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शनिवार, 11 सितंबर 2010

नई सुबह ---------भाग ६

शैफाली  ने पूछा , " अच्छा बताओ ये सब कैसे हुआ. १५ दिन में ही इतना सब कैसे बदल गया. कौन सा ऐसा चमत्कार हुआ कि तुम्हारे लेखन में इतनी उत्कृष्टता आ गयी "?


तब मैंने कहा ---------------
अब आगे ......................

तब मैंने कहा ," ये सब तुम्हारे ही कारण हुआ और उसे इतने दिन में क्या क्या महसूस किया सब बता दिया साथ ही उससे अपने प्यार का इज़हार कर दिया कि शैफाली ये सब तुम्हारे प्यार ने ही करवाया है. मुझे नहीं पता था कि प्यार में इतनी शक्ति होती है जो एक आम इंसान को खास बना देता है ".
मेरे इतना कहते ही शैफाली ने अचानक जोर से अपना हाथ खींचा और उठ खडी हुई और बोली ," माधव ये तुम क्या कह रहे हो ? मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा. तुम और मैं तो सिर्फ अच्छे दोस्त हैं . तुमने ऐसा कैसे सोच लिया ".


तब मैंने कहा , "मुझे भी नहीं पता था कि मुझे तुमसे प्यार हो गया है . ये तो राकेश ने मुझे इसका अहसास करवाया. अच्छा बताओ , बिलकुल सच -सच बताना , कि क्या तुम्हें मैं कभी याद नहीं आया इतने दिनों में. क्या तुम्हारा वहाँ मन लगा मेरे बिना. क्या तुम मुझसे मिलने के लिए बेचैन नहीं थीं ".


इन बातों का तो शायद शैफाली के पास भी कोई जवाब नहीं था . वो मुझे बिना कुछ कहे चुप चाप वहाँ से चली गयी और मैंने भी उसे नहीं रोका ताकि वो भी इस अहसास को महसूस कर सके ..........कुछ देर इसमें भीग सके और फिर कोई फैसला करे. हाल बेशक दोनों तरफ एक जैसा था मगर वो अभी इसे स्वीकार नहीं कर पा रही थी . कई दिन शैफाली मुझसे बचती रही . सामने आने पर कोई  ना कोई काम का बहाना बनाकर चली जाती.और मैं उसका इंतज़ार कर रह था कि कब वो मेरे प्रेम को स्वीकारती है और अपने प्रेम का इज़हार करती है.


इसी बीच मैं घर से सीढियां उतरते समय गिर पड़ा और पैर की हड्डी तुडवा बैठा . अब तो उससे मिलना नामुमकिन हो गया. ना जाने अभी कितनी ही बातें अधूरी थीं मगर सब अधूरी ही रह गयीं. मगर एक दिन अचानक कॉलेज के सारे दोस्त मेरा हाल पूछने मेरे घर आ गए उनके साथ शैफाली भी थी . उस दिन तो वो सबके साथ जैसी आई थी वैसी ही चली गयी थी मगर उसके २ दिन बाद वो फिर आई और आते ही जब हम कमरे में अकेले थे , माँ चाय बनाने गयी हुई थी इसी बीच बोली , " माधव तुम जल्दी से ठीक हो जाओ . अब मेरी समझ में आ गया है कि तुम सही कह रहे थे . शायद हम दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हैं. अब तुम्हारे बिना कॉलेज जाने का मन नहीं करता .हर तरफ तुम ही दिखाई देते हो . हमारी दोस्ती कब प्यार में बदल गयी ना तुम्हें पता चला ना मुझे मगर अब जब अहसास हो गया है तो स्वीकारोक्ति में देर क्यूँ करें".


मुझे तो यूँ लगा जैसे मेरी टांग पहले क्यूँ नहीं टूटी कम से कम ये ख़ुशी पहले नसीब हो जाती . अब तो ज़िन्दगी एक अलग ही राह पर बह निकली थी. अब हर दिन एक नया दिन बन कर आता. जैसे खुदा ने सारे जहाँ की खुशियाँ समेट कर मेरे दामन में डाल दी हों .मेरे पैर तो जैसे किसी ने फूलों की मखमली चादर पर रख  दिए हों और वक़्त अपनी रफ़्तार से उडा जा रहा हो .मेरे माता पिता तो उसी में खुश थे जिसमे मेरी ख़ुशी थी मगर मैं अभी तक ना शैफाली के घर जा सका  था और ना ही उसके पिता से मिल पाया था. ना ही कभी शैफाली ने चाहा कि मैं उनसे मिलूँ. कभी इस तरफ ध्यान ही नहीं गया था. उसकी माँ नहीं थी और वो भी अपने पिता की  इकलौती संतान थी. दिन सपनो की तरह रोज  नए रंग के साथ गुजर रहे थे और हम आसमान की रंगीनियों में विचरण कर रहे थे बिना सोचे कि वक्त जितना इन्सान पर मेहरबान होता है उतना ही बेरहम भी होता है...........कब अपनी दी हर सौगात एक ही झटके में छीन लेता है पता भी नहीं चलता और उस पल इंसान बेबस , खाली हाथ सिर्फ वक़्त को कोसता रह जाता है. 


जैसे किसी को एक ही दिन में अचानक सारे जहाँ की दौलत मिल गयी हो और एक ही पल में वो कंगाल हो गया हो ऐसा एक हादसा मेरी ज़िन्दगी को बदलने के लिए काफी था. दुर्भाग्य ने मेरी किस्मत का दरवाज़ा खटखटा दिया था . मेरे माता पिता का एक एक्सिडेंट में देहांत हो गया. मेरी तो सारी दुनिया ही उजड़ गयी  . मैं तो जैसे भरे बाज़ार में लुट गया था. एक दम पागल सा हो गया था मैं . इतना गहरा सदमा लगा था मुझे कि मेरा अपने होशो हवास पर काबू ही नहीं रहा. मेरा तो सब कुछ मेरे माँ बाप थे , उनके बिना मैं अधूरा था .मुझे नहीं पता कब और कैसे मेरे माता पिता की अंत्येष्टि हुई. कितने महीने , साल मेरी ज़िन्दगी के शून्य में खो गए मुझे नहीं पता. जब ८ साल बाद होश आया तो खुद को सड़क पर भटकता पाया. मैं एक भिखारी के रूप में दर- दर भटक रह था.दो लोगों  के झगडे की चपेट में आने से एक डंडा मेरे सिर पर ऐसा पड़ा कि जो मैं भूल गया चुका था वो सब  याद आ गया और मैं अपने घर की और चीखते -चिल्लाते हुए दौड़ा. मेरे पीछे -पीछे एक भिखारी दोस्त भी भागा मुझे आवाज़ देते हुए -रूक जाओ भैया, रूक जाओ लेकिन मुझे तो होश ही नहीं था. मुझे तो वो ही याद था कि मेरे माँ बाप इस दुनिया में नहीं रहे और मुझे उनका अंतिम संस्कार करना है ................


क्रमशः ..........


 

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

नई सुबह ----------भाग ५

इसी बीच शैफाली की क्लास से एक सेमिनार १५ दिनों के इए शिमला जा रहा था और वो भी वहाँ जा रही थी . ये एक साधारण बात थी तो मैंने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया मगर जब शैफाली चली गयी तो .................
अब आगे-----------

मगर जब शैफाली चली गयी तो मेरा मन उदास रहने लगा. मुझे कुछ भी  अच्छा ना लगता . एक बेचैनी -सी हर जगह छाई रहती. मैं खोया- खोया सा रहने लगा. सारा कॉलेज उसके बिना सूना -सूना सा  लगने लगा. चारों तरफ वीराना नज़र आता. किसी से बात करने का दिल न  करता. दोस्त कुछ कहते तो उन पर भड़क जाता.............उनकी छोटी से छोटी बात भी मुझे चुभने लगी  थी. मैं परेशान  हो गया कि ये मुझे क्या हो रहा है इसलिए घर जल्दी चला जाता मगर चैन तो कहीं नहीं आ रहा था हर जगह मुझे उदास , खामोश, वीरान नज़र आती. एक अजीब सी  जद्दोजहद से गुजर रहा था और इस हाल में एक दिन मैंने फिर लिखना शुरू किया ताकि अपने को कुछ बिजी रख सकूँ. 


अब हर शेर , हर ग़ज़ल में सिर्फ दर्द ही दर्द , विरह और प्रेम के रंग भरे थे. रात दिन खुद को सिर्फ और सिर्फ लेखन में ही डुबा दिया ताकि कुछ पल चैन से जी सकूँ  वरना तो हर प़ल काट खाने को आता था. 


१५ दिन कैसे बीते ये तो सिर्फ मैं ही जानता था मगर अगले दिन शैफाली आ गयी होगी मुझसे मिलेगी आते ही ,इसी उत्साह में रात कैसे कट गयी पता ही नहीं चला. इन्सान का मन भी कैसा होता है कभी तो इंतज़ार का क्षण- क्षण उसे युगों से बड़ा लगता है और कभी एक युग भी एक क्षण सा प्रतीत होता है. सब वक़्त का ही तो खेल है. कुछ ऐसा ही हाल मेरे मन का था. 


अगले दिन शैफाली से मिलने के लिए मैं जल्दी से जल्दी पंख लगाकर उड़कर कॉलेज पहुंचना  चाहता था. मैं जल्दी से उसी जगह पहुच गया जहाँ हम  मिला करते थे मगर वहाँ शैफाली नहीं  थी  तो मैं उसे उसकी क्लास में ढूँढने गया तो पता चला कि वो नहीं आई है. उसकी शिमला में तबियत ख़राब हो गयी थी इसलिए कुछ दिन बाद आएगी.


आज मुझे अफ़सोस हो रहा था कि इतने दिन हो गए हमें मिलते मगर कभी भी हम दोनों ने एक -दूसरे के घर -परिवार के बारे में कोई जानकारी नहीं ली . मैं  तो आज तक जानता ही नहीं था कि उसका घर कहाँ है. अब इंतज़ार करने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं था . मैं क्यूँकि लड़कियों से ज्यादा बात नहीं करता था तो उसकी सहेलियों से भी इस बारे में नही पूछ सकता था कि ना जाने कोई उसका क्या मतलब निकाले .


अब हर दिन उसके इंतज़ार में बीतने लगा और मेरी बेचैनी भी बढ़ने लगी. यार दोस्त मुझसे बात करना चाहते मेरा दिल बहलाना चाहते मगर मेरे तो होशोहवास पर मेरा ही काबू ना था. 


एक दिन मेरे एक दोस्त राकेश ने कहा ,"माधव तू मान न  मान  लेकिन ये  सच है मेरे यार , तुझे शैफाली से प्यार हो गया है. ये बेचैनी, उसके बिना कुछ भी अच्छा ना लगना, दोस्तों से भी बात ना करना,हर वक्त कहीं खोया खोया रहना --------ऐसा तभी होता है जब किसी को किसी से प्यार हो जाता है . तू हर वक़्त उसी का इंतज़ार करता रहता है . उसके नाम लेने पर तेरे चेहरे पर मुस्कान खिल जाती है जैसे लाखों गुलाब एक साथ एक ही बार में खिल गए हों और उसके बगैर तू ऐसा रहता है जैसे किसी ने तेरा सब कुछ छीन लिया हो , अब तू ही बता ये प्यार नहीं है तो और क्या है.अब मान भी जा इस बात को नहीं तो अपने दिल से पूछ कर देख ------क्यों तू ऐसा हो गया. क्या पहले तू ऐसा था. हर दम ज़िन्दगी से भरपूर खुद भी खुश रहता और दूसरों को भी हँसाता रहता था मगर अब देख अपने आप को . कोई भी तुझे जानने वाला पहली ही नज़र में बता देगा कि तुझमे बदलाव आ गया है और ये बदलाव तो सुखद है. अगर तुझे महसूस होता हैकि मैं सही कह रहा हूँ तो इस बारे में सोचना और अपने प्यार का इज़हार कर ताकि हमें हमारा वो ही पुराना दोस्त वापस मिल जाए".


इतना कहकर राकेश तो चला गया मगर अपने पीछे सौ सवाल छोड़ गया.


आज मैं सोचने को मजबूर हो गया था कि कहीं राकेश सही तो नहीं कहा रहा था. कहीं ये सारे लक्षण  प्यार के तो नहीं . क्या सचमुच मुझे प्यार हो गया है जो मैं शैफाली के बिना रह नहीं पाता हूँ. उसके साथ के बिना अधूरा महसूस करना , शायद यही प्यार है. 


अब मैं शैफाली के आने का इंतज़ार करने लगा . करीब एक हफ्ते बाद शैफाली कॉलेज आई तो उसे देखकर यूं लगा जैसे ना जाने कितने सालों से बीमार रही हो . मैं तो उसे देखकर स्तब्ध रह गया. परन्तु शैफाली उसी जोशो- खरोश से मिली जैसे हमेशा से मिलती थी. मैंने पूछा कि  क्या हुआ था तो हँसकर बोली ,"तुम्हारी शायरी सुनी नहीं थी ना इसलिए दिल बीमार हो गया था मगर अब आ गयी हूँ और तुम भी मौजूद हो तो देखना दो ही दिन में ठीक हो जायेगा". मुझे उसकी बातों ने आश्वस्त नहीं किया मगर मैं उसे परेशान भी नहीं करना चाहता था इसलिए चुप रहा.
तभी शैफाली बोली ,"अच्छा बताओ ,इतने दिन मेरे बिना कैसे बिताये ? क्या मेरी याद आई ?क्या मेरी याद में कोई नज़्म लिखी या सोचा अच्छा हुआ मैडम चली गयी चलो कुछ  दिन तो स्कूल की छुट्टी हुई". कितनी सहजता से शैफाली कहे जा रही थी और मैं उसे सिर्फ सुने जा रहा था . इस पल के लिए ही तो इतने दिन से तड़प रहा था और दिल चाह रहा था कि वो कहती रहे और मैं सुनता रहूँ बस और वक़्त यहीं रुक जाये. "अरे , कहाँ खो गए माधव, तुम्ही ही से तो बात कर रही हूँ"  जब शैफाली ने ये कहकर मुझे हिलाया तो अहसास हुआ कि मैं कहाँ हूँ. उस दिन मैंने ज्यादा बात नहीं की और कोशिश करता रहा की मेरी किसी बात से शैफाली को बुरा ना लगे.


अगले दिन मैं कुछ नोर्मल हुआ तो मैंने शैफाली के कहने पर उसे इतने दिन क्या -क्या किया सब बताया और जो -जो लिखा था सब उसे दिखाया. आज मेरा लिखा पढने के बाद शैफाली की आँखों में आँसू भर आये. एक उदासी उसके चेहरे पर छा गयी और वो बुत बनी बैठी रह गयी. उसे इस हाल में देखकर मैं परशान हो गया . ,मुझे लगा कि शायद कुछ गलत लिख दिया मैंने जो वो इतना दुखी हो गयी है. मैंने उसे कहा , " शैफाली तुम परेशान  मत होना अगर ख़राब लिखा है या  पसंद नहीं आया तो कह दो , तुम्हें पता है मुझे तुम्हारा कुछ भी कहना बुरा नहीं लगता ". इस पर वो बोली , " अरे माधव वो बात नहीं है . आज मैं कह सकती हूँ कि अब तुम्हारी लेखनी में वो जादू आ गया है  जिसकी मुझे तलाश थी. आज तुम्हारे लेखन में कहीं कोई कमी नहीं रही. सच यही तो चाहती थी मैं . अब तुम्हें आसमान छूने  से कोई नहीं रोक सकता". मेरे लिए तो ये सब अप्रत्याशित था.


शैफाली  ने पूछा , " अच्छा बताओ ये सब कैसे हुआ. १५ दिन में ही इतना सब कैसे बदल गया. कौन सा ऐसा चमत्कार हुआ कि तुम्हारे लेखन में इतनी उत्कृष्टता आ गयी "?


तब मैंने कहा ---------------


क्रमशः---------------

सोमवार, 6 सितंबर 2010

नई सुबह -------भाग ४

इतना कहकर शैफाली मुझे स्तब्ध खड़ा छोड़कर चली गयी और मैं काफी देर बुत -सा ठगा खड़ा रहा -----------
अब आगे -------------

वो तो दोस्तों ने जब मुझे काफी देर तक दूर खड़ा देखा तो आकर पूछा , "कौन थी वो जो उसके ख्यालों में पहली ही मुलाकात में डूब गया " क्यूँकि उन सब को पता था कि मेरी कोई गर्ल फ्रेंड नहीं है और किसी भी लड़की से आज तक मैंने कभी इतनी देर बात नही की  थी तो उनके लिए तो ये एक नयी बात ही थी.  उस सारा दिन मेरा  मन कॉलेज  के किसी भी काम में नहीं लगा . लेक्चरार ने क्या  पढाया, यार दोस्तों ने क्या कहा मुझे कुछ याद नहीं. मैं तो सारा दिन एक ही सोच में डूबा था कि वो थी कौन जिसने इतनी आत्मीयता से मुझे समझाया जैसे कोई अपना किसी अपने के लिए चिंतित होता है. घर आकर भी मैं इसी उधेड़बुन में लगा रहा और अगले दिन का इंतज़ार करने लगा. सारी रात एक बेचैनी सी छाई रही. रात कटने का नाम ही नहीं ले रही थी . यूँ लग रहा था जैसे आज की  रात मेरी ज़िन्दगी की सबसे लम्बी रात हो. 

अगले दिन वक़्त से काफी पहले ही मैं घर से कॉलेज के लिए निकल पड़ा और कॉलेज के गेट के पास एक पेड़ की ओट में इस तरह खड़ा हो गया कि  मैं तो सबको देख सकूँ मगर कोई मुझे ना देख सके. आज मुझे शिफाली का इंतज़ार था इसलिए हर आने वाले स्टुडेंट में मैं शैफाली को ढूँढ रहा था. खड़े खड़े काफी वक्त निकल गया यहाँ तक कि  मेरी एक क्लास भी मिस हो गयी .यार दोस्त मुझे ढूंढते फिर रहे थे और मैं किसी और को .

थक- हार कर जैसे ही जाने को हुआ  तभी देखा एक चमचमाती कार कॉलेज के गेट के पास अगर रुकी  और उसमे से शैफाली उतरी . उसे देखते ही मेरे तो जैसे पंखों को परवाज़ मिल गयी हो . मैं लगभग दौड़ता सा उसकी तरफ लपका और उसके सामने जाकर खड़ा हो गया मगर अब ख़ामोशी ने आकर मेरा रास्ता रोक लिया . जुबान तालू से चिपक गयी . समझ नहीं आ रहा था कि  कल से तो उससे मिलने को इतना बेताब था और आज जब वो सामने है तो कुछ समझ  नहीं आ रहा था कि  क्या कहूं . मुझे इस तरह चुप देख शेफाली ने ही 'हेलो' कहा और मेरा हाल पूछा तो मुझे भी शब्द मिल गए और मैं कह उठा ,
               बीमार कर के जो चले गए बज़्म से 
              आज पूछ रहे हैं बीमार का हाल कैसा है 
अब मैं अपने चिर -परिचित अंदाज़ में वापस आ गया था . इतना सुन शैफाली ने हँसते हुए कहा -----क्या हुआ है जो मुझ पर इतना संगीन इलज़ाम लगाया जा रहा है . तब मैंने कहा ," शैफाली जी, कल से जब से आपने जो बातें कहीं तभी से आपके ही बारे में सोच रहा हूँ कि  आपको इतना सूक्ष्म ज्ञान कैसे है. जो बात आज तक किसी ने नहीं कही वो आपने निसंकोच पहली ही बार में कह दी  तो मुझे लगता है कि  आप मेरी सबसे बड़ी शुभचिंतक हैं. आप मेरी मार्गदर्शिका बन जाइये और जब भी मैं कुछ भी नया लिखूँगा तो आपको जरूर दिखाऊँगा और आप उसमें जो भी कमी हो बताइयेगा ताकि मैं अपने स्तर में सुधार कर सकूँ ".


मेरे इतना कहते ही  शैफाली जोर से खिलखिलाकर हँस पड़ी और मैं सकपका गया कि  कहीं मैंने अपने पागलपन में कुछ गलत तो नहीं कह दिया इतने में वो बोली ," अरे माधव जी, मैं कोई बहुत बड़ी चिन्तक या विश्लेषक या आलोचक नहीं हूँ मैंने तो सिर्फ साधारण रूप में ये बात कही थी क्योंकि कहीं  ना कहीं मुझे लगा कि  तुम में वो बात  है जो तुम्हें बुलंदी पर ले जा सकती है . बाकी मेरे बारे में कोई ग़लतफ़हमी मत पालो ".


इतना कहकर वो अपनी क्लास में चली गयी और एक बार मुझे सोचने के लिए अकेला छोड़कर. अब धीरे -धीरे मुझमे सच में बदलाव आने लगा था. जिस शायरी को मैंने कभी गंभीरता से नहीं लिया था उसे अब मैंने अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था. मैं अपनी शायरी अब और डूबकर लिखने लगा था . जैसा कि  शैफाली ने कहा था . अब उसमे देश , समाज, व्यवहार सब शामिल होता मगर तब भी कभी शैफाली ने  मेरी तारीफ नहीं की बल्कि  हर रचना में कोई ना कोई कमी निकाल ही देती और मैं हर रचना को और स्तरीय बनाने  के लिए पुरजोर मेहनत  करने लगा यहाँ तक कि  अब
मुझमे अब वो पहले  जैसी चंचलता भी कम हो गयी थी और गंभीरता अपना राज़ करने लगी थी. 


मैं और शैफाली दोनों को एक- दूसरे की जब जरूरत होती मिलने लगे थे मगर सिर्फ लेखन से सम्बंधित बातें ही हमारे  तक सीमित थीं. मगर कॉलेज और यार दोस्तों में हमारे प्यार के चर्चे सिर उठाने लगे. सभी तरह तरह के कयास लगाने लगे और जब मुझे और शैफाली  को इस बात का पता चला तो दोनों बहुत जोर से हँसे . हम दोनों तो कभी ऐसा सोच भी नहीं सकते थे .हमें तो समझ ही नहीं आया कि  कैसे सबको सच बताएं क्योंकि कॉलेज में तो जरा किसी से हँस कर बोले नहीं कि ' मामला फिट है' वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है और यहाँ तो हम दोनों ही जब देखो तब एक दूसरे के साथ ज्यादातर वक्त बिताने लगे थे इसलिए किसी का मूँह कैसे बंद किया जा सकता था और अगर हम कुछ कहते भी तो किसी ने उस बात को मानना नहीं था जबकि हम दोनों के बीच ऐसा कुछ नहीं था मगर फिर भी कुछ कर नहीं पा रहे थे . इसी बीच शैफाली की क्लास से एक सेमिनार १५ दिनों के इए शिमला जा रहा था और वो भी वहाँ जा रही थी . ये एक साधारण बात थी तो मैंने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया मगर जब शैफाली चली गयी तो .................


क्रमशः --------------
 

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

नई सुबह ----------भाग ३

तब हर्षमोहन ने कहा ,"मुझे तुमसे जरूरी बात करनी है इसलिए अभी तुम नहीं जा सकते. बस शाम को आकर तुमसे बात करता हूँ . अभी आज एक जरूरी मीटिंग है वो निपटाकर आ जाऊं ".
माधव के पास रुकने के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं था..................

अब आगे -----------

शाम को जब हर्षमोहन आये तो उन्होंने माधव को बुलाया और उससे कहना शुरू किया ,  "देखो माधव तुम जैसा होनहार इन्सान फिर इसी दलदल में जाए तो मुझ  पर धिक्कार है . मैं चाहता हूँ तुम अपना एक अलग आकाश बनाओ . ज़िन्दगी में ऊंचाइयों को छुओ . अपने आप को एक नयी पहचान दो".

ये सुनकर माधव बोला , " सर , मैं एक भिखारी हूँ  और मुझमे ऐसी कोई काबिलियत नहीं जो आप ऐसा कह रहे हैं . हम तो ज़मीन के लोग ज़मीन से ही जुड़े रहते हैं  और एक दिन इसी में मर खप जाते हैं . हमारे पास से तो काबिलियत भी दूर से ही नमस्कार करके निकल जाती है ".


ये सुनकर हर्षमोहन ने कहा , " माधव तुम अपने आप को चाहे जितना छुपा लो मगर मैं तुमको और तुम्हारे अन्दर छुपी काबिलियत को पहचान गया हूँ . मुझे पता चल गया है कि मेरे सामने कोई छोटा मोटा इंसान नहीं बल्कि एक गंभीर शख्सियत का मालिक बैठा है जो ऐसा छुपे रुस्तम है कि हर पल नकाब ओढ़े रहता है . मगर आज वक़्त आ गया है कि तुम ये नकाब उठा दो और दुनिया के आगे खुद को जाहिर कर दो . ना जाने कितने प्रशंसक तुम्हारे दीदार को तरस रहे हैं ".


ये सुनकर तो माधव सकपका गया .उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये इंसान है या जादूगर , जो उसके बारे में सब जान गया . 


खुद को संयत करते हुए हिम्मत जुटाकर माधव बोला ,"सर , मैं एक आम इन्सान हूँ . आपको जरूर कोई गलफहमी हो रही है . मुझमे ऐसी कोई बात नहीं है जिससे आप इतना प्रभावित हो रहे हैं ".


तब हर्षमोहन ने कहा , " माधव अब खुद को भ्रमजाल से बाहर निकालो और सत्य को स्वीकार करो . मुझे अब तुम्हारे बारे में सब पता है कि तुम कौन हो? जब तुम्हारा एक्सिडेंट हुआ था तब तुम्हारे झोले में जो कागज़ थे वो मैंने अब तक संभल कर रखे हुए हैं . उन्ही कागजों से मुझे तुम्हारे बारे में सब पता चल गया .  बाकी मैं खुद ऐसे काम में हूँ कि तुम्हारे बारे में इन सबके बाद सारी जानकारी निकलना कोई मुश्किल काम नहीं , इतना तो तुम समझते ही होंगे.अब खुद को छुपाने से कोई फायदा नहीं इसलिए अब साफ़ -साफ़ बात करो . "


ये सुनकर माधव बोला , " ठीक है सर , जब आपको सब पता चल ही गया है तो फिर अब कहिये , क्या चाहते हैं आप "?


ये सुनकर कुछ देर खामोश हो कर  कुछ सोचते हुए से हर्षमोहन बोले , " माधव , एक बात बताओ तुम इतनी ज़हीन शख्सियत के मालिक हो , फिर क्यूँ तुमने खुद को दुनिया से छुपा रखा है ? क्यूँ दुनिया के सामने नहीं आते ? तुम्हें देखने और तुम्हें जानने के लिए आज तुम्हारे पाठक कितना बेचैन हैं ये तुम सोच भी नहीं सकते . फिर ऐसा कौन सा कारण है जो तुम खुद को सारे ज़माने से छुपा कर रखते हो और एक गुमनामी की ज़िन्दगी जीते हो ?.


इतना कहकर हर्षमोहन खामोश हो गए और माधव की तरफ प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगे . माधव बेचैनी से पहलू बदलने लगा मगर कुछ कह नहीं पा रहा था . उसके चेहरे पर छाई उदासी की महीन सी रेखा उसके दिल में उबलते ख्यालों को छुपा पाने में असमर्थ हो रही थी . ना तो वो कुछ कह पा रहा था और ना ही चुप रहकर हर्षमोहन की बात का मान घटाना  चाहता  था  क्योंकि उसके दिल में अब हर्षमोहन के लिए एक खास स्थान बन चुका था . 
बड़ी मुश्किल से अपने जज्बातों को काबू करके माधव ने बोलना शुरू किया .माधव  ने कहा , " सर आपकी जगह कोई और होता तो शायद मैं इस बात का कभी जवाब ना देता मगर आज आप से कहकर शायद मैं अपने दिल पर बरसों से रखा गम का भार कुछ हल्का कर सकूँ ".


कुछ देर रुककर माधव ने कहना शुरू किया , " सर , मैं पहले ऐसा नहीं था. मेरा भी एक हँसता मुस्कुराता परिवार था . मैं अपने माता पिता की इकलौती संतान था . बेहद लाड- प्यार से पला हुआ . हम अपनी ज़िन्दगी में बेहद खुश थे. जैसे एक मध्यमवर्गीय परिवार की ज़िन्दगी होती है वैसी ही  मेरी भी ज़िन्दगी थी . कोई गम नहीं था ज़िन्दगी में . हमेशा मस्ती करना और हंसमुख मिजाज़ इन्सान था मैं. कॉलेज के दिन याद आते हैं जब मैं उमंगों से भरा कॉलेज जाया करता था , आर्ट्स का स्टुडेंट था  क्योंकि मेरी साहित्य में रूचि थी और हिंदी मेरा प्रिय विषय . इसलिए  पढ़ाई की  कोई टेंशन तो थी नहीं और शुरू- शुरू  में वैसे भी मस्ती ही मस्ती होती है . मैं भी बेफिक्र सा मौज- मस्ती करता कॉलेज जाया करता था . 

मैं अपनी शायरी के लिए सारे कॉलेज में मशहूर था और किसी भी कार्यक्रम में जब तक मेरा नाम ना होता तो वो कार्यक्रम अधूरा ही माना जाता था . एक दिन जब मैं ऐसा ही एक कार्यक्रम पेश करके बाहर निकला तो एक आवाज़ ने मुझे चौंका दिया. शहद सी मीठी , कोयल सी कुहुकती  एक आवाज़ ने जब मेरा नाम लेकर आवाज़ दी तो मैं ठिठक कर रुक गया . पीछे मुड़कर देखा तो एक लड़की मुझे बुला रही है . मैंने सोचा शायद वो भी मेरी कोई फैन  है क्यूँकि कॉलेज की लड़कियों में मैं काफी मशहूर था . उसके पास गया तो पूछा कि क्या बात है तो उसने कहा , " मैं शैफाली हूँ  और इस कॉलेज में नयी -नयी आई हूँ इसलिए ज्यादा तो कुछ नहीं जानती मगर आपसे एक बात कहती हूँ कि आप जो शायरी करते हैं यूँ तो उसमे कोई कमी नहीं है मगर फिर भी इस तरफ कभी गंभीरता से ध्यान देना कि तुम्हारी शायरी सिर्फ रोमांटिक पहलू पर ही केन्द्रित है . अपनी शायरी में यदि तुम विविधता लाओ और साथ ही गहराई भी तो तुम एक उत्कृष्ट शायर बन सकते हो जिसका नाम सारे देश उज्जवल होगा क्योंकि तुम में वो बात तो है जो तुम्हारी शायरी को एक नयी  दिशा दे सकती है . तुम कोशिश करना और कभी सोचना इस तरफ और अगर बुरा लगे तो माफ़ी चाहती हूँ मगर मेरे ख्याल से अब तक तुम्हें सिर्फ तुम्हारे प्रशंसक ही मिले होंगे . कोई मेरे जैसा आलोचक  और सही मार्गदर्शन करने वाला नहीं मिला होगा . तुम अपनी प्रतिभा को सही दिशा दोगे तो मुझे बेहद ख़ुशी होगी  . इतना कहकर शैफाली मुझे स्तब्ध खड़ा छोड़कर चली गयी और मैं काफी देर बुत -सा ठगा खड़ा रहा ................


क्रमशः.................



बुधवार, 1 सितंबर 2010

नई सुबह ---------भाग २

तब माधव बोला ,"सर , मैं आपका आभारी हूँ कि आपने मुझ जैसे भिखारी का शहर के इतने बड़े अस्पताल में इलाज करवाया. मेरे जैसे इंसान तो ऐसा कभी सपने में भी नहीं सोच सकते. अब आप अपने बारे में कुछ बताइए ताकि मैं आपका परिचय जान सकूँ "
 अब आगे .........

ये सुनकर गाडी वाला मंद - मंद मुस्कान के साथ बोला , " माधव गलती मेरे ड्राईवर की थी और इस दुनिया में किसी को भी किसी की जान लेने का कोई हक़ नहीं है . जब नौकर गलती करे तो उसका जिम्मेदार उसका मालिक होता है . इसलिए अपने ड्राईवर की गलती के लिए , ये जो मैंने किया , उससे भी उस गलती की भरपाई नहीं हो सकती क्योंकि जो दुःख तकलीफ तुमने सही और तुम्हारा जो इतना लहू बहा क्या उसका इस संसार में कोई मोल है . हर इंसान को उतना ही दर्द होता है  जितना खुद को लगने पर होता है  . मैं तो अपने ड्राईवर के इस कृत्य पर शर्मिंदा हूँ और तुमसे इस भूल की क्षमा मांगने का भी अख्तियार नहीं रखता बल्कि ये चाहता हूँ कि तुम मुझे इसके लिए कोई सजा दो ".

बस इतना सुनते ही माधव तो जैसे  भाव-विभोर हो गया . उसके जैसे कवि ह्रदय वाला व्यक्ति कहाँ इतनी विनम्रता सहन कर पाता. माधव की आँखें छलक  आई थीं ये सोचकर कि आज के ज़माने में भी ऐसे इन्सान हैं. इसका मतलब इंसानियत अभी मरी नहीं शायद ऐसे इंसानों  के कारण ही पृथ्वी टिकी हुई है. 

फिर माधव  बोला , "सर ये आपकी महानता है वरना तो लोग टक्कर मार कर रोंदते हुए गाड़ी भगा कर ले जाते हैं . एक पल ठहरते भी नहीं ये जानने के लिए कि जिसे टक्कर मारी  है वो जिंदा भी बचा या मर गया और एक आप हैं जिनकी खुद की कोई गलती नहीं  बल्कि ड्राईवर  से गलती हुई उसके लिए भी मुझसे माफ़ी मांग रहे हैं ............आप जैसे लोग इस दुनिया में ऊँगली पर गिने जाने लायक ही होंगे. मैं आपकी विनम्रता , कृतज्ञता और महानता के आगे नतमस्तक हूँ. मुझे आपसे या आपके ड्राईवर से किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं है. आज मेरे सामने इस एक्सिडेंट के कारण ज़िन्दगी का एक नया पहलू सामने आया है." 

इतना कहकर माधव ने गाडी वाले से जाने की आज्ञा मांगी मगर गाडी वाला तो अब तक हाथ जोड़े और सिर झुकाए आँखों से अविरल धारा बहाता हुआ उसके आगे खड़ा था. ये देखकर तो माधव के होश उड़ गए. उसे समझ नहीं  आ रहा था कि वो किसी इन्सान को देख रहा है या साक्षात् भगवान उसके रूप में पृथ्वी पर अवतरित हो गए हैं क्योंकि आज के हालात में जब इन्सान ही इन्सान का सबसे बड़ा दुश्मन बना हुआ है उसमे किसी इन्सान को इस स्थिति में देखना तो ऐसा ही लगेगा कि जैसे या तो भगवान आ गए हैं या फिर वो कोई सपना ही देख रहा है , असल ज़िन्दगी में तो ऐसा संभव ही नहीं,फिर भी ये एक जीती -जागती हकीकत उसके सामने खडी थी . माधव की जुबान पर शब्द आकर रुके जा रहे थे और वाणी गदगद हो गयी थी . 

कुछ देर में खुद को संयत करके माधव गाड़ी वाले के पैरों पर गिर पड़ा और बोला , " सर आप मुझसे बड़े हैं मेरे पिता के समान हैं और इस तरह हाथ जोड़े खड़े हैं ----मैं शर्मिंदा हो रहा हूँ ,आप ऐसा मत करिए". 
जब गाड़ी वाले ने माधव को अपने पैरों पर गिरे देखा तो वो खुद को और लज्जित महसूस करने लगा . उसने माधव को उठाया और गले से लगा लिया . 
गाडी वाला बोला , " बेटा मैं इस ग्लानि के कारण खुद को मूँह दिखाने के काबिल नहीं और तुम मुझे और शर्मिंदा कर रहे हो ".

तब माधव बोला ,"सर, बस अब और नहीं . आपको जो कहना था और करना था आप कर चुके हैं . अगर आपको इतना ही ये बात परशान किये जा रही है तो सिर्फ इतना बता दीजिये कि आप हैं कौन? आपका परिचय ही आपका प्रायश्चित होगा".

तब गाड़ी वाला बोला , " मैं इस शहर में एक अख़बार जन -जागरण का मालिक हर्षवर्धन हूँ ".
इतना सुनते ही माधव तो अचम्भित हो गया . वो तो सोच भी नहीं सकता था कि इतना बड़ा इन्सान आज उसके सामने इस तरह खड़ा है. माधव तो खुद को कृतज्ञ समझने लगा. अब माधव ने हर्षमोहन  से जाने की इजाजत मांगी तो उन्होंने मना कर दिया और कहा कि तुम मेरे साथ मेरे घर चलोगे और जब तक पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते तब तक आराम करोगे. माधव की तो जुबान ही तालू से चिपक गयी थी . वो चुप खड़ा रहा .तब हर्षमोहन माधव का हाथ पकड़कर उसे अपनी गाडी में बैठाकर घर ले गए. 
हर्षमोहन का घर  था या  एक राजमहल था . कितने नौकर- चाकर थे कोई गिनती नहीं . रात को भी घर ऐसा लगता जैसे दिन निकला हो. माधव खुद में सिमटता जा रहा था. उसने तो कभी सपने में भी ऐसा भव्य दृश्य नहीं देखा था. हर्षमोहन ने नौकरों से कहकर माधव के रहने और उसकी देखभाल का खास इंतजाम करवाया. भला ऐसे जन्नत जैसे माहौल में कोई कितने दिन बीमार रह सकता था सो ४-५ दिन में ही माधव भला -चंगा हो गया और फिर एक दिन उसने हर्षमोहन से जाने की इजाजत मांगी .

तब हर्षमोहन ने कहा ,"मुझे तुमसे जरूरी बात करनी है इसलिए अभी तुम नहीं जा सकते. बस शाम को आकर तुमसे बात करता हूँ . अभी आज एक जरूरी मीटिंग है वो निपटाकर आ जाऊं ". 
माधव के पास रुकने के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं था..................

क्रमशः ......................

सोमवार, 30 अगस्त 2010

नई सुबह ---------भाग 1

माधव का नाम साहित्य जगत का एक जाना -पहचाना नाम था.उसकी कलम से निकला हर शब्द पढने वाले को सोचने पर मजबूर कर देता था ---------क्या श्रृंगार,क्या वियोग,क्या मानवता और क्या व्यंग्य ----------हर विधा का बेजोड़ लेखक था. हर शब्द में ऐसा जादू कि पढने वाले उसमे ही खो जाते थे शायद हर दिल की बात महसूस करने की कूवत थी उसमे तभी उसका हर शब्द हर शख्स को अपना सा लगता था. माधव जो लिखता उसके लिए एक पूजा थी और वो अपनी पूजा को बेचता नहीं था सिर्फ पूजा का प्रशाद ही सबमे बांटता था.अपनी कृतियों से प्राप्त पैसा वो अपने लिए प्रयोग नहीं करता था बल्कि सारा पैसा गरीब , नि:सहाय ,झुग्गी झोंपड़ी में रहने वालों पर खर्च कर देता था . उस कमाई का एक भी पैसा अपने पर खर्च ना करता. उसके चाहने वालों को पता भी ना था कि वो कहाँ रहता है और क्या करता है. एक गुमनाम सी ज़िन्दगी जीता था माधव.अपने जीवन का निर्वाह वो सिर्फ लालबत्ती पर प्राप्त पैसों से ही करता था . ऐसा था मस्त फक्कड़ माधव. जो रोज़ ज़िन्दगी के ना जाने कितने रंगों से सामना करता था और उसी को लफ़्ज़ो में उतार देता था. सारी दुनिया उससे मिलने को बेचैन रहती और शायद लोग उसके पास से गुजर भी जाते होंगे मगर फिर भी उसे पहचान ना पाने के कारण एक भिखारी समझ आगे बढ़ जाते होंगे. उसके संपादक उससे कितनी ही मिन्नतें करते मगर वो टस से मस ना होता. ना जाने क्यों वो गुमनामी के अंधेरों में ही खोया रहना चाहता था. ना  जाने कौन सी खलिश थी जो उसे ऐसा जीवन जीने के लिए मजबूर कर रही थी.

आज के वक़्त में भी ऐसा इन्सान होना संसार के आठवें आश्चर्य से कम नहीं. आज के वक्त में ऐसा कौन इंसान होगा जो दौलत और शोहरत ना चाहता हो या ऐशोआराम की ज़िन्दगी जीना ना चाहता हो मगर माधव की सोच आज के ज़माने से बिलकुल हटकर थी. बेशक जीता आज के वक्त में था और लिखता भी आज के दौर का ही था तभी तो हर  दिल की धड़कन बन  गया था मगर फिर भी अपने उसूलों और आदर्शों से कभी समझौता नहीं करता था.

माधव के आस पास के भिखारी जो लालबत्ती  पर होते थे कोई भी उसके दिल की बात नहीं जानता था. इतना तो था कि वो कभी कभी कुछ दार्शनिक बातें कहता तो अन्य लोगो के सिर के ऊपर  से गुजर जाती और इसे ही पागल समझने लगते मगर उन में से कोई भी नहीं सोच सकता था कि उनके बीच गुदड़ी का लाल छुपा है .

एक दिन अचानक जब माधव लाल बत्ती पर खड़ा भीख मांग रहा था तभी पीछे से आती एक तेज़ रफ़्तार कार का बैलेंस बिगड़ जाने के कारण फुटपाथ  पर खड़े माधव को उसने टक्कर मार दी और माधव अपने झोले के साथ लहूलुहान हो गया और उसके झोले में पड़े पैसों के साथ उसके कागज़ भी हवा में उड़कर तपती सड़क पर उसके ही लहू में भीग कर इधर -उधर बिखर गए जैसे किसी के सपनो को आँधी अपने साथ उडा ले गयी हो और सब तितर -बितर कर दिया हो.आप -पास लोगों  का हुजूम इकठ्ठा हो गया और  वो सब गाड़ी वाले के पीछे पड़ गए उसे पुलिस में ले जाने की धमकी देने लगे .कोई कह रहा था "गरीब आदमी क्या इन्सान नहीं होता जो इन गाड़ी वालो को दिखाई नहीं देता , गरीब का खून क्या खून नहीं होता या उसकी जान मुफ्त की होती है जो इतनी बेरहमी से बेचारे को मार दिया". ऐसे इंसानों को तो पकड़ कर पुलिस में दे देना चाहिए मगर इतने में जो गाडी में बैठा था वो उतर कर आया वो शहर का एक जाना माना शख्स था और गाडी उसका ड्राईवर चला रहा था . उसने कहा ,"भाइयो मेरी मदद करो और इसे जल्दी से गाड़ी में डालो मैं इसका इलाज करवाता हूँ . इतने में भीड़ में से कोई बोला ये सब बचने के उपाय हैं कोई इलाज नहीं करवाएगा हम तो अभी पुलिस का इंतज़ार करेंगे मगर गाडी वाला बोला अगर पुलिस का इंतज़ार करोगे तो उसके इलाज में देरी होने की वजह से वो मर भी सकता है देखो उसका कितना खून बह चुका है .एक बार इसे अस्पताल में दाखिल करवा दो फिर चाहे तो पुलिस में दे देना .कम से कम इसकी जान तो बच जाएगी. उसकी बात में दम देखकर लोगो न माधव और उसके झोले और कागजों को उसके साथ  ही गाड़ी में रख दिया  .

गाडी वाला माधव को अस्पताल ले गया और उसका इलाज शहर के सबसे बड़े अस्पताल में करवाया. पुलिस से निपटना वो अच्छी तरह जानता था और सबसे बड़ी बात कि उसने खुद उसका इलाज करवाया और सारा खर्चा उठाया तो पुलिस तो खुद इन सबसे हाथ झाडती फिरती है और वैसे भी उनका पेट भर ही चुका था गाडी वाला, तो वो क्यूँ कोई एक्शन लेती. दो ही दिन में माधव चलने -फिरने लायक हो गया तब एक दिन वो गाडी वाला उससे मिलने आया . माधव का हाल पूछा तो माधव ने अपने दार्शनिक अंदाज़ में कहा ,"बेरहम ज़िन्दगी एक बार फिर जीत गयी , मौत को भी धोखा दे आई , ना जाने अभी और कौन सा करम बाकी है ".ये सुनकर गाडी वाले के चहेरे पर लाचारगी का एक भाव आकर चला गया मगर माधव को महसूस भी नहीं हुआ.अब माधव को ख्याल आया कि उसने तो उस आदमी से उसका परिचय ही नहीं पुछा . तब माधव बोला ,"सर , मैं आपका आभारी हूँ कि आपने मुझ जैसे भिखारी का शहर के इतने बड़े अस्पताल में इलाज करवाया. मेरे जैसे इंसान तो ऐसा कभी सपने में भी नहीं सोच सकते. अब आप अपने बारे में कुछ बताइए ताकि मैं आपका परिचय जान सकूँ ".....................
क्रमशः ................

सोमवार, 23 अगस्त 2010

उसका पता मिलता नहीं

अपना पता भूलती नहीं 
उसका पता मिलता नहीं 
नगरी नगरी , द्वारे द्वारे 
खोजती फिरूँ प्यारे को 
पर उसका ठिकाना मिलता नहीं 

कमली बन कर डोलूँ 
मन के वृन्दावन में खोजूँ
सांझ सकारे प्रीतम प्यारे 
दर्शन को तरसे नैना हमारे
मैं खोजत खोजत हारी 
मुझे मिले ना कृष्ण मुरारी
मुझे मुझसे मिला जाओ 
इक बार दरस दिखा जाओ
अपना मुझे बना जाओ
प्यारे अपना पता बता जाओ
मुझे मेरा "मैं " भुला जाओ
इक होने का आनंद चखा जाओ
प्रेमानंद में डूबा जाओ
श्याम अपनी श्यामा बना जाओ
ह्रदय की तडपन मिटा जाओ
जन्मो की प्यास बुझा जाओ
सांवरिया इक बार तो आ जाओ
सांवरिया इक बार तो आ जाओ

रविवार, 8 अगस्त 2010

"मैं "का कोई अस्तित्व नहीं

मैं क्या हूँ ?
कुछ भी तो नहीं 
ब्रह्मांड में घूमते
एक कण के सिवा 
कुछ भी तो नहीं 
अकेले किसी 
कण की
सार्थकता नहीं
जब तक अणु 
परमाणु ना बने
जब तक उसके 
जीवन का कोई
प्रयोजन ना हो 
उद्देश्यहीन सफ़र
को मंजिल
नहीं मिलती 
हर डूबती लहर को 
साहिल नहीं मिलता 
और बिना बाती के 
जिस तरह 
दीया नहीं जलता
उसी तरह
"मैं "का कोई 
अस्तित्व नहीं
तब तक ......
जब तक
अस्तित्व बोध 
नहीं  होता  

बुधवार, 4 अगस्त 2010

श्याम बिन ज़िन्दगी गुजरती नहीं है

श्याम बिन ज़िन्दगी गुजरती नहीं है
राधे नाम बिन ये सँवरती नहीं है 
श्याम बिन .....................................

१) पीले पड़ गए हैं ये शाखों के पत्ते -२-
    उजड़ गया है ये मधुबन सारा -२-
    गोविन्द बिन कुछ भी सुहाता नहीं है 
श्याम बिन ..........................................

२) पनघट भी सूने गलियाँ भी सूनी -२-
    वो अमुआ के झूले वो मौसम भी भूले -२-
    तेरे बिन सांवरिया हम मरना भी भूले 
श्याम बिन ............................................

३) वो वंशी की ताने वो यमुना की बाहें -२-
    वो कदम्ब की छाहें वो टेढ़ी निगाहें -२-
    हर इक याद तेरी भुलाती नहीं है 
श्याम बिन .............................................

बुधवार, 14 जुलाई 2010

ए री मोहे मिल गये नन्द किशोर

ए री मोहे मिल गये नन्द किशोर
 बाँह पकड़त हैं मटकी फोड़त हैं
करत हैं कितनी किलोल 
ए री मोहे ......................................

कभी छुपत हैं कभी दिखत हैं
कभी रूठत हैं कभी मानत हैं
जिया में उठत हिलोर 
ए री मोहे ........................................

रास रचावत हैं सबहों नचावत हैं
वेणु मधुर- मधुर ऐसी बजावत हैं
बाँध कर प्रेम की डोर 
ए री मोहे .........................................

 

शनिवार, 10 जुलाई 2010

विरह- वियोग

शरीर रुपी पिंजरे में मेरा आत्मा रुपी पंछी फ़डफ़डा रहा है श्याम .............संसार के बन्धनों में जकड़ी हुई हूँ .........हरी मिलन को तरस रही हूँ .............जल बिन मीन सी तड़प रही हूँ..............पाप गठरी उठाये भटक रही हूँ ........जन्मों के फेरे में पड़ी हुई हूँ.......... फिर भी कान्हा......... तेरे वियोग में ह्रदय फटता नहीं है ..........पत्थर ह्रदय है ये प्रेम की बूँद पड़ी ही नहीं इस पर, वरना पिघल ना गया होता प्रेम की एक बूँद से .............सुना है प्रेम तो पत्थर को भी पिघला देता है और मेरा ये कठोर ह्रदय तेरे प्रेम वियोग से फटता ही नहीं .............ज्ञान की आँख मेरे पास नहीं और कोई उपाय आता नहीं .............सोचती थी प्रेम होगा मगर नहीं है अगर होता तो तू मुझसे दूर कब होता ............मुलाकात ना हो जाती ...........अब कौन जतन  करूँ सांवरिया ..........सिर्फ नैनन का नीर ही मेरी थाती है बस वो ही अर्पण कर सकती हूँ मगर ना मालूम कितने जन्म लगेंगे तुझसे मिलने को.........तुझे पाने को..................तुझे तो अपना बना लिया मगर तेरी कब बनूँगी तू मुझे कब अपना बनाएगा ,किस जन्म में ये विरह वियोग मिटाएगा कान्हा ............इसी आस पर दिन गुजार रही हूँ ..............क्यूँ इस देह के पिंजरे में फँसा रखा है कान्हा .........अब तो अपने आनंदालय  की एक बूँद पिला दे श्याम .............बस एक बार अपना बना ले...........अब विरह वियोग सहा नहीं जाता.........तुझ बिन रहा नहीं जाता..........श्याम ,अब तो बस अपनी गोपी बना ले एक बार .............जन्मों की प्यास मिटा जा श्याम बस एक बार अपना बना जा श्याम ..........बस एक बार.

रविवार, 4 जुलाई 2010

काहे भूल गए सांवरिया........

प्रियतम 
प्राण प्यारे 
नैना जोहते
बाट तिहारी 
तुझ बिन तडपत
रैन हमारी 
पी -पी पुकारत
सांझ सकारे 
तुझको खोजत
नैन हमारे 
आस की आस 
भी छूटन लागी 
प्रीत की प्यास 
भी टूटन लागी 
तुझ बिन प्यारे
बरसत हैं 
सावन भादों हमारे
कोऊ ना सन्देश 
पाऊं तिहारा
पाती भी 
सूनी आ जाती
बिन संदेस के 
संदेस दे जाती
भूल गए 
प्राणाधार हमारे
प्रेम के वो 
हिंडोले भूले
कर आलिंगन के
रस्ते भूले
तिरछी कमान के
तीर भी टूटे
अधरों के अवलंबन 
भी छूटे 
रूठ गए 
सांवरिया मोसे 
भूल गए वो
प्रेम बिछोने
खोजत- खोजत
मैं तो हारी
नैना भी
पथरा गए हैं
प्रीतम ,आने की
राह तकत हैं 
क्यूँ भूल गए सांवरिया  
सूनी पड़ी प्रीत अटरिया
काहे भूल गए सांवरिया........

शनिवार, 26 जून 2010

नमन

श्याम मोहन मदन मुरारी
राधे- राधे रटती प्यारी 
कृष्ण केशव कुञ्ज बिहारी
रमता जोगी बहता पानी 
आनंद कंद  मुरली धारी 
जमुना जी की महिमा न्यारी
गोविन्द माधव गिरिवरधारी 
खोजत -खोजत सखियाँ हारी 
आनंदघन अविनाशी त्रिभुवनधारी
कुञ्ज- कुञ्ज में बसे गिरधारी
नटवर नागर छैल बिहारी
रोम- रोम में रमे मुरारी
सुखधाम सुधासम कृष्ण मुरारी
कण -कण में रम रहे रमणबिहारी

गुरुवार, 17 जून 2010

दिव्य प्रेम

प्रेम प्रतिकार 
नहीं मांगता 
तुझसे तेरे
होने का हिसाब 
नहीं मांगता
प्रेम तो 
प्रेमी का
दीदार भी 
नहीं मांगता
जो रूह
बन गया हो 
जो साँसों में 
समा गया हो
जो जिस्म के 
रोएँ- रोएँ में
बस गया हो
फिर दीदार 
किसका करे 
और कौन करे
 जब दो हों
तो दीदार हो
जब दो हों तो
प्रतिकार  हो  
जहाँ एकाकार 
हो गया हो
प्रेम और प्रेमी का
वहाँ 
कोई बँधन नहीं
कोई चाहत नहीं 
वहाँ 
पूर्णता में लिप्त 
आनंद की 
स्वरलहरियाँ
गुंजारित होती हैं
रोम- रोम 
उल्लसित
पुलकित
प्रफुल्लित
कुसुम सा
महकता है
शरीर नगण्य
हो जहाँ
बस दिव्य प्रेम पनपता है वहाँ

गुरुवार, 10 जून 2010

प्रीत का रंग

प्रीत चदरिया ऐसी ओढ़ी 
हो गयी मैं बेगानी 
अपना पता खोजती डोलूं
बन के मैं दीवानी 
बांसुरी की धुन पर
वन -वन खोजूं
बन के मैं मतवाली
श्याम प्रीत की 
ओढनी ओढ़ के
हो गयीं मैं अनजानी
श्याम के  रंग में 
ऐसी रंग गयीं
हो गयी मैं भी कारी
श्याम रंग की चुनरिया 
पर मैं जाऊं वारी -वारी
प्रीत की  सब रीतें भुला दूँ
तन -मन की सुधि बिसरा दूँ
प्रेम धुन पर ऐसे 
नाचूँ  छम- छम 
होकर मैं  मतवाली

मंगलवार, 1 जून 2010

सखी री मेरे नैना भये चितचोर

सखी री मेरे
नैना भये चितचोर 

श्याम को चाहें
श्याम को निहारें 
प्रेम सुधा में
भीग- भीग जावें 
मुझ  बैरन के
हिय को रुलावैं 
सखी री मेरे
नैना भये चितचोर

श्याम छवि पर
बलि -बलि जावें
मधुर स्मित पर
लाड- लड़ावें 
मुझ  बेबस की 
एक ना मानें
सखी री मेरे 
नैना भये चितचोर

श्याम पर रीझें
श्याम को रिझावें
मुरली की धुन पर
बरस- बरस जावें
मुझ बिरहन के
विरह को बढ़ावें
सखी री मेरे 
नैना भये चितचोर

बुधवार, 26 मई 2010

श्यामा , अपना मुझे बना लेना

    मैं भूल जाऊँ कान्हा , कुछ गम नहीं
    पर तुम ना मुझको भुला देना 
    श्यामा , अपना मुझे बना लेना
१) मैं तेरी जोत जलाऊँ या ना जलाऊँ 
    पर तुम ना मुझे भुला देना
   अपनी दिव्य ज्योति जगा देना
   कान्हा , अपना मुझे बना लेना 
२)मैं तुम्हें ध्याऊँ या ना ध्याऊँ 
   पर तुम ना मुझे भुला देना
   मेरा ध्यान निज चरणों में लगा लेना
   कान्हा , अपना मुझे बना लेना
३)मैं प्रीत निभाऊं या ना निभाऊं 
   तुम ना मुझे भुला देना
   प्रीत की रीत निभा देना
   श्यामा प्रेम का राग सुना देना 
   कान्हा, अपना मुझे बना लेना

मंगलवार, 11 मई 2010

मन की थकान

तन की थकान 
तो उतर भी जाये 
मन की थकान
कहाँ उतारूँ
किस पेड़ को 
साया बनाऊँ
किस डाल पर
झूला डालूँ
कहाँ मैं यादों का 
घरौंदा  बनाऊँ
कौन सा अब
फूल खिलाऊँ 

किस देहरी पर 
माथा नवाऊँ
किस आँगन को
मैं बुहारूँ
किस मकां की 
दहलीज पर
मन की
रंगोली सजाऊँ


तन की टूटन
जुड़ जाएगी
मन की टूटन
कहाँ जुडाऊँ
किस थाली में
मन को परोसूँ
कौन सा मैं
दीप जलाऊँ
किस देवता का 
करूँ मैं  पूजन
किस श्याम की
राधा बन जाऊँ

तन की थकन तो उतर भी जाए 
मन की थकन उतारने को 
किस श्याम का काँधा पाऊँ 
कौन सा नेह दीप जलाऊँ 
कौन सी बाँसुरी बजाऊँ 
जो श्याम दौडे चले आयें 
मुझ बिरहन को गले से लगायें 
मेरी युगों की थकन मिटायें 

शुक्रवार, 7 मई 2010

अश्क कैसे बहाऊँ?

तेरी याद में
जब अश्कों का 
दरिया बहता था
तब अंतस में
बैठा तू ही तो 
तड़पता था
आज तेरा 
ये अंदाज़ 
समझ आया है
जब मैं और तू
दो रहे ही नहीं 
जब तू ही वजूदमें समाया है 
हर ओर तेरा ही
नूर समाया है
जहाँ मेरा "मैं"
ना नज़र आता है
 जब एकत्व को
अस्तित्व प्राप्त
हो गया है
फिर बता साँवरे
अश्क अब
कैसे बहाऊँ?
तुझे अब कैसे
और तडपाऊँ?

रविवार, 2 मई 2010

"मोहब्बत " हो गयी

तुझे देखा
नहीं हुई
तुझे पाया 
नहीं हुई
तुझे चाहा
नहीं हुई
मगर 
जिस दिन
तुझे जाना
"मोहब्बत "
हो गयी

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

एक सत्य ---------५० वीं पोस्ट

प्यार
इश्क 
मोहब्बत
प्रेम 
सब 
कर 
लिया
मगर 
फिर
भी 
खुदा
ना मिला 
जब 
खुद 
को
नेस्तनाबूद 
किया
 तब
"मैं "
ना 
मिला
बस 
"खुदा "
ही 
था 
वहाँ

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

ओ मेरे प्यारे

सुनो 
तुम्हें ढूंढ रही हूँ
जन्मों से 
रूह आवारा
भटकती 
फिरती है
इक तेरी 
खोज में
और तू 
जो मेरे
वजूद का 
हिस्सा नहीं
वजूद ही 
बन गया है
ना जाने 
फिर भी
क्यूँ मिलकर भी
नहीं मिलता
सिर्फ अहसासों में
मौजूद होने से
क्या होगा 
अदृश्यता में
दृश्यता को बोध 
होने से क्या होगा
नैनों के दरवाज़े से
दिल के आँगन में
अपना बिम्ब तो 
दिखलाओ 
इक झलक 
पाने को 
तरसती 
इस रूह की
प्यास तो 
बुझा जाओ 
ओ मेरे प्यारे
राधा सा विरह 
तो दे दिया
मुझे भी अपनी 
राधा तो बना जाओ

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

गीत- गोविन्द

गीत गोविन्द के गाती फिरूँ
मैं तो तन- मन में गोविन्द झुलाती फिरूँ 
गली- गली गोविन्द गाती फिरूँ
मैं तो तेरे ही दर्शन पाती फिरूँ
अँखियों में गोविन्द सजाती फिरूँ
हिय की जलन मिटाती फिरूँ
जन जन में गोविन्द निहारती फिरूँ
कभी गोपी कभी कृष्ण बनती फिरूँ
मैं तो गोविन्द ही गोविन्द गाती फिरूँ
कभी गोविन्द को गोपाल बनाती फिरूँ
कभी राधा को गोविन्द बनाती फिरूँ
कभी खुद में गोविन्द समाती फिरूँ
कभी गोविन्द में खुद को समाती फिरूँ
मैं तो गोविन्द ही गोविन्द गाती फिरूँ
मैं तो गोविन्द से नेहा लगाती फिरूँ
कभी गोविन्द को अपना बनाती फिरूँ
कभी गोविन्द की धुन पर नाचती फिरूँ
मैं तो मुरली अधरों पर सजाती फिरूँ
कभी मुरली सी गली- गली बजती फिरूँ
मैं तो गोविन्द ही गोविन्द गाती फिरूं
कभी बावरिया बन नैना बहाती फिरूँ
कभी गुजरिया बन राह बुहारती फिरूँ
कभी गोविन्द की राधा प्यारी बनूँ
कभी गोविन्द की मीरा दीवानी बनूँ
मैं तो गोविन्द ही गोविन्द गाती फिरूँ
मैं तो तन- मन में गोविन्द झुलाती फिरूँ

रविवार, 18 अप्रैल 2010

नैनन पड़ गए फीके

सखी री मेरे
 नैनन पड़ गए फीके
रो-रो धार अँसुवन की 
छोड़ गयी कितनी लकीरें
आस सूख गयी 
प्यास सूख गयी
सावन -भादों बीते सूखे 
सखी री मेरे
नैनन पड़ गए फीके
बिन अँसुवन  के 
अँखियाँ बरसतीं 
बिन धागे के 
माला जपती 
हो गए हाल  
बिरहा  के 
सखी री मेरे
नैनन पड़ गए फीके  
श्याम बिना फिरूं 
 हो के दीवानी
लोग कहें मुझे 
मीरा बावरी 
कैसे कटें 
दिन बिरहन के
सखी री मेरे
नैनन पड़ गए फीके
हार श्याम को
सिंगार श्याम को
राग श्याम को
गीत श्याम को
कर गए
जिय को रीते 
सखी री मेरे
नैनन पड़ गए फीके






गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

ये किस मोड़ पर ? ..............अंतिम भाग

गतांक से आगे .....................
अब निशि मंझधार में फँसी थी जिसका कोई साहिल ना था. अब उसे समझ आ रहा था घर , परिवार , पति , बच्चों का महत्त्व. अब उसे लग रहा था कि वो कैसी झूठी मृगतृष्णा के पीछे भाग रही थी. रंग - रूप , धन -दौलत, ऐशो- आराम कोई मायने नहीं रखता जब तक अपना परिवार अपने साथ ना हो. परिवार के सदस्यों का साथ ही इंसान का सबसे बड़ा संबल होता है , उन्ही के कारण वो ज़िन्दगी की हर जंग जीत जाता है मगर आज निशि अपनी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी जंग हार चुकी थी. अगर घर के सदस्यों ने उसकी तरफ अपना हाथ बढ़ाये रखा होता , उसके अकेलेपन के कुछ पलों को बाँटा होता तो शायद ये नौबत ना आती या फिर शायद निशि ने कुछ समझदारी रखी होती ,अपने बढ़ते क़दमों पर कुछ अंकुश लगाये होते तो उसे ये दिन ना देखना पड़ता क्यूंकि ये दिन तो हर औरत की ज़िन्दगी में आता है जब एक वक़्त वो अकेली पड़ जाती है मगर इसका ये मतलब तो नहीं ना कि हर औरत गलत राह पर चल पड़े ,उसे भी अपने उस वक़्त का सही उपयोग करना चाहिए था , ये सब बातें उसे मथ रही थीं. आज उसने अपने , अपनों को , उनके प्यार , विश्वास को चोट पहुंचाई थी जिसका शायद कोई प्रायश्चित नहीं था. शर्मिंदगी का अहसास उसे जीने नहीं दे रहा था. बेशक बच्चों को कुछ नहीं पता था मगर राजीव की निगाहों में बैठी अविश्वास की लकीर वो सहन नहीं कर पा रही थी . उसकी ख़ामोशी ही बिना कहे सब कुछ कह देती थी. राजीव की ख़ामोशी उसे हर पल तोड़ रही थी और साथ ही आत्मग्लानि का बोध उसके मानसिक संतुलन को बिगाड़ रहा था. निशि क्षण -प्रतिक्षण ज़िन्दगी से दूर जा रही थी क्यूंकि वो नहीं चाहती थी कि उसके बच्चों को कभी ज़िन्दगी में पता चले कि उम्र के ऐसे मोड़ पर जाकर उनकी माँ रास्ता भटक गयी थी और वो उससे नफरत करने लगें . राजीव की नफरत ही उसे जीने नहीं दे रही थी और अगर बच्चों के मन में भी यदि नफरत का अंकुरण फूट गया तो वो कैसे सहन करेगी, कैसे बच्चों से निगाह मिला पायेगी, क्या फिर कभी वो उनके किसी गलत काम पर उन्हें कुछ कहने की हिम्मत कर पायेगी ? ये सब बातें उसे विचलित कर रही थीं. अगर वो तलाक भी लेती है तो क्या वजह बताई जाएगी जब दिखने में सब कुछ सामान्य है तो और फिर क्या वो जी पायेगी अपने परिवार के बिना ?क्या उनके बिना उसका कोई अस्तित्व है ? ज़िन्दगी बोझ ना बन जाएगी?तब भी तो वो अकेलापन उस पर हावी हो जायेगा ?तब कहाँ जाएगी वो और क्या करेगी ?ये कुछ ऐसे प्रश्न थे जो उसकी अंतरआत्मा उससे पूछती और उसके पास इन सवालों का कोई जवाब ना होता .
एक ज़रा सी भूल कई बार हँसते -खेलते परिवार की तबाही का कारण बन जाती है . उस हद तक कोई ना तो सोच पाता है और ना ही चाहता है कि कोई ये कदम उठाये. बेशक भूल बहुत बड़ी नहीं थी कि जिसे माफ़ ना किया जा सके मगर आत्मग्लानि का बोझ सबसे बढ़कर होता है . शायद राजीव कुछ वक़्त बाद समझौता कर भी लेता मगर अपनी ही निगाहों में गिरना शायद सबसे बड़ा अभिशाप है. और जब इंसान खुद की निगाहों में गिर जाता है तब शायद ऐसा कदम उठाने की सोचता है क्यूंकि उसे चारों तरफ सिवाय अँधेरे के और कुछ नहीं सूझता. हर राह बंद दिखाई देती है . हर पल घुट - घुटकर जीना इंसान को भीतर ही भीतर तोड़ देता है फिर वो उन अहसासों से उबर नहीं पाता और ऐसा कदम उठाने को मजबूर हो जाता है .
और फिर इसी उहापोह में फँसी निशि ने वो कदम उठा लिया जो कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था . निशि ने आत्महत्या कर ली . सबने समझा डिप्रेशन में थी इसीलिए आत्महत्या कर ली मगर असल कारण सिर्फ राजीव जानता था और आज वो भी पछता रहा था क्यूंकि उसने इस स्थिति के बारे में तो कभी सोचा ही नहीं था . निशि की एक छोटी सी भूल ने पूरे परिवार को किस मोड़ पर पहुंचा दिया था जहाँ सिर्फ अँधेरा ही अँधेरा था.
समाप्त .

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

ये किस मोड़ पर ?.............भाग ४

गतांक से आगे .........................
निशि ने राजीव से वादा लिया कि वो उसकी पूरी बात ध्यान से सुनेगा और उसे समझने की कोशिश करेगा , उसके बाद कोई फैसला लेगा और फिर निशि ने दिल पर पत्थर रखकर , अकेलेपन से उपजी त्रासदी की पूरी दास्ताँ राजीव को सुना दी , निशि का एक- एक शब्द पिघले सीसे की तरह राजीव के कानों में उतरा , उसे यूँ लगा जैसे हजारों बम एक साथ उसके सर पर फोड़ दिए गए हों. सारी बात सुनकर राजीव सन्न रह गया. वो तो सपने में भी नहीं सोच सकता था कि निशि उसके साथ ऐसा भी कर सकती है. वो तो बेफिक्र होकर काम पर चला जाता था ताकि अधिक से अधिक सुख -सुविधाएं अपने परिवार को दे सके. क्या निशि पर विश्वास करके उसने ठीक नहीं किया? क्या पति -पत्नी  के रिश्ते की डोर इतनी कमजोर होती है कि एक ही आंधी उसे उडा ले जाये ?क्या उसकी निशि के ख्यालों में उसके सिवा किसी और का भी स्थान है ---------इन बातों  ने तो जैसे राजीव के मन पर ना भरने वाला घाव कर दिया. उसकी तो वो हालात हो गयी कि जैसे एक ही पल में उसे किसी ने राजा से रंक बना दिया हो . राजीव समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे. उसके प्यार में कहाँ कमी रह गयी थी कि निशि दिल-ओ-जान से चाहने वाले पति से भी बेवफाई कर बैठी. इसके बाद कई दिन तक निशि और राजीव के बीच ख़ामोशी छाई रही और इसी हालत में दोनों वापस आ गए. 
निशि खुद अन्दर ही अन्दर छटपटा रही थी  . उसे समझ नहीं आ रहा था कि अगर ये बात उसके जवान होते बच्चों को पता चल गयी तो वो उनसे निगाह कैसे मिलाएगी. बच्चे तो सिर्फ माँ बीमार है -------इतना ही जानते थे . अब तो निशि  आत्मग्लानि के बोझ तले और भी ज्यादा दब गयी. उधर राजीव उससे कोई बात ही ना करता. घर का माहौल देखने में तो शान्तिपूर्ण था मगर भीतर ही भीतर लावा धधक रहा था बस ज्वालामुखी के विस्फोट का इंतज़ार था.
और फिर एक दिन राजीव कुछ कागज़ लेकर निशि के पास आया और उससे दस्तखत करने को कहा . जब निशि ने कागज़ खोले तो उन्हें पढ़ते ही उसे लगा जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली हो. वो तलाक के कागज़ थे. निशि वहीँ कटे पेड़ सी गिर पड़ी. काफी देर बाद जब उसे होश आया तो वो खूब रोई , गिडगिडायी  , काफी माफ़ी मांगी राजीव से मगर राजीव ने उसकी एक ना सुनी. वो कहते हैं ना विश्वास की डोर बहुत ही कच्चे धागे की बनी होती है और एक बार यदि टूट जाये तो जुड़ना मुमकिन नही होता. निशि की बेवफाई से आहत राजीव अब निशि के साथ नहीं रहना चाहता था और ना ही किसी तरह का शोर -शराबा करना चाहता था बस शान्तिपूर्वक निशि से अलग हो जाना चाहता था. वो नहीं चाहता था कि इस बात का किसी को पता चले और जग- हंसाई हो और उसके बच्चों पर बुरा असर पड़े. वो निशि के रहने -खाने की भी भरपाई करने को तैयार था बस तैयार नहीं था तो सिर्फ साथ रहने के लिए. राजीव चाहता तो माफ़ कर भी देता निशि को मगर निशि की बेवफाई उसे एक पल भी चैन से जीने ना देती और पल- पल मरने से अच्छा है उस रिश्ते की आहुति दे दी जाये क्यूंकि जब भी निशि सामने आती उसे वो बातें याद आ जातीं और वो भी अपना चैन खो बैठता और फिर बच्चे कौन संभालता , यही सोचकर राजीव ने तलाक का फैसला लिया. निशि को अपने किये पर इतना पछतावा था कि वो राजीव से नज़रें भी नहीं मिला पा रही थी और उस पर तलाक के कागजों ने तो उसकी रही सही हिम्मत भी तोड़ दी. 
क्रमशः ..........................

रविवार, 4 अप्रैल 2010

ये किस मोड़ पर ?..........भाग ३

गतांक से आगे ...........................
अपने हालात के बारे में ना तो निशि किसी से कह सकती थी और ना ही सहन कर पा रही थी. उसे तो यूँ लगा जैसे स्वच्छंद आकाश में विचरण करने वाले पंछी को किसी ने घायल कर दिया हो और वो फ़ड्फ़डाता हुआ जमीन पर आ गिरा हो. धीरे -धीरे निशि  डिप्रेशन में चली गयी क्यूंकि अन्दर की घुटन उसे जीने नहीं दे रही थी. डॉक्टर भी कितनी ही दवाइयां दे रहे थे मगर वो उससे उबर नहीं पा रही थी . एक दिन जब वो नेट पर बैठी थी तो उसकी एक नेट फ्रेंड जो एक महिला थी, उससे उसने अपने मन की सारी बातें कहीं. उसे कहने के बाद वो अपने को कुछ हल्का महसूस करने लगी . उसकी नेट दोस्त जिसका नाम रिया था , उसने निशि को समझाया----- नेट की आभासी दुनिया के बारे में बताया , यहाँ कोई किसी का नहीं होता , जो अपने होते हैं सिर्फ वो ही  अपने होते हैं ,ये दुनिया तो इक छलावा है ,कुछ पल गुजारने का साधन मात्र है.  रिया ने निशि को कहा कि अगर उसे अपने पति पर , उसके प्रेम पर पूर्ण विश्वास है तो अपने पति को विश्वास में लेकर उनसे सारी बात कह दे तभी उसके दिल- दिमाग को सुकून मिल सकेगा  शायद तब वो अपने पछतावे से बाहर आ पायेगी और फिर तुमने कोई इतना बड़ा गुनाह तो किया  नहीं है कि जिसकी माफ़ी ना मिल सके .
रिया की बात सुनकर निशि उलझन में पड़ गयी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे. क्या सारी बातें राजीव को बता दे ? क्या ये सब सुनकर राजीव उसे माफ़ कर देगा ? क्या राजीव की जगह यदि  वह होती तो क्या उसे माफ़ कर पाती ? ना जाने कितने अनगिनत प्रश्न उसके दिमाग में दस्तक देने लगे. जितना वो इन सबसे दूर रहने की कोशिश करती उतना ही खुद  को इन प्रश्नों के चक्रव्यूह में उलझा पाती. इसी कशमकश में फँसी निसी को एक दिन नर्वस ब्रेक डाउन हो गया.  
जब राजीव ने उसकी इतनी बुरी हालत देखी तो  डॉक्टर के कहने पर अपना सारा व्यवसाय छोड़कर उसे घुमाने के लिए शिमला ले गया मगर वहाँ का सुरम्य वातावरण भी निशि के जीवन में कोई बदलाव ना ला पा रहा था. जब मन में अन्धेरा हो तो बाहर की रौशनी भी फीकी पड़ जाती  है .राजीव अपनी तरफ से हर भरसक कोशिश करता निशि का मन दूसरी तरफ लगाने का मगर निशि अपने अंतर्मन की पीड़ा से उबर नहीं पा रही थी . एक तरफ  तो मनोज की बेवफाई , धोखा और दूसरी तरफ उसकी गृहस्थी , प्यार करने वाला पति और आज्ञाकारी बच्चे. इन हालातों ने उसे तोड़कर रख दिया था और वो पछतावे की आग में जल रही थी. फिर एक दिन जब राजीव के बहुत कुरेदने पर , अपने प्यार का  वास्ता देने पर निशि ने उसे सब बताने का निर्णय लिया. उसने सोचा की रोज घुट-घुटकर जीने से तो अच्छा है कि एक ही बार अपनी गलती को स्वीकार कर ले तो शायद जीना आसान हो जाये...............
क्रमशः ......................

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

ये किस मोड़ पर ?.............भाग 2

गतांक से आगे ....................
निशि उस दिन जैसे ही कंप्यूटर पर चैट करने बैठी तो एक शख्स बार- बार उससे बात करने की कोशिश करने लगा  . निशि के मना करने पर भी वो नही माना तो निशि ने सोचा चलो जब चैट  ही करनी है  तो इससे भी बात कर ही ली जाये ताकि इस शख्स को भी चैन आये और वो भी आराम से बात कर सके अपने दोस्तों से.अब निशि उस शख्स यानि मनोज से मुखातिब हुई. दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. मनोज ने सबसे पहले तो निशि के सौंदर्य पर एक खूबसूरत कविता लिखी जिसे पढ़कर निशि आनंद विभोर हो उठी. निशि की सबसे बड़ी कमजोरी पर ही मनोज ने हाथ रख दिया था. उसके बाद तो जैसे निशि की ज़िन्दगी ही बदलने लगी थी. मनोज रोज निशि के सौंदर्य पर कोई ना कोई नयी कविता उसे सुनाता और उसके बाद निशि के सौंदर्य की जी भर कर तारीफ करता .निशि ख़ुशी से फूली ना समाती . धीरे- धीरे दोनों में घनिष्ठता बढ़ने लगी . अब जब तक निशि मनोज से बात ना कर लेती उसे चैन ना आता . इसी प्रकार रोज दोनों बतियाते . मनोज भी निशि को खुश करने में कोई कोर -कसर ना छोड़ता . फिर एक दिन मनोज ने निशि से अपने प्रेम का इजहार किया तो निशि तो जैसे इसी दिन के इंतज़ार में बैठी थी उसने किसी भी प्रकार का कोई प्रतिकार नही किया . उसने एक बार भी अपनी गृहस्थी , अपने पति और बच्चों के बारे में नही सोचा. इस वक़्त तो उसे हर तरफ मनोज ही मनोज दिखाई देता था. पति के पास होकर भी वो ख्यालों में मनोज के साथ होती थी. मनोज का वजूद पूरी तरह उसके दिल-ओ-दिमाग पर हावी हो चुका था. १६ साल की लड़की  जैसी उमंगें फिर जवान होने लगी थी. पल- पल खुद को आईने में निहारा करती .अपने सौंदर्य में जरा सी भी कमी ना  होने देती और भी बन सँवर कर रहती क्यूंकि  अब निशि के ख्वाबों -ख्यालों में सिर्फ एक ही तस्वीर होती . घर के काम तो वो यंत्रचालित मशीन की तरह जल्दी -जल्दी निबटा देती और फिर जल्दी से सबके जाते ही कंप्यूटर पर या फिर फ़ोन पर मनोज से बात करने लगती. . दोनों ने एक -दूसरे को अपना नंबर भी दे दिया था बस मिले नही थे क्यूंकि मनोज काफी दूर किसी दूसरे शहर में रहता था इसलिए मिलना तो ना हो पाया मगर मनोज के बिना एक -एक पल उसे काटने को दौड़ता. निशि को लगता कि बस मनोज उसके सौंदर्य की शान में कसीदे पढता रहे और वो सुनती रहे. धीरे- धीरे मनोज के प्रेमापाश में निशि इस कदर बंध गयी कि अब उसे लगने लगा कि मनोज के बिना वो जी नहीं पायेगी इसलिए एक दिन उसने मनोज से कहा कि अब वो उसके बिना नहीं रह सकती इसलिए अब उन्हें मिलना चाहिए और भविष्य के बारे में तय करना चाहिए कि अब आगे क्या करना है? कहाँ रहना है ? कैसे अपने सपनो को पूरा करना है?इतना सुनते ही मनोज तो ऐसा हो गया जैसे काटो तो खून नही. उसने तो सोचा ही नहीं  था इस नज़रिए से. वो तो सिर्फ निशि की भावनाओं से खेल रहा था और अपने पौरुष को संतुष्ट कर रहा था . पहले तो मनोज ने समझाना चाहा कि उसकी भी गृहस्थी है घर परिवार है बच्चे हैं और वो उन्हेंतो नहीं छोड़ सकता इसलिए जैसे चल रहा है वैसे ही चलने दिया जाये कम से कम दोनों एक दूसरे के साथ तो हैं मगर निशि तो कुछ भी सुनने के लिए तैयार ना थी . उसे तो लगता था जैसे सारे संसार में एक मनोज ही है जो उसे चाहता है. वो तो मनोज के इरादों से अनभिज्ञ उसके प्यार में पूरी तरह पागल हो चुकी थी. जब मनोज को लगा कि ये बला तो गले ही पड़ रही है तो वो धीरे- धीरे निशि से कटने लगा. निशि के फ़ोन करने पर उसे जवाब देना उसने बंद कर दिया और ना ही चैट पर सामने आता. कभी गलती से नेट पर सामना हो जाता तो फ़ौरन चला जाता. इस अप्रत्याशित व्यवहार से निशि बौखला  गयी . उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे , कैसे मनोज से मिले? वो अपनी हर भरसक कोशिश करने लगी मगर जब मनोज ने उससे पूरी तरह किनारा कर लिया तो इस आघात को निशि सहन नहीं कर पाई ......................
 क्रमशः .....................


बुधवार, 31 मार्च 2010

ये किस मोड़ पर ?

निशि की सुन्दरता पर मुग्ध होकर ही तो राजीव और उसके घरवालों ने पहली बार में ही हाँ कह दी थी . दोनों की एक भरपूर , खुशहाल गृहस्थी थी . राजीव का अपना व्यवसाय था और निशि को लाड-प्यार करने वाला परिवार मिला. एक औरत को और क्या चाहिए . प्यार करने वाला पति और साथ देने वाला परिवार. वक़्त के साथ उनके दो बच्चे हुए . चारों तरफ खुशहाल माहौल . कहीं कोई कमी नहीं . वक़्त के साथ बच्चे भी बड़े होने लगे और परिवार के सदस्य भी काम के सिलसिले में दूर चले गए . अब सिर्फ निशि अपने पति और बच्चों के साथ घर में रहती . धीरे- धीरे राजीव का व्यवसाय भी काफी बढ़ गया और वो उसमें व्यस्त रहने लगा. निशि के ऊपर गृहस्थी की पूरी जिम्मेदारी छोड़ राजीव ने अपना सारा ध्यान व्यापार की तरफ केन्द्रित कर लिया . इधर बच्चे भी अब कॉलेज जाने लगे थे तो ऐसे में निशि के पास कोई खास काम भी ना होता और सारा दिन काटने को दौड़ता. उसे समझ नही आता कि वो सारा दिन क्या करे, एक दिन उसके बेटे ने ही उसे बताया की नेट पर चैट किया करो तो आपका मन लगा रहेगा और वक़्त का पता भी नही चलेगा . उसके बेटे ने उसे सब कुछ सिखा दिया . अब तो निशि को दिन कहाँ गुजरा ,पता ही ना चलता . धीरे -धीरे अपने नेट दोस्तों के माध्यम से उसने और भी कई साईट ज्वाइन कर लीं अब तो इस आभासी दुनिया में उसे कई दोस्त मिल गए . नए -नए लोगों से बातें करना उसे अच्छा लगने लगा .
निशि जब भी कंप्यूटर पर चैट करने बैठती उसे देखते ही ना जाने कितने मजनुनुमा भँवरे आ जाते उससे बात करने क्यूंकि वो थी ही इतनी खूबसूरत कि यदि कोई उसे एक बार देख ले तो बात करने को उतावला हो जाता. खुदा ने बड़ी फुरसत में उसे बनाया था . हर अंग जैसे किसी शिल्पकार ने नफासत से गढा हो . शोख चंचल आँखें यूँ लगती जैसे अभी बोलेंगी. लबों की मुस्कान तो देखने वाले का दिल चीर देती थी. उस पर संगमरमरी दूधिया रंग और गुलाबी गालों पर एक छोटा सा काला तिल ऐसा लगता जैसे भगवान ने नज़र का टीका साथ ही लगाकर भेजा हो. ऐसी रूप -लावण्य की राशि पर कौन ना मर मिटे और ऐसे रूप -रंग पर किसे ना नाज़ हो. ऐसा ही हाल निशि का था. जब भी कोई उसकी तारीफ करता , उसके सौंदर्य का गुणगान करता तो वो इठला जाती उसका अहम् संतुष्ट होता. उसे अपने सौंदर्य की प्रशंसा सुनना अच्छा लगता और उम्र के इस पड़ाव पर भी वो किसी भी नज़रिए से इतने बड़े बच्चों की माँ नही लगती थी ऐसे में प्रशंसा के मीठे बोल तो सोने पर सुहागा थे और कंप्यूटर की आभासी दुनिया तो शायद इस काम में माहिर है ही . ......................
क्रमशः ...................

सोमवार, 22 मार्च 2010

शक्ति का वंदन



शक्ति का
पूजन , अर्चन 
वंदन,श्रृंगार
किया तुमने 
मगर साथ ही
शक्ति का
उपहास, परिहास
खण्डन, मर्दन 
ह्रास ,त्रास 
 और तर्पण भी
किया तुमने
फिर कैसे 
शक्ति के 
उपासक बनते हो
जब शक्ति को ही
शक्ति सा ही 
ना वंदन 
करते  हो
पहले शक्ति का 
महिमामंडन करो
शक्ति का 
अवलंबन बनो
शक्ति का पथ
आलोकित करो
शक्ति का संचार करो
शक्ति का आवाहन करो
शक्ति को नव जीवन दो 
फिर शक्ति स्वयं बंध जाएगी 
तुम्हारे पूजन ,अर्चन
वंदन, श्रृंगार 
स्वीकार कर पायेगी
शक्ति की शक्ति 
तुम्हें मिल जाएगी 

सभी के लिए नव संवत्सर और चैत्र नवरात्र मंगलमय हों

शनिवार, 13 मार्च 2010

फेरों का फेर

ये फेरे जन्म मरण के
लगाये तू जा रहा है
कोल्हू के बैल सा
चलता ही जा रहा है
कभी उनकी गली के फेरे
कभी मंडप के हैं फेरे
बस फेरों के फेर में
फिरता ही जा रहा है
कहीं रुसवाइयों के डेरे
कभी डॉक्टर है घेरे
कहीं मंदिर के हैं फेरे
इन फेरों के फेर में
फिरता ही जा रहा है
इक पल घुमा ले वापस
ज़रा ज़िन्दगी की पिक्चर
क्या खोया क्या पाया
इन फेरों के चक्कर में
पशुओं सा जीवन बस
बिता के जा रहा है
इन फेरों के फेर में
फिरता ही जा रहा है
कुछ पल तू ठहर जा
और आत्मज्योति जगा ले
किस मुख से जायेगा
कैसे नज़र मिलाएगा
कुछ अपने लिए भी कर ले
कुछ तो सुकून पा ले

अब फेरों के फेर से
मुक्त हो जा ओ प्यारे
कट जायेंगे सब तेरे
ये जन्म मरण के फेरे


शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

श्याम संग खेलें होली

कान्हा ओ कान्हा
कहाँ छुपा है श्याम सांवरिया
ढूँढ रही है राधा बावरिया
होली की धूम मची है
तुझको राधा खोज रही है
अबीर गुलाल लिए खडी है
तेरे लिए ही जोगन बनी है
माँ के आँचल में छुपा हुआ है
रंगों से क्यूँ डरा हुआ है
एक बार आ जा रे कन्हाई
तुझे दिखाएं अपनी रंगनायी
सखियाँ सारी ढूँढ रही हैं
रंग मलने को मचल रही हैं
कान्हा ओ कान्हा
कान्हा ओ कान्हा
तुझ बिन होली सूनी पड़ी है
श्याम रंग को तरस रही है
प्रीत का रंग आकर चढ़ा जा
श्याम रंग में सबको भिगो जा
प्रेम रस ऐसे छलका जा
राधा को मोहन बना जा
मोहन बन जाये राधा प्यारी
हिल मिल खेलें सखियाँ सारी
रंगों से सजाएँ मुखमंडल प्यारी
लाल रंग मुख पर लिपटाएँ
देख सुरतिया बलि बलि जायें
श्याम रंग यूँ निखर निखर जाये
श्यामल श्यामल सब हो जाये

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

ऐसा आखिर कब तक -----------अंतिम भाग

दीप्ति से अलग होने के बाद , उसे किये वादे की लाज रखने और उसके त्याग को सम्पूर्णता प्रदान करने के लिए तथा अपना बेटा होने का कर्त्तव्य पूरा करने के लिए आकाश ने अपनी सभी इच्छाओं की बलि चढाते हुए माता- पिता की पसंद की बहुत ही सुन्दर , रईस खानदान की अपनी ही जाति की लड़की रश्मि से शादी कर ली । वक़्त अपनी रफ़्तार से गुजरने लगा ---------आकाश अपनी तरफ से पुरजोर कोशिश करता कि किसी को भी उससे कोई शिकायत ना हो और अपना बेटा और पति होने के फ़र्ज़ को बखूबी निभा सके। उसने खुद को सबकी खुशियों के प्रति समर्पित कर दिया था अपने हर शौक अपनी हर इच्छा का गला तो उसी दिन घोंट दिया था जिस दिन दीप्ति से अलग हुआ था -----------उसकी आवाज़ जो उसकी सबसे बड़ी पहचान थी ना जाने कहाँ वक़्त की गर्दिशों में खो गयी थी यहाँ तक कि रश्मि को तो उसकी इस खूबी का पता भी ना था क्यूँकि उसने कभी आकाश के मन में झाँकने का प्रयास ही नही किया। इसी तरह २ साल निकल गए मगर रश्मि एक रईस खानदान की इकलौती लड़की थी। उसने जो ऐशो -आराम अपने घर देखे थे उसकी तुलना में आकाश तो कुछ भी ना था। मगर फिर भी किसी तरह २ साल उसने निकाल लिए मगर आखिर कब तक एक लगी बँधी तनख्वाह में वो गुजारा करती , कब तक अपनी इच्छाओं को मारती। और जब वो अपनी सहेलियों की ज़िन्दगी की तुलना खुद से करती तब तो वो तिलमिला उठती । धीरे- धीरे २ साल में उसके सब्र का घड़ा भर चुका था और अब उसने छलकना शुरू कर दिया था । अब रश्मि बात -बात पर आकाश को उलाहना देने लगी थी । उसे किसी ना किसी बहाने जलील करती कि इतने पैसों में क्या होता है, आमदनी बढ़ाने के लिए इंसान और भी हथकंडे अपनाता है मगर आकाश एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देता क्यूँकि वो बात बढ़ाना नही चाहता था । जब इसका असर नही दिखा तो रश्मि ने आकाश के माँ -बाप को कोसना शुरू कर दिया ------------उसे लगने लगा कि अगर इन दोनों का खर्च उसके सर से हट जाये तो वो उन पैसों से ज़िन्दगी की खुशियाँ खरीद सकती है। इसलिए वो आकाश पर अपने माँ -बाप से अलग होने का दबाब बनाने लगी । उसे लगा कि जो पैसा उन पर खर्च हो रहा है वो बच जायेगा। रोज- रोज की कलह से तंग आकर आकाश के माँ -बाप भी परेशान रहने लगे और उन्होंने आकाश को मजबूर किया कि वो उनसे अलग हो जाये ताकि उसका जीवन खुशहाल हो सके और वो भी बुढ़ापे में दो रोटी चैन की खा सकें। आकाश को मन मारकर अपने माँ- बाप की खुशहाली के लिए और घर में कुछ सुकून रह सके , अलग होना पड़ा मगर इसका नतीजा तो और भी उल्टा निकला। अब तो रश्मि पर किसी तरह का कोई अंकुश ना था । आकाश तो सारा दिन ऑफिस में होता और रश्मि अपने दोस्तों के साथ कभी पार्टी, कभी पिकनिक, कभी मूवी और कभी किट्टी पार्टी आदि में मशगूल रहने लगी। वो तो ऐसे ही जीवन की आदी थी इसलिए वो अब अपने मन के मुताबिक जीने लगी और उसने अब आकाश पर बिलकुल भी ध्यान देना बंद कर दिया । उसके लिए तो वो बस सिर्फ पैसा कमाने की मशीन था या कहो ऐसा बैंक था जिससे जब चाहे जितना चाहे रुपया निकाल सके । इससे आगे उसे आकाश से कोई मतलब ना होता। मगर आकाश को वो भी मंजूर था क्यूँकि वो चाहता था कि किसी भी तरह घर में शान्ति रहे मगर कुछ ही महीनो में रश्मि की आकांक्षाएं बुलंदियों को छूने लगीं। वो आकाश से दिन पर दिन अपना रहन - सहन का स्तर ऊँचा करने के लिए दबाब डालने लगी। उसे नाजायज तरीकों से पैसा कमाने के लिए उकसाने लगी मगर आकाश को ये तरीका पसंद ना था । वो तो सादा जीवन उच्च विचार के आदर्शों का पालन करने वाला इंसान था और रश्मि उससे बिलकुल उलट थी। आखिर कब तक दोनों की निभती। धीरे- धीरे अब सम्बन्ध और भी बिगड़ने लगे। और फिर एक दिन तो उसके सब्र का सारा बाँध ढह गया जब उसने रश्मि को अपने ही घर में नशे की हालत में धुत होकर उसके एक दोस्त की बाँहों में झूमते हुए देखा , वो पल उसकी ज़िन्दगी का सबसे बुरा पल था। जिस इज्ज़त , शान्ति और खुशहाली के लिए उसने इतने त्याग किये थे वो सब आज धुल -धूसरित हुए उसके आगे पड़े थे। बस उस दिन उन दोनों में इतनी ज्यादा तकरार हुई कि रश्मि घर छोड़कर अपने पिता के घर चली गयी। उस पल तो आकाश ने भी जाने दिया ,मगर जब अगले दिन गुस्सा शांत हुआ तो उसे मनाने उसके घर गया मगर वहाँ उसके पिता और रश्मि ने उसकी इतनी बेईज्ज़ती की कि वो उलटे पैर वापस आ गया। कुछ दिनों बाद आकाश ने फिर उसे मनाने की कोशिश की मगर वो नही मानी। अब रश्मि अपनी ज़िन्दगी से किसी भी प्रकार का कोई समझौता नही करना चाहती थी। अब जब आकाश और उसके माता- पिता भी अपनी तरफ से हर संभव कोशिश करके हार गए तब आकाश ने एक गंभीर निर्णय लिया। आकाश ने सोचा कि इस निर्णय से घबराकर शायद रश्मि वापस आ जाये इसलिए आकाश ने तलाक के कागजात रश्मि के पास भेजे। मगर परिणाम आकाश की सोच के विपरीत हुआ। रश्मि ने वापस आने की बजाय कोर्ट जाना पसंद किया। अब दोनों कोर्ट की तारीखों में घिसटने लगे और इसी जद्दोजहद में आकाश की ज़िन्दगी के पांच साल निकल गए। आकाश को हर रिश्ता सिर्फ स्वार्थपरक लगने लगा। उसे लगता कोई भी उसका अपना नही है सब उसे प्रयोग करना चाहते हैं। माँ बाप ने अपने प्यार , इज्जत और जाति की दुहाई दी और उसके प्रेम का बलिदान ले लिया मगर उसे क्या हासिल हुआ -------वो जिसे उसने जीवनसाथी बनाया वो कभी उसकी ना हुई , उसके लिए तो आकाश का कोई अस्तित्व ही ना था। इन सब बातों ने आकाश को अंधेरों के गर्त में धकेल दिया और जिन राहों को वो बुरा समझता था आज उन्ही राहों पर कदम उसे ले गए थे। अब वो अपना गम शराब की बोतलों में डुबाने की कोशिश करता क्यूँकि कुछ देर के लिए ही सही मगर वो इस मतलबी दुनिया से दूर हो जाता था और आज भी तलाक का इंतज़ार करते -करते जब उसे अगली तारीख मिली तो एक बार फिर उसने शराब का सहारा लिया और उसी हालत में दीप्ति को मिला।
इतन कहकर आकाश चुप हो गया। दीप्ति तो इतना सब सुनकर वैसे ही सुन्न हो गयी थी। उसे तो खुद समझ नही आ रहा था कि ये क्या हो गया है। कैसे आकाश को सांत्वना दे । मगर किसी तरह खुद को संभालकर उसने आकाश को समझाया और थोडा - बहुत खिलाया पिलाया। फिर दीप्ति ने पूछा कि तुम्हें तलाक अब तक क्यूँ नही मिला तो आकाश ने बताया कि रश्मि उससे बदला ले रही है इतने दिन की तड़प का , चाहती तो वो भी है मगर मुझे तड़पते देख उसे सुकून मिल रहा है इसलिए वो हर बार तारीख लेकर निकल जाती है जबकि आकाश को हर बार इस शहर में आना पड़ता है क्यूँकि रश्मि का मायका यहीं है और हर बार सिर्फ तारीख लेकर ही चला जाता है। बस इन्ही हालात ने उसे परेशान कर दिया है । उसकी ज़िन्दगी कोर्ट की सीढियां चढ़ने- उतरने में ही बर्बाद हो रही है और कोई हल नही मिल रहा क्यूँकि रश्मि को औरत होने का भी फायदा मिल रहा है कोर्ट की भी सारी सहानुभूति उसके साथ है।
अब दीप्ति ने आकाश को समझाया और कुछ दिनों की छुट्टी लेकर आकाश के साथ उसके शहर गयी। आज उसे ये शहर अपना होते हुए भी अजीब लग रहा था मगर किसी तरह दिल पर पत्थर रखकर वो आकाश के साथ उसके माता -पिता के पास गयी उनसे मिली । आज वो भी अपने किये पर शर्मिंदा थे। अब उन्हें भी अपनी गलती का अहसास हो गया था मगर अब पछताय होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत । अब जब उन्होंने अपने बेटे की ज़िन्दगी बर्बाद होते देखी तब उन्हें समझ आया कि जाति -बिरादरी कोई काम नही आता और जहाँ प्रेम हो वहां इन सबकी कोई जरूरत नही होती । सिर्फ अपने उसूलों की वजह से आज उन्होंने तीन जिंदगियां बर्बाद कर दी थीं। आज वो दीप्ति के आगे खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहे थे। आज वो तहेदिल से चाहते थे कि आकाश और दीप्ति एक हो जायें मगर आज उनके बीच था आज का कानून। साल पर साल निकल रहे थे मगर आकाश और रश्मि का अभी तलाक नही हुआ था। आकाश और दीप्ति का प्रेम एक बार जाति -पांति के चक्कर में बलिदान हुआ था और अब कानून के चक्रव्यूह में फँसा अपने भविष्य की बाट जोह रहा था। कब तक हमारा समाज इन बेड़ियों में जकड़ा रहेगा और मासूमों की ज़िंदगियाँ बर्बाद करता रहेगा। कब तक कानून की जटिल प्रक्रियाएं मानव मन को खोखला करती रहेगी और वो बेबस , असहाय -सा निरीह पशु की भाँति कानून के शिकंजे में फँसा बर्बाद होता रहेगा। ऐसा आखिर कब तक????????????

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

ऐसा आखिर कब तक ?

गतांक से आगे ..................

जैसे ही आकाश ने अपने घर में दीप्ति के बारे में बताया तो उसके माता- पिता बहुत खुश हुए। वो तो कब से इस दिन का इंतज़ार कर रहे थे इसलिए उसी दिन रिश्ता लेकर दीप्ति के घरवालों के पास गए मगर वहाँ जब पता चला कि दीप्ति छोटी जाति की है और आकाश राजपूत तो आकाश के माता -पिता उलटे पैर वापस आ गए । उन्हें अपने से छोटी जाति की लड़की से अपने बेटे का विवाह मंजूर ना था। आकाश ने लाख समझाया ,अपने प्यार की दुहाई दी मगर उसके माता -पिता अपनी बात से टस से मस ना हुये । उन्हें अपने समाज , अपनी बिरादरी सब से ऊपर लगती थी और अपनी इज्ज़त की खातिर उन्होंने आकाश का दिल तोडना उचित समझा क्यूँकि वो समझते थे कि प्यार- व्यार कुछ नही होता महज शारीरिक आकर्षण है जो दूसरी जगह शादी होने के बाद अपने आप खत्म हो जायेगा और वो ये सब कुछ भूल जायेगा। आकाश की सबसे बड़ी विडंबना यही थी कि वो अपने माता- पिता की इकलौती संतान था इसलिए उसका फ़र्ज़ भी बनता था कि कुछ भी ऐसा ना करे जिससे उनका दिल दुखे क्यूँकि उन्होंने उसे बहुत ही लाड -प्यार से पाला था तो क्या वो सिर्फ अपने स्वार्थ की खातिर अपने माता- पिता को दुखी कर दे और इस कारण उन्हें छोड़ भी नही सकता था और दीप्ति के बिना रह भी नही सकता था । उसने अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश की मगर नतीजा शून्य ही रहा और इसी जद्दोजहद में २ साल निकल गए । उधर दीप्ति भी बहुत दुखी थी मगर वो सिवाय इंतज़ार के कर भी क्या सकती थी. इधर जब २ साल निकल गए और कोई हल ना निकला समस्या का तब एक दिन आकाश के माता -पिता ने दीप्ति को बुलाया क्यूँकि उन्हें लगता था कि दीप्ति के कारण ही उनका बेटा शादी नही कर रहा है इसलिए यदि वो ही उसे कहेगी तभी आकाश शादी के लिए राजी होगा इसलिए उन्होंने दीप्ति पर अपने प्यार,त्याग और तपस्या की दुहाई देकर दबाब बनाया कि आकाश उनकी इकलौती संतान है और उसकी खुशियाँ देखने के लिए ही तो वो जिंदा हैं इसलिए अगर दीप्ति कहे तो आकाश मान जायेगा और दूसरी जगह शादी कर लेगा । बहुत गहरा धक्का लगा था दीप्ति को उस दिन। एकदम आसमान से धरती पर आ गयी थी आंखों के आगे अँधेरा छा गया था मगर किसी तरह खुद को सँभाल कर और अपने आँसुओं को आँखों में ही दफ़न करके वो वहाँ से वापस आई। सारी रात रोती रही क्यूँकि उसे एक विश्वास था कि शायद कुछ दिन में आकाश के माँ -बाप का दिल पिघल जायेगा अपने बेटे की हालत देखकर तो मान जायेंगे मगर नतीजा कुछ नही निकला बल्कि उसे ही बलि की वेदी पर बिठा दिया गया कितना स्वार्थमय है ये संसार । किसी के अरमानो की चिता जलाकर हाथ सेंकना ही आता है शायद सबको मगर फिर आकाश के बारे में सोचकर , उसकी जिम्मेदारियों , कर्तव्यों के बारे में सोचकर उसने आकाश को समझाने के फैसला लिया क्यूँकि उसने सोचा यदि वो खुश नही रह सकती तो कम से कम किसी को तो ख़ुशी के कुछ पल ही दे दे कम से कम कुछ और ज़िंदगियाँ बर्बाद होने से तो बच जाएँगी। अपने प्यार की दुहाई देकर किसी तरह दीप्ति ने आकाश को मना लिया और दोनों ने एक -दूसरे से एक अच्छे दोस्त की तरह विदा ली। दीप्ति को सुकून था कि चलो उसे आकाश तो नही मिला मगर उसका प्रेम तो हमेशा उसका ही रहेगा और वो ही उसके जीवन का सबसे अनमोल तोहफा होगा तथा आकाश और उसके माता- पिता एक खुशहाल जीवन तो जी सकेंगे। चाहे उसकी मोहब्बत को मुकाम नही मिला मगर सुकून तो मिला। इस प्रकार दीप्ति ने खुद को तसल्ली देकर कभी विवाह ना करने का फैसला कर लिया और अपना ट्रान्सफर उस शहर से दूसरे शहर में करवा लिया और उस दिन के बाद आज आकाश को इस हालत में अपने शहर में भटकते पाया तो उसका दिल दहल गया । उसे समझ ही ना आया कि ऐसा क्या हो गया आकाश के साथ जो उसकी ये हालत हो गयी थी क्या इसी दिन के लिए उसने अपनी मोहब्बत कुर्बान की थी ।अब उसे सुबह का इंतज़ार था जब आकाश उठे तो उससे जाने उसके अतीत के बारे में ।
अगले दिन सुबह जब आकाश उठा तो उसने अपने आप को एक अजनबी घर में बिस्तर पर लेटा पाया तो हडबडाकर उठ बैठा। उसे समझ नही आ रहा था कि वो कहाँ है तभी दीप्ति हाथ में चाय की ट्रे लेकर कमरे में दाखिल हुई और जैसे ही आकाश ने दीप्ति को देखा तो उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही ना हुआ । उसे लगा कि वो कोई सपना देख रहा है मगर जब दीप्ति ने आकाश का हाल पूछा तो उसे यकीन आया कि जो सामने है वो भी हकीकत ही है । थोड़ी देर के लिए दोनों के बीच ख़ामोशी पसर गयी। मगर इस बार दीप्ति ने ख़ामोशी को तोडा और आकाश से उसके बारे में पूछा । उसका ये हाल कैसे हुआ सब जानना चाहती थी दीप्ति । सारी रात उसने इसी उधेड़बुन में काटी थी मगर जैसे ही दीप्ति ने ये प्रश्न किया आकाश तिलमिला उठा जैसे जलते हुए तवे पर उसका पाँव पड़ गया हो सारे जहान का दर्द उसके चेहरे पर उतर आया था । ना जाने कौन सी पीड़ा समेटे था कि दीप्ति के पूछने पर वो एकदम फूट -फूटकर रोने लगा । दीप्ति के लिए ये एक अप्रत्याशित घटना थी । वो चेहरा जिसे उसने हमेशा हँसता -खिलखिलाता, जीवन की उमंगों से भरपूर देखा था वो आज उसके आगे रो रहा था । दीप्ति से बर्दाश्त नही हो रहा था मगर क्या करती किस तरह उसे सांत्वना दे उसे समझ नही आ रहा था । जब आकाश रोने के बाद कुछ हल्का हुआ तो उसने बताना शुरू किया ---------------क्रमशः .........................


मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

ऐसा आखिर कब तक?

यूँ लगा दहकता अंगारा सीने पर रख दिया हो किसी ने ---------जैसे ही दीप्ति ने आकाश को देखा । ये क्या हाल हो गया था आकाश का ? वो तो ऐसा ना था । आज ५ बरस बाद जब उसने आकाश को देखा तो ज़िन्दगी के बीते लम्हे सामने आ खड़े हुए ।

दीप्ति ने आकाश को उठाया और अपने साथ अपने घर ले गयी । उसे दवाई देकर सुला दिया और खुद अतीत की गलियों में विचरने लगी । उसे याद है आज भी जब आकाश उसकी ज़िन्दगी में आया था ।
हँसता मुस्कुराता जिंदादिल इंसान था आकाश । हर कोई उसके साथ के लिए तरसता था । हर महफ़िल की जान हुआ करता था । सबसे बड़ी चीज उसकी शख्सियत की ----------उसकी आवाज़ ------जब वो गाता था तो यूँ लगता जैसे सावन की रिमझिम फुहार पड़ रही हों ----------सारा आलम उस पल रुक जाता था । हर कोई मंत्रमुग्ध सा उसकी आवाज़ सुनता और उसी में खो जाता । गाना कब ख़त्म होता किसी को पता ही नही चलता जब तक कि खुद वो इस बात का बोध ना कराता । ऐसे ही एक महफ़िल में दीप्ति की मुलाक़ात आकाश से हुई थी और आकाश की आवाज़ सुनते ही दीप्ति को यूँ लगा जैसे दूर पहाड़ों की वादियों से कोई उसे आवाज़ दे रहा हो , जैसे ना जाने कितने जलतरंग एक साथ बज रहे हों ।आकाश की आवाज़ ने उसका तन मन भिगो दिया था और वो उसकी गहराइयों में डूबती चली गयी। उस दिन दीप्ति आकाश की आवाज़ को अपना दिल दे आई थी ।
दीप्ति एक ऑफिस में कार्यरत साधारण रूप रंग वाली मध्यमवर्गीय लड़की थी । उसकी कोई बहुत ऊँची आकांक्षायें नही थी । बस उसमें आकर्षण था तो सिर्फ एक ---------उसकी आँखें । आँखें क्या थी जैसे ज़िन्दगी वहीँ बसती हो । ऐसी नशीली स्वप्निल आँखें थी कि जो एक बार देख लेता तो भूल नही सकता था । बस सिर्फ यही एक उसके अस्तित्व की सबसे बड़ी पहचान थी बाकी सब उसमें साधारण ही था।
उसके पिता भी नौकरीपेशा इंसान थे और एक भाई और एक बहन की शादी होचुकी थी और वो उनकी तीसरी संतान थी। एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार की साधारण सी लड़की थी इसलिए किसी भी तरह के अरमानो को अपनी ज़िन्दगी में जगह नही देती थी । उसे अपनी सीमा पता थी। मगर जिस दिन से आकाश की आवाज़ सुनी थी , सारी बंदिशें , सारी सीमाएं ना जाने कहाँ लुप्त हो गयी थी। अब तो उसे हर जगह सिर्फ आकाश की आवाज़ सुनने की इच्छा होती और वो चाहती किसी तरह एक बार फिर वो ही आवाज़ सुनने को मिले। एक अजीब सी बेचैनी, एक तड़प ना जाने कब चुपके से दिल में घर कर गयी थी ।
उधर आकाश यूँ तो ना जाने रोज कितनी ही लड़कियों से मिलता था । एक से बढ़कर एक सुन्दर होती मगर जिस दिन से उसने दीप्ति को देखा उसकी आँखों की शोखी में अपना सब कुछ लुटा बैठा था ।दिन का चैन रात की नींद , सब ना जाने कहाँ उड़नछू हो गए थे । ना जाने कौन सा जादू था उन आँखों में कि उसे हर पल अपने आस -पास उन्ही निगाहों की मौजूदगी का अहसास होता। यूँ तो आकाश पेशे से इंजिनियर था । घर में माँ, बाप की इकलौती संतान होने के कारण उनकी आँखों का तारा था । किसी बात की ज़िन्दगी में कोई कमी ना थी। बस कमी थी तो इतनी कि कोई अच्छी सी लड़की जीवनसाथी बन उसकी ज़िन्दगी में आ जाती।
इधर जबसे उसने दीप्ति को देखा था अपना दिल अपना चैन सब उसकी निगाहों पर लुटा बैठा था। ना जाने कैसी कशिश थी उन आँखों में जिनसे वो खुद को आज़ाद नही कर पा रहा था इसलिए एक दिन उसने पता लगाने की कोशिश की कि वो थी कौन? इसके लिए उसने अपने उसी दोस्त को कहा जिसने उसे महफ़िल में बुलाया था । वो पार्टी आकाश के दोस्त समीर ने दी थी इसलिए उसने समीर से दीप्ति के बारे में जानना चाहा तो पता चला कि वो तो समीर की दूर के रिश्ते की बहन है । बस इतना ही काफी था आकाश के लिए। किसी तरह उसने समीर को उससे मिलने के लिए मनाया और फिर एक दिन योजना के मुताबिक वो समीर के साथ दीप्ति के ऑफिस के नीचे पहुँच गया और वहां जब दीप्ति आई तो समीर ने उन दोनों का परिचय करवाया और चला गया क्यूँकि वो जानता था कि आकाश के साथ दीप्ति को छोड़ने में कोई बुराई नही है । आकाश एक समझदार इंसान है वो कोई ऐसी बात नही करेगा जो उसकी सीमा से बाहर हो ।
अब आकाश और दीप्ति आमने -सामने थे । दोनों की चिर- प्रतीक्षित अभिलाषा आज पूर्ण हो गयी थी । दोनों ही एक दूसरे से मिलना चाहते थे मगर आज जुबान साथ छोड़ गयी थी । काफी देर दोनों के बीच यूँ ही मौन पसरा रहा । आकाश तो वैसे भी दीप्ति को देखते ही उसकी आँखों के जादुई आकर्षण में खो गया था । अब उसे अपना होश कहाँ था और दीप्ति वो तो अभी तक इस आश्चर्य से बाहर ही नही आ पा रही थी कि आकाश उसके सामने खड़ा है । उसने तो स्वप्न में भी नही सोचा था कि इस तरह अचानक आकाश से यूँ मुलाक़ात होगी। काफी देर दोनों यूँ ही जडवत से एक दूसरे को देखते रहे। फिर जब काफी देर बाद उन्हें अपनी स्थिति का आभास हुआ तो दोनों साथ- लगे। सबसे पहले आकाश ने बात शुरू की और जैसा कि उसकी आदत थी कभी भी खामोश ना रहना और हँसते हँसाते रहना वो यहाँ भी बदस्तूर जारी था और दीप्ति सिर्फ 'हाँ' 'हूँ' में जवाब देती उसकी हर अदा पर फ़िदा होती जा रही थी। नारी मन की कोमल भावनाएं वो इतनी जल्दी किसी को दिखा भी नहीं सकती थी और ना ही किसी को बता सकती थी। बस इसी प्रकार धीरे -धीरे दोनों का मिलना जारी रहा । एक दूसरे को अच्छी तरह जान चुके थे दोनों और प्रेम का इज़हार भी हो चुका था । बस अब तो सिर्फ शहनाई बजनी बाकी रह गयी थी मगर नियति को तो कुछ और ही मंजूर था।

क्रमशः .......................

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

भाव सुमन

आनन्द ही आनन्द समाया है
सतगुरु तुम्हारे चरणों में
अनमोल वचन अब पाया है
सतगुरु तुम्हारी वाणी में
आनन्द ही आनन्द .......................

मैं कैसे भुला दूँ नेह तेरा
तुमने ही मुझे अपनाया है
दुनिया ने मुझे ठुकराया है
सतगुरु ने ज्ञान जगाया है
आनन्द ही आनन्द ........................

मैं दीन- हीन हूँ अज्ञानी
तुम हो चराचर के स्वामी
मुझे मुझसे आज मिलाया है
वो दिव्य रूप दिखलाया है
आनन्द ही आनन्द ..........................

मैं माया बीच भटकती हूँ
माया के हाथों ठगती हूँ
सतगुरु ने दीप जलाया है
वो आत्मज्ञान जगाया है
आनन्द ही आनन्द . ...........................

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

मैं तेरी हो जाऊँ

कान्हा
प्रेम तेरा
वासंतिक हो जाये
ह्रदय- सुमन
मेरा खिल जाये
प्रेम पुष्पित
पल्लवित हो जाये
भक्ति की सरसों
मन में लहराए
पीत रंग
हर अंग समाये
जीव ब्रह्म
धानी हो जाये
द्वि का हर
परदा हट जाये
चूनर मेरी
श्यामल हो जाये
श्याम -श्याम
करते -करते
श्यामल -श्यामल
मैं हो जाऊं
श्याम रस पीते- पीते
मैं भी रसानंद हो जाऊं
श्याम खाऊँ
श्याम पियूँ
श्याम हँसूँ
श्याम रोऊँ
श्याम- श्याम
करते -करते
श्याम ही हो जाऊं
कान्हा मैं
तेरी हो जाऊँ
कान्हा मैं
तेरी हो जाऊँ