
तुझे देखा
नहीं हुई
तुझे पाया
नहीं हुई
तुझे चाहा
नहीं हुई
मगर
जिस दिन
तुझे जाना
"मोहब्बत "
हो गयी
नहीं हुई
तुझे पाया
नहीं हुई
तुझे चाहा
नहीं हुई
मगर
जिस दिन
तुझे जाना
"मोहब्बत "
हो गयी
गुरुवार, 29 अप्रैल 2010
एक सत्य ---------५० वीं पोस्ट
प्यार
इश्क
मोहब्बत
प्रेम
सब
कर
लिया
मगर
फिर
भी
खुदा
ना मिला
जब
खुद
को
नेस्तनाबूद
किया
तब
"मैं "
ना
मिला
बस
"खुदा "
ही
था
वहाँ
इश्क
मोहब्बत
प्रेम
सब
कर
लिया
मगर
फिर
भी
खुदा
ना मिला
जब
खुद
को
नेस्तनाबूद
किया
तब
"मैं "
ना
मिला
बस
"खुदा "
ही
था
वहाँ
सोमवार, 26 अप्रैल 2010
ओ मेरे प्यारे
सुनो
तुम्हें ढूंढ रही हूँ
जन्मों से
रूह आवारा
भटकती
फिरती है
इक तेरी
खोज में
और तू
जो मेरे
वजूद का
हिस्सा नहीं
वजूद ही
बन गया है
ना जाने
फिर भी
क्यूँ मिलकर भी
नहीं मिलता
सिर्फ अहसासों में
मौजूद होने से
क्या होगा
अदृश्यता में
दृश्यता को बोध
होने से क्या होगा
नैनों के दरवाज़े से
दिल के आँगन में
अपना बिम्ब तो
दिखलाओ
इक झलक
पाने को
तरसती
इस रूह की
प्यास तो
बुझा जाओ
ओ मेरे प्यारे
राधा सा विरह
तो दे दिया
मुझे भी अपनी
राधा तो बना जाओ
तुम्हें ढूंढ रही हूँ
जन्मों से
रूह आवारा
भटकती
फिरती है
इक तेरी
खोज में
और तू
जो मेरे
वजूद का
हिस्सा नहीं
वजूद ही
बन गया है
ना जाने
फिर भी
क्यूँ मिलकर भी
नहीं मिलता
सिर्फ अहसासों में
मौजूद होने से
क्या होगा
अदृश्यता में
दृश्यता को बोध
होने से क्या होगा
नैनों के दरवाज़े से
दिल के आँगन में
अपना बिम्ब तो
दिखलाओ
इक झलक
पाने को
तरसती
इस रूह की
प्यास तो
बुझा जाओ
ओ मेरे प्यारे
राधा सा विरह
तो दे दिया
मुझे भी अपनी
राधा तो बना जाओ
शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010
गीत- गोविन्द
गीत गोविन्द के गाती फिरूँ
मैं तो तन- मन में गोविन्द झुलाती फिरूँ
गली- गली गोविन्द गाती फिरूँ
मैं तो तेरे ही दर्शन पाती फिरूँ
अँखियों में गोविन्द सजाती फिरूँ
हिय की जलन मिटाती फिरूँ
जन जन में गोविन्द निहारती फिरूँ
कभी गोपी कभी कृष्ण बनती फिरूँ
मैं तो गोविन्द ही गोविन्द गाती फिरूँ
कभी गोविन्द को गोपाल बनाती फिरूँ
कभी राधा को गोविन्द बनाती फिरूँ
कभी खुद में गोविन्द समाती फिरूँ
कभी गोविन्द में खुद को समाती फिरूँ
मैं तो गोविन्द ही गोविन्द गाती फिरूँ
मैं तो गोविन्द से नेहा लगाती फिरूँ
कभी गोविन्द को अपना बनाती फिरूँ
कभी गोविन्द की धुन पर नाचती फिरूँ
मैं तो मुरली अधरों पर सजाती फिरूँ
कभी मुरली सी गली- गली बजती फिरूँ
मैं तो गोविन्द ही गोविन्द गाती फिरूं
कभी बावरिया बन नैना बहाती फिरूँ
कभी गुजरिया बन राह बुहारती फिरूँ
कभी गोविन्द की राधा प्यारी बनूँ
कभी गोविन्द की मीरा दीवानी बनूँ
मैं तो गोविन्द ही गोविन्द गाती फिरूँ
मैं तो तन- मन में गोविन्द झुलाती फिरूँ
मैं तो तन- मन में गोविन्द झुलाती फिरूँ
गली- गली गोविन्द गाती फिरूँ
मैं तो तेरे ही दर्शन पाती फिरूँ
अँखियों में गोविन्द सजाती फिरूँ
हिय की जलन मिटाती फिरूँ
जन जन में गोविन्द निहारती फिरूँ
कभी गोपी कभी कृष्ण बनती फिरूँ
मैं तो गोविन्द ही गोविन्द गाती फिरूँ
कभी गोविन्द को गोपाल बनाती फिरूँ
कभी राधा को गोविन्द बनाती फिरूँ
कभी खुद में गोविन्द समाती फिरूँ
कभी गोविन्द में खुद को समाती फिरूँ
मैं तो गोविन्द ही गोविन्द गाती फिरूँ
मैं तो गोविन्द से नेहा लगाती फिरूँ
कभी गोविन्द को अपना बनाती फिरूँ
कभी गोविन्द की धुन पर नाचती फिरूँ
मैं तो मुरली अधरों पर सजाती फिरूँ
कभी मुरली सी गली- गली बजती फिरूँ
मैं तो गोविन्द ही गोविन्द गाती फिरूं
कभी बावरिया बन नैना बहाती फिरूँ
कभी गुजरिया बन राह बुहारती फिरूँ
कभी गोविन्द की राधा प्यारी बनूँ
कभी गोविन्द की मीरा दीवानी बनूँ
मैं तो गोविन्द ही गोविन्द गाती फिरूँ
मैं तो तन- मन में गोविन्द झुलाती फिरूँ
रविवार, 18 अप्रैल 2010
नैनन पड़ गए फीके
सखी री मेरे
नैनन पड़ गए फीके
रो-रो धार अँसुवन की
छोड़ गयी कितनी लकीरें
आस सूख गयी
प्यास सूख गयी
सावन -भादों बीते सूखे
सखी री मेरे
नैनन पड़ गए फीके
बिन अँसुवन के
अँखियाँ बरसतीं
बिन धागे के
माला जपती
हो गए हाल
बिरहा के
सखी री मेरे
नैनन पड़ गए फीके
श्याम बिना फिरूं
हो के दीवानी
लोग कहें मुझे
मीरा बावरी
कैसे कटें
दिन बिरहन के
सखी री मेरे
नैनन पड़ गए फीके
हार श्याम को
सिंगार श्याम को
राग श्याम को
गीत श्याम को
कर गए
जिय को रीते
सखी री मेरे
नैनन पड़ गए फीके
नैनन पड़ गए फीके
रो-रो धार अँसुवन की
छोड़ गयी कितनी लकीरें
आस सूख गयी
प्यास सूख गयी
सावन -भादों बीते सूखे
सखी री मेरे
नैनन पड़ गए फीके
बिन अँसुवन के
अँखियाँ बरसतीं
बिन धागे के
माला जपती
हो गए हाल
बिरहा के
सखी री मेरे
नैनन पड़ गए फीके
श्याम बिना फिरूं
हो के दीवानी
लोग कहें मुझे
मीरा बावरी
कैसे कटें
दिन बिरहन के
सखी री मेरे
नैनन पड़ गए फीके
हार श्याम को
सिंगार श्याम को
राग श्याम को
गीत श्याम को
कर गए
जिय को रीते
सखी री मेरे
नैनन पड़ गए फीके
गुरुवार, 8 अप्रैल 2010
ये किस मोड़ पर ? ..............अंतिम भाग
गतांक से आगे .....................
अब निशि मंझधार में फँसी थी जिसका कोई साहिल ना था. अब उसे समझ आ रहा था घर , परिवार , पति , बच्चों का महत्त्व. अब उसे लग रहा था कि वो कैसी झूठी मृगतृष्णा के पीछे भाग रही थी. रंग - रूप , धन -दौलत, ऐशो- आराम कोई मायने नहीं रखता जब तक अपना परिवार अपने साथ ना हो. परिवार के सदस्यों का साथ ही इंसान का सबसे बड़ा संबल होता है , उन्ही के कारण वो ज़िन्दगी की हर जंग जीत जाता है मगर आज निशि अपनी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी जंग हार चुकी थी. अगर घर के सदस्यों ने उसकी तरफ अपना हाथ बढ़ाये रखा होता , उसके अकेलेपन के कुछ पलों को बाँटा होता तो शायद ये नौबत ना आती या फिर शायद निशि ने कुछ समझदारी रखी होती ,अपने बढ़ते क़दमों पर कुछ अंकुश लगाये होते तो उसे ये दिन ना देखना पड़ता क्यूंकि ये दिन तो हर औरत की ज़िन्दगी में आता है जब एक वक़्त वो अकेली पड़ जाती है मगर इसका ये मतलब तो नहीं ना कि हर औरत गलत राह पर चल पड़े ,उसे भी अपने उस वक़्त का सही उपयोग करना चाहिए था , ये सब बातें उसे मथ रही थीं. आज उसने अपने , अपनों को , उनके प्यार , विश्वास को चोट पहुंचाई थी जिसका शायद कोई प्रायश्चित नहीं था. शर्मिंदगी का अहसास उसे जीने नहीं दे रहा था. बेशक बच्चों को कुछ नहीं पता था मगर राजीव की निगाहों में बैठी अविश्वास की लकीर वो सहन नहीं कर पा रही थी . उसकी ख़ामोशी ही बिना कहे सब कुछ कह देती थी. राजीव की ख़ामोशी उसे हर पल तोड़ रही थी और साथ ही आत्मग्लानि का बोध उसके मानसिक संतुलन को बिगाड़ रहा था. निशि क्षण -प्रतिक्षण ज़िन्दगी से दूर जा रही थी क्यूंकि वो नहीं चाहती थी कि उसके बच्चों को कभी ज़िन्दगी में पता चले कि उम्र के ऐसे मोड़ पर जाकर उनकी माँ रास्ता भटक गयी थी और वो उससे नफरत करने लगें . राजीव की नफरत ही उसे जीने नहीं दे रही थी और अगर बच्चों के मन में भी यदि नफरत का अंकुरण फूट गया तो वो कैसे सहन करेगी, कैसे बच्चों से निगाह मिला पायेगी, क्या फिर कभी वो उनके किसी गलत काम पर उन्हें कुछ कहने की हिम्मत कर पायेगी ? ये सब बातें उसे विचलित कर रही थीं. अगर वो तलाक भी लेती है तो क्या वजह बताई जाएगी जब दिखने में सब कुछ सामान्य है तो और फिर क्या वो जी पायेगी अपने परिवार के बिना ?क्या उनके बिना उसका कोई अस्तित्व है ? ज़िन्दगी बोझ ना बन जाएगी?तब भी तो वो अकेलापन उस पर हावी हो जायेगा ?तब कहाँ जाएगी वो और क्या करेगी ?ये कुछ ऐसे प्रश्न थे जो उसकी अंतरआत्मा उससे पूछती और उसके पास इन सवालों का कोई जवाब ना होता .
एक ज़रा सी भूल कई बार हँसते -खेलते परिवार की तबाही का कारण बन जाती है . उस हद तक कोई ना तो सोच पाता है और ना ही चाहता है कि कोई ये कदम उठाये. बेशक भूल बहुत बड़ी नहीं थी कि जिसे माफ़ ना किया जा सके मगर आत्मग्लानि का बोझ सबसे बढ़कर होता है . शायद राजीव कुछ वक़्त बाद समझौता कर भी लेता मगर अपनी ही निगाहों में गिरना शायद सबसे बड़ा अभिशाप है. और जब इंसान खुद की निगाहों में गिर जाता है तब शायद ऐसा कदम उठाने की सोचता है क्यूंकि उसे चारों तरफ सिवाय अँधेरे के और कुछ नहीं सूझता. हर राह बंद दिखाई देती है . हर पल घुट - घुटकर जीना इंसान को भीतर ही भीतर तोड़ देता है फिर वो उन अहसासों से उबर नहीं पाता और ऐसा कदम उठाने को मजबूर हो जाता है .
और फिर इसी उहापोह में फँसी निशि ने वो कदम उठा लिया जो कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था . निशि ने आत्महत्या कर ली . सबने समझा डिप्रेशन में थी इसीलिए आत्महत्या कर ली मगर असल कारण सिर्फ राजीव जानता था और आज वो भी पछता रहा था क्यूंकि उसने इस स्थिति के बारे में तो कभी सोचा ही नहीं था . निशि की एक छोटी सी भूल ने पूरे परिवार को किस मोड़ पर पहुंचा दिया था जहाँ सिर्फ अँधेरा ही अँधेरा था.
समाप्त .
मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
ये किस मोड़ पर ?.............भाग ४
गतांक से आगे .........................
निशि ने राजीव से वादा लिया कि वो उसकी पूरी बात ध्यान से सुनेगा और उसे समझने की कोशिश करेगा , उसके बाद कोई फैसला लेगा और फिर निशि ने दिल पर पत्थर रखकर , अकेलेपन से उपजी त्रासदी की पूरी दास्ताँ राजीव को सुना दी , निशि का एक- एक शब्द पिघले सीसे की तरह राजीव के कानों में उतरा , उसे यूँ लगा जैसे हजारों बम एक साथ उसके सर पर फोड़ दिए गए हों. सारी बात सुनकर राजीव सन्न रह गया. वो तो सपने में भी नहीं सोच सकता था कि निशि उसके साथ ऐसा भी कर सकती है. वो तो बेफिक्र होकर काम पर चला जाता था ताकि अधिक से अधिक सुख -सुविधाएं अपने परिवार को दे सके. क्या निशि पर विश्वास करके उसने ठीक नहीं किया? क्या पति -पत्नी के रिश्ते की डोर इतनी कमजोर होती है कि एक ही आंधी उसे उडा ले जाये ?क्या उसकी निशि के ख्यालों में उसके सिवा किसी और का भी स्थान है ---------इन बातों ने तो जैसे राजीव के मन पर ना भरने वाला घाव कर दिया. उसकी तो वो हालात हो गयी कि जैसे एक ही पल में उसे किसी ने राजा से रंक बना दिया हो . राजीव समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे. उसके प्यार में कहाँ कमी रह गयी थी कि निशि दिल-ओ-जान से चाहने वाले पति से भी बेवफाई कर बैठी. इसके बाद कई दिन तक निशि और राजीव के बीच ख़ामोशी छाई रही और इसी हालत में दोनों वापस आ गए.
निशि खुद अन्दर ही अन्दर छटपटा रही थी . उसे समझ नहीं आ रहा था कि अगर ये बात उसके जवान होते बच्चों को पता चल गयी तो वो उनसे निगाह कैसे मिलाएगी. बच्चे तो सिर्फ माँ बीमार है -------इतना ही जानते थे . अब तो निशि आत्मग्लानि के बोझ तले और भी ज्यादा दब गयी. उधर राजीव उससे कोई बात ही ना करता. घर का माहौल देखने में तो शान्तिपूर्ण था मगर भीतर ही भीतर लावा धधक रहा था बस ज्वालामुखी के विस्फोट का इंतज़ार था.
और फिर एक दिन राजीव कुछ कागज़ लेकर निशि के पास आया और उससे दस्तखत करने को कहा . जब निशि ने कागज़ खोले तो उन्हें पढ़ते ही उसे लगा जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली हो. वो तलाक के कागज़ थे. निशि वहीँ कटे पेड़ सी गिर पड़ी. काफी देर बाद जब उसे होश आया तो वो खूब रोई , गिडगिडायी , काफी माफ़ी मांगी राजीव से मगर राजीव ने उसकी एक ना सुनी. वो कहते हैं ना विश्वास की डोर बहुत ही कच्चे धागे की बनी होती है और एक बार यदि टूट जाये तो जुड़ना मुमकिन नही होता. निशि की बेवफाई से आहत राजीव अब निशि के साथ नहीं रहना चाहता था और ना ही किसी तरह का शोर -शराबा करना चाहता था बस शान्तिपूर्वक निशि से अलग हो जाना चाहता था. वो नहीं चाहता था कि इस बात का किसी को पता चले और जग- हंसाई हो और उसके बच्चों पर बुरा असर पड़े. वो निशि के रहने -खाने की भी भरपाई करने को तैयार था बस तैयार नहीं था तो सिर्फ साथ रहने के लिए. राजीव चाहता तो माफ़ कर भी देता निशि को मगर निशि की बेवफाई उसे एक पल भी चैन से जीने ना देती और पल- पल मरने से अच्छा है उस रिश्ते की आहुति दे दी जाये क्यूंकि जब भी निशि सामने आती उसे वो बातें याद आ जातीं और वो भी अपना चैन खो बैठता और फिर बच्चे कौन संभालता , यही सोचकर राजीव ने तलाक का फैसला लिया. निशि को अपने किये पर इतना पछतावा था कि वो राजीव से नज़रें भी नहीं मिला पा रही थी और उस पर तलाक के कागजों ने तो उसकी रही सही हिम्मत भी तोड़ दी.
क्रमशः ..........................
रविवार, 4 अप्रैल 2010
ये किस मोड़ पर ?..........भाग ३
गतांक से आगे ...........................
अपने हालात के बारे में ना तो निशि किसी से कह सकती थी और ना ही सहन कर पा रही थी. उसे तो यूँ लगा जैसे स्वच्छंद आकाश में विचरण करने वाले पंछी को किसी ने घायल कर दिया हो और वो फ़ड्फ़डाता हुआ जमीन पर आ गिरा हो. धीरे -धीरे निशि डिप्रेशन में चली गयी क्यूंकि अन्दर की घुटन उसे जीने नहीं दे रही थी. डॉक्टर भी कितनी ही दवाइयां दे रहे थे मगर वो उससे उबर नहीं पा रही थी . एक दिन जब वो नेट पर बैठी थी तो उसकी एक नेट फ्रेंड जो एक महिला थी, उससे उसने अपने मन की सारी बातें कहीं. उसे कहने के बाद वो अपने को कुछ हल्का महसूस करने लगी . उसकी नेट दोस्त जिसका नाम रिया था , उसने निशि को समझाया----- नेट की आभासी दुनिया के बारे में बताया , यहाँ कोई किसी का नहीं होता , जो अपने होते हैं सिर्फ वो ही अपने होते हैं ,ये दुनिया तो इक छलावा है ,कुछ पल गुजारने का साधन मात्र है. रिया ने निशि को कहा कि अगर उसे अपने पति पर , उसके प्रेम पर पूर्ण विश्वास है तो अपने पति को विश्वास में लेकर उनसे सारी बात कह दे तभी उसके दिल- दिमाग को सुकून मिल सकेगा शायद तब वो अपने पछतावे से बाहर आ पायेगी और फिर तुमने कोई इतना बड़ा गुनाह तो किया नहीं है कि जिसकी माफ़ी ना मिल सके .
रिया की बात सुनकर निशि उलझन में पड़ गयी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे. क्या सारी बातें राजीव को बता दे ? क्या ये सब सुनकर राजीव उसे माफ़ कर देगा ? क्या राजीव की जगह यदि वह होती तो क्या उसे माफ़ कर पाती ? ना जाने कितने अनगिनत प्रश्न उसके दिमाग में दस्तक देने लगे. जितना वो इन सबसे दूर रहने की कोशिश करती उतना ही खुद को इन प्रश्नों के चक्रव्यूह में उलझा पाती. इसी कशमकश में फँसी निसी को एक दिन नर्वस ब्रेक डाउन हो गया.
जब राजीव ने उसकी इतनी बुरी हालत देखी तो डॉक्टर के कहने पर अपना सारा व्यवसाय छोड़कर उसे घुमाने के लिए शिमला ले गया मगर वहाँ का सुरम्य वातावरण भी निशि के जीवन में कोई बदलाव ना ला पा रहा था. जब मन में अन्धेरा हो तो बाहर की रौशनी भी फीकी पड़ जाती है .राजीव अपनी तरफ से हर भरसक कोशिश करता निशि का मन दूसरी तरफ लगाने का मगर निशि अपने अंतर्मन की पीड़ा से उबर नहीं पा रही थी . एक तरफ तो मनोज की बेवफाई , धोखा और दूसरी तरफ उसकी गृहस्थी , प्यार करने वाला पति और आज्ञाकारी बच्चे. इन हालातों ने उसे तोड़कर रख दिया था और वो पछतावे की आग में जल रही थी. फिर एक दिन जब राजीव के बहुत कुरेदने पर , अपने प्यार का वास्ता देने पर निशि ने उसे सब बताने का निर्णय लिया. उसने सोचा की रोज घुट-घुटकर जीने से तो अच्छा है कि एक ही बार अपनी गलती को स्वीकार कर ले तो शायद जीना आसान हो जाये...............
क्रमशः ......................
शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010
ये किस मोड़ पर ?.............भाग 2
गतांक से आगे ....................
निशि उस दिन जैसे ही कंप्यूटर पर चैट करने बैठी तो एक शख्स बार- बार उससे बात करने की कोशिश करने लगा . निशि के मना करने पर भी वो नही माना तो निशि ने सोचा चलो जब चैट ही करनी है तो इससे भी बात कर ही ली जाये ताकि इस शख्स को भी चैन आये और वो भी आराम से बात कर सके अपने दोस्तों से.अब निशि उस शख्स यानि मनोज से मुखातिब हुई. दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. मनोज ने सबसे पहले तो निशि के सौंदर्य पर एक खूबसूरत कविता लिखी जिसे पढ़कर निशि आनंद विभोर हो उठी. निशि की सबसे बड़ी कमजोरी पर ही मनोज ने हाथ रख दिया था. उसके बाद तो जैसे निशि की ज़िन्दगी ही बदलने लगी थी. मनोज रोज निशि के सौंदर्य पर कोई ना कोई नयी कविता उसे सुनाता और उसके बाद निशि के सौंदर्य की जी भर कर तारीफ करता .निशि ख़ुशी से फूली ना समाती . धीरे- धीरे दोनों में घनिष्ठता बढ़ने लगी . अब जब तक निशि मनोज से बात ना कर लेती उसे चैन ना आता . इसी प्रकार रोज दोनों बतियाते . मनोज भी निशि को खुश करने में कोई कोर -कसर ना छोड़ता . फिर एक दिन मनोज ने निशि से अपने प्रेम का इजहार किया तो निशि तो जैसे इसी दिन के इंतज़ार में बैठी थी उसने किसी भी प्रकार का कोई प्रतिकार नही किया . उसने एक बार भी अपनी गृहस्थी , अपने पति और बच्चों के बारे में नही सोचा. इस वक़्त तो उसे हर तरफ मनोज ही मनोज दिखाई देता था. पति के पास होकर भी वो ख्यालों में मनोज के साथ होती थी. मनोज का वजूद पूरी तरह उसके दिल-ओ-दिमाग पर हावी हो चुका था. १६ साल की लड़की जैसी उमंगें फिर जवान होने लगी थी. पल- पल खुद को आईने में निहारा करती .अपने सौंदर्य में जरा सी भी कमी ना होने देती और भी बन सँवर कर रहती क्यूंकि अब निशि के ख्वाबों -ख्यालों में सिर्फ एक ही तस्वीर होती . घर के काम तो वो यंत्रचालित मशीन की तरह जल्दी -जल्दी निबटा देती और फिर जल्दी से सबके जाते ही कंप्यूटर पर या फिर फ़ोन पर मनोज से बात करने लगती. . दोनों ने एक -दूसरे को अपना नंबर भी दे दिया था बस मिले नही थे क्यूंकि मनोज काफी दूर किसी दूसरे शहर में रहता था इसलिए मिलना तो ना हो पाया मगर मनोज के बिना एक -एक पल उसे काटने को दौड़ता. निशि को लगता कि बस मनोज उसके सौंदर्य की शान में कसीदे पढता रहे और वो सुनती रहे. धीरे- धीरे मनोज के प्रेमापाश में निशि इस कदर बंध गयी कि अब उसे लगने लगा कि मनोज के बिना वो जी नहीं पायेगी इसलिए एक दिन उसने मनोज से कहा कि अब वो उसके बिना नहीं रह सकती इसलिए अब उन्हें मिलना चाहिए और भविष्य के बारे में तय करना चाहिए कि अब आगे क्या करना है? कहाँ रहना है ? कैसे अपने सपनो को पूरा करना है?इतना सुनते ही मनोज तो ऐसा हो गया जैसे काटो तो खून नही. उसने तो सोचा ही नहीं था इस नज़रिए से. वो तो सिर्फ निशि की भावनाओं से खेल रहा था और अपने पौरुष को संतुष्ट कर रहा था . पहले तो मनोज ने समझाना चाहा कि उसकी भी गृहस्थी है घर परिवार है बच्चे हैं और वो उन्हेंतो नहीं छोड़ सकता इसलिए जैसे चल रहा है वैसे ही चलने दिया जाये कम से कम दोनों एक दूसरे के साथ तो हैं मगर निशि तो कुछ भी सुनने के लिए तैयार ना थी . उसे तो लगता था जैसे सारे संसार में एक मनोज ही है जो उसे चाहता है. वो तो मनोज के इरादों से अनभिज्ञ उसके प्यार में पूरी तरह पागल हो चुकी थी. जब मनोज को लगा कि ये बला तो गले ही पड़ रही है तो वो धीरे- धीरे निशि से कटने लगा. निशि के फ़ोन करने पर उसे जवाब देना उसने बंद कर दिया और ना ही चैट पर सामने आता. कभी गलती से नेट पर सामना हो जाता तो फ़ौरन चला जाता. इस अप्रत्याशित व्यवहार से निशि बौखला गयी . उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे , कैसे मनोज से मिले? वो अपनी हर भरसक कोशिश करने लगी मगर जब मनोज ने उससे पूरी तरह किनारा कर लिया तो इस आघात को निशि सहन नहीं कर पाई ......................
क्रमशः .....................
बुधवार, 31 मार्च 2010
ये किस मोड़ पर ?
निशि की सुन्दरता पर मुग्ध होकर ही तो राजीव और उसके घरवालों ने पहली बार में ही हाँ कह दी थी . दोनों की एक भरपूर , खुशहाल गृहस्थी थी . राजीव का अपना व्यवसाय था और निशि को लाड-प्यार करने वाला परिवार मिला. एक औरत को और क्या चाहिए . प्यार करने वाला पति और साथ देने वाला परिवार. वक़्त के साथ उनके दो बच्चे हुए . चारों तरफ खुशहाल माहौल . कहीं कोई कमी नहीं . वक़्त के साथ बच्चे भी बड़े होने लगे और परिवार के सदस्य भी काम के सिलसिले में दूर चले गए . अब सिर्फ निशि अपने पति और बच्चों के साथ घर में रहती . धीरे- धीरे राजीव का व्यवसाय भी काफी बढ़ गया और वो उसमें व्यस्त रहने लगा. निशि के ऊपर गृहस्थी की पूरी जिम्मेदारी छोड़ राजीव ने अपना सारा ध्यान व्यापार की तरफ केन्द्रित कर लिया . इधर बच्चे भी अब कॉलेज जाने लगे थे तो ऐसे में निशि के पास कोई खास काम भी ना होता और सारा दिन काटने को दौड़ता. उसे समझ नही आता कि वो सारा दिन क्या करे, एक दिन उसके बेटे ने ही उसे बताया की नेट पर चैट किया करो तो आपका मन लगा रहेगा और वक़्त का पता भी नही चलेगा . उसके बेटे ने उसे सब कुछ सिखा दिया . अब तो निशि को दिन कहाँ गुजरा ,पता ही ना चलता . धीरे -धीरे अपने नेट दोस्तों के माध्यम से उसने और भी कई साईट ज्वाइन कर लीं अब तो इस आभासी दुनिया में उसे कई दोस्त मिल गए . नए -नए लोगों से बातें करना उसे अच्छा लगने लगा .
निशि जब भी कंप्यूटर पर चैट करने बैठती उसे देखते ही ना जाने कितने मजनुनुमा भँवरे आ जाते उससे बात करने क्यूंकि वो थी ही इतनी खूबसूरत कि यदि कोई उसे एक बार देख ले तो बात करने को उतावला हो जाता. खुदा ने बड़ी फुरसत में उसे बनाया था . हर अंग जैसे किसी शिल्पकार ने नफासत से गढा हो . शोख चंचल आँखें यूँ लगती जैसे अभी बोलेंगी. लबों की मुस्कान तो देखने वाले का दिल चीर देती थी. उस पर संगमरमरी दूधिया रंग और गुलाबी गालों पर एक छोटा सा काला तिल ऐसा लगता जैसे भगवान ने नज़र का टीका साथ ही लगाकर भेजा हो. ऐसी रूप -लावण्य की राशि पर कौन ना मर मिटे और ऐसे रूप -रंग पर किसे ना नाज़ हो. ऐसा ही हाल निशि का था. जब भी कोई उसकी तारीफ करता , उसके सौंदर्य का गुणगान करता तो वो इठला जाती उसका अहम् संतुष्ट होता. उसे अपने सौंदर्य की प्रशंसा सुनना अच्छा लगता और उम्र के इस पड़ाव पर भी वो किसी भी नज़रिए से इतने बड़े बच्चों की माँ नही लगती थी ऐसे में प्रशंसा के मीठे बोल तो सोने पर सुहागा थे और कंप्यूटर की आभासी दुनिया तो शायद इस काम में माहिर है ही . ......................
क्रमशः ...................
निशि जब भी कंप्यूटर पर चैट करने बैठती उसे देखते ही ना जाने कितने मजनुनुमा भँवरे आ जाते उससे बात करने क्यूंकि वो थी ही इतनी खूबसूरत कि यदि कोई उसे एक बार देख ले तो बात करने को उतावला हो जाता. खुदा ने बड़ी फुरसत में उसे बनाया था . हर अंग जैसे किसी शिल्पकार ने नफासत से गढा हो . शोख चंचल आँखें यूँ लगती जैसे अभी बोलेंगी. लबों की मुस्कान तो देखने वाले का दिल चीर देती थी. उस पर संगमरमरी दूधिया रंग और गुलाबी गालों पर एक छोटा सा काला तिल ऐसा लगता जैसे भगवान ने नज़र का टीका साथ ही लगाकर भेजा हो. ऐसी रूप -लावण्य की राशि पर कौन ना मर मिटे और ऐसे रूप -रंग पर किसे ना नाज़ हो. ऐसा ही हाल निशि का था. जब भी कोई उसकी तारीफ करता , उसके सौंदर्य का गुणगान करता तो वो इठला जाती उसका अहम् संतुष्ट होता. उसे अपने सौंदर्य की प्रशंसा सुनना अच्छा लगता और उम्र के इस पड़ाव पर भी वो किसी भी नज़रिए से इतने बड़े बच्चों की माँ नही लगती थी ऐसे में प्रशंसा के मीठे बोल तो सोने पर सुहागा थे और कंप्यूटर की आभासी दुनिया तो शायद इस काम में माहिर है ही . ......................
क्रमशः ...................
सोमवार, 22 मार्च 2010
शक्ति का वंदन
शक्ति का
पूजन , अर्चन
वंदन,श्रृंगार
किया तुमने
मगर साथ ही
शक्ति का
उपहास, परिहास
खण्डन, मर्दन
ह्रास ,त्रास
और तर्पण भी
किया तुमने
फिर कैसे
शक्ति के
उपासक बनते हो
जब शक्ति को ही
शक्ति सा ही
ना वंदन
करते हो
पहले शक्ति का
महिमामंडन करो
शक्ति का
अवलंबन बनो
शक्ति का पथ
आलोकित करो
शक्ति का संचार करो
शक्ति का आवाहन करो
शक्ति को नव जीवन दो
फिर शक्ति स्वयं बंध जाएगी
तुम्हारे पूजन ,अर्चन
वंदन, श्रृंगार
स्वीकार कर पायेगी
शक्ति की शक्ति
तुम्हें मिल जाएगी
सभी के लिए नव संवत्सर और चैत्र नवरात्र मंगलमय हों
शनिवार, 13 मार्च 2010
फेरों का फेर
ये फेरे जन्म मरण के
लगाये तू जा रहा है
कोल्हू के बैल सा
चलता ही जा रहा है
कभी उनकी गली के फेरे
कभी मंडप के हैं फेरे
बस फेरों के फेर में
फिरता ही जा रहा है
कहीं रुसवाइयों के डेरे
कभी डॉक्टर है घेरे
कहीं मंदिर के हैं फेरे
इन फेरों के फेर में
फिरता ही जा रहा है
इक पल घुमा ले वापस
ज़रा ज़िन्दगी की पिक्चर
क्या खोया क्या पाया
इन फेरों के चक्कर में
पशुओं सा जीवन बस
बिता के जा रहा है
इन फेरों के फेर में
फिरता ही जा रहा है
कुछ पल तू ठहर जा
और आत्मज्योति जगा ले
किस मुख से जायेगा
कैसे नज़र मिलाएगा
कुछ अपने लिए भी कर ले
कुछ तो सुकून पा ले
अब फेरों के फेर से
मुक्त हो जा ओ प्यारे
कट जायेंगे सब तेरे
ये जन्म मरण के फेरे
लगाये तू जा रहा है
कोल्हू के बैल सा
चलता ही जा रहा है
कभी उनकी गली के फेरे
कभी मंडप के हैं फेरे
बस फेरों के फेर में
फिरता ही जा रहा है
कहीं रुसवाइयों के डेरे
कभी डॉक्टर है घेरे
कहीं मंदिर के हैं फेरे
इन फेरों के फेर में
फिरता ही जा रहा है
इक पल घुमा ले वापस
ज़रा ज़िन्दगी की पिक्चर
क्या खोया क्या पाया
इन फेरों के चक्कर में
पशुओं सा जीवन बस
बिता के जा रहा है
इन फेरों के फेर में
फिरता ही जा रहा है
कुछ पल तू ठहर जा
और आत्मज्योति जगा ले
किस मुख से जायेगा
कैसे नज़र मिलाएगा
कुछ अपने लिए भी कर ले
कुछ तो सुकून पा ले
अब फेरों के फेर से
मुक्त हो जा ओ प्यारे
कट जायेंगे सब तेरे
ये जन्म मरण के फेरे
शनिवार, 27 फ़रवरी 2010
श्याम संग खेलें होली
कान्हा ओ कान्हा
कहाँ छुपा है श्याम सांवरिया
ढूँढ रही है राधा बावरिया
होली की धूम मची है
तुझको राधा खोज रही है
अबीर गुलाल लिए खडी है
तेरे लिए ही जोगन बनी है
माँ के आँचल में छुपा हुआ है
रंगों से क्यूँ डरा हुआ है
एक बार आ जा रे कन्हाई
तुझे दिखाएं अपनी रंगनायी
सखियाँ सारी ढूँढ रही हैं
रंग मलने को मचल रही हैं
कान्हा ओ कान्हा
कान्हा ओ कान्हा
तुझ बिन होली सूनी पड़ी है
श्याम रंग को तरस रही है
प्रीत का रंग आकर चढ़ा जा
श्याम रंग में सबको भिगो जा
प्रेम रस ऐसे छलका जा
राधा को मोहन बना जा
मोहन बन जाये राधा प्यारी
हिल मिल खेलें सखियाँ सारी
रंगों से सजाएँ मुखमंडल प्यारी
लाल रंग मुख पर लिपटाएँ
देख सुरतिया बलि बलि जायें
श्याम रंग यूँ निखर निखर जाये
श्यामल श्यामल सब हो जाये
कहाँ छुपा है श्याम सांवरिया
ढूँढ रही है राधा बावरिया
होली की धूम मची है
तुझको राधा खोज रही है
अबीर गुलाल लिए खडी है
तेरे लिए ही जोगन बनी है
माँ के आँचल में छुपा हुआ है
रंगों से क्यूँ डरा हुआ है
एक बार आ जा रे कन्हाई
तुझे दिखाएं अपनी रंगनायी
सखियाँ सारी ढूँढ रही हैं
रंग मलने को मचल रही हैं
कान्हा ओ कान्हा
कान्हा ओ कान्हा
तुझ बिन होली सूनी पड़ी है
श्याम रंग को तरस रही है
प्रीत का रंग आकर चढ़ा जा
श्याम रंग में सबको भिगो जा
प्रेम रस ऐसे छलका जा
राधा को मोहन बना जा
मोहन बन जाये राधा प्यारी
हिल मिल खेलें सखियाँ सारी
रंगों से सजाएँ मुखमंडल प्यारी
लाल रंग मुख पर लिपटाएँ
देख सुरतिया बलि बलि जायें
श्याम रंग यूँ निखर निखर जाये
श्यामल श्यामल सब हो जाये
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010
ऐसा आखिर कब तक -----------अंतिम भाग
दीप्ति से अलग होने के बाद , उसे किये वादे की लाज रखने और उसके त्याग को सम्पूर्णता प्रदान करने के लिए तथा अपना बेटा होने का कर्त्तव्य पूरा करने के लिए आकाश ने अपनी सभी इच्छाओं की बलि चढाते हुए माता- पिता की पसंद की बहुत ही सुन्दर , रईस खानदान की अपनी ही जाति की लड़की रश्मि से शादी कर ली । वक़्त अपनी रफ़्तार से गुजरने लगा ---------आकाश अपनी तरफ से पुरजोर कोशिश करता कि किसी को भी उससे कोई शिकायत ना हो और अपना बेटा और पति होने के फ़र्ज़ को बखूबी निभा सके। उसने खुद को सबकी खुशियों के प्रति समर्पित कर दिया था अपने हर शौक अपनी हर इच्छा का गला तो उसी दिन घोंट दिया था जिस दिन दीप्ति से अलग हुआ था -----------उसकी आवाज़ जो उसकी सबसे बड़ी पहचान थी ना जाने कहाँ वक़्त की गर्दिशों में खो गयी थी यहाँ तक कि रश्मि को तो उसकी इस खूबी का पता भी ना था क्यूँकि उसने कभी आकाश के मन में झाँकने का प्रयास ही नही किया। इसी तरह २ साल निकल गए मगर रश्मि एक रईस खानदान की इकलौती लड़की थी। उसने जो ऐशो -आराम अपने घर देखे थे उसकी तुलना में आकाश तो कुछ भी ना था। मगर फिर भी किसी तरह २ साल उसने निकाल लिए मगर आखिर कब तक एक लगी बँधी तनख्वाह में वो गुजारा करती , कब तक अपनी इच्छाओं को मारती। और जब वो अपनी सहेलियों की ज़िन्दगी की तुलना खुद से करती तब तो वो तिलमिला उठती । धीरे- धीरे २ साल में उसके सब्र का घड़ा भर चुका था और अब उसने छलकना शुरू कर दिया था । अब रश्मि बात -बात पर आकाश को उलाहना देने लगी थी । उसे किसी ना किसी बहाने जलील करती कि इतने पैसों में क्या होता है, आमदनी बढ़ाने के लिए इंसान और भी हथकंडे अपनाता है मगर आकाश एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देता क्यूँकि वो बात बढ़ाना नही चाहता था । जब इसका असर नही दिखा तो रश्मि ने आकाश के माँ -बाप को कोसना शुरू कर दिया ------------उसे लगने लगा कि अगर इन दोनों का खर्च उसके सर से हट जाये तो वो उन पैसों से ज़िन्दगी की खुशियाँ खरीद सकती है। इसलिए वो आकाश पर अपने माँ -बाप से अलग होने का दबाब बनाने लगी । उसे लगा कि जो पैसा उन पर खर्च हो रहा है वो बच जायेगा। रोज- रोज की कलह से तंग आकर आकाश के माँ -बाप भी परेशान रहने लगे और उन्होंने आकाश को मजबूर किया कि वो उनसे अलग हो जाये ताकि उसका जीवन खुशहाल हो सके और वो भी बुढ़ापे में दो रोटी चैन की खा सकें। आकाश को मन मारकर अपने माँ- बाप की खुशहाली के लिए और घर में कुछ सुकून रह सके , अलग होना पड़ा मगर इसका नतीजा तो और भी उल्टा निकला। अब तो रश्मि पर किसी तरह का कोई अंकुश ना था । आकाश तो सारा दिन ऑफिस में होता और रश्मि अपने दोस्तों के साथ कभी पार्टी, कभी पिकनिक, कभी मूवी और कभी किट्टी पार्टी आदि में मशगूल रहने लगी। वो तो ऐसे ही जीवन की आदी थी इसलिए वो अब अपने मन के मुताबिक जीने लगी और उसने अब आकाश पर बिलकुल भी ध्यान देना बंद कर दिया । उसके लिए तो वो बस सिर्फ पैसा कमाने की मशीन था या कहो ऐसा बैंक था जिससे जब चाहे जितना चाहे रुपया निकाल सके । इससे आगे उसे आकाश से कोई मतलब ना होता। मगर आकाश को वो भी मंजूर था क्यूँकि वो चाहता था कि किसी भी तरह घर में शान्ति रहे मगर कुछ ही महीनो में रश्मि की आकांक्षाएं बुलंदियों को छूने लगीं। वो आकाश से दिन पर दिन अपना रहन - सहन का स्तर ऊँचा करने के लिए दबाब डालने लगी। उसे नाजायज तरीकों से पैसा कमाने के लिए उकसाने लगी मगर आकाश को ये तरीका पसंद ना था । वो तो सादा जीवन उच्च विचार के आदर्शों का पालन करने वाला इंसान था और रश्मि उससे बिलकुल उलट थी। आखिर कब तक दोनों की निभती। धीरे- धीरे अब सम्बन्ध और भी बिगड़ने लगे। और फिर एक दिन तो उसके सब्र का सारा बाँध ढह गया जब उसने रश्मि को अपने ही घर में नशे की हालत में धुत होकर उसके एक दोस्त की बाँहों में झूमते हुए देखा , वो पल उसकी ज़िन्दगी का सबसे बुरा पल था। जिस इज्ज़त , शान्ति और खुशहाली के लिए उसने इतने त्याग किये थे वो सब आज धुल -धूसरित हुए उसके आगे पड़े थे। बस उस दिन उन दोनों में इतनी ज्यादा तकरार हुई कि रश्मि घर छोड़कर अपने पिता के घर चली गयी। उस पल तो आकाश ने भी जाने दिया ,मगर जब अगले दिन गुस्सा शांत हुआ तो उसे मनाने उसके घर गया मगर वहाँ उसके पिता और रश्मि ने उसकी इतनी बेईज्ज़ती की कि वो उलटे पैर वापस आ गया। कुछ दिनों बाद आकाश ने फिर उसे मनाने की कोशिश की मगर वो नही मानी। अब रश्मि अपनी ज़िन्दगी से किसी भी प्रकार का कोई समझौता नही करना चाहती थी। अब जब आकाश और उसके माता- पिता भी अपनी तरफ से हर संभव कोशिश करके हार गए तब आकाश ने एक गंभीर निर्णय लिया। आकाश ने सोचा कि इस निर्णय से घबराकर शायद रश्मि वापस आ जाये इसलिए आकाश ने तलाक के कागजात रश्मि के पास भेजे। मगर परिणाम आकाश की सोच के विपरीत हुआ। रश्मि ने वापस आने की बजाय कोर्ट जाना पसंद किया। अब दोनों कोर्ट की तारीखों में घिसटने लगे और इसी जद्दोजहद में आकाश की ज़िन्दगी के पांच साल निकल गए। आकाश को हर रिश्ता सिर्फ स्वार्थपरक लगने लगा। उसे लगता कोई भी उसका अपना नही है सब उसे प्रयोग करना चाहते हैं। माँ बाप ने अपने प्यार , इज्जत और जाति की दुहाई दी और उसके प्रेम का बलिदान ले लिया मगर उसे क्या हासिल हुआ -------वो जिसे उसने जीवनसाथी बनाया वो कभी उसकी ना हुई , उसके लिए तो आकाश का कोई अस्तित्व ही ना था। इन सब बातों ने आकाश को अंधेरों के गर्त में धकेल दिया और जिन राहों को वो बुरा समझता था आज उन्ही राहों पर कदम उसे ले गए थे। अब वो अपना गम शराब की बोतलों में डुबाने की कोशिश करता क्यूँकि कुछ देर के लिए ही सही मगर वो इस मतलबी दुनिया से दूर हो जाता था और आज भी तलाक का इंतज़ार करते -करते जब उसे अगली तारीख मिली तो एक बार फिर उसने शराब का सहारा लिया और उसी हालत में दीप्ति को मिला।
इतन कहकर आकाश चुप हो गया। दीप्ति तो इतना सब सुनकर वैसे ही सुन्न हो गयी थी। उसे तो खुद समझ नही आ रहा था कि ये क्या हो गया है। कैसे आकाश को सांत्वना दे । मगर किसी तरह खुद को संभालकर उसने आकाश को समझाया और थोडा - बहुत खिलाया पिलाया। फिर दीप्ति ने पूछा कि तुम्हें तलाक अब तक क्यूँ नही मिला तो आकाश ने बताया कि रश्मि उससे बदला ले रही है इतने दिन की तड़प का , चाहती तो वो भी है मगर मुझे तड़पते देख उसे सुकून मिल रहा है इसलिए वो हर बार तारीख लेकर निकल जाती है जबकि आकाश को हर बार इस शहर में आना पड़ता है क्यूँकि रश्मि का मायका यहीं है और हर बार सिर्फ तारीख लेकर ही चला जाता है। बस इन्ही हालात ने उसे परेशान कर दिया है । उसकी ज़िन्दगी कोर्ट की सीढियां चढ़ने- उतरने में ही बर्बाद हो रही है और कोई हल नही मिल रहा क्यूँकि रश्मि को औरत होने का भी फायदा मिल रहा है कोर्ट की भी सारी सहानुभूति उसके साथ है।
अब दीप्ति ने आकाश को समझाया और कुछ दिनों की छुट्टी लेकर आकाश के साथ उसके शहर गयी। आज उसे ये शहर अपना होते हुए भी अजीब लग रहा था मगर किसी तरह दिल पर पत्थर रखकर वो आकाश के साथ उसके माता -पिता के पास गयी उनसे मिली । आज वो भी अपने किये पर शर्मिंदा थे। अब उन्हें भी अपनी गलती का अहसास हो गया था मगर अब पछताय होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत । अब जब उन्होंने अपने बेटे की ज़िन्दगी बर्बाद होते देखी तब उन्हें समझ आया कि जाति -बिरादरी कोई काम नही आता और जहाँ प्रेम हो वहां इन सबकी कोई जरूरत नही होती । सिर्फ अपने उसूलों की वजह से आज उन्होंने तीन जिंदगियां बर्बाद कर दी थीं। आज वो दीप्ति के आगे खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहे थे। आज वो तहेदिल से चाहते थे कि आकाश और दीप्ति एक हो जायें मगर आज उनके बीच था आज का कानून। साल पर साल निकल रहे थे मगर आकाश और रश्मि का अभी तलाक नही हुआ था। आकाश और दीप्ति का प्रेम एक बार जाति -पांति के चक्कर में बलिदान हुआ था और अब कानून के चक्रव्यूह में फँसा अपने भविष्य की बाट जोह रहा था। कब तक हमारा समाज इन बेड़ियों में जकड़ा रहेगा और मासूमों की ज़िंदगियाँ बर्बाद करता रहेगा। कब तक कानून की जटिल प्रक्रियाएं मानव मन को खोखला करती रहेगी और वो बेबस , असहाय -सा निरीह पशु की भाँति कानून के शिकंजे में फँसा बर्बाद होता रहेगा। ऐसा आखिर कब तक????????????
इतन कहकर आकाश चुप हो गया। दीप्ति तो इतना सब सुनकर वैसे ही सुन्न हो गयी थी। उसे तो खुद समझ नही आ रहा था कि ये क्या हो गया है। कैसे आकाश को सांत्वना दे । मगर किसी तरह खुद को संभालकर उसने आकाश को समझाया और थोडा - बहुत खिलाया पिलाया। फिर दीप्ति ने पूछा कि तुम्हें तलाक अब तक क्यूँ नही मिला तो आकाश ने बताया कि रश्मि उससे बदला ले रही है इतने दिन की तड़प का , चाहती तो वो भी है मगर मुझे तड़पते देख उसे सुकून मिल रहा है इसलिए वो हर बार तारीख लेकर निकल जाती है जबकि आकाश को हर बार इस शहर में आना पड़ता है क्यूँकि रश्मि का मायका यहीं है और हर बार सिर्फ तारीख लेकर ही चला जाता है। बस इन्ही हालात ने उसे परेशान कर दिया है । उसकी ज़िन्दगी कोर्ट की सीढियां चढ़ने- उतरने में ही बर्बाद हो रही है और कोई हल नही मिल रहा क्यूँकि रश्मि को औरत होने का भी फायदा मिल रहा है कोर्ट की भी सारी सहानुभूति उसके साथ है।
अब दीप्ति ने आकाश को समझाया और कुछ दिनों की छुट्टी लेकर आकाश के साथ उसके शहर गयी। आज उसे ये शहर अपना होते हुए भी अजीब लग रहा था मगर किसी तरह दिल पर पत्थर रखकर वो आकाश के साथ उसके माता -पिता के पास गयी उनसे मिली । आज वो भी अपने किये पर शर्मिंदा थे। अब उन्हें भी अपनी गलती का अहसास हो गया था मगर अब पछताय होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत । अब जब उन्होंने अपने बेटे की ज़िन्दगी बर्बाद होते देखी तब उन्हें समझ आया कि जाति -बिरादरी कोई काम नही आता और जहाँ प्रेम हो वहां इन सबकी कोई जरूरत नही होती । सिर्फ अपने उसूलों की वजह से आज उन्होंने तीन जिंदगियां बर्बाद कर दी थीं। आज वो दीप्ति के आगे खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहे थे। आज वो तहेदिल से चाहते थे कि आकाश और दीप्ति एक हो जायें मगर आज उनके बीच था आज का कानून। साल पर साल निकल रहे थे मगर आकाश और रश्मि का अभी तलाक नही हुआ था। आकाश और दीप्ति का प्रेम एक बार जाति -पांति के चक्कर में बलिदान हुआ था और अब कानून के चक्रव्यूह में फँसा अपने भविष्य की बाट जोह रहा था। कब तक हमारा समाज इन बेड़ियों में जकड़ा रहेगा और मासूमों की ज़िंदगियाँ बर्बाद करता रहेगा। कब तक कानून की जटिल प्रक्रियाएं मानव मन को खोखला करती रहेगी और वो बेबस , असहाय -सा निरीह पशु की भाँति कानून के शिकंजे में फँसा बर्बाद होता रहेगा। ऐसा आखिर कब तक????????????
बुधवार, 17 फ़रवरी 2010
ऐसा आखिर कब तक ?
गतांक से आगे ..................
जैसे ही आकाश ने अपने घर में दीप्ति के बारे में बताया तो उसके माता- पिता बहुत खुश हुए। वो तो कब से इस दिन का इंतज़ार कर रहे थे इसलिए उसी दिन रिश्ता लेकर दीप्ति के घरवालों के पास गए मगर वहाँ जब पता चला कि दीप्ति छोटी जाति की है और आकाश राजपूत तो आकाश के माता -पिता उलटे पैर वापस आ गए । उन्हें अपने से छोटी जाति की लड़की से अपने बेटे का विवाह मंजूर ना था। आकाश ने लाख समझाया ,अपने प्यार की दुहाई दी मगर उसके माता -पिता अपनी बात से टस से मस ना हुये । उन्हें अपने समाज , अपनी बिरादरी सब से ऊपर लगती थी और अपनी इज्ज़त की खातिर उन्होंने आकाश का दिल तोडना उचित समझा क्यूँकि वो समझते थे कि प्यार- व्यार कुछ नही होता महज शारीरिक आकर्षण है जो दूसरी जगह शादी होने के बाद अपने आप खत्म हो जायेगा और वो ये सब कुछ भूल जायेगा। आकाश की सबसे बड़ी विडंबना यही थी कि वो अपने माता- पिता की इकलौती संतान था इसलिए उसका फ़र्ज़ भी बनता था कि कुछ भी ऐसा ना करे जिससे उनका दिल दुखे क्यूँकि उन्होंने उसे बहुत ही लाड -प्यार से पाला था तो क्या वो सिर्फ अपने स्वार्थ की खातिर अपने माता- पिता को दुखी कर दे और इस कारण उन्हें छोड़ भी नही सकता था और दीप्ति के बिना रह भी नही सकता था । उसने अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश की मगर नतीजा शून्य ही रहा और इसी जद्दोजहद में २ साल निकल गए । उधर दीप्ति भी बहुत दुखी थी मगर वो सिवाय इंतज़ार के कर भी क्या सकती थी. इधर जब २ साल निकल गए और कोई हल ना निकला समस्या का तब एक दिन आकाश के माता -पिता ने दीप्ति को बुलाया क्यूँकि उन्हें लगता था कि दीप्ति के कारण ही उनका बेटा शादी नही कर रहा है इसलिए यदि वो ही उसे कहेगी तभी आकाश शादी के लिए राजी होगा इसलिए उन्होंने दीप्ति पर अपने प्यार,त्याग और तपस्या की दुहाई देकर दबाब बनाया कि आकाश उनकी इकलौती संतान है और उसकी खुशियाँ देखने के लिए ही तो वो जिंदा हैं इसलिए अगर दीप्ति कहे तो आकाश मान जायेगा और दूसरी जगह शादी कर लेगा । बहुत गहरा धक्का लगा था दीप्ति को उस दिन। एकदम आसमान से धरती पर आ गयी थी आंखों के आगे अँधेरा छा गया था मगर किसी तरह खुद को सँभाल कर और अपने आँसुओं को आँखों में ही दफ़न करके वो वहाँ से वापस आई। सारी रात रोती रही क्यूँकि उसे एक विश्वास था कि शायद कुछ दिन में आकाश के माँ -बाप का दिल पिघल जायेगा अपने बेटे की हालत देखकर तो मान जायेंगे मगर नतीजा कुछ नही निकला बल्कि उसे ही बलि की वेदी पर बिठा दिया गया कितना स्वार्थमय है ये संसार । किसी के अरमानो की चिता जलाकर हाथ सेंकना ही आता है शायद सबको मगर फिर आकाश के बारे में सोचकर , उसकी जिम्मेदारियों , कर्तव्यों के बारे में सोचकर उसने आकाश को समझाने के फैसला लिया क्यूँकि उसने सोचा यदि वो खुश नही रह सकती तो कम से कम किसी को तो ख़ुशी के कुछ पल ही दे दे कम से कम कुछ और ज़िंदगियाँ बर्बाद होने से तो बच जाएँगी। अपने प्यार की दुहाई देकर किसी तरह दीप्ति ने आकाश को मना लिया और दोनों ने एक -दूसरे से एक अच्छे दोस्त की तरह विदा ली। दीप्ति को सुकून था कि चलो उसे आकाश तो नही मिला मगर उसका प्रेम तो हमेशा उसका ही रहेगा और वो ही उसके जीवन का सबसे अनमोल तोहफा होगा तथा आकाश और उसके माता- पिता एक खुशहाल जीवन तो जी सकेंगे। चाहे उसकी मोहब्बत को मुकाम नही मिला मगर सुकून तो मिला। इस प्रकार दीप्ति ने खुद को तसल्ली देकर कभी विवाह ना करने का फैसला कर लिया और अपना ट्रान्सफर उस शहर से दूसरे शहर में करवा लिया और उस दिन के बाद आज आकाश को इस हालत में अपने शहर में भटकते पाया तो उसका दिल दहल गया । उसे समझ ही ना आया कि ऐसा क्या हो गया आकाश के साथ जो उसकी ये हालत हो गयी थी क्या इसी दिन के लिए उसने अपनी मोहब्बत कुर्बान की थी ।अब उसे सुबह का इंतज़ार था जब आकाश उठे तो उससे जाने उसके अतीत के बारे में ।
अगले दिन सुबह जब आकाश उठा तो उसने अपने आप को एक अजनबी घर में बिस्तर पर लेटा पाया तो हडबडाकर उठ बैठा। उसे समझ नही आ रहा था कि वो कहाँ है तभी दीप्ति हाथ में चाय की ट्रे लेकर कमरे में दाखिल हुई और जैसे ही आकाश ने दीप्ति को देखा तो उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही ना हुआ । उसे लगा कि वो कोई सपना देख रहा है मगर जब दीप्ति ने आकाश का हाल पूछा तो उसे यकीन आया कि जो सामने है वो भी हकीकत ही है । थोड़ी देर के लिए दोनों के बीच ख़ामोशी पसर गयी। मगर इस बार दीप्ति ने ख़ामोशी को तोडा और आकाश से उसके बारे में पूछा । उसका ये हाल कैसे हुआ सब जानना चाहती थी दीप्ति । सारी रात उसने इसी उधेड़बुन में काटी थी मगर जैसे ही दीप्ति ने ये प्रश्न किया आकाश तिलमिला उठा जैसे जलते हुए तवे पर उसका पाँव पड़ गया हो सारे जहान का दर्द उसके चेहरे पर उतर आया था । ना जाने कौन सी पीड़ा समेटे था कि दीप्ति के पूछने पर वो एकदम फूट -फूटकर रोने लगा । दीप्ति के लिए ये एक अप्रत्याशित घटना थी । वो चेहरा जिसे उसने हमेशा हँसता -खिलखिलाता, जीवन की उमंगों से भरपूर देखा था वो आज उसके आगे रो रहा था । दीप्ति से बर्दाश्त नही हो रहा था मगर क्या करती किस तरह उसे सांत्वना दे उसे समझ नही आ रहा था । जब आकाश रोने के बाद कुछ हल्का हुआ तो उसने बताना शुरू किया ---------------क्रमशः .........................
जैसे ही आकाश ने अपने घर में दीप्ति के बारे में बताया तो उसके माता- पिता बहुत खुश हुए। वो तो कब से इस दिन का इंतज़ार कर रहे थे इसलिए उसी दिन रिश्ता लेकर दीप्ति के घरवालों के पास गए मगर वहाँ जब पता चला कि दीप्ति छोटी जाति की है और आकाश राजपूत तो आकाश के माता -पिता उलटे पैर वापस आ गए । उन्हें अपने से छोटी जाति की लड़की से अपने बेटे का विवाह मंजूर ना था। आकाश ने लाख समझाया ,अपने प्यार की दुहाई दी मगर उसके माता -पिता अपनी बात से टस से मस ना हुये । उन्हें अपने समाज , अपनी बिरादरी सब से ऊपर लगती थी और अपनी इज्ज़त की खातिर उन्होंने आकाश का दिल तोडना उचित समझा क्यूँकि वो समझते थे कि प्यार- व्यार कुछ नही होता महज शारीरिक आकर्षण है जो दूसरी जगह शादी होने के बाद अपने आप खत्म हो जायेगा और वो ये सब कुछ भूल जायेगा। आकाश की सबसे बड़ी विडंबना यही थी कि वो अपने माता- पिता की इकलौती संतान था इसलिए उसका फ़र्ज़ भी बनता था कि कुछ भी ऐसा ना करे जिससे उनका दिल दुखे क्यूँकि उन्होंने उसे बहुत ही लाड -प्यार से पाला था तो क्या वो सिर्फ अपने स्वार्थ की खातिर अपने माता- पिता को दुखी कर दे और इस कारण उन्हें छोड़ भी नही सकता था और दीप्ति के बिना रह भी नही सकता था । उसने अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश की मगर नतीजा शून्य ही रहा और इसी जद्दोजहद में २ साल निकल गए । उधर दीप्ति भी बहुत दुखी थी मगर वो सिवाय इंतज़ार के कर भी क्या सकती थी. इधर जब २ साल निकल गए और कोई हल ना निकला समस्या का तब एक दिन आकाश के माता -पिता ने दीप्ति को बुलाया क्यूँकि उन्हें लगता था कि दीप्ति के कारण ही उनका बेटा शादी नही कर रहा है इसलिए यदि वो ही उसे कहेगी तभी आकाश शादी के लिए राजी होगा इसलिए उन्होंने दीप्ति पर अपने प्यार,त्याग और तपस्या की दुहाई देकर दबाब बनाया कि आकाश उनकी इकलौती संतान है और उसकी खुशियाँ देखने के लिए ही तो वो जिंदा हैं इसलिए अगर दीप्ति कहे तो आकाश मान जायेगा और दूसरी जगह शादी कर लेगा । बहुत गहरा धक्का लगा था दीप्ति को उस दिन। एकदम आसमान से धरती पर आ गयी थी आंखों के आगे अँधेरा छा गया था मगर किसी तरह खुद को सँभाल कर और अपने आँसुओं को आँखों में ही दफ़न करके वो वहाँ से वापस आई। सारी रात रोती रही क्यूँकि उसे एक विश्वास था कि शायद कुछ दिन में आकाश के माँ -बाप का दिल पिघल जायेगा अपने बेटे की हालत देखकर तो मान जायेंगे मगर नतीजा कुछ नही निकला बल्कि उसे ही बलि की वेदी पर बिठा दिया गया कितना स्वार्थमय है ये संसार । किसी के अरमानो की चिता जलाकर हाथ सेंकना ही आता है शायद सबको मगर फिर आकाश के बारे में सोचकर , उसकी जिम्मेदारियों , कर्तव्यों के बारे में सोचकर उसने आकाश को समझाने के फैसला लिया क्यूँकि उसने सोचा यदि वो खुश नही रह सकती तो कम से कम किसी को तो ख़ुशी के कुछ पल ही दे दे कम से कम कुछ और ज़िंदगियाँ बर्बाद होने से तो बच जाएँगी। अपने प्यार की दुहाई देकर किसी तरह दीप्ति ने आकाश को मना लिया और दोनों ने एक -दूसरे से एक अच्छे दोस्त की तरह विदा ली। दीप्ति को सुकून था कि चलो उसे आकाश तो नही मिला मगर उसका प्रेम तो हमेशा उसका ही रहेगा और वो ही उसके जीवन का सबसे अनमोल तोहफा होगा तथा आकाश और उसके माता- पिता एक खुशहाल जीवन तो जी सकेंगे। चाहे उसकी मोहब्बत को मुकाम नही मिला मगर सुकून तो मिला। इस प्रकार दीप्ति ने खुद को तसल्ली देकर कभी विवाह ना करने का फैसला कर लिया और अपना ट्रान्सफर उस शहर से दूसरे शहर में करवा लिया और उस दिन के बाद आज आकाश को इस हालत में अपने शहर में भटकते पाया तो उसका दिल दहल गया । उसे समझ ही ना आया कि ऐसा क्या हो गया आकाश के साथ जो उसकी ये हालत हो गयी थी क्या इसी दिन के लिए उसने अपनी मोहब्बत कुर्बान की थी ।अब उसे सुबह का इंतज़ार था जब आकाश उठे तो उससे जाने उसके अतीत के बारे में ।
अगले दिन सुबह जब आकाश उठा तो उसने अपने आप को एक अजनबी घर में बिस्तर पर लेटा पाया तो हडबडाकर उठ बैठा। उसे समझ नही आ रहा था कि वो कहाँ है तभी दीप्ति हाथ में चाय की ट्रे लेकर कमरे में दाखिल हुई और जैसे ही आकाश ने दीप्ति को देखा तो उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही ना हुआ । उसे लगा कि वो कोई सपना देख रहा है मगर जब दीप्ति ने आकाश का हाल पूछा तो उसे यकीन आया कि जो सामने है वो भी हकीकत ही है । थोड़ी देर के लिए दोनों के बीच ख़ामोशी पसर गयी। मगर इस बार दीप्ति ने ख़ामोशी को तोडा और आकाश से उसके बारे में पूछा । उसका ये हाल कैसे हुआ सब जानना चाहती थी दीप्ति । सारी रात उसने इसी उधेड़बुन में काटी थी मगर जैसे ही दीप्ति ने ये प्रश्न किया आकाश तिलमिला उठा जैसे जलते हुए तवे पर उसका पाँव पड़ गया हो सारे जहान का दर्द उसके चेहरे पर उतर आया था । ना जाने कौन सी पीड़ा समेटे था कि दीप्ति के पूछने पर वो एकदम फूट -फूटकर रोने लगा । दीप्ति के लिए ये एक अप्रत्याशित घटना थी । वो चेहरा जिसे उसने हमेशा हँसता -खिलखिलाता, जीवन की उमंगों से भरपूर देखा था वो आज उसके आगे रो रहा था । दीप्ति से बर्दाश्त नही हो रहा था मगर क्या करती किस तरह उसे सांत्वना दे उसे समझ नही आ रहा था । जब आकाश रोने के बाद कुछ हल्का हुआ तो उसने बताना शुरू किया ---------------क्रमशः .........................
मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010
ऐसा आखिर कब तक?
यूँ लगा दहकता अंगारा सीने पर रख दिया हो किसी ने ---------जैसे ही दीप्ति ने आकाश को देखा । ये क्या हाल हो गया था आकाश का ? वो तो ऐसा ना था । आज ५ बरस बाद जब उसने आकाश को देखा तो ज़िन्दगी के बीते लम्हे सामने आ खड़े हुए ।
दीप्ति ने आकाश को उठाया और अपने साथ अपने घर ले गयी । उसे दवाई देकर सुला दिया और खुद अतीत की गलियों में विचरने लगी । उसे याद है आज भी जब आकाश उसकी ज़िन्दगी में आया था ।
हँसता मुस्कुराता जिंदादिल इंसान था आकाश । हर कोई उसके साथ के लिए तरसता था । हर महफ़िल की जान हुआ करता था । सबसे बड़ी चीज उसकी शख्सियत की ----------उसकी आवाज़ ------जब वो गाता था तो यूँ लगता जैसे सावन की रिमझिम फुहार पड़ रही हों ----------सारा आलम उस पल रुक जाता था । हर कोई मंत्रमुग्ध सा उसकी आवाज़ सुनता और उसी में खो जाता । गाना कब ख़त्म होता किसी को पता ही नही चलता जब तक कि खुद वो इस बात का बोध ना कराता । ऐसे ही एक महफ़िल में दीप्ति की मुलाक़ात आकाश से हुई थी और आकाश की आवाज़ सुनते ही दीप्ति को यूँ लगा जैसे दूर पहाड़ों की वादियों से कोई उसे आवाज़ दे रहा हो , जैसे ना जाने कितने जलतरंग एक साथ बज रहे हों ।आकाश की आवाज़ ने उसका तन मन भिगो दिया था और वो उसकी गहराइयों में डूबती चली गयी। उस दिन दीप्ति आकाश की आवाज़ को अपना दिल दे आई थी ।
दीप्ति एक ऑफिस में कार्यरत साधारण रूप रंग वाली मध्यमवर्गीय लड़की थी । उसकी कोई बहुत ऊँची आकांक्षायें नही थी । बस उसमें आकर्षण था तो सिर्फ एक ---------उसकी आँखें । आँखें क्या थी जैसे ज़िन्दगी वहीँ बसती हो । ऐसी नशीली स्वप्निल आँखें थी कि जो एक बार देख लेता तो भूल नही सकता था । बस सिर्फ यही एक उसके अस्तित्व की सबसे बड़ी पहचान थी बाकी सब उसमें साधारण ही था।
उसके पिता भी नौकरीपेशा इंसान थे और एक भाई और एक बहन की शादी होचुकी थी और वो उनकी तीसरी संतान थी। एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार की साधारण सी लड़की थी इसलिए किसी भी तरह के अरमानो को अपनी ज़िन्दगी में जगह नही देती थी । उसे अपनी सीमा पता थी। मगर जिस दिन से आकाश की आवाज़ सुनी थी , सारी बंदिशें , सारी सीमाएं ना जाने कहाँ लुप्त हो गयी थी। अब तो उसे हर जगह सिर्फ आकाश की आवाज़ सुनने की इच्छा होती और वो चाहती किसी तरह एक बार फिर वो ही आवाज़ सुनने को मिले। एक अजीब सी बेचैनी, एक तड़प ना जाने कब चुपके से दिल में घर कर गयी थी ।
उधर आकाश यूँ तो ना जाने रोज कितनी ही लड़कियों से मिलता था । एक से बढ़कर एक सुन्दर होती मगर जिस दिन से उसने दीप्ति को देखा उसकी आँखों की शोखी में अपना सब कुछ लुटा बैठा था ।दिन का चैन रात की नींद , सब ना जाने कहाँ उड़नछू हो गए थे । ना जाने कौन सा जादू था उन आँखों में कि उसे हर पल अपने आस -पास उन्ही निगाहों की मौजूदगी का अहसास होता। यूँ तो आकाश पेशे से इंजिनियर था । घर में माँ, बाप की इकलौती संतान होने के कारण उनकी आँखों का तारा था । किसी बात की ज़िन्दगी में कोई कमी ना थी। बस कमी थी तो इतनी कि कोई अच्छी सी लड़की जीवनसाथी बन उसकी ज़िन्दगी में आ जाती।
इधर जबसे उसने दीप्ति को देखा था अपना दिल अपना चैन सब उसकी निगाहों पर लुटा बैठा था। ना जाने कैसी कशिश थी उन आँखों में जिनसे वो खुद को आज़ाद नही कर पा रहा था इसलिए एक दिन उसने पता लगाने की कोशिश की कि वो थी कौन? इसके लिए उसने अपने उसी दोस्त को कहा जिसने उसे महफ़िल में बुलाया था । वो पार्टी आकाश के दोस्त समीर ने दी थी इसलिए उसने समीर से दीप्ति के बारे में जानना चाहा तो पता चला कि वो तो समीर की दूर के रिश्ते की बहन है । बस इतना ही काफी था आकाश के लिए। किसी तरह उसने समीर को उससे मिलने के लिए मनाया और फिर एक दिन योजना के मुताबिक वो समीर के साथ दीप्ति के ऑफिस के नीचे पहुँच गया और वहां जब दीप्ति आई तो समीर ने उन दोनों का परिचय करवाया और चला गया क्यूँकि वो जानता था कि आकाश के साथ दीप्ति को छोड़ने में कोई बुराई नही है । आकाश एक समझदार इंसान है वो कोई ऐसी बात नही करेगा जो उसकी सीमा से बाहर हो ।
अब आकाश और दीप्ति आमने -सामने थे । दोनों की चिर- प्रतीक्षित अभिलाषा आज पूर्ण हो गयी थी । दोनों ही एक दूसरे से मिलना चाहते थे मगर आज जुबान साथ छोड़ गयी थी । काफी देर दोनों के बीच यूँ ही मौन पसरा रहा । आकाश तो वैसे भी दीप्ति को देखते ही उसकी आँखों के जादुई आकर्षण में खो गया था । अब उसे अपना होश कहाँ था और दीप्ति वो तो अभी तक इस आश्चर्य से बाहर ही नही आ पा रही थी कि आकाश उसके सामने खड़ा है । उसने तो स्वप्न में भी नही सोचा था कि इस तरह अचानक आकाश से यूँ मुलाक़ात होगी। काफी देर दोनों यूँ ही जडवत से एक दूसरे को देखते रहे। फिर जब काफी देर बाद उन्हें अपनी स्थिति का आभास हुआ तो दोनों साथ- लगे। सबसे पहले आकाश ने बात शुरू की और जैसा कि उसकी आदत थी कभी भी खामोश ना रहना और हँसते हँसाते रहना वो यहाँ भी बदस्तूर जारी था और दीप्ति सिर्फ 'हाँ' 'हूँ' में जवाब देती उसकी हर अदा पर फ़िदा होती जा रही थी। नारी मन की कोमल भावनाएं वो इतनी जल्दी किसी को दिखा भी नहीं सकती थी और ना ही किसी को बता सकती थी। बस इसी प्रकार धीरे -धीरे दोनों का मिलना जारी रहा । एक दूसरे को अच्छी तरह जान चुके थे दोनों और प्रेम का इज़हार भी हो चुका था । बस अब तो सिर्फ शहनाई बजनी बाकी रह गयी थी मगर नियति को तो कुछ और ही मंजूर था।
क्रमशः .......................
दीप्ति ने आकाश को उठाया और अपने साथ अपने घर ले गयी । उसे दवाई देकर सुला दिया और खुद अतीत की गलियों में विचरने लगी । उसे याद है आज भी जब आकाश उसकी ज़िन्दगी में आया था ।
हँसता मुस्कुराता जिंदादिल इंसान था आकाश । हर कोई उसके साथ के लिए तरसता था । हर महफ़िल की जान हुआ करता था । सबसे बड़ी चीज उसकी शख्सियत की ----------उसकी आवाज़ ------जब वो गाता था तो यूँ लगता जैसे सावन की रिमझिम फुहार पड़ रही हों ----------सारा आलम उस पल रुक जाता था । हर कोई मंत्रमुग्ध सा उसकी आवाज़ सुनता और उसी में खो जाता । गाना कब ख़त्म होता किसी को पता ही नही चलता जब तक कि खुद वो इस बात का बोध ना कराता । ऐसे ही एक महफ़िल में दीप्ति की मुलाक़ात आकाश से हुई थी और आकाश की आवाज़ सुनते ही दीप्ति को यूँ लगा जैसे दूर पहाड़ों की वादियों से कोई उसे आवाज़ दे रहा हो , जैसे ना जाने कितने जलतरंग एक साथ बज रहे हों ।आकाश की आवाज़ ने उसका तन मन भिगो दिया था और वो उसकी गहराइयों में डूबती चली गयी। उस दिन दीप्ति आकाश की आवाज़ को अपना दिल दे आई थी ।
दीप्ति एक ऑफिस में कार्यरत साधारण रूप रंग वाली मध्यमवर्गीय लड़की थी । उसकी कोई बहुत ऊँची आकांक्षायें नही थी । बस उसमें आकर्षण था तो सिर्फ एक ---------उसकी आँखें । आँखें क्या थी जैसे ज़िन्दगी वहीँ बसती हो । ऐसी नशीली स्वप्निल आँखें थी कि जो एक बार देख लेता तो भूल नही सकता था । बस सिर्फ यही एक उसके अस्तित्व की सबसे बड़ी पहचान थी बाकी सब उसमें साधारण ही था।
उसके पिता भी नौकरीपेशा इंसान थे और एक भाई और एक बहन की शादी होचुकी थी और वो उनकी तीसरी संतान थी। एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार की साधारण सी लड़की थी इसलिए किसी भी तरह के अरमानो को अपनी ज़िन्दगी में जगह नही देती थी । उसे अपनी सीमा पता थी। मगर जिस दिन से आकाश की आवाज़ सुनी थी , सारी बंदिशें , सारी सीमाएं ना जाने कहाँ लुप्त हो गयी थी। अब तो उसे हर जगह सिर्फ आकाश की आवाज़ सुनने की इच्छा होती और वो चाहती किसी तरह एक बार फिर वो ही आवाज़ सुनने को मिले। एक अजीब सी बेचैनी, एक तड़प ना जाने कब चुपके से दिल में घर कर गयी थी ।
उधर आकाश यूँ तो ना जाने रोज कितनी ही लड़कियों से मिलता था । एक से बढ़कर एक सुन्दर होती मगर जिस दिन से उसने दीप्ति को देखा उसकी आँखों की शोखी में अपना सब कुछ लुटा बैठा था ।दिन का चैन रात की नींद , सब ना जाने कहाँ उड़नछू हो गए थे । ना जाने कौन सा जादू था उन आँखों में कि उसे हर पल अपने आस -पास उन्ही निगाहों की मौजूदगी का अहसास होता। यूँ तो आकाश पेशे से इंजिनियर था । घर में माँ, बाप की इकलौती संतान होने के कारण उनकी आँखों का तारा था । किसी बात की ज़िन्दगी में कोई कमी ना थी। बस कमी थी तो इतनी कि कोई अच्छी सी लड़की जीवनसाथी बन उसकी ज़िन्दगी में आ जाती।
इधर जबसे उसने दीप्ति को देखा था अपना दिल अपना चैन सब उसकी निगाहों पर लुटा बैठा था। ना जाने कैसी कशिश थी उन आँखों में जिनसे वो खुद को आज़ाद नही कर पा रहा था इसलिए एक दिन उसने पता लगाने की कोशिश की कि वो थी कौन? इसके लिए उसने अपने उसी दोस्त को कहा जिसने उसे महफ़िल में बुलाया था । वो पार्टी आकाश के दोस्त समीर ने दी थी इसलिए उसने समीर से दीप्ति के बारे में जानना चाहा तो पता चला कि वो तो समीर की दूर के रिश्ते की बहन है । बस इतना ही काफी था आकाश के लिए। किसी तरह उसने समीर को उससे मिलने के लिए मनाया और फिर एक दिन योजना के मुताबिक वो समीर के साथ दीप्ति के ऑफिस के नीचे पहुँच गया और वहां जब दीप्ति आई तो समीर ने उन दोनों का परिचय करवाया और चला गया क्यूँकि वो जानता था कि आकाश के साथ दीप्ति को छोड़ने में कोई बुराई नही है । आकाश एक समझदार इंसान है वो कोई ऐसी बात नही करेगा जो उसकी सीमा से बाहर हो ।
अब आकाश और दीप्ति आमने -सामने थे । दोनों की चिर- प्रतीक्षित अभिलाषा आज पूर्ण हो गयी थी । दोनों ही एक दूसरे से मिलना चाहते थे मगर आज जुबान साथ छोड़ गयी थी । काफी देर दोनों के बीच यूँ ही मौन पसरा रहा । आकाश तो वैसे भी दीप्ति को देखते ही उसकी आँखों के जादुई आकर्षण में खो गया था । अब उसे अपना होश कहाँ था और दीप्ति वो तो अभी तक इस आश्चर्य से बाहर ही नही आ पा रही थी कि आकाश उसके सामने खड़ा है । उसने तो स्वप्न में भी नही सोचा था कि इस तरह अचानक आकाश से यूँ मुलाक़ात होगी। काफी देर दोनों यूँ ही जडवत से एक दूसरे को देखते रहे। फिर जब काफी देर बाद उन्हें अपनी स्थिति का आभास हुआ तो दोनों साथ- लगे। सबसे पहले आकाश ने बात शुरू की और जैसा कि उसकी आदत थी कभी भी खामोश ना रहना और हँसते हँसाते रहना वो यहाँ भी बदस्तूर जारी था और दीप्ति सिर्फ 'हाँ' 'हूँ' में जवाब देती उसकी हर अदा पर फ़िदा होती जा रही थी। नारी मन की कोमल भावनाएं वो इतनी जल्दी किसी को दिखा भी नहीं सकती थी और ना ही किसी को बता सकती थी। बस इसी प्रकार धीरे -धीरे दोनों का मिलना जारी रहा । एक दूसरे को अच्छी तरह जान चुके थे दोनों और प्रेम का इज़हार भी हो चुका था । बस अब तो सिर्फ शहनाई बजनी बाकी रह गयी थी मगर नियति को तो कुछ और ही मंजूर था।
क्रमशः .......................
गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010
भाव सुमन
आनन्द ही आनन्द समाया है
सतगुरु तुम्हारे चरणों में
अनमोल वचन अब पाया है
सतगुरु तुम्हारी वाणी में
आनन्द ही आनन्द .......................
मैं कैसे भुला दूँ नेह तेरा
तुमने ही मुझे अपनाया है
दुनिया ने मुझे ठुकराया है
सतगुरु ने ज्ञान जगाया है
आनन्द ही आनन्द ........................
मैं दीन- हीन हूँ अज्ञानी
तुम हो चराचर के स्वामी
मुझे मुझसे आज मिलाया है
वो दिव्य रूप दिखलाया है
आनन्द ही आनन्द ..........................
मैं माया बीच भटकती हूँ
माया के हाथों ठगती हूँ
सतगुरु ने दीप जलाया है
वो आत्मज्ञान जगाया है
आनन्द ही आनन्द . ...........................
सतगुरु तुम्हारे चरणों में
अनमोल वचन अब पाया है
सतगुरु तुम्हारी वाणी में
आनन्द ही आनन्द .......................
मैं कैसे भुला दूँ नेह तेरा
तुमने ही मुझे अपनाया है
दुनिया ने मुझे ठुकराया है
सतगुरु ने ज्ञान जगाया है
आनन्द ही आनन्द ........................
मैं दीन- हीन हूँ अज्ञानी
तुम हो चराचर के स्वामी
मुझे मुझसे आज मिलाया है
वो दिव्य रूप दिखलाया है
आनन्द ही आनन्द ..........................
मैं माया बीच भटकती हूँ
माया के हाथों ठगती हूँ
सतगुरु ने दीप जलाया है
वो आत्मज्ञान जगाया है
आनन्द ही आनन्द . ...........................
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
मैं तेरी हो जाऊँ
कान्हा
प्रेम तेरा
वासंतिक हो जाये
ह्रदय- सुमन
मेरा खिल जाये
प्रेम पुष्पित
पल्लवित हो जाये
भक्ति की सरसों
मन में लहराए
पीत रंग
हर अंग समाये
जीव ब्रह्म
धानी हो जाये
द्वि का हर
परदा हट जाये
चूनर मेरी
श्यामल हो जाये
श्याम -श्याम
करते -करते
श्यामल -श्यामल
मैं हो जाऊं
श्याम रस पीते- पीते
मैं भी रसानंद हो जाऊं
श्याम खाऊँ
श्याम पियूँ
श्याम हँसूँ
श्याम रोऊँ
श्याम- श्याम
करते -करते
श्याम ही हो जाऊं
कान्हा मैं
तेरी हो जाऊँ
कान्हा मैं
तेरी हो जाऊँ
प्रेम तेरा
वासंतिक हो जाये
ह्रदय- सुमन
मेरा खिल जाये
प्रेम पुष्पित
पल्लवित हो जाये
भक्ति की सरसों
मन में लहराए
पीत रंग
हर अंग समाये
जीव ब्रह्म
धानी हो जाये
द्वि का हर
परदा हट जाये
चूनर मेरी
श्यामल हो जाये
श्याम -श्याम
करते -करते
श्यामल -श्यामल
मैं हो जाऊं
श्याम रस पीते- पीते
मैं भी रसानंद हो जाऊं
श्याम खाऊँ
श्याम पियूँ
श्याम हँसूँ
श्याम रोऊँ
श्याम- श्याम
करते -करते
श्याम ही हो जाऊं
कान्हा मैं
तेरी हो जाऊँ
कान्हा मैं
तेरी हो जाऊँ
बुधवार, 27 जनवरी 2010
बेलगाम घोडा
ज़िन्दगी के अस्तबल का
बेलगाम घोडा
तमन्नाओं, आरजूओं ,
हसरतों के रथ पर
रथारूढ़ हो
पवनवेग से
दौड़ता जाता है
कहीं कोई अंकुश नही
बेपरवाह, लापरवाह
वक़्त के सीने पर
पाँव रख
आसमान को
छूने की
चाहत में
बिन पंख उड़ा जाता है
मगर एक दिन
पंख कटे पंछी की
मानिन्द
यथार्थ के धरातल पर
जब फडफडा कर
गिरता है
उस पल
हर आरजू, हर ख्वाहिश
धूल धूसरित हो जाती है
और वक़्त के हाथों
घायल ये जर्जर मन
अपने अस्तित्व बोध
को प्राप्त हो
अन्तस्थ में विलीन
हो जाता है
बेलगाम घोडा
तमन्नाओं, आरजूओं ,
हसरतों के रथ पर
रथारूढ़ हो
पवनवेग से
दौड़ता जाता है
कहीं कोई अंकुश नही
बेपरवाह, लापरवाह
वक़्त के सीने पर
पाँव रख
आसमान को
छूने की
चाहत में
बिन पंख उड़ा जाता है
मगर एक दिन
पंख कटे पंछी की
मानिन्द
यथार्थ के धरातल पर
जब फडफडा कर
गिरता है
उस पल
हर आरजू, हर ख्वाहिश
धूल धूसरित हो जाती है
और वक़्त के हाथों
घायल ये जर्जर मन
अपने अस्तित्व बोध
को प्राप्त हो
अन्तस्थ में विलीन
हो जाता है
मंगलवार, 5 जनवरी 2010
खोज अस्तित्व की
अंतस में दबी चिंगारी
खुद की पहचान
ना कर पाने की
विडंबना
ह्रदय रसातल में दबे
भावपुन्ज
घटाटोप अँधेरे की चादर
बिखरा -बिखरा अस्तित्व
चेतनाशून्य मस्तिष्क
अवचेतन मन की
चेतना को खोजता
सूक्ष्म शरीर
कहो , कब , कैसे
पार पायेगा
मानव ! तू कैसे
खुद को जान पायेगा
भावनाओं के सागर पर
रथारूढ़ हो
प्रकाशपुंज तक
पहुंचा नही जाता
'मैं' को भुलाकर ही
अस्तित्व को
समेटा जाता है
सब कुछ भुलाकर ही
खुद को पाया जाता है
खुद की पहचान
ना कर पाने की
विडंबना
ह्रदय रसातल में दबे
भावपुन्ज
घटाटोप अँधेरे की चादर
बिखरा -बिखरा अस्तित्व
चेतनाशून्य मस्तिष्क
अवचेतन मन की
चेतना को खोजता
सूक्ष्म शरीर
कहो , कब , कैसे
पार पायेगा
मानव ! तू कैसे
खुद को जान पायेगा
भावनाओं के सागर पर
रथारूढ़ हो
प्रकाशपुंज तक
पहुंचा नही जाता
'मैं' को भुलाकर ही
अस्तित्व को
समेटा जाता है
सब कुछ भुलाकर ही
खुद को पाया जाता है
शनिवार, 12 दिसंबर 2009
कैसे तुम्हें नमन करूँ
कैसे तुम्हारा वंदन करूँ
कैसे तुम्हारा अभिनन्दन करूँ
किस सूरज की लालिमा से
माथे पर तुम्हारे तिलक करूँ
किस चन्द्रमा की चांदनी से
मन्दिर तेरा आप्लावित करूँ
किन तारों की माला गुन्थूं
किस इन्द्रधनुषी रंग से
श्याम तेरा श्रृंगार करूँ
किस ओंकार के नाद से
ब्रह्माण्ड की गुंजार करूँ
श्याम कैसे तुम्हारा वंदन करूँ मैं
कैसे तुम्हें नमन करूँ
कैसे तुम्हारा अभिनन्दन करूँ
किस सूरज की लालिमा से
माथे पर तुम्हारे तिलक करूँ
किस चन्द्रमा की चांदनी से
मन्दिर तेरा आप्लावित करूँ
किन तारों की माला गुन्थूं
किस इन्द्रधनुषी रंग से
श्याम तेरा श्रृंगार करूँ
किस ओंकार के नाद से
ब्रह्माण्ड की गुंजार करूँ
श्याम कैसे तुम्हारा वंदन करूँ मैं
कैसे तुम्हें नमन करूँ
सोमवार, 23 नवंबर 2009
श्रीमद्भागवद्गीता से ......................
श्रीमद्भागवद्गीता के ७ वें अध्याय के २४ वें श्लोक की व्याख्या स्वामी रामसुखदास जी ने कुछ इस प्रकार की है जिससे परमात्मा के साकार और निराकार स्वरुप की सार्थकता समझ आती है ।
श्लोक
बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ परमभाव को न जानते हुए अव्यक्त (मन - इन्द्रियों से पर ) मुझ सच्चिदानंदघन परमात्मा को मनुष्य की तरह शरीर धारण करने वाला ही मानते हैं।
व्याख्या
जो मनुष्य निर्बुद्धि हैं और जिनकी मेरे में श्रद्धा भक्ति नही है वे अल्पमेधा के कारण अर्थात समझ की कमी के कारण मेरे को साधारण मनुष्य की तरह अव्यक्त से व्यक्त होने वाला अर्थात जन्मने मरने वाला मानते हैं । मेरा जो अविनाशी अव्यय भाव है अर्थात जिससे बढ़कर कोई दूसरा हो ही नही सकता और जो देश , काल , वस्तु व्यक्ति आदि में परिपूर्ण रहता हुआ इन सबसे अतीत सदा एकरूप रहने वाला ,निर्मल और असम्बद्ध है ------ऐसे मेरे अविनाशी भाव को वे नही जानते इसलिए वे मेरे को साधारण मनुष्य मानकर मेरी उपासना नही करते प्रत्युत देवताओं की उपासना करते हैं ।
मेरे स्वरुप को न जानने से वे अन्य देवताओं की उपासना में लग गए और उत्पत्ति विनाशशील पदार्थों की कामना में लग जाने से वे बुद्धिहीन मनुष्य मेरे से विमुख हो गए । यद्यपि वे मेरे से अलग नही हो सकते तथा मैं भी उनसे अलग नही हो सकता तथापि कामना के कारण ज्ञान ढक जाने से वे देवताओं की तरफ़ खिंच जाते हैं । अगर वे मेरे को जान जाते तो केवल मेरा ही भजन करते ।
१) बुद्धिमान मनुष्य वे होते हैं जो भगवान के शरण होते हैं । वे भगवान को ही सर्वोपरि मानते हैं।
२)अल्पमेधा वाले मनुष्य वे होते हैं जो देवताओं के शरण होते हैं । वे देवताओं को अपने से बड़ा मानते हैं जिससे उनमें थोड़ी नम्रता , सरलता रहती है।
३)अबुद्धि वाले मनुष्य वे होते हैं जो भगवान को देवता जैसा भी नही मानते , किंतु साधारण मनुष्य जैसा ही मानते हैं । वे अपने को ही सर्वोपरि , सबसे बड़ा मानते हैं ।
यही तीनो में अन्तर है ।
भगवान कहते हैं कि मैं अज रहता हुआ ,अविनाशी होता हुआऔर लोकों का ईश्वर होता हुआ ही अपनी प्रकृति को वश में करके योगमाया से प्रकट होता हूँ ------------इस मेरे परमभाव को बुद्धिहीन मनुष्य नही जानते। कहने का तात्पर्य है की जिसको क्षर से अतीत और अक्षर से उत्तम बताया है अर्थात जिससे उत्तम दूसरा कोई है ही नही ऐसे मेरे अनुपम भाव को वे नही जानते।
जो सदा निराकार रहने वाले मेरे को केवल साकार मानते हैं , वे निर्बुद्धि हैं क्यूंकि वे मेरे अव्यक्त, निर्विकार और निराकार स्वरुप को नही जानते । ऐसे ही मैं अवतार लेकर तेरा सारथि बना हूँ -------ऐसे मेरे को केवल निराकार मानते हैं वे निर्बुद्धि हैं क्यूंकि वे मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी भाव को नही जानते।
उपर्युक्त दोनों अर्थों में से कोई भी अर्थ ठीक नही है कारण कि ऐसा अर्थ मानने पर केवल निराकार को मानने वाले साकाररूप की और साकार रूप के उपासकों की निंदा करेंगे और केवल साकार मानने वाले निराकार रूप की और निराकार रूप के उपासकों की निंदा करेंगे । यह सब एकदेशियपना है।
पृथ्वी , जल तेज़ आदि जितने भी विनाशी पदार्थ हैं वे भी दो -दो तरह के होते हैं --------सूक्ष्म और स्थूल । जैसे स्थूल रूप से पृथ्वी साकार है और परमाणु रूप से निराकार है , जल बर्फ , बूँद , बादल रूप से साकार है और परमाणु रूप से निराकार है तेज काठ और दियासलाई में रहता हुआ निराकार है और प्रज्वलित होने पर साकार है आदि। इस तरह से भोतिक सृष्टि के भी दोनों रूप होते हैं और दोनों होते हुए भी वास्तव में दो नही होती । साकार होने पर निराकार में बाधा नही होती और निराकार होने पर साकार में बाधा नही लगती तो फिर परमात्मा के साकार और निराकार दोनों होने में क्या बाधा है ? अर्थात कोई बाधा नही है । वे साकार भी हैं और निराकार भी हैं , सगुण भी हैं और निर्गुण भी। गीता साकार और निराकार दोनों को मानती है। भगवान कहते हैं कि मैं अज होता हुआ भी प्रगट होता हूँ , अविनाशी होता हुआ भी अंतर्धान हो जाता हूँ और सबका ईश्वर होता हुआ भी आज्ञापालक बन जाता हूँ । अतः निराकार होते हुए साकार होने में और साकार होते हुए निराकार होने में भगवान में किंचिन्मात्र अन्तर नही आता।
मेरे स्वरुप को न जानने से वे अन्य देवताओं की उपासना में लग गए और उत्पत्ति विनाशशील पदार्थों की कामना में लग जाने से वे बुद्धिहीन मनुष्य मेरे से विमुख हो गए । यद्यपि वे मेरे से अलग नही हो सकते तथा मैं भी उनसे अलग नही हो सकता तथापि कामना के कारण ज्ञान ढक जाने से वे देवताओं की तरफ़ खिंच जाते हैं । अगर वे मेरे को जान जाते तो केवल मेरा ही भजन करते ।
१) बुद्धिमान मनुष्य वे होते हैं जो भगवान के शरण होते हैं । वे भगवान को ही सर्वोपरि मानते हैं।
२)अल्पमेधा वाले मनुष्य वे होते हैं जो देवताओं के शरण होते हैं । वे देवताओं को अपने से बड़ा मानते हैं जिससे उनमें थोड़ी नम्रता , सरलता रहती है।
३)अबुद्धि वाले मनुष्य वे होते हैं जो भगवान को देवता जैसा भी नही मानते , किंतु साधारण मनुष्य जैसा ही मानते हैं । वे अपने को ही सर्वोपरि , सबसे बड़ा मानते हैं ।
यही तीनो में अन्तर है ।
भगवान कहते हैं कि मैं अज रहता हुआ ,अविनाशी होता हुआऔर लोकों का ईश्वर होता हुआ ही अपनी प्रकृति को वश में करके योगमाया से प्रकट होता हूँ ------------इस मेरे परमभाव को बुद्धिहीन मनुष्य नही जानते। कहने का तात्पर्य है की जिसको क्षर से अतीत और अक्षर से उत्तम बताया है अर्थात जिससे उत्तम दूसरा कोई है ही नही ऐसे मेरे अनुपम भाव को वे नही जानते।
जो सदा निराकार रहने वाले मेरे को केवल साकार मानते हैं , वे निर्बुद्धि हैं क्यूंकि वे मेरे अव्यक्त, निर्विकार और निराकार स्वरुप को नही जानते । ऐसे ही मैं अवतार लेकर तेरा सारथि बना हूँ -------ऐसे मेरे को केवल निराकार मानते हैं वे निर्बुद्धि हैं क्यूंकि वे मेरे सर्वश्रेष्ठ अविनाशी भाव को नही जानते।
उपर्युक्त दोनों अर्थों में से कोई भी अर्थ ठीक नही है कारण कि ऐसा अर्थ मानने पर केवल निराकार को मानने वाले साकाररूप की और साकार रूप के उपासकों की निंदा करेंगे और केवल साकार मानने वाले निराकार रूप की और निराकार रूप के उपासकों की निंदा करेंगे । यह सब एकदेशियपना है।
पृथ्वी , जल तेज़ आदि जितने भी विनाशी पदार्थ हैं वे भी दो -दो तरह के होते हैं --------सूक्ष्म और स्थूल । जैसे स्थूल रूप से पृथ्वी साकार है और परमाणु रूप से निराकार है , जल बर्फ , बूँद , बादल रूप से साकार है और परमाणु रूप से निराकार है तेज काठ और दियासलाई में रहता हुआ निराकार है और प्रज्वलित होने पर साकार है आदि। इस तरह से भोतिक सृष्टि के भी दोनों रूप होते हैं और दोनों होते हुए भी वास्तव में दो नही होती । साकार होने पर निराकार में बाधा नही होती और निराकार होने पर साकार में बाधा नही लगती तो फिर परमात्मा के साकार और निराकार दोनों होने में क्या बाधा है ? अर्थात कोई बाधा नही है । वे साकार भी हैं और निराकार भी हैं , सगुण भी हैं और निर्गुण भी। गीता साकार और निराकार दोनों को मानती है। भगवान कहते हैं कि मैं अज होता हुआ भी प्रगट होता हूँ , अविनाशी होता हुआ भी अंतर्धान हो जाता हूँ और सबका ईश्वर होता हुआ भी आज्ञापालक बन जाता हूँ । अतः निराकार होते हुए साकार होने में और साकार होते हुए निराकार होने में भगवान में किंचिन्मात्र अन्तर नही आता।
गुरुवार, 12 नवंबर 2009
यादों के झरोखों से ..............अन्तिम भाग
ज़िन्दगी एक नई दिशा की ओर घूमने लगी ...........अनजाने मोडों से गुजरती न जाने कौन सी राह की ओर ले जा रही थी । रवि और मैं एक बार फिर आपस में कहीं न कहीं टकराने लगे और ज़िन्दगी के इस मोड़ के बारे में सोचने लगे। शायद दोनों को ही अपनी -अपनी गलती का अहसास हो चुका था । ज़िन्दगी के थपेडों ने हमें बता दिया था कि अकेले ज़िन्दगी जीनी इतनी आसान नही होती और सफलता पा लेना सफल जीवन का प्रमाण नही होता। हम दोनों को ही समझ आ गया था कि अपनी नादानियों की वजह से हमने एक अटूट रिश्ते को तोड़ दिया था । अपने -अपने अहम के कारण आज हमारा जीवन तिनके- सा बिखर गया था। शायद इसीलिए कहा गया है कि ज़िन्दगी का दूसरा नाम समझौता है क्यूंकि अब तक भी तो हम दोनों अपनी -अपनी ज़िन्दगी से और ज़िन्दगी में आए हालातों से समझौता ही तो कर रहे थे। अगर उस वक्त हमने ये छोटे -छोटे समझौते कर लिए होते और एक दूसरे को समझने की कोशिश की होती , एक दूसरे की गलतियों को एक -दूसरे को समझाने की कोशिश की होती तो आज शायद ये हालात न होते। ज़िन्दगी में कभी न कभी किसी न किसी से समझौते करने ही पड़ते हैं तो फिर जिसे हम चाहते हैं उसके साथ क्यूँ नही कर सकते , वहां अपने अहम को आडे क्यूँ ले आते हैं । मगर शाख से टूटे पत्ते भी कहीं शाख से दोबारा जुडा करते हैं यही सोच हम अपनी ज़िन्दगी जी रहे थे मगर वो कहते हैं न कि जो रिश्ता भगवान ने बनाया हो उसे कौन तोड़ सकता है। एक दिन अचानक फिर हम दोनों उसी मन्दिर में टकराए जैसे पहली बार टकराए थे और जैसे ही एक -दूसरे को देखा तो वो लम्हात एक चलचित्र की भांति आंखों के सामने घूम गए और उस पल हमें लगा कि शायद भगवान की भी यही मर्ज़ी है की हम दोनों एक -दूजे के लिए ही बने हैं । और उस दिन अपने -अपने अहम को तोड़ते हुए दोनों ने एक बार फिर अपने- अपने दिल की बात कही और एक नए सिरे से ज़िन्दगी जीने की सोची।
अब एक बार फिर हम दोनों उसी बंधन में बंध गए थे जिसे अपनी नादानियों के कारण तोड़ चुके थे। ज़िन्दगी के अर्थ अब हमें समझ आ चुके थे।
अब एक बार फिर हम दोनों उसी बंधन में बंध गए थे जिसे अपनी नादानियों के कारण तोड़ चुके थे। ज़िन्दगी के अर्थ अब हमें समझ आ चुके थे।
मंगलवार, 10 नवंबर 2009
यादों के झरोखों से भाग ४ .............................
ज़िन्दगी यूँ ही अपनी रफ़्तार से चल रही थी और हमें भी चलने को मजबूर कर रही थी। आख़िर हमारी ही चुनी हुई तो ज़िन्दगी थी फिर उससे कैसे मुहँ मोड़ सकते थे हम।
एक दिन अचानक जब मैं काफ़ी शॉप में बैठी हुयी थी तभी देखा सामने वाली कुर्सी पर रवि आकर बैठा है। उसे देखते ही एक धक्का सा लगा दिल को । क्या हाल हो गया था रवि का । एक कंपनी का इतना उच्च पदाधिकारी और ये हाल -----------टूटा , बिखरा , बेतरतीब सा। देखने पर यूँ लगा जैसे बरसों से बीमार हो । एक हँसता मुस्कुराता चेहरा जैसे कुम्हला गया हो। उसे देखते ही दिल में संवेदनाएं जागने लगीं ............चाहे आज हम अलग हो गए थे मगर कभी तो हम साथ रहे थे इसलिए इंसानियत के नाते उठकर रवि के पास चली गई और अपने सामने अचानक मुझे देखकर वो हडबडा गया। फिर ख़ुद को संयत कर उसने मुझे बैठने को कहा। मैंने उससे पूछा ये क्या हाल बना रखा है तुमने, तो बोला किसके लिए कुछ करुँ। जैसा हूँ ठीक हूँ । एक धक्का सा लगा उसका जवाब सुनकर। एक अपराधबोध सा होने लगा जैसे उसकी गुनहगार मैं ही हूँ और साथ यूँ भी लगा कि जैसे आज भी वो मुझे उतना ही चाहता है। फिर वो बोला तुम्हारा हाल ही कौन सा मुझसे अलग है । कभी देखा है ख़ुद को आईने में । उस वक्त यूँ अहसास हुआ जैसे किसी ने जलते हुए छालों पर बर्फ का मरहम लगा दिया हो । बस उसके बाद अपने -अपने ख्यालों में गुम हम दोनों ही अपनी -अपनी राह पर चल दिए कुछ सवालों के साथ ।
घर आकर लगा जैसे कहीं कुछ अपनी बहुत ही खास चीज़ छूट गई है। उसे पकड़ने की इच्छा जागृत होने लगी। यूँ लगने लगा जैसे रवि एक बार आवाज़ दे तो .................. मगर सोचने से ही तो सब कुछ नही होता । उधर रवि का भी यही हाल था। उसे भी लगा कि कहीं कुछ ग़लत हो गया है जिसे शायद हम दोनों ही नही समझ पा रहे थे।
आज थोडी वक्त की कमी है इसलिए कहानी इतनी ही डाल पा रही हूँ क्षमाप्रार्थी हूँ ।
क्रमशः.................................
एक दिन अचानक जब मैं काफ़ी शॉप में बैठी हुयी थी तभी देखा सामने वाली कुर्सी पर रवि आकर बैठा है। उसे देखते ही एक धक्का सा लगा दिल को । क्या हाल हो गया था रवि का । एक कंपनी का इतना उच्च पदाधिकारी और ये हाल -----------टूटा , बिखरा , बेतरतीब सा। देखने पर यूँ लगा जैसे बरसों से बीमार हो । एक हँसता मुस्कुराता चेहरा जैसे कुम्हला गया हो। उसे देखते ही दिल में संवेदनाएं जागने लगीं ............चाहे आज हम अलग हो गए थे मगर कभी तो हम साथ रहे थे इसलिए इंसानियत के नाते उठकर रवि के पास चली गई और अपने सामने अचानक मुझे देखकर वो हडबडा गया। फिर ख़ुद को संयत कर उसने मुझे बैठने को कहा। मैंने उससे पूछा ये क्या हाल बना रखा है तुमने, तो बोला किसके लिए कुछ करुँ। जैसा हूँ ठीक हूँ । एक धक्का सा लगा उसका जवाब सुनकर। एक अपराधबोध सा होने लगा जैसे उसकी गुनहगार मैं ही हूँ और साथ यूँ भी लगा कि जैसे आज भी वो मुझे उतना ही चाहता है। फिर वो बोला तुम्हारा हाल ही कौन सा मुझसे अलग है । कभी देखा है ख़ुद को आईने में । उस वक्त यूँ अहसास हुआ जैसे किसी ने जलते हुए छालों पर बर्फ का मरहम लगा दिया हो । बस उसके बाद अपने -अपने ख्यालों में गुम हम दोनों ही अपनी -अपनी राह पर चल दिए कुछ सवालों के साथ ।
घर आकर लगा जैसे कहीं कुछ अपनी बहुत ही खास चीज़ छूट गई है। उसे पकड़ने की इच्छा जागृत होने लगी। यूँ लगने लगा जैसे रवि एक बार आवाज़ दे तो .................. मगर सोचने से ही तो सब कुछ नही होता । उधर रवि का भी यही हाल था। उसे भी लगा कि कहीं कुछ ग़लत हो गया है जिसे शायद हम दोनों ही नही समझ पा रहे थे।
आज थोडी वक्त की कमी है इसलिए कहानी इतनी ही डाल पा रही हूँ क्षमाप्रार्थी हूँ ।
क्रमशः.................................
रविवार, 8 नवंबर 2009
यादों के झरोखों से भाग ३..........................
रवि और निशा की शायद यही परिणति है ...............मिलकर भी न मिलना। यही तसल्ली दिल को देकर आगे के बारे में सोचना शुरू किया। अब मैं अपने पुराने घावों को भूल एक नए सिरे से आजाद पंछी की भांति जीवन- यापन करने की सोचने लगी। पिता के घर में किसी बात की कमी तो थी नही और साथ ही मैं इतना अच्छा कमाती थी तो आर्थिक स्थिति तो सुदृढ़ थी ही । मैं अपने हिसाब से जीने की कोशिश करने लगी मगर मुझे पता नही था कि एक तलाकशुदा का जीवन कोई फूलों की डगर नही। बहुत ही जल्द वक्त ने मुझे यथार्थ का धरातल दिखा दिया । मुझे अपनी कमाई पर गर्व था और सोचती थी कि धन से सब कुछ ख़रीदा जा सकता है ,सिर्फ़ रवि ही मेरी भावनाएं नही समझ सका मगर घर में भाई भाभी भी थे उन्हें मेरी कमाई से कोई फर्क नही पड़ता था मैं उनके या उनके बच्चों के लिए कितना भी कुछ करने की कोशिश करती मगर उन पर असर नही होता। उनके लिए तो मैं अब एक आजीवन बोझ ही थी । मैं अपनी खुशी से कुछ भी करती मगर सब बेकार ,किसी को भी मेरी खुशी से कुछ लेना देना नही होता,एक अनचाहा बोझ समझते थे सब। इस बात का अहसास अब मुझे भी होने लगा था। इसलिए मैंने अलग रहने की सोची और जब घर देखने निकली तब तो और भी मुश्किलों ने घेर लिया। कोई भी एक तलाकशुदा को जल्द ही घर देने को राजी न होता। जैसे ही तलाकशुदा होने का पता चलता यूँ देखते जैसे संसार का आठवां अजूबा मैं ही हूँ या जैसे मैं इंसान न होकर उनके घर को उजाड़ने वाली कोई चीज़ हूँ या फिर हर कोई चाहता की ये तो तलाकशुदा है तो जैसे इस पर अपना अधिकार है । हर कोई ग़लत नज़रिए से ही देखता। आज के युग में भी इंसानी सोच कितनी जड़ थी.........मैं यही सोचकर परेशान हो जाती मगर कर कुछ नही सकती थी। ऐसे जीवन की तो मैंने कल्पना भी नही की थी न ही कभी सोचा था कि हालत ऐसे भी हो सकते हैं। तलाक लेने से पहले सबने कितना समझाया था मगर उस वक्त मैं कल्पनाओं के आकाश पर विचर रही थी तो कैसे यथार्थ बोध होता। जब भी कहीं रहती कोई न कोई समस्या मुहँ बाये खड़ी रहती। जिंदगी को जितना आसान समझा था वो उतनी ही राहों में कांटे बोती जा रही थी। अब तो अकेलेपन का दर्द बहुत ही सालने लगा था । कोई कंधा ऐसा न था जिसपे अपना सिर रखकर रो पाती या किसी से अपना हाल-ए-दिल कह पाती। कभी कोई बीमारी होती तो उस वक्त इतनी लाचार महसूस करने लगती कि सोचती कि क्या ऐसी ही जिंदगी की मैंने कल्पना की थी ।ऐसे वक्त पर रवि की बहुत याद आती। वो मेरा कितना ख्याल रखता था अगर मुझे ज़रा सा भी कुछ हो जाता तो रात भर आंखों में ही काट देता था मगर मेरे सिरहाने से नही हिलता था। क्या हालात और वक्त ऐसे बदलता है। जो न सोचा हो वो होता है। धीरे -धीरे मेरा दंभ मरना लगा था । अब मुझे लगने लगा था कि शायद तलाक लेने में मैंने बहुत जल्दी कर दी थी । कुछ वक्त दिया होता अपने रिश्ते को । अब रवि की बहुत सी बातें मुझे याद आने लगी थी। अब मुझे सिर्फ़ उसकी अच्छी बातें ही याद आती । उधर रवि का भी मेरे से कम बुरा हाल न था । उसका भी कमोबेश यही हाल था। एक ही शहर में होने के कारन उसके बारे में मुझे जानकारी मिलती रहती थी। मगर अब क्या हो सकता था। जिंदगी दोनों के लिए दुश्वार होने लगी थी । जब साथ थे तो साथ नही रहना चाहते थे और अब जब अलग हो गए तब भी दोनों को सुकून नही मिल रहा था। जिंदगी का न जाने ये कौन सा मुकाम था जहाँ एक अजीब सी बचैनी बढती ही जा रही थी। क्या करें और क्या न करें की अजीब सी कशमकश में उलझते जा रहे थे। अब हमारा वो हाल था न हम आगे बढ़ पा रहे थे और न ही पीछे लौट कर जा सकते थे। अब तो सिर्फ़ यादें थी जो हमारी तन्हाई की साथी थी । अब सिर्फ़ सुखद यादें ही याद आती। दुखद यादें तो जैसे न जाने कौन से परदे में छुप गई थीं। और हम जिंदगी जीने को मजबूर इसी ऊहापोह में जिए जा रहे थे मगर बिना लक्ष्य का जीवन भी कोई जीवन होता है। दुनिया के हँसते खिलखिलाते चेहरे देख , उनके परिवारों को देख दिल में एक कसक सी उठती । शायद इससे बड़ी सजा और क्या मिलती अपनी नादानियों की .....................
क्रमशः .........................
क्रमशः .........................
शनिवार, 7 नवंबर 2009
यादों के झरोखे से भाग २ ...................
ज़िन्दगी धीरे- धीरे ढर्रे पर आने लगी । दोनों ही अपनी- अपनी तरफ़ से उस दुखद पल को भुलाने की कोशिश करने लगे मगर कहीं एक चुभन शायद दोनों के ही दिलों में कहीं बहुत गहरे बैठ गई थी। फिर भी दोनों ज़िन्दगी जीने की कोशिश में लग गए थे। आत्मग्लानि की वजह से रवि अपने को ज्यादा ही व्यस्त रखने लगा। वो अधिक से अधिक काम की वजहों से टूर पर जाने लगा और साथ ही उसकी महत्वाकांक्षाएं बढ़ने लगी थीं , कुछ पाने की , कुछ बनने की उसकी चाह जोर उठाने लगी थी। इधर मैंने भी अपनी पी० एच० डी ० पूरी करने की सोची और मैं भी ज़िन्दगी में एक मुकाम पाने की दिशा की ओर अग्रसर हो गई । शायद ख़ुद को व्यस्त रखकर हम दोनों ही सच से दूर भाग रहे थे या शायद अपने- अपने अहम् को संतुष्ट कर रहे थे। हम दोनों साथ थे मगर अपनी -अपनी दुनिया में व्यस्त रहने लगे। समय अपनी गति से खिसकता रहा । उसके बाद हमारी चार सालगिरह और आई मगर अब उनमें वो गर्माहट न होती । अब उत्साह ठंडा पड़ चुका था क्यूंकि भूतकाल की कटु याद जेहन में एक बार फिर डंक मारने लगती । हम साधारण तरीके से सालगिरह मनाते जैसे कोई औपचारिकता पूरी कर रहे हों।
वक्त के साथ मेरी पी ० एच ० डी ० पूरी हो चुकी थी और मैं अब कॉलेज में लेक्चरार लग गई थी। अब तो मुझे अपने आप पर एक गर्व महसूस होने लगा था और मैं अपनी सफलता के नशे में डूबने लगी थी । मेरे पैर जमीन पर नही पड़ते थे जैसे न जाने मैंने कौन सा गढ़ जीत लिया हो । शायद सफलता का नशा ऐसा ही होता है जो इंसान के सिर चढ़कर बोलता है । उधर रवि भी तरक्की की सीढियाँ चढ़ते हुए अपनी कंपनी का सी०ई०ओ० बन गया था। अब हमारे रहन सहन का स्तर बदल चुका था । आए दिन घर में पार्टियाँ होती थीं , बड़ी बड़ी बिज़नस मीटिंग्स होती थी। हम दोनों के पास बाकी सब कामों के लिए वक्त था बस अगर नही था तो एक दूसरे के लिए। दोनों ही सफलता के घोडे पर सवार आगे ही आगे बढ़ने की धुन में एक दूसरे को नज़रंदाज़ करते गए। कभी भी एक दूसरे का साथ निभाने या दूसरे को पुकारने की कोशिश ही नही करते । दोनों के अहम हमारे जेहन पर हावी हो गए थे। एक दूसरे की भावनाओं का कोई मोल नही रह गया था , कभी वो वक्त था जब हम सिर्फ़ एक दूसरे के लिए जीते थे और अब ये वक्त आ गया था कि दोनों सिर्फ़ अपने लिए ही जीने लगे। अगर रवि चाहता कि मैं उसके साथ कहीं घूमने जाऊँ या कोई फ़िल्म देखने चलूँ तो मुझे कोई न कोई काम होता और जब मैं चाहती तो रवि के पास वक्त न होता। हम दोनों ही शायद अपनी इस ज़िन्दगी से सामंजस्य नही बैठा पा रहे थे ............या शायद कोशिश ही नही करना चाहते थे । वक्त ने शायद हमारे बीच सदियों के फासले बो दिए थे जिन्हें सींचना अब नामुमकिन -सा होता जा रहा था। शायद सफलता के एक मुकाम पर आकर उसे बनाये रखना और भी मुश्किल होता है और उसकी कीमत भी हमें ही चुकानी पड़ती है। हम दोनों साथ रहकर भी अजनबियों सी ज़िन्दगी जीने लगे थे। आज एक- दूजे की भावनाओं की हमें कोई क़द्र ही नही रह गई थी । कितने संवेदनहीन हो गए थे हमारे ह्रदय।
धीरे- धीरे हमारे अहम् टकराने लगे.सिर्फ़ अपनी बात मनवाना चाहते थे एक दूसरे से, उसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े ,हम करते थे , धीरे- धीरे यही छोटी -छोटी बातें हमारी ज़िन्दगी में खाई बनने लगीं. बात -बात पर हम दोनों एक -दूसरे को तानाकशी करने लगे और हालत बद से बदतर होने लगे । और फिर एक दिन जब मेरी और रवि दोनों की ही सहनशीलता जवाब दे गई तो मैं रवि को छोड़कर अपने मायके आ गई। घर वाले इस अप्रत्याशित घटना से परेशान हो गए। रवि और मेरे घरवालों ने बहुत कोशिशें की कि हम दोनों एक- दूसरे को समझें क्यूंकि कोई भी समस्या ऐसी नही होती जिसका हल नही होता मगर हमारे अहम् सबसे ऊपर थे उस वक्त इसलिए हम दोनों में से किसी ने भी समझौता करने की नही सोची । और फिर एक दिन हमने तलाक लेने की सोची और आपसी सहमति से तलाक ले लिए। ज़िन्दगी के एक स्वर्णिम अध्याय का ऐसा अंत .......कभी स्वप्न में भी नही सोचा था..........................
क्रमशः ............................
वक्त के साथ मेरी पी ० एच ० डी ० पूरी हो चुकी थी और मैं अब कॉलेज में लेक्चरार लग गई थी। अब तो मुझे अपने आप पर एक गर्व महसूस होने लगा था और मैं अपनी सफलता के नशे में डूबने लगी थी । मेरे पैर जमीन पर नही पड़ते थे जैसे न जाने मैंने कौन सा गढ़ जीत लिया हो । शायद सफलता का नशा ऐसा ही होता है जो इंसान के सिर चढ़कर बोलता है । उधर रवि भी तरक्की की सीढियाँ चढ़ते हुए अपनी कंपनी का सी०ई०ओ० बन गया था। अब हमारे रहन सहन का स्तर बदल चुका था । आए दिन घर में पार्टियाँ होती थीं , बड़ी बड़ी बिज़नस मीटिंग्स होती थी। हम दोनों के पास बाकी सब कामों के लिए वक्त था बस अगर नही था तो एक दूसरे के लिए। दोनों ही सफलता के घोडे पर सवार आगे ही आगे बढ़ने की धुन में एक दूसरे को नज़रंदाज़ करते गए। कभी भी एक दूसरे का साथ निभाने या दूसरे को पुकारने की कोशिश ही नही करते । दोनों के अहम हमारे जेहन पर हावी हो गए थे। एक दूसरे की भावनाओं का कोई मोल नही रह गया था , कभी वो वक्त था जब हम सिर्फ़ एक दूसरे के लिए जीते थे और अब ये वक्त आ गया था कि दोनों सिर्फ़ अपने लिए ही जीने लगे। अगर रवि चाहता कि मैं उसके साथ कहीं घूमने जाऊँ या कोई फ़िल्म देखने चलूँ तो मुझे कोई न कोई काम होता और जब मैं चाहती तो रवि के पास वक्त न होता। हम दोनों ही शायद अपनी इस ज़िन्दगी से सामंजस्य नही बैठा पा रहे थे ............या शायद कोशिश ही नही करना चाहते थे । वक्त ने शायद हमारे बीच सदियों के फासले बो दिए थे जिन्हें सींचना अब नामुमकिन -सा होता जा रहा था। शायद सफलता के एक मुकाम पर आकर उसे बनाये रखना और भी मुश्किल होता है और उसकी कीमत भी हमें ही चुकानी पड़ती है। हम दोनों साथ रहकर भी अजनबियों सी ज़िन्दगी जीने लगे थे। आज एक- दूजे की भावनाओं की हमें कोई क़द्र ही नही रह गई थी । कितने संवेदनहीन हो गए थे हमारे ह्रदय।
धीरे- धीरे हमारे अहम् टकराने लगे.सिर्फ़ अपनी बात मनवाना चाहते थे एक दूसरे से, उसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े ,हम करते थे , धीरे- धीरे यही छोटी -छोटी बातें हमारी ज़िन्दगी में खाई बनने लगीं. बात -बात पर हम दोनों एक -दूसरे को तानाकशी करने लगे और हालत बद से बदतर होने लगे । और फिर एक दिन जब मेरी और रवि दोनों की ही सहनशीलता जवाब दे गई तो मैं रवि को छोड़कर अपने मायके आ गई। घर वाले इस अप्रत्याशित घटना से परेशान हो गए। रवि और मेरे घरवालों ने बहुत कोशिशें की कि हम दोनों एक- दूसरे को समझें क्यूंकि कोई भी समस्या ऐसी नही होती जिसका हल नही होता मगर हमारे अहम् सबसे ऊपर थे उस वक्त इसलिए हम दोनों में से किसी ने भी समझौता करने की नही सोची । और फिर एक दिन हमने तलाक लेने की सोची और आपसी सहमति से तलाक ले लिए। ज़िन्दगी के एक स्वर्णिम अध्याय का ऐसा अंत .......कभी स्वप्न में भी नही सोचा था..........................
क्रमशः ............................
शुक्रवार, 6 नवंबर 2009
यादों के झरोखों से ..................
आज भी याद है वो शाम जब अचानक तुम उस मन्दिर में मुझसे टकराए थे और मेरी पूजा की थाली गिर गई थी । कितने शर्मिंदा हुए थे तुम और फिर एक नई पूजा की थाली लाकर मुझे दी थी। भगवान के आँगन में हमारी मुलाक़ात शायद उसका एक इशारा था। उसी की इच्छा थी की हम उस पवित्र बंधन में बंधें और अपने रिश्ते को पूर्ण करें। उस मुलाक़ात के बाद तो जैसे तुम्हारा और मेरा रोज मन्दिर आना एक नियम सा बन गया था। हम दोनों ने एक दूसरे से बात करना भी शुरू कर दिया था । तब पता चला कि तुम इंजिनियर हो और मैं भी स्कूल में अध्यापिका थी । बहुत ही सुलझे हुए इंसान लगे तुम। हर बात को एक दम सटीक और नपे- तुले शब्दों में कहने की तुम्हारी अदा मुझे अच्छी लगने लगी। धीरे -धीरे तुम मेरे वजूद पर छाने लगे.............तुम्हारी हर बात , हर अदा मुझे तुम्हारी ओर खींचती। मैं अपने आप को जितना रोकने की कोशिश करती उतनी ही विफल होती गई.........शायद पहले प्यार का आकर्षण ऐसा ही होता है। जब तुम्हारी आंखों में झांकती तो उन गहराइयों में इतना गहरे उतर जाती कि ख़ुद को भी भूल जाती .........एक अजब आलम था .........हर पल तुम्हारा ही ख्याल रहता और तुम्हारा ही इंतज़ार। अब तक हम दोनों ने साथ जीने का निर्णय ले लिया था और फिर एक दिन तुम अचानक मेरे घर अपने माता -पिता के साथ आए और मेरा हाथ माँगा। दोनों ही परिवार में कोई भी ऐसा न था जो इस रिश्ते को ना कर पाता। सर्वगुण संपन्न रिश्ता घर बैठे मिल रहा था तो और चाहिए ही क्या था। दोनों परिवारों की आपसी सहमति से हम परिणय-सूत्र में बंध गए।
ज़िन्दगी सपनो के पंख लगाकर उड़ने लगी । रवि मेरी छोटी से छोटी इच्छा ,मेरी हर खुशी के लिए दिन- रात कुछ न देखते । बस मेरे चेहरे पर हँसी की लकीर देखने के लिए कुछ भी कर गुजरते। मेरे दिन- रात मेरे नही रहे थे सब रवि को समर्पित हो गए थे। मैं भी रवि की राहों में अपने प्रेम के पुष्प बिछाए रहती। रवि की हर इच्छा जैसे मेरे जीने का सबब बन जाती............दिन ख्वाबों के सुनहरे पंख लगाये उड़ रहे थे। एक -दूसरे में कभी कोई कमी ही नज़र न आती । सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम था । हर कोई हमें देखकर यही कहता कि ये दोनों तो जैसे बने ही एक दूजे के लिए हैं । ऐसा सुनकर हम दोनों बहुत खुश होते ,अपने आप पर गर्व होता । पता ही नही चला कब एक साल गुजर गया।
उस दिन हमारी शादी की पहली सालगिरह थी । कितनी उमंगें थी हम दोनों के दिलों में। हम इस हसीन शाम को यादगार बनाना चाहते थे और उन सब लोगो को शामिल करना चाहते थे जिनकी निगाहों में हम आदर्श दंपत्ति थे। फिर तुमने एक पार्टी का आयोजन किया और हम दोनों के दोस्तों को बुलाया ताकि इस हसीन शाम का आनंद अलग ही हो जो बरसों भुलाये न भुला जा सके।
पार्टी हॉल में तुम अपने दोस्तों के साथ मेरा इंतज़ार कर रहे थे और जब मैं तैयार होकर वहां आई तो मुझे देखकर तुम बुत बने रह गए थे..........तुम्हारी उस अदा ने तो जैसे मेरी जान ही ले ली थी। ज़िन्दगी में कभी ऐसे क्षणों के बारे में नही सोचा था सब एक सपना सा लग रहा था। उस दिन तुम्हारे पाँव जमीन पर नही पड़ रहे थे। केक काटने के बाद जब रात गहराने लगी तब तुमने भावनाओं के अतिरेक में बहकर एक खवाहिश जाहिर की कि मैं भी तुम्हारे साथ एक पैग लूँ। मैं स्तब्ध रह गई तुम्हारे वो शब्द सुनकर। मेरी प्यार की सारी खुमारी तुम्हारे इन शब्दों से उतरने लगी। तुम्हें अच्छी तरह पता था कि मैं उस तरह को सोच की नही हूँ मगर फिर भी उस दिन की खुशी में या अपने प्यार के नशे में डूबे तुम मुझसे जिद करने लगे कि आज के दिन निशा तुम मुझे ये एक छोटा सा उपहार भी नही दे सकती । मैं जो रवि के लिए कभी भी कुछ भी कर सकती थी उस वक्त सकते में आ गई कि आज ये रवि को क्या हो गया है । आज से पहले तुमने कभी ऐसी कोई फरमाइश नही की थी और न ही कभी ऐसी जिद पकड़ी थी। मगर उस दिन न जाने रवि को क्या हो गया था वो मुझसे सबके सामने जिद करने लगा और मैं उस वक्त ख़ुद को लज्जित महसूस करने लगी जब तुम मुझे जबरन पिलाने की कोशिश करने लगे। और फिर मैं तुम्हारी ज्यादती बर्दाश्त न कर पाई और पार्टी बीच में छोड़कर घर आ गई। बस वो रात , सारी रात गरजती रही और बरसती रही। एक खामोशी पसर गई दोनों के बीच। काफी दिन तक तुम मुहँ छुपाते फिरते रहे शायद तुम्हें अपने किए पर पछतावा था और फिर तुमने अपने किए पर मुझसे माफ़ी मांगी और शायद अपनी ज़िन्दगी की ये पहली लड़ाई थी इसलिए मैंने भी तुम्हें जल्दी माफ़ कर दिया ये सोचकर की कई बार हमारी अपेक्षाएं कुछ ज्यादा बढ़ जाती हैं तो उन्हें पूरा करने के लिए हम सही ग़लत कुछ नही सोच पाते शायद ऐसा ही रवि के साथ हुआ था...........................मगर ज़िन्दगी के सबसे हसीन पल सबसे दुखद पल में बदल गए थे .............एक ऐसी याद बन गए थे जो कभी मिटाए नही मिट पायी...................
क्रमशः ................................
ज़िन्दगी सपनो के पंख लगाकर उड़ने लगी । रवि मेरी छोटी से छोटी इच्छा ,मेरी हर खुशी के लिए दिन- रात कुछ न देखते । बस मेरे चेहरे पर हँसी की लकीर देखने के लिए कुछ भी कर गुजरते। मेरे दिन- रात मेरे नही रहे थे सब रवि को समर्पित हो गए थे। मैं भी रवि की राहों में अपने प्रेम के पुष्प बिछाए रहती। रवि की हर इच्छा जैसे मेरे जीने का सबब बन जाती............दिन ख्वाबों के सुनहरे पंख लगाये उड़ रहे थे। एक -दूसरे में कभी कोई कमी ही नज़र न आती । सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम था । हर कोई हमें देखकर यही कहता कि ये दोनों तो जैसे बने ही एक दूजे के लिए हैं । ऐसा सुनकर हम दोनों बहुत खुश होते ,अपने आप पर गर्व होता । पता ही नही चला कब एक साल गुजर गया।
उस दिन हमारी शादी की पहली सालगिरह थी । कितनी उमंगें थी हम दोनों के दिलों में। हम इस हसीन शाम को यादगार बनाना चाहते थे और उन सब लोगो को शामिल करना चाहते थे जिनकी निगाहों में हम आदर्श दंपत्ति थे। फिर तुमने एक पार्टी का आयोजन किया और हम दोनों के दोस्तों को बुलाया ताकि इस हसीन शाम का आनंद अलग ही हो जो बरसों भुलाये न भुला जा सके।
पार्टी हॉल में तुम अपने दोस्तों के साथ मेरा इंतज़ार कर रहे थे और जब मैं तैयार होकर वहां आई तो मुझे देखकर तुम बुत बने रह गए थे..........तुम्हारी उस अदा ने तो जैसे मेरी जान ही ले ली थी। ज़िन्दगी में कभी ऐसे क्षणों के बारे में नही सोचा था सब एक सपना सा लग रहा था। उस दिन तुम्हारे पाँव जमीन पर नही पड़ रहे थे। केक काटने के बाद जब रात गहराने लगी तब तुमने भावनाओं के अतिरेक में बहकर एक खवाहिश जाहिर की कि मैं भी तुम्हारे साथ एक पैग लूँ। मैं स्तब्ध रह गई तुम्हारे वो शब्द सुनकर। मेरी प्यार की सारी खुमारी तुम्हारे इन शब्दों से उतरने लगी। तुम्हें अच्छी तरह पता था कि मैं उस तरह को सोच की नही हूँ मगर फिर भी उस दिन की खुशी में या अपने प्यार के नशे में डूबे तुम मुझसे जिद करने लगे कि आज के दिन निशा तुम मुझे ये एक छोटा सा उपहार भी नही दे सकती । मैं जो रवि के लिए कभी भी कुछ भी कर सकती थी उस वक्त सकते में आ गई कि आज ये रवि को क्या हो गया है । आज से पहले तुमने कभी ऐसी कोई फरमाइश नही की थी और न ही कभी ऐसी जिद पकड़ी थी। मगर उस दिन न जाने रवि को क्या हो गया था वो मुझसे सबके सामने जिद करने लगा और मैं उस वक्त ख़ुद को लज्जित महसूस करने लगी जब तुम मुझे जबरन पिलाने की कोशिश करने लगे। और फिर मैं तुम्हारी ज्यादती बर्दाश्त न कर पाई और पार्टी बीच में छोड़कर घर आ गई। बस वो रात , सारी रात गरजती रही और बरसती रही। एक खामोशी पसर गई दोनों के बीच। काफी दिन तक तुम मुहँ छुपाते फिरते रहे शायद तुम्हें अपने किए पर पछतावा था और फिर तुमने अपने किए पर मुझसे माफ़ी मांगी और शायद अपनी ज़िन्दगी की ये पहली लड़ाई थी इसलिए मैंने भी तुम्हें जल्दी माफ़ कर दिया ये सोचकर की कई बार हमारी अपेक्षाएं कुछ ज्यादा बढ़ जाती हैं तो उन्हें पूरा करने के लिए हम सही ग़लत कुछ नही सोच पाते शायद ऐसा ही रवि के साथ हुआ था...........................मगर ज़िन्दगी के सबसे हसीन पल सबसे दुखद पल में बदल गए थे .............एक ऐसी याद बन गए थे जो कभी मिटाए नही मिट पायी...................
क्रमशः ................................
मंगलवार, 3 नवंबर 2009
श्रीमद्भागवद्गीता से .........................
श्रीमद्भागवद्गीता के १२ वे अध्याय के १५ वे श्लोक की बहुत ही सुंदर व्याख्या स्वामी रामसुखदास जी ने की है कि भक्त कैसा होता है और कैसा भक्त भगवान को प्रिय है।
श्लोक
श्लोक
जिससे किसी प्राणी को उद्वेग नही होता और जिसको ख़ुद भी किसी प्राणी से उद्वेग नही होता तथा जो हर्ष , अमर्ष (इर्ष्या), भय, और उद्वेग से रहित है , वह मुझे प्रिय है।
व्याख्या
भक्त सबमें और सर्वत्र अपने परमप्रिय प्रभु को ही देखता है। अतः उसकी दृष्टि में मन , वाणी और शरीर से होने वाली संपूर्ण क्रियायें एकमात्र भगवान की प्रसन्नता के लिए होती हैं। ऐसी अवस्था में भक्त किसी भी प्राणी को उद्वेग कैसे पहुँचा सकता है ? फिर भी भक्तों के चरित्र में ये देखने में आता है कि उनकी महिमा , आदर सत्कार यहाँ तक की उनकी सौम्य आकृति मात्र से भी कुछ लोग इर्श्यावश उद्गिन हो जाते हैं और भक्तों से अकारण द्वेष और विरोध करने लगते हैं । भक्त की क्रियाएं कभी किसी के उद्वेग का कारण नही होती क्यूंकि भक्त प्राणिमात्र में भगवान को ही देखता है । उसके द्वारा भूल से भी किसी के अहित की चेष्टा नही होती। जिनको उससे उद्वेग होता है वह उनके अपने राग - द्वेष युक्त आसुर स्वभाव के कारण होता है ,जो होता है वो उनके अपने स्वभाव के कारण होता है तो इसमें भक्त का क्या दोष?
हिरन , मछली और सज्जन क्रमशः तिनके , जल और संतोष पर ही जीवन निर्वाह करते हैं परन्तु व्याध , मछुए और दुष्ट्लोग अकारण ही इनसे वैर रखते हैं ।
भक्तों से द्वेष रखने वाले भी उनके चिंतन संग , स्पर्श और दर्शन से अपना आसुर स्वभाव छोड़कर भक्त हो गए ----ऐसा होने में भक्तों का उदारतापूर्ण स्वभाव ही सेतु है। परन्तु भक्तों से द्वेष रखने वाले सभी लोगों को लाभ ही मिलता हो ऐसा कोई नियम नही है।
लोगों को अपने आसुर स्वाभाव के कारण भक्त की हितकर क्रियाओं से भी उद्वेग हो जाता है और वे बदले की भावना से भक्त के विरुद्ध चेष्टा कर सकते हैं तथा अपने को भक्त का शत्रु मान सकते हैं परन्तु भक्त की दृष्टि में न कोई शत्रु होता है और न ही उद्वेग का भावः।
वास्तविकता का बोध होने और भगवान में अत्यन्त प्रेम होने के कारण भक्त भगवत्प्रेम में इतना निमग्न रहता है कि उसको सर्वत्र और सबमें भगवान के ही दर्शन होते हैं और भगवान की ही लीला दिखाई देती है। मनुष्य को दूसरों से उद्वेग तभी होता है जब उसकी कामना,मान्यता , साधना धारणा आदि का विरोध होता है । भक्त सर्वथा पूरनकाम होता है इसलिए दूसरों से उद्वेग होने का कोई कारण ही नही रहता।
किसी के उत्कर्ष को सहन न करना अमर्ष कहलाता है । दूसरों को अपने से अधिक सुविधा संपन्न प्राप्त हुआ देखकर साधारण मनुष्य के अंतःकरण में इर्ष्या का भावः पैदा होता है क्यूंकि उसको दूसरों का उत्कर्ष सहन नही होता । कई बार साधकों के मन में भी दूसरे साधको की आध्यात्मिक उन्नति देखकर इर्ष्या का भावः जागृत हो जाता है पर भक्त इस विकार से सर्वथा रहित होता है क्यूंकि उसकी दृष्टि में अपने प्रभु के सिवाय और किसी की स्वतंत्र सत्ता नही होती तो फिर क्यूँ और किससे अमर्ष करे।
अगर साधक के मन में दूसरों की आध्यात्मिक उन्नति देखकर ऐसा भावः पैदा हो कि मेरी भी ऐसी ही अध्यात्मिक उन्नति हो तो ये भाव उसके साधन में सहायक होता है। मगर ग़लत भावः अमर्ष पैदा करने वाला होता है।
इष्ट के वियोग और इष्ट के संयोग की आशंका से होने वाले विकार को भय कहते हैं। भय दो कारणों से होता है --------बाहरी कारण जैसे सिंह , सौंप , चोर आदि, दूसरा भीतरी कारण जैसे चोरी , झूठ , कपट आदि से होने वाला भय।
सबसे बड़ा भय मौत का होता है । विवेकशील कहे जाने वाले लोगों को भी प्रायः मौत का भय बना रहता है । साधक को भी सत्संग, भजन आदि में कृश होने का भय रहता है या उसको अपने परिवार के भरण पोषण का भय रहता है । ये सभी भय शरीर की जड़ता के आश्रय से पैदा होते हैं परन्तु भक्त सदा भगवान के आश्रित रहता है इसलिए भयमुक्त रहता है । साधक को भी तभी तक भय जब तक वह भगवान के आश्रित नही होता। सिद्ध भक्त तो सब जगह अपने भगवान की लीला देखते हैं तो भगवान की लीला उनके मन में भय कैसे पैदा कर सकती है।
मुक्त पद का अर्थ है सर्वथा विकारों से छूटा हुआ। अंतःकरण में संसार का आदर रहने से अर्थात परमात्मा में पूर्णतया मन बुद्धि न लगने से ही हर्ष,अमर्ष,भय, उद्वेग आदि विकार उत्पन्न होते हैं । परन्तु भक्त की दृष्टि में एक भगवान के सिवाय अन्य किसी की स्वतंत्र सत्ता और महत्ता होती ही नही इस कारण उसमें ये विकार उत्पन्न ही नही होते।
गुणों का अभिमान करने से दुर्गुण अपने आप आ जाते हैं । अपने में किसी गुण के आने पर अभिमान रूप दुर्गुण उत्पन्न हो जाए तो उस गुण को गुण कैसे माना जा सकता है। भक्त को इस बात की जानकारी ही नही होती की मेरे में कोई गुण है। अगर उसको अपने में कोई गुण दीखता भी है तो वो उसे भगवान का ही मानता है अपना नही। इस प्रकार गुणों का अभिमान न होने के कारण भक्त सभी दुर्गुण दुराचारों विकारों से मुक्त होता है ।
भक्त को भगवान प्रिय होते हैं इसलिए भगवान को भी भक्त प्रिय होते हैं।
भक्त सबमें और सर्वत्र अपने परमप्रिय प्रभु को ही देखता है। अतः उसकी दृष्टि में मन , वाणी और शरीर से होने वाली संपूर्ण क्रियायें एकमात्र भगवान की प्रसन्नता के लिए होती हैं। ऐसी अवस्था में भक्त किसी भी प्राणी को उद्वेग कैसे पहुँचा सकता है ? फिर भी भक्तों के चरित्र में ये देखने में आता है कि उनकी महिमा , आदर सत्कार यहाँ तक की उनकी सौम्य आकृति मात्र से भी कुछ लोग इर्श्यावश उद्गिन हो जाते हैं और भक्तों से अकारण द्वेष और विरोध करने लगते हैं । भक्त की क्रियाएं कभी किसी के उद्वेग का कारण नही होती क्यूंकि भक्त प्राणिमात्र में भगवान को ही देखता है । उसके द्वारा भूल से भी किसी के अहित की चेष्टा नही होती। जिनको उससे उद्वेग होता है वह उनके अपने राग - द्वेष युक्त आसुर स्वभाव के कारण होता है ,जो होता है वो उनके अपने स्वभाव के कारण होता है तो इसमें भक्त का क्या दोष?
हिरन , मछली और सज्जन क्रमशः तिनके , जल और संतोष पर ही जीवन निर्वाह करते हैं परन्तु व्याध , मछुए और दुष्ट्लोग अकारण ही इनसे वैर रखते हैं ।
भक्तों से द्वेष रखने वाले भी उनके चिंतन संग , स्पर्श और दर्शन से अपना आसुर स्वभाव छोड़कर भक्त हो गए ----ऐसा होने में भक्तों का उदारतापूर्ण स्वभाव ही सेतु है। परन्तु भक्तों से द्वेष रखने वाले सभी लोगों को लाभ ही मिलता हो ऐसा कोई नियम नही है।
लोगों को अपने आसुर स्वाभाव के कारण भक्त की हितकर क्रियाओं से भी उद्वेग हो जाता है और वे बदले की भावना से भक्त के विरुद्ध चेष्टा कर सकते हैं तथा अपने को भक्त का शत्रु मान सकते हैं परन्तु भक्त की दृष्टि में न कोई शत्रु होता है और न ही उद्वेग का भावः।
वास्तविकता का बोध होने और भगवान में अत्यन्त प्रेम होने के कारण भक्त भगवत्प्रेम में इतना निमग्न रहता है कि उसको सर्वत्र और सबमें भगवान के ही दर्शन होते हैं और भगवान की ही लीला दिखाई देती है। मनुष्य को दूसरों से उद्वेग तभी होता है जब उसकी कामना,मान्यता , साधना धारणा आदि का विरोध होता है । भक्त सर्वथा पूरनकाम होता है इसलिए दूसरों से उद्वेग होने का कोई कारण ही नही रहता।
किसी के उत्कर्ष को सहन न करना अमर्ष कहलाता है । दूसरों को अपने से अधिक सुविधा संपन्न प्राप्त हुआ देखकर साधारण मनुष्य के अंतःकरण में इर्ष्या का भावः पैदा होता है क्यूंकि उसको दूसरों का उत्कर्ष सहन नही होता । कई बार साधकों के मन में भी दूसरे साधको की आध्यात्मिक उन्नति देखकर इर्ष्या का भावः जागृत हो जाता है पर भक्त इस विकार से सर्वथा रहित होता है क्यूंकि उसकी दृष्टि में अपने प्रभु के सिवाय और किसी की स्वतंत्र सत्ता नही होती तो फिर क्यूँ और किससे अमर्ष करे।
अगर साधक के मन में दूसरों की आध्यात्मिक उन्नति देखकर ऐसा भावः पैदा हो कि मेरी भी ऐसी ही अध्यात्मिक उन्नति हो तो ये भाव उसके साधन में सहायक होता है। मगर ग़लत भावः अमर्ष पैदा करने वाला होता है।
इष्ट के वियोग और इष्ट के संयोग की आशंका से होने वाले विकार को भय कहते हैं। भय दो कारणों से होता है --------बाहरी कारण जैसे सिंह , सौंप , चोर आदि, दूसरा भीतरी कारण जैसे चोरी , झूठ , कपट आदि से होने वाला भय।
सबसे बड़ा भय मौत का होता है । विवेकशील कहे जाने वाले लोगों को भी प्रायः मौत का भय बना रहता है । साधक को भी सत्संग, भजन आदि में कृश होने का भय रहता है या उसको अपने परिवार के भरण पोषण का भय रहता है । ये सभी भय शरीर की जड़ता के आश्रय से पैदा होते हैं परन्तु भक्त सदा भगवान के आश्रित रहता है इसलिए भयमुक्त रहता है । साधक को भी तभी तक भय जब तक वह भगवान के आश्रित नही होता। सिद्ध भक्त तो सब जगह अपने भगवान की लीला देखते हैं तो भगवान की लीला उनके मन में भय कैसे पैदा कर सकती है।
मुक्त पद का अर्थ है सर्वथा विकारों से छूटा हुआ। अंतःकरण में संसार का आदर रहने से अर्थात परमात्मा में पूर्णतया मन बुद्धि न लगने से ही हर्ष,अमर्ष,भय, उद्वेग आदि विकार उत्पन्न होते हैं । परन्तु भक्त की दृष्टि में एक भगवान के सिवाय अन्य किसी की स्वतंत्र सत्ता और महत्ता होती ही नही इस कारण उसमें ये विकार उत्पन्न ही नही होते।
गुणों का अभिमान करने से दुर्गुण अपने आप आ जाते हैं । अपने में किसी गुण के आने पर अभिमान रूप दुर्गुण उत्पन्न हो जाए तो उस गुण को गुण कैसे माना जा सकता है। भक्त को इस बात की जानकारी ही नही होती की मेरे में कोई गुण है। अगर उसको अपने में कोई गुण दीखता भी है तो वो उसे भगवान का ही मानता है अपना नही। इस प्रकार गुणों का अभिमान न होने के कारण भक्त सभी दुर्गुण दुराचारों विकारों से मुक्त होता है ।
भक्त को भगवान प्रिय होते हैं इसलिए भगवान को भी भक्त प्रिय होते हैं।
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