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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

कृष्ण लीला .........भाग 43




एक दिन बलरामजी घर पर रहे
और कान्हा गोपों संग गौ चराने गए 
वन में चरते चरते गौ छिटक गयीं
ग्वालबाल कान्हा से विलग हो 
गायों को ढूँढने निकले 
और अति व्याकुल हो 
गौओं संग यमुना का जल पीया
होनहार वश ना उन्हें
यमुना के विषैले जल का याद रहा
पीते ही सब प्राणहीन हुए
जब काफी देर तक
ग्वाल बाल नहीं आये
तब उन्हें ढूँढने 
कान्हा निकल पड़े
यमुना तट पर ग्वालों सहित
गौओं को मृत पाया
पर अपनी दिव्य अमृत दृष्टि से
उन्हें जिलाया 
इस तरह जब सब उठ खड़े हुए
जैसे नींद से जगे हों
जब सारा कारण जाना
तब कान्हा से लिपट गए
तुम ही हमारे खिवैया हो
तुमने प्राण बचाए हैं
हम तुम पर जीवन हारे हैं
ब्रज में आकर सबको हाल बताया है 
ये सुन मैया बाबा प्रसन्न हुए
इधर कान्हा ने सोचा
कालिया का यमुना में रहना ठीक नहीं
जो भी जल पीता था
मर जाता था 
उस नाग के विष की ज्वाला से
चार कोस तक जल खौलता रहता था
कोई पशु पक्षी ना 
वहाँ जा पाता था 
कोई धोखे से जाता भी था
तो जीवित ना बच पाता था
इसे यहाँ से हटाना होगा
काली नाग के रहने से
यमुना को भी दोष लगता है
वहाँ पर ना कोई वृक्ष 
घास फूस उगती है
बस एक कदम्ब का वृक्ष ही
वहाँ अविनाशी दिखता था 
ये सुनकर परीक्षित ने पूछा
ऐसा क्या कारण हुआ
जो ना उस वृक्ष का नाश हुआ
सुन शुकदेव जी बताने लगे
किसी युग में गरुड़ जी 
अपने मुख में अमृत ले
उस वृक्ष पर आ बैठे थे
सो एक बूँद वृक्ष पर 
गिर पड़ी थी
इसलिए ही तो वृक्ष हरा रहता है
कालिया का विष ना उसमे
प्रवेश कर सकता था 



जब श्याम सुन्दर ने यमुना को
कालिय नाग से मुक्त करने का निश्चय किया
तब प्रभु प्रेरणा से नारद जी ने
कंस के महल का रुख किया
राजन क्यों उदास बैठे हो ?
नारद जी ने पूछ लिया
हाथ जोड़ कंस ने अपना हाल बयां किया
नन्द के दो बेटा बड़े बलशाली हैं
उन्होंने मेरे कई राक्षस मार डाले हैं
लगता है वो ही मेरे 
प्राण लेने वाले हैं 
तब नारद जी ने इक उपाय बताया
और प्रभु का भी काज बनाया 
तुम नन्द जी से कालीदह से 
कमल पुष्प मंगवा  लेना
जब लेने वो बालक जायेगा
कालीदंश से मर जायेगा
इतना कह नारद जी चले गए 
और कंस ने संदेसा भिजवाया है
एक करोड़ कमल के फूल 
कालीदह से मँगा कर भेजो
अन्यथा घर बार लूटा जायेगा
ब्रज से सबको निकाला जायेगा
तुम्हारे बेटों को बंदी बनाया जायेगा


क्रमशः ...........

बुधवार, 28 मार्च 2012

.कृष्ण लीला ......भाग 42




आठवें वर्ष में कन्हैया ने
शुभ मुहूर्त में दान दक्षिणा कर
वन में गौ चराने जाना शुरू किया
मैया ने कान्हा को 
बलराम जी और गोपों के 
सुपुर्द किया
वन की छटा बड़ी निराली थी
सुन्दर पक्षी चहचहाते थे
हिरन कुलाचें भरते थे
शीतल मंद सुगंध 
समीर बहती थी
वृक्ष फल फूलों से लदे खड़े थे 
आज मनमोहन को देख
सभी प्रफुल्लित हुए थे 
वहाँ कान्हा नई- नई 
लीलाएं करते थे
गौ चरने छोड़ देते
और खुद ग्वालों के संग
विविध क्रीडा करते थे

कभी मुरली की मधुर तान छेड़ देते थे 
जिसे सुन पशु - पक्षी स्तब्ध रह जाते थे 
यमुना का जल स्थिर हो जाता था
कभी मधुर स्वर में संगीत अलापा करते थे
कभी पक्षियों की बोलियाँ निकाला करते थे
कभी मेघ सम गंभीर वाणी से
गौओं को नाम ले पुकारा करते थे
कभी ठुमक- ठुमक कर नाचा करते थे
और मयूर के नृत्य को भी 
उपहासास्पद बनाया करते थे
कभी खेलते खेलते थक कर
किसी गोप की गोद में 
सो जाया करते थे
कभी ताल ठोंककर 
एक दूजे से कुश्ती लड़ते थे
कभी ग्वाल बालों की 
कुश्ती कराया करते थे
और दोनों भाई मिल 
वाह- वाही दिया करते थे 
जो सर्वशक्तिमान सच्चिदानंद 
सर्वव्यापक था
वो ग्रामीणों संग ग्रामीण बन खेला करता था
जिसका पार योगी भी 
ध्यान में ना पाते थे
वो आज गोपों के संग
बालसुलभ लीलाएं करते थे
फिर किसमे सामर्थ्य है जो 
उनकी लीला महिमा का वर्णन करे 

इक दिन गौ चराते दोनों भाई 
अलग- अलग वन में गए
तब श्रीदामा बलराम से बोल उठा
भाई यहाँ से थोड़ी दूर
इक ताड़ का वन है 
जिसमे बहुत मीठे फल लगा करते हैं
वहाँ भांति- भांति के वृक्ष लगे खड़े हैं
पर वहाँ तक हम पहुँच नहीं पाते हैं
धेनुक नामक दैत्य गर्दभ रूप में
वहाँ निवास करता है 
जो किसी को भी उसके
मीठे फल ना खाने देता है
ये सुन बलराम जी वहाँ पहुँच गए
और एक वृक्ष को हिला
सारे फल गिरा दिए
जैसे ही फल गिरने की आवाज़ सुनी
दैत्य दौड़ा आया और
बलराम जी पर वार किया
बलराम जी ने उसकी 
टांग पकड़ पटक दिया
बलराम जी को दुलत्तियाँ मारने लगा
तब बलराम जी ने उसे वृक्ष पर
मार उसका प्राणांत किया 
ये देख उसके दूसरे साथी दौड़े आये
पर बलराम जी के आगे 
कोई ना टिक पाए
ये देख देवताओं ने 
पुष्प बरसाए

जब मोहन बलराम और ग्वालों संग
गोधुली वेला में वापस आते हैं
ये मधुर वेश कान्हा के 
हर दिल को भाते हैं
संध्या समय ब्रज में प्रवेश करते हैं
घुंघराली अलकों पर धूल पड़ी होती है
सिर पर मोर पंख का 
मुकुट शोभा देता है 
बालों में सुन्दर सुन्दर 
जंगली पुष्प लगे हैं 
जो मोहन की सुन्दरता से
शोभित होते हैं
मधुर नेत्रों की चितवन 
मुख पर मुस्कान ओढ़े 
अधरों पर बंसी सुशोभित होती
मंद मंद गति से 
मुरली बजाते जब 
श्याम ब्रज में प्रवेश करते हैं
तब दिन भर विरह अगन से 
तप्त गोपियों के ह्रदयो को
मधुर मतवारी चितवन से 
तृप्त करते हैं 
गोपियाँ अपने नेत्र रुपी 
भ्रमरों से 
प्रभु के मुखारविंद के 
मकरंद रस का पान कर 
जीवन सफल बनाती हैं 
और प्रभु के ध्यान में 
चित्र लिखी सी खडी रह जाती हैं 
यशोदा रोहिणी तेल उबटन लगा
उन्हें स्नान करती हैं
फिर भांति भांति के भोज करा
सुन्दर शैया पर सुलाती हैं 
इसी प्रकार कान्हा 
रोज दिव्य लीलाएं करते हैं 
ग्वाल बाल गोपियों और ब्रजवासियों को
जो वैकुण्ठ में भी सुलभ नहीं
वो सुख देते हैं 

क्रमशः .........

सोमवार, 19 मार्च 2012

कृष्ण लीला ..........भाग 41






जो बछड़े जंगल में थे चरने गए
उन्हें ब्रह्मा ने अपनी माया से लिया छुपा 
जब बहुत देर हुई और बछड़े नहीं आये
तब ग्वाल बाल घबराये
तब कान्हा ने धैर्य बंधाया
और उन्हें रोक खुद 
ढूँढने का उपक्रम किया 
जंगल में बछड़े नहीं पाए 
तब कान्हा वहीँ लौट आये 
आकर देखा तो 
सारे ग्वाल बालों को भी
वहाँ नहीं पाया 
तब उन्हें जोर से आवाज़ लगाया है
पर जब ना बछड़े और ग्वालों को पाया है
तब अंतर्यामी भगवान ने ध्यान लगाया है
और ब्रह्मा द्वारा अपहृत 
ग्वालबाल और बछड़ों का
हाल जाना है
प्रभु समझ गए ये ब्रह्मा की 
बुद्धि मेरी माया ने हर ली है
चाहूँ तो अभी सभी को
वापस ला सकता हूँ
मगर इससे ना ब्रह्मा का
भरम टूटेगा
ये सोच कान्हा ने 
ग्वाल बाल और बछड़ों का रूप धरा
जितने ग्वाल- बाल और बछड़े थे
उतने ही कान्हा ने रूप धरे थे
ये भेद ना किसी ने पाया था
जो -जो जिस- जिस 
गुण- स्वभाव और आकार का था 
जैसे श्रृंगार करता था
जैसा बोला करता था
जैसा आचार- व्यवहार करता था
प्रभु ने बिल्कुल वैसा ही रूप धरा था 
और शाम को ब्रज की ओर
प्रस्थान किया था
बांसुरी की  तान सुन
गोपों की माताएं दौड़ी आई थीं
और कृष्ण रूप ग्वाल को गले लगायी थीं
और वात्सल्य स्नेह सुधा बरसाई थी
अजब आनंद आज समाया था
जैसा पहले कभी नहीं आया था
गाय दूध ज्यादा देने लगी थीं
अपने बछड़ों से स्नेह 
ज्यादा करने लगी थीं 
माताएं भी अति आनंदित रहती थीं
ग्वाल बालों से कृष्ण सरीखा
प्रेम किया करती थीं
ये भेद कोई ना जान पाया था
कि हर रूप में 
कृष्ण ही तो समाया था
फिर कैसे ना हर्षातिरेक होता
और कैसे ना प्रभु सम प्रेम होता
ये देख बलराम जी चकराए थे
ये कैसी विचित्र बात नज़र आती है
हर ओर कृष्ण प्रेम की 
बयार बही जाती \ है
यह कैसी माया छाई है
दैवी है या दानवी 
जो मेरा स्नेह भी
कृष्ण सम इन ग्वालों और 
बछड़ों पर आया है
ये किसकी माया है
प्रभु की माया के सिवा
और कोई मोहित 
कर नहीं सकता
इतना विचार कर 
दिव्य दृष्टि से 
सब देख लिया
इधर ब्रह्मा जी वापस आये हैं
और प्रभु को ग्वाल बालों सहित
बृज में पाए हैं
ये देख ब्रह्मा चकराए हैं 
ग्वाल बालों को तो मैं
ब्रह्मलोक  छोड़ आया हूँ
फिर ये कैसे यहाँ आ गए
सोच ब्रह्मा जी ने ध्यान किया
पर पार ना कोई पाया है
कौन से असली और कौन से नकली
पता ना लग पाया है
अब ब्रह्मा भी चकराया है
और फिर ध्यान लगाया है
अब तक दीखते थे जो
बछड़े और ग्वाल बाल
उन सबमे कृष्ण का 
दर्शन पाया है
अपने भी कई रूप
प्रभु की पूजा करते देखे
ये देख ब्रह्मा जी घबराये हैं
आँखें खोल प्रभु के 
चरणों में शीश झुकाए हैं
प्रभु की सारी माया समझ गए
और अपनी करनी पर 
उन्हें ग्लानि होती है
प्रभु चरणों की वन्दना करते हैं
प्रभु की  यूँ तो होती हैं
चार परिक्रमा 
पर ब्रह्मा जी तीन करके
निकल गए
प्रभु के गुस्से से घबराये हैं
इधर प्रभु प्रेरणा से
जब ब्रह्मा जी 
ब्रह्मलोक में पहुंचे हैं
वहाँ द्वारपालों ने 
उन्हें रोक लिया
तब ब्रह्मा जी बोल उठे
आज तुम्हें क्या हो गया
मैं तुम्हारा स्वामी ब्रह्मा हूँ
पर उन्होंने ना ध्यान दिया
कर जोड़ कह दिया
हमारे ब्रह्मा तो अन्दर विराजते हैं
हम उनसे पूछकर आते हैं
ये सुन ब्रह्मा का दिमाग चकरा गया
ये कौन सा दूसरा ब्रह्मा आ गया
ये कैसी लीला चलती है
ब्रह्मा ने ध्यान लगाया है 
और अपनी गद्दी पर 
अपना वेश धरे 
प्रभु को बैठा पाया है
वहाँ प्रभु कह रहे हैं
देखा ब्रह्मा तुमने मुझ पर शक किया
आज तेरे घरवाले ही 
तुझ पर शक करते हैं 
जो प्रभु पर शक करते हैं
वो कहीं के नहीं रहते हैं 
ये देख ब्रह्मा ने कर जोड़ लिए
इधर पहरेदार आया है , कहा
तुम्हें अन्दर ब्रह्मा ने बुलाया है
जैसे ही ब्रह्मा जी ने प्रवेश किया
प्रभु ने ब्रज को प्रस्थान किया
इस तरह प्रभु ने ब्रह्मा का 
मोह भंग किया
इतना कह शुकदेव जी ने
पांचवें वर्ष की कथा का 
छटे वर्ष में कैसे
ग्वालबालों ने बतलाया 
वो रहस्य बतला दिया 
ये रूप प्रभु ने एक वर्ष तक धारण किया 
पर ये भेद किसी ने ना जाना
ये दिव्य लीला प्रभु की 
सिर्फ इतना बतलाती है 
अपने पालनहार को न बिसराना
बस प्रभु से ही अपने तार लगाना 
कब कौन सी लीला वो रच देंगे 
ये पार न कोई पाता है 
बस जो प्रभु की ऊंगली पकड़ 
चलता जाता है 
वो भव से आसानी से तर जाता है 

क्रमशः .........

शनिवार, 10 मार्च 2012

कृष्ण लीला .......40



ये सुन शुकदेव जी बोल उठे
भगवत प्रेमियों में तुम्हारा श्रेष्ठ स्थान है
उनमे तुम्हारा अनुराग भी महान है
तुम्हें प्रभु की लीलाएं 
नित्य नयी लगा करती हैं
तभी प्रभु चर्चा में तुम्हें आनंद आता है
यद्यपि ये लीला अत्यंत रहस्यमयी है
फिर भी इसके सभी 
राज़ तुम्हें सुनाता हूँ
जब अघासुर मारा गया तब
कन्हैया ग्वालबालों संग
यमुना किनारे गए
सबने मिल स्नान किया
और मंडलाकार पंक्ति बना
भोजन का आनंद लिया
कान्हा ने सबसे पहला ग्रास लिया
फिर सारे गोपों ने 
भोजन शुरू किया 
कभी कान्हा खुद खाते हैं 
कभी गोपों को खिलाते हैं
उन्हीं झूठे हाथों से 
सबको खिला 
परम सुख देते हैं
जिस सुख के लिए
ऋषि मुनि योगी भी तरसते हैं
आज वो सुख ये 
ग्वाल बाल लेते हैं
सबका भोजन करते हैं
कभी सबकी जूठन खाते हैं
ये देख- देख देवताओं के सिर चकराते हैं
जब सब भोजन करते थे
तब कान्हा का एक सखा छुपा बैठा था
वो बाल सखा बेहद गरीब था
खाने को उसके घर में
कुछ भी नहीं था
तीन दिन की बासी रखी 
खट्टी छाछ वो लाया था
और कैसे उसे खिलाऊँ 
सोच चकराया था
और वृक्ष की  ओट  में जा
छुपा  बैठा था 
और अश्रु बहा रहा था
आज मेरे मोहन ने कलेवा मंगाया था
और मैं निर्भाग्य इतना भी न कर सका
अपने प्यारे सखा को 
भोजन भी न अर्पित कर सका 
ये सोच- सोच सीने में उसके 
हूक उठ रही थी 
पर जिसे सारी दुनिया 
भुला देती है
उसी पर तो हमारे प्रभु की
कृपा बरसती है
जो किसी के काम का नहीं रहता है
वो ही तो प्रभु को सबसे प्यारा होता है
फिर कैसे न उसकी पुकार 
उन तक पहुँचती 
और कान्हा को उसकी याद आई थी
और "कहाँ है मनसुखा "
आवाज़ लगायी थी
तभी एक ग्वाल ने बतलाया
वो देखो पेड़ की ओट में 
छुपा बैठा है
और अपना भोजन खुद कर रहा है
इतना सुन कान्हा उसकी  तरफ चल पड़े 
उँगलियों में भोजन कण लगे थे
किसी में दही, किसी में चावल
किसी ऊँगली में कधी
किसी में माखन लगा था
पर मोहन का चित्त तो 
मनसुखा के भोजन में अटका था
इधर मनसुखा रोता जाता था
आज मेरे पास अपने कान्हा को
खिलाने को कुछ नहीं है
ये खट्टी छाछ तो 
उसे नहीं पिला सकता
ये सोच खुद ही घूँट भर रहा था 
जैसे ही आखिरी घूँट भरी
कान्हा ने जाकर उसकी गर्दन पकड़ी
क्यों रे मनसुखा सारा 
भोजन खुद कर लिया
और मुझे तो 
चखने को भी नहीं दिया
अब मनसुखा के मुँह में 
जितनी छाछ थी बस
वो ही बची थी
बाकी तो लोटे में 
ख़त्म हो चुकी थी
कान्हा ने उसकी गर्दन को दबाया
और उसके मुँह की छाछ को
अपने मुखे में पाया
जिसे पीकर कान्हा का मन हर्षाया
और वो बोल पड़े
अरे मनसुखा! तेरी छाछ तो बहुत मीठी है रे 
इतना स्वाद तो माँ यशोदा के
दूध में भी नहीं आया कभी 
इतना स्वाद तो 
शबरी के बेरों में भी ना पाया कभी 
इतना स्वाद तो विदुरानी के 
छिलकों में भी ना समाया था
और तू मुझे इससे 
बंचित रखता था
ये होती है प्रभु की महती कृपा 
सोचने वाली बात सिर्फ इतनी थी 
जैसे माँ बाप अपने बच्चों का
जूठा प्रसन्नता से खा लेते हैं
और तनिक भी भेदभाव नहीं करते हैं
वैसा ही दृश्य तो प्रभु ने 
पेश किया था
क्योंकि सभी उन्ही की तो संतान हैं
यूँ ही तो नहीं कहा जाता
"त्वमेव माता च पिता त्वमेव "
जब वो ही हमारे सर्वस्व हैं
तो उनमे हम में क्या भेद हुआ
जब आम इन्सान अपने बच्चे की जूठन खा
खुश हो सकता है 
तो फिर परमपिता क्यों नहीं ऐसा कर सकता है
पर मनुष्य बुद्धि इसके पार नहीं जा पाती है
ये परम भेद नहीं जान पाती है 
सिर्फ तेरे मेरे झूठ सच में ही 
उलझती जाती है 
मोह माया के गंदले सलिल में
धंसती जाती है 
पर प्रभु का पार न कोई पाती है 

इस दृश्य को देख
ब्रह्मा का मन भटका था
ब्रह्मा तो मोहित हो गए
ये कैसे भगवान है 
जो सबकी जूठन खाते हैं
ये तो भगवान नहीं हो सकते
अगर भगवान  हैं तो
परीक्षा लेनी होगी 
सोच ब्रह्मा ने एक माया रची

क्रमशः .........

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

कृष्ण लीला.......... भाग 39



इक दिन कान्हा कलेवा बांधे 
समस्त अंगों पर सुन्दर चित्रकारी किये
फूलों के गहने पहन
पशु पक्षियों की बोली बोलते
ग्वाल बालों संग
बछड़े चराने गए
सभी बालोचित क्रीड़ायें करने लगे
श्याम सुन्दर संग मनोहारी
खेल खेलने लगे
और आनंद मग्न होने लगे
तभी कंस का भेजा
अघासुर नामक दैत्य 
अजगर रूप बनाकर आया है
और राह में पर्वताकार रूप 
रख बैठ गया है
ग्वाल मंडली जब वहाँ पहुंची है
तब उसे देख यूँ बोली है
ये कौन सा पर्वत है
अब से पहले तो नहीं देखा
ये तो अजगर समान लगता है
तो दूसरा बोला
सूर्य किरण से बादल लाल हो गए हैं
मानो किसी अजगर का ऊपरी होंठ हो 
और जो बादलों की परछाईं
धरा पर पड़ती है
मानो वो इसका निचला होंठ हों
तभी तीसरा बोल पड़ा
ये दायीं और बायीं ओर की 
गिरी कंदराएं अजगर के
जबड़े जैसी लगती हैं
और ऊंची- ऊंची शिखर पंक्तियाँ
इसकी दाढें लगती  हैं
चौथा बोला 
ये लम्बी चौड़ी सड़क तो
अजगर की जीभ सरीखी लगती है
और गिरी शिखरों के बीच का अन्धकार
इसके मुख का भीतरी भाग लगता है 
तभी इक ग्वाल बाल बोल पड़ा
देखो - देखो इधर 
जंगल में आग लगी है
तभी तीखी और गरम हवा चली है
मानो कोई अजगर 
गरम- गरम सांस छोड़ रहा हो
तभी इक ग्वाल बाल बोल उठा
चलो आगे बढ़कर देखा जाये
इस गिरी कन्दरा में घुसा जाये
हमें किसी का क्या डर
जब हमारा कान्हा है हमारे संग
गर कोई राक्षस हुआ भी तो
बकासुर सम नष्ट हो जायेगा
कान्हा के हाथों मारा जायेगा
इतना कह ग्वाल बाल
उसके मुख में प्रवेश करते गए
इधर कृष्ण उनकी बात सुन सोचते रहे
इन्हें रोकना होगा
ये तो सर्प को रस्सी समझ रहे हैं
मगर जब तक रोकते
उससे पहले तो ग्वाल बाल
उसके मुख में प्रवेश कर गए


अघासुर और कोई नहीं
बकासुर और पूतना का भाई था
कान्हा से बदला लेने आया था
उसने अपना मुख ना बंद किया
जब तक कृष्ण ने ना प्रवेश किया
जैसे ही प्रभु ने अन्दर प्रवेश किया
अघासुर ने अपना मुख बंद किया
ये दृश्य देख देवता घबरा गए
हाय -हाय का उच्चारण करने लगे
जब भगवान ने देखा
मेरे भक्त परेशान हुए
तब उसके जबड़े में अपने 
शरीर का विस्तार किया
और अघासुर की श्वासों को बंद किया
उसकी आँखें उलट गयीं
व्याकुल हो छटपटा गया
और ब्रह्मरंध्र को फोड़ प्राणांत किया
उसकी दिव्य ज्योति प्रभु में समा गयी
ये देख देवता सब हर्षित हुए
कर जोड़ प्रभु की स्तुति करने लगे
प्रभु ने ग्वाल बाल सब जिला दिए
प्रभु का गुणगान होने लगा 
आकाश में दुदुभी नगाड़े बजने लगे
अप्सराएं नृत्य करने लगीं
मंगलमय वाद्य बजने लगे
जय जयकार की मंगलध्वनि
ब्रह्मलोक तक पहुँच गयी
तब ब्रह्मा जी ने वह ध्वनि सुनी
और आकर अद्भुत दृश्य देखा
और उनका मन भी 
प्रभु माया से मोहित हो गया

जब अजगर का वो शरीर सूख गया
ग्वाल बालों का वो क्रीड़ास्थल बना
मगर ये लीला ठाकुर ने 
पांचवें वर्ष में की 
जिसका वर्णन ब्रज वासियों को
ग्वालबालों ने छठे वर्ष में किया
ये सुन परीक्षित ने 
शुकदेव जी से पूछ लिया
गुरुदेव ये कैसे संभव हुआ
एक समय की  लीला का वर्णन
दूसरे समय में भी वर्तमानकालीन रहे 
अवश्य इसमें जरूर प्रभु की 
कोई महालीला होगी
कृपा कर गुरुदेव वो सुनाइए
प्रभु की  दिव्य लीलाओं का पान कराइए 


क्रमशः ..........

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

कृष्ण लीला ........भाग 38




इक दिन जब मोहन ने 
राधा जी के कहने पर 
दूध दुहा था
और राधा जी ने जाने का 
उपक्रम किया था 
तब मोहन ने अपनी
चित्ताकर्षक मुस्कान की मोहिनी
राधा पर डाली है
रास्ते में सखियों ने 
जैसे ही मोहन का नाम लिया 
राधा के हाथ से 
दूध का बर्तन छूट गया 
अचेत होते सिर्फ
यह ही शब्द 
अधरों पर आया है
मुझे काले साँप ने काटा है
इतना सुन सखियाँ 
 घर पर ले आयीं
और कीर्ति जी को
राधा की व्यथा बतलाई
जिसे सुन मैया बहुत घबरायी 
और झाड फूंक करवाई 
पर राधा  प्यारी को 
आराम ना आता 
मंत्र यन्त्र भी बेकार हुआ जाता 
जो सखी राधा की प्रीत पहचानती थी 
उसने उपाय बतलाया 
नन्द लाल का बेटा 
साँप काटे का मंत्र जानता है
इतना सुन कीर्ति को याद आ गया
जो राधा ने बतलाया था
वो दौड़ी- दौड़ी यशोदा के पास गयी
हाथ जोड़ विनती करने लगी
श्याम सुन्दर को साथ भेज देना
राधा का जीवन बचा लेना
सुन मैया बोल उठी
मेरा लाला तो बालक है
वो झाड़ फूंक क्या जाने
किसी नीम हकीम को दिखलाओ
अच्छे से राधा का इलाज करवाओ
तब कीर्ति ने सारा किस्सा बयां किया
कैसे मनमोहन ने एक गोपी को बचा लिया

ललिता जी जो दोनों की 
प्रीत पहचानती थीं
किस साँप ने काटा था
सब जानती थीं
जाकर चुपके से 
नंदलाल से कहा
जिसकी तुमने गौ दूही थी
वो अचेत पड़ी है
बस तुम्हारे नाम पर
आँखें खोल रही है
कोई मन्त्र यन्त्र ना काम करता है
तुम्हारे श्याम रंग रुपी 
सांप ने उसे डंसा है
ये विष लहर ना
किसी तरह उतर पाती है
राधा को रह - रहकर
तुम्हारी याद सताती है
विरह अग्नि में जल रही है
अपनी चंद्रमुखी शीतलता से
उसकी अगन शीतल करो
यदि सच में भुजंग ने डंसा हो 
तो भी मैं उन्हें अच्छा कर दूँगा 
कह मोहन घर को गए
वहाँ मैया ने हँसकर पूछा 
कान्हा तुमने साँप डँसे का
मंत्र कहाँ से है सीखा 
जाओ राधा को साँप ने डंसा है
उसे बचा लेना
इतना सुन मोहन
राधिका जू के पास गए
और अपनी मुरली को
राधा से छुआ दिया 
जिससे राधा का ह्रदय
ठंडा हुआ
और प्रेमाश्रु झड़ने लगे
ज्यों ही राधा को होश आया है
 कीर्ति जू  ने सारा हाल
राधा को सुनाया है
और बड़े प्रेम से
नन्कुमार को गोद में उठाया है
इस प्रकार राधा मोहन की 
प्रीत ने रंग चढ़ाया है
जो हर ब्रज वासी के 
मन को भाया है
मगर ललिता जी ने
असल मर्म को पाया है
ये भेद कोई न जान पाया है
अलौकिक प्रीत को लौकिक जन क्या जाने
ये तो कोई प्रेम दीवाना ही पहचाने 
जिसने खुद को पूर्ण समर्पित किया हो
वो ही प्रेम का असल तत्त्व है पहचाने 

क्रमशः ......................

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

कृष्ण लीला ........भाग 37





मगर राधा के मन को 
मोहन ऐसे भाए हैं
उनके बिना चैन
ना जिया को आये हैं 
तीसरे दिन दूध दोहने के बहाने
कान्हा के द्वारे पर आई हैं
और मोहन को आवाज़ लगायी है 
राधा प्यारी के शब्दों ने 
मोहन की प्रीत बढ़ाई है
मैया से बोल उठे , "मैया 
कल मैं यमुना का रास्ता भूल गया था
इक गोपी ने लाकर 
घर पर छोड़ा था 
अभी वो ही गोपी आवाज़ लगायी है
पर लज्जा के कारण
ना भीतर आई है
तुम ही उसे बुला लो मैया
इतना कह मोहन ने
अपनी माया फैलाई है
और मैया के ह्रदय में 
श्यामा की प्रीत बढ़ाई है 
तब मैयाके कहने पर
श्यामसुंदर ने 
राधा की बाँह पकड़ी है
और घर के भीतर लाये हैं 
राधा जू की सुन्दरता में 
मैया ने सुध बुध बिसरायी है 




फिर धैर्य धारण कर
बड़े प्रेम से राधा जी का
परिचय जाना है
कौन गाँव की बेटी हो
कौन तुम्हारे तात हैं
पहले ना कभी देखा है
इतना सुन राधा ने 
अपना नाम पता बतलाया है
जिसे सुन यशोदा का
ह्रदय हर्षाया है
तुम्हारी माँ बड़ी कुलवंती हैं 
तुम बृष भानु लली हो 
कह मैया ने गले लगाया है
और मन में ये ख्याल उतार आया है
कितना अच्छा हो 
मेरे मोहन से इसका विवाह हो
फिर मैया ने श्यामा जी का 
श्रृंगार किया है
और गहने कपडे पहना
मेवा मिठाई तिल चावली 
गोद में डाली है
और कान्हा के साथ 
खेलने की आज्ञा दी है
उन दोनों को खेलते देख
मैया वारी वारी जाती  है
और बार बार उन्हें
मोहन संग खेलने को बुलाती है
जब राधा प्यारी श्रृंगार कर
अपने घर को पहुंची है
तब उनकी मैया अचरज में बोली हैं
ये किसने श्रृंगार किया है
तब राधा जी ने बतला दिया
तुम्हारा और बाबा का नाम पूछकर
यशोदा जी ने श्रृंगार किया है
तिल चावली मेवा मिठाई 
दे विदा किया है
घर में घर में बात फ़ैल गयी
यशोदा के मन की बात जान
कीर्ति जी अपने मन की बात कही है
मेरी बेटी दामिनी सो
मोहन प्यारा श्याम घटा सा
दोनों की जोड़ी मन को भाई है
दोनोका विवाह हो जाये
ये बात बृष भानु जी को बताई है
अब राधा प्यारी नित्य
मोहन प्यारे संग खेला करती थीं
प्रीत को रोज नए रंग में रंगती थीं 

क्रमशः ..........