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शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

इसे प्रश्नोत्तरी कहो या वार्तालाप या आरोप प्रत्यारोप............2




मगर ये वार्तालाप 
यहीं ना बंद हुआ 
भक्त ने झट दूसरा प्रश्न दाग दिया
प्रभु जब तुमने मान लिया
तुम ही सब कुछ करते हो
तो बताओ तो जरा
फिर भक्त की परीक्षा क्यूँ लेते हो
क्यों उसे दो के भ्रम में उलझाते हो
क्यूँ तुम में और उसमे कोई भेद है
ये बतलाते हो
सुन प्रभु ने जवाब दिया
जब भक्त मेरे हैं
मैं उनका हूँ
तो उनके प्रेम का परिक्षण करता हूँ
क्या ये भी मुझे उतना ही चाहता है
जितना मैंने इसे चाहा है
या ये अपनी किसी गरज से
मुझसे मिलने आया है
जब खोटा है या खरा 
ये परख लेता हूँ
तब उस पर अपना 
सर्वस्व  न्योछावर करता हूँ
और भक्त के हाथों बिक लेता हूँ
अब वो जैसा चाहे मुझे नचाता है
चाहे तो भूखा रखे
चाहे तो काम करवाए
चाहे तो बर्तन मंजवाए
चाहे तो झाडू लगवाए
मैं उसके प्रेम पर रीझ जाता हूँ
और उसकी ख़ुशी में ही
अपनी ख़ुशी समझता हूँ
जैसे भक्त मेरी ख़ुशी में
अपनी ख़ुशी समझता है
वैसे ही मैं भी उसके साथ करता हूँ
यहाँ दोनों के भाव 
एकाकार हो जाते हैं
दोनों ही अपना स्व भूल जाते हैं
और एक रूप हो जाते हैं
यही तो वो भाव होता है
जिसके लिए मैं ये 
सारी लीला रचता हूँ
और तुम मुझ पर दोषारोपण करते हो
बताओ तो जरा कहाँ फिर
दोनों में कोई भेद रहा
और कब मैंने दो का भेद कहा
यही तो मैं समझाना चाहता हूँ
तू मेरी किरण है जो मुझसे बिछड़ी है
बस एक बार मुझे आवाज़ दे
मैं सौ कदम आगे आ जाता हूँ
और उसे अपने में मिला लेता हूँ
फिर कहाँ दोनों में भेद रहा
ये भेद मैंने नहीं डाला है
बस दृष्टि के बदलने से ही
सृष्टि बदली नज़र आती है
वरना तो तुझमे मुझमे कोई भेद नहीं
यही समझाना चाहता हूँ
पर जीव भूला भूला फिरता है
और आवागमन में फंसता है
अरे अरे फिर तुम उसी बात पर आते हो
प्रभु मुझे फिर घुमाते हो
अभी तो तुमने माना है
सब तुम ही करते हो
तो इस रूप में भी तो 
तुम्हारा ही सारा खेल होता है
भेद विभेद सब दृष्टि भ्रम होता है
जबकि कर्ता कर्म और फल 
सब तुम्हारा ही रूप होता है
देखो ये शब्दों की उलझन में ना उलझाओ
मुझे अपने शब्द जाल में ना फंसाओ
और जब तुम कहते हो
तुझमे मुझमे कोई भेद नहीं
फिर क्यों कठिन परीक्षा लेते हो
क्यों जीव को इतना भटकाते हो
जो जान पर बन आती है
तब जाकर तुम मिलने आते हो
और दूसरी तरफ कहते हो
बस मेरा सुमिरन किया कर
और कर्म सारे मेरे अर्पण किया कर
बताओ तो जरा 
जीव क्या करे और क्या ना करे
कैसे खुद को अपने कर्तव्यों से विमुख करे
जब तुम ही उसे फंसाते हो
कर्त्तव्य निभाने का उपदेश देते हो
कर्म की शिक्षा देते हो
और जब वो कर्म में संलग्न होता है
तब उसे भोगों में लिप्त होने का दंड देते हो
ये कैसा तुम्हारा विधान है
जो जीव की समझ से पार है
अरे भोले भक्त मेरे 
मैंने ना कोई दंड विधान रखा
सिर्फ इतना ही तो है कहा
कर्म करे जा फल की इच्छा मत रख
अर्थात निर्लिप्त भाव से कर्म कर
और अपने सारे कर्म मुझे अर्पण कर
मुझे अर्पण करने से वो ही कर्म तेरा
मेरी  पूजा बन जायेगा
और फिर मुझसे मिलने में
ना कोई बाधा तू पायेगा 
कर्म करते भी मुझसे मिला जा सकता है
जरूरी नहीं तू राम नाम की माला ही जपा करे
ये कर्म भूमि मैंने ही बनाई है
बस इतनी ही तो बात कहलाई है
यहाँ कर्म किये बिना ना
कोई एक क्षण रह सकता है
बस तू खुद को कर्म का कर्ता मत मान
और कर्म अपना मेरे अर्पण कर
फिर देख मुझसे मिलना सुगम हो जायेगा
तेरे पथ पर तू बिना पुकारे भी
मुझे खड़ा पायेगा 
अरे वाह प्रभु .....क्या बात तुम कहते हो
जब जीव कर्म करेगा तो बताओ तो जरा
कैसे कर्म बँधन से खुद को मुक्त करेगा
क्या कर्म बिना किसी आशा के किया जा सकता है
क्या कर्म से बिना सम्बन्ध जोड़े कोई कर्म किया जा सकता है
जब कर्म से कोई नाता होगा 
तभी तो कर्म सही ढंग से होगा
और उसे पूरा करने की जब इच्छा होगी
तभी तो कर्म में उसकी रति होगी 
बताओ फिर कैसे कर्मफल से जीव
खुद को विमुख कर सकता है
बिना चाहत के कोई कैसे
कर्म कर सकता है
कहीं ना कहीं किसी ना किसी अंश में
कोई तो चाहत छुपी होगी
अच्छा बताओ जरा
अगर कोई तुम्हें चाहे
तो क्या तुम्हें पाने की चाहत नहीं रखेगा
और तुम्हें पाने के लिए 
वो तुम्हारा सुमिरन भजन मनन नहीं करेगा
अब सारे कर्म वो कर रहा है
मगर बिना चाहत के तो
तुम्हें पाने का कर्म भी नहीं कर रहा है
फिर भला कैसे जीव
चाहत मुक्त हो सकता है
कैसे खुद को पूर्ण विमुख कर सकता है
जब तक किसी कार्य को करने का कारण नहीं होगा
कार्य कहो तो कैसे संपन्न होगा 
प्रभु तुम्हारी बातें बहुत भरम फैलाती हैं
जो जीव के समझ नहीं आती हैं
देखो तुम्हें अपनी कार्यप्रणाली बदलनी होगी
थोड़ी जीव की भी सुननी पड़ेगी
ये नहीं सारा दोष जीव के सिर मढ़ दो
और खुद को पाक साफ़ दिखा दो
तुम भी दोषमुक्त नहीं हो सकते हो
जब तक जीव पर आरोप रखते हो
प्रभु प्यारे भक्त की बातों में 
रस लेते हैं
और मधुर मधुर मुस्कान से 
दृष्टिपात करते हैं
भक्त और भगवान की महिमा
अजब न्यारी है
जहाँ भक्त ने ही वकील और जज की कुर्सी संभाली है
और प्रभु कटघरे में खड़े
मधुर मधुर मुस्काते हैं
और अपने प्यारे भक्त की मीठी बातों पर
रीझे जाते हैं

क्रमश :………

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

इसे प्रश्नोत्तरी कहो या वार्तालाप या आरोप प्रत्यारोप --1

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
श्री गणेशाय नमः
श्री सरस्वत्यै नमः
श्री सद्गुरुभ्यो नमः 

अब इसे क्या कहूं वार्तालाप या प्रश्नोत्तरी या भक्त और भगवान की खट्टी मीठी नोंक झोंक .........मगर ये भाव उठते जरूर हैं हर किसी के मन में तो आज उन्हें ही कहने का प्रयत्न किया है और पता नहीं सबके मन मे उठते भी हैं या नहीं मगर मेरे मन मे उठे और मैनें उनसे प्रश्न किये तो उन्होने अन्दर से यही उत्तर दिये जो आज आप सबके सम्मुख हैं…………



जीवन मृत्यु बने दो द्वार
आवागमन से ना पाया पार
इधर जीव घबराया 
उधर ईश्वर भी अकुलाया
जब विकल हुई दोनों की धार
मिलन का बन गया आधार
सम्मुख प्रभु को पाया जब उसने
जिह्वा  तब लगी रुकने
अनुपम सौंदर्य में खो गया
अपना सर्वस्व भी भूल गया
तब प्रभु ने चेतना का किया संचार
क्यूँ घबराया था यूँ अकुलाया था
किया प्रश्न ये बारम्बार
जब चेतना जागृत हुई
खुद की जब स्मृति हुई
जीव ने प्रश्न किया इस बार
प्रभो ! क्यों जन्म मृत्यु का रचा संसार
जिसमे बांधा कर्म का तार ?
मधुर मुस्कान धर प्रभु ने
सुधामय वाणी से दिया जवाब
ये मेरा है लीला विलास
नित्य खेल मैं रचता हूँ
बस तुझमे विलक्षण बुद्धि धरता हूँ
मगर तू उससे ऐसे लिपटता है
स्व स्वरुप भी भूलता है
ना तेरे आना हाथ में 
ना तेरे जाना हाथ में
फिर क्यूँ मैं -मैं का नारा रटता है
जबकि तू कुछ नहीं है
मात्र हाथों की कठपुतली है
बस यही भूल तू करता है
और आवागमन में फंसता है
सुन जीव मुस्कुराया 
प्रभु की चाल समझ प्रश्न किया
जब तुम्हारा खेल है
तुम उसके नियंता हो 
तुम ही सारा कर्ता- धरता हो
फिर क्यूँ बुद्धि की आड़ लेते हो
क्यूँ जीव को भरम ये देते हो
जब तुम खुद ही सब कुछ करते हो
फिर क्यूँ खुद को कर्तुम अकर्तुम 
अन्यथा कर्तुम कहते हो
जब नाटक तुमने लिखा
उसके सब पात्र तुमने रचे
सब पात्रों को संवाद तुमने दिया
अभिनय को मंच दिया 
फिर भला बताओ तो ज़रा 
कैसे जीव की बुद्धि का यहाँ 
प्रवेश हुआ
सारी रचना के रचयिता तुम हो
तो कैसे तुमसे पात्र उन्मुख हो सकता है
वो तो तुम्हारे इशारे पर ही चलता है
फिर भी अभिनय मंच पर 
दृश्य चाहे बदलता है 
समय भी नए रूप धरता है
मगर नाटक वो ही चलता है
वो उससे बाहर ना निकलता है
तुमने उसे ऐसे घेरा है
चाहकर भी ना निकल सकता है
फिर कहो तो जीव ने कब 
स्वयं को तुमसे ऊपर माना
वो तो तुम्हारी ऊंगली के इशारे पर
अभिनय करता है 
जब पात्र का हर संवाद तुम्हारा है
उसकी हर गतिविधि पर लगा
पहरा तुम्हारा है 
फिर कैसे कहते हो 
ये अपने मन की करता है 
सुन प्रभु  मुस्काए
और जीव के सारे भेद सुलझाये
हाँ ....मैं ही ये खेल रचता हूँ
मैं ही पात्रों को संवाद देता हूँ
अभिनय की तालीम देता हूँ
और रंगमंच पर छोड़ देता हूँ
मगर वो अभिनय की बारीकियां भुला देता है
खुद को खुदा मन बैठता है
जो मैंने संवाद दिए 
जैसा अभिनय को कहा
ठीक उससे उलट जब करता है
तभी उसके भाग्य का पांसा पलटता है
और वो आवागमन में फंसता है
अरे वाह प्रभु .........ये कैसे कह सकते हो
तुमने शिशु रूप में जन्म दिया
अब बताओ तो जरा 
उस जरा से शिशु ने ऐसा कौन सा कर्म किया
जो वो अपने मन की कर सके
अभी तो वो बोलना भी नहीं जानता है
ना खुद अपने नित्यकर्म कर सकता है
फिर बुद्धि के प्रयोग की तो बात ही दूसरी हो जाती है
अब उसे जैसे सांचे में 
ढालना होता है
तुम उसमे वैसा ही रंग भर देते हो
और अपने मन का आकार देते हो
और दोष जीव के मत्थे मढ़ देते हो 
बताओ ये कौन सा खेल हुआ
जिसमे सिर्फ परवशता होती है 
बिन सहारे के तो लकड़ी भी नहीं खडी होती है
उसके मुँह में जुबान भी तुम ही देते हो
बुद्धि रूप में भी तुम ही प्रवेश लेते हो
अब कैसे जीव का कोई कर्म 
अकर्म हो सकता है 
जब हर रूप में तुमने ही आकार लिया होता है
अरे मेरे भोले भक्त
तूने सिर्फ जो सुना देखा जाना 
वो तो सिर्फ एक पक्ष होता है
हर तस्वीर का एक 
दूसरा पक्ष भी होता है
बेशक मैं ही सबमे व्याप्ता हूँ
और मैं ही हर सांचे को आकार देता हूँ
मगर साथ में उसमे 
एक गुण भी भर देता हूँ
उसकी बुद्धि में एक बात धर देता हूँ
देख रंगमंच पर जाकर 
तू मुझे ना भूल जाना
मैं तेरा जनक हूँ
गोड फादर हूँ
तू मुझे ना भुलाना
अभिनय करते करते कहीं
उसी में ना रच बस जाना
और जीव मुझसे वादा करता है
और जब रंगमंच पर उतरता है
तो पात्र में ऐसे डूब जाता है
वो अपने घर का पता भी भूल जाता है
और फिर अपनी बुद्धि
दूसरे गोरख धंधों में लगाता है
मगर जिसने भेजा उसे याद नहीं करता है
और मैं इस खेल का रचयिता 
ये देख देख कर दुखी होता हूँ
ये मेरे पात्र को क्या हुआ
कैसे इसने नया रंग लिया
मेरा तो सारा खेल ही
इसने बिगाड़ दिया
अब इसे याद दिलाने को
अपनी पहचान कराने को
मैं दूसरे पात्र या घटनाएं 
उसके जीवन में अवतरित करता हूँ
मगर ये अपने अहम् के वशीभूत हो
सबको दरकिनार करता है
और खुद को ही दुनिया का
भगवान समझता है
जब मैं समझा समझा कर 
हार जाता हूँ
तब उसे अपने पास बुलाता हूँ
और अपनी पहचान करवाता हूँ
जब उसे समझ आ जाता है
और जब वो एक मौका
और चाहता है
उसे फिर से दुनिया में भेज देता हूँ
ये सोच इस बार ये जरूर बदलेगा
मगर वो फिर भी नहीं सुधरता है
और बार बार खुद ही आवागमन में फंसता है
सुन भक्त खिलखिलाकर हँस पड़ा
और प्रभु से प्रश्न किया 
अरे प्रभु ......एक तरफ तुम
गीता में उपदेश ये देते हो
मैं ही सबका कर्ता- धरता हूँ
मेरी इच्छा के बिना तो 
पत्ता भी नहीं हिल सकता है
फिर कहो तो कैसे कोई जीव
अपने मन की कर सकता है
जब तुम ही हर रूप में समाये हो
जब तुम्हारा ही ये संसार रचाया है
और इसके कण - कण में तुम ही समाये हो
फिर कहो कैसे जीव और ब्रह्म का भरम  फैलाये हो 
जब मुझमे भी तुम हो
और तुम में मैं
हर कण कण में सृष्टि के
तुम्हारा ही दर्शन होता है
फिर भला वहाँ कैसे 
किसी की बुद्धि का प्रवेश हो सकता है
कहीं कहते हो 
मैं कुछ नहीं करता हूँ
मैं निर्लेप रहता हूँ
और कहीं कहते हो
सब मेरी दृष्टि का विलास है
सबमे मेरी माया समायी है
मैं ही जर्रे जर्रे में समाया हूँ
मुझसे ही ये सृष्टि जगमगाई है
अब तुम खुद ही दोगली बात करते हो
और जीव को दुधारी तलवार पर चलाते हो
और दूर खड़े तुम मुस्काते हो
ये तो ना न्याय हुआ
ये तो सब तुम्हारा ही किया धरा हुआ
तुम बस यूँ ही जीव को फंसाते हो
और उसकी दुर्दशा देख मुस्काते हो
क्यूँकि खुद ही रचयिता होते हो
खुद ही पात्र भी बनते हो
और खुद ही तुम दिल्लगी करते हो
और दोष जीव पर मढ़ते हो
प्रभु ये ना सही खेल हुआ
इसमें तुम्हारा पांसा तुम ही पर
उल्टा पड़ गया 
भक्त की मीठी बातें सुन
प्रभु खिलखिला उठे
और भक्त की बात को ही 
ऊंचा बना दिया
हाँ मैं ही सब कर्ता नियंता हूँ 
मान लिया और 
भक्त का मान रख लिया 

क्रमश: ……………

बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया



शब्दहीन, भावहीन ,स्पंदनहीन ह्रदय को
और दिमाग को कुंद औ मूढ बना दिया
सांवरे तूने ये क्या किया , ये क्या किया

ना रसधारा बहती है

ना नामोच्चार होता है
बस ये विग्रह निर्लेप सा रहता है
अब कौन दिशा है जाना
सबको भ्रमित बना दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

ना ह्रदय द्रवित होता है

ना अश्रु  नैनो से ढलते हैं
बस निर्विकारता छा जाती है
निर्जीव इस विग्रह पर
ये कैसा कुहासा छा दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

ना मै अब मै रही

ना तू ही मुझे मिला
एक तत्व भी अज्ञात रहा
ये कैसा द्वंद समा गया
जो मुझे प्रश्नसूचक बना दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

ना प्रेम का छोर मिला

ना कोई उस ओर मिला
बस प्रेमाभक्ति का ह्रास रहा
ये कैसा रोग लगा दिया
भरा, पूजा का थाल लौटा दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

अब ना दिशा का बोध रहा

ना अपना ही होश रहा
जब से तुझमे खुद को मिला दिया
तेरी चाह को परवान चढा दिया
और खुद को भी मिटा दिया
फिर भी ना तेरा दरस हुआ
और चौखट से जो अपनी
तूने खाली हाथ लौटा दिया
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया


तेरे हाथ बिके बेमोल

अब किधर जायेंगे
जो तूने हमे रुसवा किया
तेरे कूचे मे ही ना मर जायेंगे
मगर  ना कहीं कोई ठौर पायेंगे
सांवरे तूने ये क्या किया, ये क्या किया

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

पूर्णाहूति …तुभ्यम समर्पितं गोविन्दं…कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी ……भाग 71


प्राकृत देह का निर्माण
स्थूल , सूक्ष्म और कारण शरीरों से हुआ
जिनके कारण ही जीव
जन्म मृत्य के चक्कर में पड़ा
ये प्राकृत शरीर
चाहे मैथुन से , चाहे संकल्प से
चाहे ह्रदय , नाभि, कंठ, नेत्र ,
या सिर्फ स्पर्श से या चाहे
दृष्टि से मिलते हैं
मगर कर्म बँधन से मुक्त ना होते हैं
मगर अप्राकृत शरीर
विलक्षण होते हैं
जो महाप्रलय में भी
ना नष्ट होते हैं
फिर भगवद देह तो
साक्षात् भगवद्स्वरूप है
रक्त मांस , मेद, अस्थि से ना निर्मित है
फिर प्रभु का स्वरुप
कैसे रक्त मांस अस्थि मय होता
उनमे देह देही , गुण गुणी
रूप रुपी , नाम नामी
लीला लीलापुरुषोत्तम का
कोई भेद नहीं
प्रभु का अंग अंग पूर्ण कृष्ण है
प्रभु की प्रत्येक इन्द्री से
सभी कार्य हो सकते हैं
जैसे उनके कान देख सकते हैं
आँखें सुन सकती हैं
त्वचा स्वाद ले सकती है
रसना सूंघ सकती है
नाक स्पर्श कर सकती है
वे हाथों से देख सकते हैं
आँखें सुन सकती हैं
कृष्ण का सब कृष्ण रूप होने से पूर्ण है
इसी कारण उनकी नित्य माधुरी
नित्य नवीन सौन्दर्यमयी है
प्रभु का शरीर ना कर्म जन्य है
ना मैथुनी ना दैवी
वो तो सर्वथा विशुद्ध भगवत स्वरुप हैं
तभी अखंड ब्रह्मचारी कहलाते हैं


प्रभु की ये लीला  पूर्ण दिव्य थी
तभी योगमाया को कह
अपना मन बनवाया
क्योंकि प्रभु के पास स्वयं का
ना कोई मन होता है
और गोपियों ने तो
अपना मन प्रभु में मिला दिया था
तब प्रभु ने विहार के लिए
नवीन मन की
दिव्य मन की सृष्टि की
यही योगमाया प्रभु के लिए
दिव्य स्थल , दिव्य सामग्री
दिव्य मन का निर्माण करती है
तभी प्रभु की बांसुरी
जड़ को चेतन , चेतन को जड़
चल को अचल, अचल को चल
विक्षिप्त को समाधिस्थ
और समाधिस्थ को विक्षिप्त बनाती है
तभी गोपियाँ बंसी की धुन सुनते ही
सब कार्य छोड़ प्रभु की ओर
चल पड़ती हैं
उन्हें ना ध्यान कुछ रहता है
कौन सा कम अधूरा हो
या पूरा करके जाएँगी
क्योंकि वो तो नित्य संकल्प हो चुकी थीं
सर्वस्व समर्पण कर चुकी थीं
बेशक शरीर से सारे कार्य करती थीं
मगर वंशी की धुन कानों में पड़ते ही
उनका ध्यान कर्म की पूर्णता पर ना रहता था
जैसे सन्यासी का मन
वैराग्य की प्रबल ज्वाला से परिपूर्ण रहता है
फिर वैराग्य की पूर्णता
और प्रेम की पूर्णता
एक ही तो बात हुई
गोपियाँ ब्रज और प्रभु के बीच
पूर्ण वैराग्य स्वरुप हैं
या मूर्तिमान प्रेम
इस विषय में कौन निर्णय ले सकता है
गोपियों और प्रभु के
अलौकिक रूप को
कैसे जान सकता है
फिर उनकी दिव्य लीला का
कोई कैसे वर्णन कर सकता है


फिर कैसे मैं अज्ञानी वर्णन कर सकती हूँ
बस प्रभु चरणों में ही
सारा लेखन समर्पित करती हूँ
यूँ तो जितना गुणगान करो
थोडा ही रहता है
अभी ना जाने कितने और
दिव्य भाव यहाँ बतलाये हैं
जो मानुष के समझ ना आये हैं
प्रभु प्रेरणा से लिया संकल्प पूर्ण हुआ
ये प्रभु की दिव्य लीलाओं का
प्रभु के लिए गुणगान हुआ
अगली प्रेरणा तक
अब लेखनी को विराम देती हूँ
जब जैसी प्रभु की मर्ज़ी होगी
जब गोपी विरह के भावों का समावेश होगा
तभी उद्धव गोपी संवाद रूप में
नव सृजन होगा
जब प्रभु इस लायक समझेंगे
तब उद्धव गोपी संवाद का आगाज़ करेंगे
तब तक उस पूर्णकाम को
कोटि कोटि नमन करती हूँ
जो मुझे नराधम को अपनी शक्ति से नवाज़ा
और अपनी लीलाओं का गुणगान करने का मौका दिया
कैसे उऋण हो सकती हूँ
प्रभु कृपा की यही तो विलक्षण महिमा है
स्वयं सब कार्य संपन्न करते हैं
और उसका श्रेय भक्तों को दे देते हैं
मैं नतमस्तक हुई जाती हूँ
पर पार ना उनका पाती हूँ
बस उनके दर्शन की अभिलाषी हूँ
प्रेम सुधा की प्यासी हूँ
 
!!!!!!!!अथ श्री कृष्ण कथा !!!!!!

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी ……भाग 70

अब प्रभु ने जितनी गोपियाँ
उतने रूप धरे थे
दो- दो गोपियों के बीच कन्हैया
गलबहियां डाले नाचते थे
कभी एक गोपी के चारों तरफ
कृष्ण नृत्य करते थे
रसमयी दिव्य लीला का
प्रभु ने प्रारंभ किया
सहस्त्रों गोपियाँ सहस्त्रों कृष्ण
चारों तरफ नृत्य करते थे
जिसे देखने देवता भी
पत्नियों सहित
आकाश में उतरे थे
स्वर्ग की दुन्दुभियाँ स्वयं बज उठीं
दिव्य पुष्प वर्षा होने लगी
गन्धर्व गण प्रभु का यश गान करने लगे
गोपियों के कंगन
पैरों की पायल और करधनी के घुँघरू
एक साथ बजने लगे
ताल से ताल मिलाने लगे
सुर लय ताल ना बिगडती थी
गोपियाँ चाहे रूकती थीं
चाहे थकती थीं , चाहे गिरती थीं
पर लय ताल पर ना असर होता था
अजब चमत्कारिक रसमयी
अद्भुत वातावरण बना था
कृष्ण गोपियों  संग कभी
बड़े वेग से घूमते थे
कभी गोपियाँ कलापूर्ण ढंग से मुस्काती थीं
भौहें मटकाती थीं
नाचते- नाचते पतली कमर
ऐसे लचक -लचक जाती थी
मानो टूट गयी हो
नाचते -नाचते पसीने की बूँदें
चेहरे पर छलछला रही थीं
उन पर काले केश यूँ लगते मानो
काले सर्प ओस की बूँद चाटने आये हों
तन -मन वस्त्रों की सुधि
गोपियाँ भूल गयीं
चोटियाँ ढीली पड़ गयीं
नीवों की गाँठें खुल गयीं
सिर्फ और सिर्फ
आनंद विलास छा गया
कोई गोपी थक जाती तो कृष्ण को पकड़ लेती
तो किसी गोपी का चन्दन
कृष्ण के अंग से लग जाता
और सारा वातावरण महका जाता
कोई गोपी कहती
ज़रा मेरे कलेजे पर
हाथ रख देखो सांवरे
कैसा धड़कता है
आठों पहर तुम इसमें रहते हो
डरती हूँ कहीं
कलेजा धड़कने से तुम्हें दुःख ना पहुंचे
ये उनके प्रेम की पराकाष्ठा थी
बस में होता तो धडकनों को भी रोक देतीं
पर अपने प्रियतम को
ना ज़रा सा भी क्लेश होने देतीं
जब प्रेम की ऐसी उच्चावस्था हो
वहाँ कैसे ना प्रभु की
अनंत कृपा हो
कैसे ना प्रभु उनके वश में हों
यूँ मोहन ने ब्रजबालाओं संग
छह राग और छत्तीस रागनियों संग
रास विलास किया
किसी को ना तन- मन की सुधि रही
नाचते- नाचते गोपियों का आँचल उड़ जाता था
कभी मोहन का मुकुट गिर जाता था
कभी मोतियों  की माला
टूट कर बिखर जाती थी
पर किसी को  किसी की
सुधि कहाँ रह  जाती थी
सब को यूँ लगता
मोहन मेरे साथ ही रास करते हैं
कोई गोपी मोहन के सुर में
ऐसे राग अलापती थी
कि मोहन वंशी बजाना भूल जाते थे
और उसके राग में खो जाते थे
जैसे निर्विकार शिशु दर्पण में
अपनी परछाईं से खेला करता है
वैसे ही राधारमण कभी उन्हें
ह्रदय से लगाते थे
कभी प्रेमभरी चितवन से
घायल करते थे
कभी उन्मुक्त हँसी हँसते थे
कभी अंग स्पर्श करते थे
प्रभु के संस्पर्श से
गोपियाँ प्रेमानंद में भाव विह्वल हुईं
केश खुल गए
हार टूट गए
गहने वस्त्र अस्त व्यस्त हो गए
ये देख देवता भी चकित हो गए
यूँ तो प्रभु आत्माराम हैं
उनमे ना किसी क्रिया का लेशमात्र है
अपने अतिरिक्त किसी और की आवश्यकता नहीं
फिर भी उन्होंने
जितनी गोपियाँ उतने रूप धरे थे
राग रंग के मद में गोपियाँ
गहने और वस्त्र एक दूजे पर
वारना करती हैं
ऐसे अद्भुत दृश्य को देख
यमुना का जल ठहर गया
पशु पक्षी मोहित हो
चित्रलिखे से खड़े रह गए
हवा बहना भूल गयी
जब राधा संग मोहन नृत्य करते हैं
जिसे देख- देख गोपांगनाओं  के ह्रदय
हर्षित होते हैं
तभी एक गोपी नन्द
और एक वृषभानु बनी
और कान्हा का राधा संग
गठजोड़ कर ब्याह करा
समधियों का शिष्टाचार कराया
और राधा के हाथ में
कंगना बांध मोहन से खुलवाती हैं
और जब मोहन खोल ना पाते हैं
तो मीठी ठिठोलियाँ करती हैं
फिर सब गोपियाँ दोनो का पूजन करती हैं
इस दिव्य महारास के दर्शन कर
देवता मोहित होते हैं
और गोपियों की ब्रज रज की
वहाँ के जड़ -चेतन के
भाग्य की सराहना करते हैं
क्यों ना हमें ब्रज में जन्म मिला
ये सोच कर अकुलाते हैं
जब गोपियाँ प्रभु संग विलास कर थक गयीं
तब प्रभु ने यमुना में
गोपियों संग प्रवेश किया
जैसे गजराज हथनियों संग
जल क्रीडा करता है
एक दूजे पर जल की बौछार करते हैं
देवता पुष्प वर्षा करते स्तुति करते  हैं
अद्भुत दृश्य को निहारा करते हैं
जब सबके अन्तस्थ शीतल हुए
तब प्रभु जल से बाहर निकले
और यमुना तट पर आये
योगमाया ने सबको वस्त्र
आभूषण इत्र गजरे दिए
सबने पुराने वस्त्र वहीँ छोड़ दिए
जिन्हें देवताओं ने प्रसाद रूप
टुकड़े कर आपस में बाँट लिया
वास्तव में ये तो प्रभु के
चिन्मय स्वरुप की चिन्मयी लीला थी
कामभावना हो या क्रिया या चेष्टा
सब उनके ही आधीन थी
जिसमे कोई दूसरा स्वरुप ना था
सिर्फ स्वरुप ही निज स्वरुप में अवस्थित था
मगर परीक्षित के मन में प्रश्न उठा
जब प्रभु ने धर्म की रक्षा को अवतार लिया
तो क्यों परस्त्रियों का स्पर्श किया
जब प्रभु पूर्णकाम थे
तो किस अभिप्राय से ऐसा कर्म किया
शुकदेव ने जिसका इस प्रकार उत्तर दिया
समरथ को नहीं दोष गोसाईं
ज्यों पावक चाहे अच्छा हो या बुरा
सब ग्रहण कर लेती है
पर उस पर ना दोष लगता है
जैसे भोलेनाथ  ने
हलाहल का पान किया
मगर उनका उससे कुछ ना बिगड़ा क्योंकि
सामर्थ्यवान का कर्म
निज उद्देश्य से नहीं होता
जगत के कल्याण के लिए
उनका सब कर्म है होता
अहंकार रहित ऐसे पुरुष
ना किसी कर्म बँधन में फंसते हैं
उनके तो हर कर्म जगत हित में होते हैं
फिर चाहे कर्म शुद्ध हों या अशुद्ध
मगर ऐसा ही कर्म यदि
असामर्थ्य विहीन करे
तो अपनी दुर्दशा को स्वयं पहुंचे
जो आचरण अनुकरणीय हो
वो ही जीवन में उतारा जाता है
मगर अन्य मनुष्यों द्वारा
हर कार्य किसी ना किसी
उद्देश्य के निहित किया जाता है
जो स्वार्थ और अनर्थ से जुड़ा होता है
मगर देवता आदि इनसे
ऊपर उठ जाते हैं
तभी ऐसे कर्म कर पाते हैं
तो सोचो जब ये ऐसा कर पाते हैं
तो इनको बनाने वाला
वो जग नियंता
कैसे उसे मानवीय गुणों
शुभ अशुभ
से जोड़ा जा सकता है
कैसे उनमे कर्म बँधन की
कल्पना की जा सकती है
जिनकी चरण रज का
भक्त सेवन करते हैं
जिनके प्रभाव से योगीजन
कर्म बंधन काट डालते हैं
वे प्रभु भक्तों की इच्छा पर ही
अपना चिन्मय स्वरुप प्रकट करते हैं
जब वो ही प्रभु
आत्मरूप से
चर -अचर समस्त विश्व में व्याप्त हैं
फिर वो गोपियों , उनके पतियों
गाय, बछड़ों , बच्चों से
कहो कैसे जुदा हैं
ये तो जीवों पर परम कृपा
बरसाने को प्रभु
ऐसी लीला करते हैं
जिन्हें सुन जीव भगवद परायण हो जायें
उसका चित प्रभु में ही विलय हो जाये
इसलिए प्रभु की इस लीला को
ना दोष दृष्टि से देखो
ये तो जीव और ब्रह्म का
आत्मसाक्षात्कार है
जो जन्म जन्मान्तरों से बिछड़ा है
और महारास में जाकर
अपनी ज्योति में जा मिला है
यही तो जीवन और जीव की परमगति है '
जिसे पाने को जीव
लख चौरासी में भटकता है
इस प्रकार प्रभु ने महारास का आनंद दे
गोपियों की विदा किया
मगर उनके चित को
अपने श्री चरणों में रख लिया
अब गोपियाँ रहती तो घर में थीं
सारे गृह कार्य भी करती थीं
मगर उनकी दृष्टि
उनका मन
उनकी हर क्रिया
सिर्फ कृष्ण के लिए ही होती थी
सबमे कृष्ण का ही दर्शन करती थीं
भेदबुद्धि मिट चुकी थी
एक पर ही अब टिक चुकी थी
बस यही तो महारास का महाभाव है
जहाँ दो का भाव मिट जाता है
और जीव पूर्णता पा जाता है
परीक्षित ये हाल उनके घर में
किसी ने ना जाना
ये ही तो प्रभु की दिव्य लीला होती है
जो अन्दर ही घटित होती है
बाहर से तो हर क्रिया यथावत होती है
मगर अंतर में सब भेद मिट जाता है
जीव ब्रह्म का मिलन हो
अंतस में महारास हो जाता है
इसे पाने को ही हर जीव भटका करता है
और यही उसके जीवन का
प्रथम और अंतिम लक्ष्य होता है
गोपियाँ कोई देह नहीं
बल्कि एक भाव हैं
जिसमे जीव जब "मैं" को भुला देता है
तभी निज स्वरुप को पा लेता है
यह रास वस्तुतः परम उज्जवल रस का दिव्य प्रकाश है
जिन सुधीजनों में गोपीभाव पुष्ट होता है
उन्हें ही इस दिव्य महारास का अनुभव होता है
आत्मा का आत्म में विलास ही
महारास कहलाता है
जब साधक का ध्यान टिक जाता है
ना केवल जड़ शरीर बल्कि
सूक्ष्म शरीर को प्राप्त होने वाले
स्वर्ग , कैवल्य या मोक्ष का भी त्याग होजाता है
और दृष्टि में केवल
चिदानंद स्वरुप कृष्ण बस जाता है
उनके ह्रदय में ही
कृष्ण को तृप्त करने वाला
प्रेमामृत बरसता है
उनकी इस अलौकिक स्थिति में
स्थूल शरीर और उसकी क्रियाओं का
लेश भी ना बचता  है
ऐसी कल्पना तो देहात्मबुद्धि से
जकड़े जीवों को ही होती है
जिन्होंने गोपियों को जाना
या गोपीभाव  को पहचाना
उन्होंने फिर सिर्फ वैसी ही अभिलाषा की
फिर वो चाहे ब्रह्मा हो या शंकर
उद्धव हो या अर्जुन
सब की रति प्रभु चरणों में हुई

क्रमश:…………..........



गुरुवार, 27 सितंबर 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी………भाग 69


जब विरह की उच्चतम अवस्था हुई
और प्रभु ने देखा
अब ये बस मेरी हुईं
तभी प्रभु ने खुद को प्रकट किया
यहाँ एक कारण नज़र आता है
प्रभु के अंतर्धान होने का
वो बतलाना चाहते हैं
जो गोपियाँ  दिन रात
मेरे नाम की माला जपती थीं
जिनका मेरे सिवा ना दूजा ठिकाना था
उनकी परीक्षा लेने से भी ना चूकता हूँ
जिन्होंने सर्वस्व  समर्पण किया था
उनको भी किसी भी मोड़ पर
परीक्षा में बैठा देता हूँ
तो जीव जो उनकी तरफ आते हैं
और अपने प्रेम का दावा करते हैं
तो उन्हें कैसे छोड़ सकता हूँ
प्रभु देखना चाहते हैं
ये कच्चा है या पक्का
क्या इसका भाव वास्तव में
प्रेम समर्पण का है
या अभी भी दुनियावी
बातों से भरा है
जब प्रभु ठोक बजाकर परख लेते हैं
तब उसे रास में शामिल कर लेते हैं
और उसका योगक्षेम स्वयं वहन कर लेते हैं

जब प्रभु ने जान लिया
अब ये प्राण छोड़ देंगी
पर विरह में ना जीवित रहेंगी
तब प्रभु ने उनकी अलौकिक प्रीति जान
स्वयं को प्रकट किया
खिले कमल सा प्रभु का मुखकमल
वैजयंती माला पहने
मंद मंद मुस्कुराते
मुरली मधुर बजाते
प्रभु का जब दर्शन किया
गोपियों में प्राणों का संचार हुआ
ज्यों रेत पर पड़ी मीन पर
बरखा ने जीवनदान दिया
सब गोपियों के ह्रदय आंगन  खिल उठे
कान्हा को सबने घेर लिया
किसी गोपी ने उनका हाथ पकड़ लिया
किसी ने उनका चरण स्पर्श किया
किसी ने उन्हें नेत्र द्वार से
ह्रदय में बिठा लिया
और नेत्र बंद कर
अन्दर ही अन्दर उनका
आलिंगन कर
प्रेम समाधि में डूब गयी
कोई गोपी अपने कटाक्ष बाणों से
बींधने लगी
कोई गोपी प्रेम गुहार करने लगी
तो कोई गोपी निर्मिमेष नेत्रों से
प्रभु के मुखकमल का
मकरंद रस पान करने लगी
फिर भी ना ह्रदय तृप्त होता है
सभी गोपियों ने प्रभु में ध्यान लगाया है
जिसे देख उनका ह्रदय हर्षाया है
प्रभु विरह की वेदना से
जो दुःख उपजा था
वो अब दूर हुआ था
परम शांति का गोपियों को
अनुभव हुआ था
प्रभु के दर्शन से
गोपियाँ पूर्णकाम हुईं
इतना आनंदोल्लास हुआ
ह्रदय की सारी आधि व्याधि मिट गयी
अब गोपियों ने चन्दन केसर युक्त
अपनी ओढनी बिछा
प्रभु को विराजमान किया
जिन प्रभु को योगसाधन से भी
पवित्र ह्रदय में
ऋषि मुनि ना
ह्रदय सिंहासन पर बैठा पाते हैं
वो कृष्ण आज प्रेम के वशीभूत हो
यमुना की रेती में
गोपियों की ओढनी पर बैठे दिखाई देते हैं
ये ही तो प्रेम की सगाई है
जो सिर्फ गोपियों ने ही निभाई है
प्रभु के संसर्ग का , संस्पर्श का
गोपियाँ आनंद लेती हैं
और कभी कभी कह उठती हैं
कितना सुकुमार है
कितना मधुर है
और मन ही मन
प्रभु के छिपने से नाराज होने का
अभिनय कर उन्हें
दोष स्वीकारने को कहती हैं
गोपियों ने यहाँ प्रभु से प्रश्न किया
हे नटवर ज़रा इतना तो बतलाना
कुछ लोग ऐसे होते हैं
जो प्रेम करने वालों से ही प्रेम करते हैं
और कुछ लोग
प्रेम ना करने वालों से भी प्रेम करते हैं
परन्तु कोई कोई तो
दोनों से ही प्रेम नहीं करते हैं
प्यारे ज़रा बतलाओ
इन तीनों में से तुम्हें
कौन अच्छा लगता है ?
तब प्रभु ने जवाब यूँ दिया
गोपियों जो प्रेम करने पर प्रेम करे
ये तो सिर्फ स्वार्थियों का व्यापार हुआ
इसमें ना कोई सौहार्द हुआ
और ना ही धर्माचरण का पालन हुआ
जो लोग ना करने वालों से भी प्रेम करते हैं
वहाँ ही निश्छल सत्य और पूर्ण धर्म का पालन हुआ
जैसे सज्जन, माता पिता , करुणाशील लोग
बिना कारण दया करते हैं
और सबके परम हितैषी होते हैं
कुछ ऐसे होते हैं
जो प्रेम करने वालों से भी
प्रेम नहीं करते
और प्रेम ना करने वालों का तो वहाँ
प्रश्न ही नहीं उठता है
ऐसे लोग भी चार प्रकार के होते हैं
एक जो निज स्वरुप में मस्त रहते हैं
जहाँ द्वैत का ना भास होता है
दूसरे वे जिन्हें द्वैत तो भासता है
पर वो कृतकृत्य हो चुके हैं
उनका ना फिर किसी से कोई प्रयोजन रहता है
तीसरे वे हैं जो जानते ही नहीं
हमसे कौन प्रेम करता है
और चौथे वे हैं जो जान बूझकर
अपना हित करने वालों को भी सताना चाहते हैं
उनसे भी द्रोह रखते हैं
गोपियों मैं तो प्रेम करने वालों से भी
प्रेम का वैसा व्यवहार ना कर पाता हूँ
जैसे करना चाहिए
और ऐसा मैं इसलिए करता हूँ
ताकि उनकी चितवृत्ति मुझमे लगी रहे
निरंतर मेरा ही ध्यान उन्हें बना रहे
इसलिए ही उन्हें
मिल मिल कर छुप  जाता हूँ
और इस तरह
उनका प्रेम बढाता हूँ
निस्संदेह तुम लोगों ने
लोग मर्यादा वेदमार्ग
सगे सम्बन्धियों को त्यागा है
तभी मुझे पाया है
अब तुम्हारी मनोवृत्ति
मुझमे लगी रहे
निरंतर मेरा ही चिंतन तुम्हें होता रहे
इसलिए परोक्ष रूप से
तुमसे प्रेम करता हुआ भी
मैं छुप गया था
इसलिए मेरे प्रेम में
तुम ना दोष निकलना
तुम मेरी सर्वथा प्यारी हो
जन्म जन्म के लिए
तुम्हारा ऋणी हुआ  हूँ
क्योंकि तुमने उन बेड़ियों को तोडा है
जिसे बड़े बड़े ऋषि मुनि भी ना तोड़ पाते हैं
यदि मैं अपने अमर शरीर से
अमर जीवन से
अनंत काल तक
तुम्हारे प्रेम, सेवा और त्याग का
बदला चुकाना चाहूँ
तो भी ना चुका सकता हूँ
और तुम्हारे ऋण से ना कभी
उऋण हो सकता हूँ
प्रभु के मुख से उनकी
सुमधुर वाणी सुन
जो विरह्जन्य ताप शेष था
उससे गोपियाँ मुक्त हुईं
अब प्रभु ने यमुना के पुलिन पर
गोपियों संग रासलीला प्रारंभ की 


क्रमश:…………

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी………भाग 68


विरह अगन में गोपियाँ पुकारने लगीं
मधुदूदन तुमने हमारे लिए
तो है अवतार लिया
प्रभु भला फिर क्यूँ हमसे
मुँह फेर लिया
ये बृज की भूमि तुम्हें बुलाती है
तुम्हारी चरण रज की प्यासी है
तुमने तो बृज की खातिर
लक्ष्मी को भी
दासी बना दिया
बैकुंठ को भी ठुकरा दिया
अब क्यों देर लगाते हो
मोहन क्यों छुप छुप जाते हो
हमारी रक्षा को ही तो तुमने
इतने असुरों का संहार किया
जो हमें छोड़कर जाना था
फिर क्यों
बकासुर, अघासुर, वृत्तासुर , पूतना , तृणावर्त से था बचाया
क्यों दावानल की अग्नि से
तो कभी कालिया के विष से
तो कभी इन्द्र के कोप से
तुमने था बचाया
देखो तुम्हारे विरह में हम
बावली हुई जाती हैं
और उलटे सीधे आक्षेप लगाती हैं
पर प्रेम में इतना तो अधिकार होता है
प्रीतम को मनाने का
ये ही तो तरीका होता है
हे प्राणनाथ ! तुम्हारी मंद मंद मुस्कान पर
हम बलिहारी जाती हैं
गोधुली वेला में अधरों पर
वंशी सजाये
मोर मुकुट धारण किये
मुरली बजाते जब तुम
प्रवेश करते हो
उसी मनमोहिनी छवि के दर्शन को तो
दिन भर हमारे नैना तरसते थे
तुम्हारी अद्भुत झांकी देख
ह्रदय ज्वाला शांत हो जाती थी
मगर हाय ! प्यारे अब हम कहाँ जायें
कहाँ तुम्हें खोजें
हमसे बड़ी भूल हुई
कह गोपियाँ पछताती हैं
हे श्यामसुंदर ! क्यों छोड़ चले गए
कैसे छुए छुपे फिर रहे हो
जिन चरणों को
लक्ष्मी भी अपनी छाया से दबाती है
वो चरण आज
कंकड़ पत्थरों से भरे
ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर चल रहे हैं
जिन चरणों से कालिया पर
नृत्य किया वो ही चरण
आज वनों की कंटकाकीर्ण
कुश, झाडी से लहूलुहान होते होंगे
हमारी गलती की सजा उन्हें मत दो
इन्हें चरण कमलों पर तो
हमारे नयन गड़े रहते हैं
आपकी हम चरण दासी हैं
हे स्वामी ! प्रकट हो जाओ
और अपने चरण कमल
हमारे वक्षस्थल पर रख
विरह ज्वाल शांत करो
हा गोपीनाथ! अपने नाम की लाज रखो
हा मदनमोहन ! यूँ कठोरता ना तुम्हें शोभा देती है
हम अपने बधू बांधव
पति बच्चे
सब छोड़ कर आई हैं
यूँ ना हमारा बहिष्कार करो
गर तुमने ठुकरा दिया तो कहाँ जाएँगी
तुम्हारे बिना तो हम
यूँ ही मर जाएँगी
जब मरने की गोपियों ने बात कही
तो कहीं से आवाज़ आई
तो फिर मर क्यों नहीं जातीं ?
इतना सुन गोपियाँ बोल पड़ीं
अरे चितचोर! मरना तो हम चाहती हैं
तुम बिन एक सांस भी नहीं लेना चाहती हैं
पर जैसे ही मरने को उद्यत होती हैं
वैसे ही तुम्हारा भेजा कोई
संत आ जाता है
और तुम्हारी मधुर मंगलकारी कथा
सुनाने लगता है
तुम्हारी कथा रुपी अमृत ही
हमें जिला देता है
वरना तो ये शरीर प्राण विहीन  ही रहता है
प्राण तो तुम्हारे साथ गए हैं
यहाँ तो बस मिटटी को रख गए हैं
तुम्हारे नाम का अमृत ही
मिटटी में प्राण फूंकता है
हा राधारमण! अब तो दर्श दो गिरधारी
हम हैं तुम्हारी बिना मोल की दासी
अपनी मधुर वंशी की धुन सुना दो
हमें भी अपनी वंशी बना
अधरों पर सजा लो
हे प्यारे ! हमें प्रेमामृत पिलाओ
अब जी सो की
आगे ना कोई गलती होगी
कह गोपियाँ करुण स्वर से विलाप करने लगीं
जब -जब वेदना चरम पर पहुँच गयी
तब -तब एक- एक ठाकुर का प्रकटीकरण हुआ
हा गोपीनाथ! हा राधारमण ! हा मदनमोहन !
ऐसे पांच बार जब
विरह वेदना हर सीमा को लाँघ गयी
और गोपियों ने पुकारा
तब पांच ठाकुर प्रकट हुए
जिनमे से तीन आज भी
वृन्दावन में आसान जमाये हैं
दो दूसरे राज्यों में पहुँच गए हैं


क्रमश:…………

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी……भाग 67



इधर गोपियाँ विलाप करतीं
चरण चिन्हों को देखतीं
वन वन भटक रही थीं
उधर कृष्ण जिस गोपी को
साथ लेकर गए थे
उसने समझा "मैं" सब गोपियों में श्रेष्ठ हूँ
इसलिए तो प्यारे सबको छोड़
मेरा मान रखते हैं
और मुझे इतना चाहते हैं
तभी अपने साथ लाये हैं
गोपियों को अभिमान हुआ था
और राधा रानी को मान
सौभाग्य  के मद में  मतवाली हो
कृष्ण से कहने लगीं
मुझसे अब चला जाता नहीं
तुम मुझे कहाँ लिए जाते हो
कान्हा बोले जहाँ मैं चलता हूँ
तुम मेरे साथ चलो
मैं तो थक गयी हूँ राधा ने इज़हार किया
सुन प्रभु ने उपाय बताया
मेरे कंधे पर चढ़ जाओ
और जैसे ही प्रभु झुके
और राधा रानी बैठने को उद्यत हुईं
वैसे ही प्रभु नीचे से अंतर्धान हुए
इस लीला का भी बड़ा विलक्षण भाव है
राधा रानी ने सोचा
अगर मैं प्रभु के साथ चली गयी तो
गोपियों को प्रभु कभी ना मिलेंगे
और वो विरह वेदना में दग्ध हो जाएँगी
ये सोच राधा रानी ने
थके होने का स्वांग रचा
और सब गोपियों पर
अपनी विलक्षण कृपा का आह्वान किया
यूँ ही थोड़े राधा को
प्रेम माधुरी कहा जाता है
प्रेम का महासागर है वो
किसी भी प्रेमी की पुकार पर
दौड़ी चली आती हैं
खुद दुःख उठाती हैं
पर कृष्ण से जरूर मिलवाती हैं
गर कान्हा का पता पाना हो
तो राधा को बुलाना होगा
अपना दुखड़ा सुनाना होगा
तभी प्रियतम का दरस पाना होगा
जैसे ही प्रभु अंतर्धान हुए
राधा प्यारी विकल हो पुकारने लगीं
हा नाथ ! हा प्राण प्यारे
तुम कहाँ गए
मुझे अकेला किसके सहारे छोड़ गए
श्याम तुम कहाँ गए?
जैसे मणि खोने पर सर्प
विकल हो जाता है
वैसा ही हाल आज राधा का होता है
अपनी दासी समझ मेरी
सुध ले लो श्याम
मुझे अपनी शरण में ले लो श्याम
राधा विरह में व्याकुल हो पुकारती हैं
रुदन देख वन के पशु पक्षी और वृक्ष भी रोने लगते हैं
राधा की प्रीत में खोने लगते हैं
तभी चरण चिन्हों का
अवलोकन करतीं
गोपियाँ वहाँ पहुँच गयीं
और राधे को रोती देख
उसके समीप गयीं
क्या तुम्हें भी श्यामसुंदर
छोड़ गए राधा ?
हाँ गोपियों ,मैंने थोडा मान किया
तुमने थोडा अभिमान किया
ये मोहन को नागवार गुज़रा
और तुम संग मुझे भी अकेला छोड़ गए
कह विलाप करने लगीं
अब तो गोपियों का बुरा हाल हुआ
मधुसूदन बिना जीना बेहाल हुआ
उनका तो कान्हा को
याद करते करते
सारा शरीर कृष्णमय हुआ
तन मन वचन से
कृष्णमय हो गयीं
वाणी कृष्ण गान करने लगी
मन चितचोर को ढूँढने लगा
तन का ना कोई होश रहा
सुध बुध  भूल गोपियाँ
वन वन भटकने लगीं
कृष्ण नाम की माला जपने लगीं
जरा कहीं पीत वर्ण दिखता
पीताम्बरी का आभास कर
उस ओर दौड़ पड़तीं
और कुछ ना मिलने पर
अचेत हो गिर पड़तीं
होश आने पर फिर
कान्हा नाम जपने लगतीं
कुञ्ज लताओं में
मोहन को खोजने लगतीं
कहीं कोई मधुर ध्वनि सुनाई पड़ती
गोपियों को बंसी की तान ही लगती
और गोपियाँ चित्रलिखि सी
खडी रह जातीं
घंटों यूँ ही खडी रहतीं
तन की ना कोई सुधि रहती
ये प्रेम के ढाई अक्षर का कमाल था
प्रीतम के बिना प्यारी का ये हाल था
अपना पता चलता  ना था
उनका पता मिलता ना था
प्रीत का कैसा हाल हुआ था
रोम रोम कृष्ण नाम जपता था
जब विरह वेदना में गोपियाँ बेहाल हुयें
तब राधा रानी ने उन्हें समझाया
देखो यूँ वन वन भटकने से
कुछ नहीं होने वाला
जो चीज जहाँ पर खोती है
वो वहीँ पर वापिस मिलती है
गोपियों  चलो  यमुना की रेती में
वहीं हम आराधना करती हैं
और मोहन को खोजती हैं
मानो राधा कह रही हों
यमुना है भक्ति
और जब तक भक्ति नहीं करोगे
शक्ति कहाँ से आएगी
और शक्ति बिना कैसे
शक्तिमान को पाओगी
तब सभी गोपियाँ यमुना किनारे पहुँच गयीं
सबने अपनी अपनी चूनर उतारकर
सिंहासन बना दिया
और गहन भक्तिभाव में डूब गयीं


 क्रमश:…………

रविवार, 9 सितंबर 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी ……भाग 66



जब प्रेम विरह में मतवाली हुईं
तब एक गोपी बोल पड़ी
सखियों देखो इन पशु पक्षियों को
ब्रज रज और वृक्षों को
ये सब ऋषि मुनि योगी हैं
प्रभु दरस की लालसा में
बने वियोगी हैं
इनसे पता हम पूछते हैं
जरूर इन्होने
श्यामसुंदर को देखा होगा
कृष्ण हमारा मन चुरा
डर कहीं छुप गए हैं
ए वृक्षों! क्या तुमने उन्हें
कहीं देखा है
ओ तुलसी ! तुम कितनी कोमल हो
प्रेम में सराबोर हो
तुमसे तो वो प्रेम करते हैं
जरूर तुम्हें पता होगा
क्या तुमने हमारे
चितचोर को देखा है
ए अनार ! तेरी दंतपंक्ति तो
खूब निकल रही है
लगा है तुमने जरूर
उन्हें देखा होगा
ए केला ! तुम्हारे नरम नरम
पत्तों पर ही तो
मोहन भोजन करते थे
जरूर तुम्हें उनका पता होगा
हे अशोक के वृक्ष ! तुम ही
अपने नाम को सार्थक करो
हम सब का शोक हरो
और हमारे प्यारे का पता बतला दो
या तो उनका पता बतला दो
नहीं तो अपना नाम बदल दो
हे चन्दन ! तुम्हें तो कान्हा
अपने अंगों पर लगाते हैं
तुम्हारे बिन ना रह पाते हैं
जरूर तुमने उन्हें देखा होगा
हे मालती , जूही , चमेली के फूलों
तुम्हारी मुस्काती मुख माधुरी बतलाती है
जरूर उन्होंने तुम्हारा स्पर्श किया है
ज़रा उनका पता तो बतलाओ
हे पृथ्वी ! तुम्हारे भार हरण को तो
मनहर प्यारे अवतरित हुए हैं
तुमसा बडभागी कौन होगा
जरूर तुम्हें उनका पता होगा
अरी लताओं ! कैसे तुमने
वृक्षों को आलिंगनबद्ध किया है
ये पुलक ये रोमांच जो तुम्हें हुआ है
जरूर हमारे प्यारे के नखों का
तुम्हें स्पर्श हुआ है
यूँ गोपियाँ मतवाली हो
प्रलाप करते करते
भगवद्स्वरूपरूप हो गयीं
और कृष्ण रूप ही बन गयीं
उनकी लीलाओं का अनुकरण करने लगीं



एक गोपी पूतना बन गयी
दूसरी कृष्ण
पूतना बनी गोपी ने
कृष्ण बनी गोपी को
अपने ऊपर डाल लिया
और पूतना मर गयी
पूतना मर गयी का आलाप किया
कोई गोपी शकटासुर
तो गोपी तृणाव्रत बन गयी
और प्रभु की दिव्य लीलाएं करने लगी
कोई गोपी बांसुरी  बजाने लगी
बाकी गोपियाँ उसकी प्रशंसा करने लगीं
कोई गोपी गोवर्धन धारण का अनुकरण करने लगी
और अपनी ओढनी तान कर
ब्रजवासियों की रक्षा करने लगी
कोई गोपी कालिय नाग
तो कोई गोपी कृष्ण बन
उसके ऊपर नृत्य करने लगी
कोई गोपी यशोदा
तो कोई कृष्ण बनी
और प्रभु की ऊखल लीला का
अनुसरण करने लगीं
जब लीला करते करते भी
कृष्ण का ना पता चला
तब चलते चलते एक जगह
कृष्ण चरण चिन्ह  दिखा
अवश्य ये उन्ही के चरण चिन्ह हैं
देखो ध्वजा  , कमल , बज्र
और अंकुश
जो आदि चिन्ह स्पष्ट दीखते हैं
थोडा आगे बढ़ने पर
स्त्री के चरण चिन्ह साथ दिखे
अब गोपियाँ व्याकुल हो
बतियाने लगीं
कौन बडभागिनी है जो
मोहन के मन को भायी है
किस देवी देवता की तपस्या
से उन्हें रिझायी है
जरूर उनकी प्यारी
आराधिका के चरण चिन्ह  हैं
जिसकी रज वो स्वयं
मस्तक पर धारण करते हैं
वो सखी जरूर श्यामा प्यारी है
जिनके संग मोहन प्रेमालाप करते हैं
और हम वियोगिनी सी बन
वन वन भटकती फिरती हैं
यूँ विरह वेदना में  बतियाती गोपियाँ
आगे बढती जाती हैं
कुछ दूर जाने पर
चरण चिन्ह ना नज़र आते हैं
तब गोपियों के ह्रदय में बड़ा क्षोभ हुआ
जरूर श्यामसुंदर ने अपनी प्रेयसी
कोमलांगी  राधा को कंधे पर चढ़ा लिया होगा
देखो यहाँ की बालू
कितना नीचे धंस गयी है
मालूम होता है किसी ने
कोई भारी वस्तु उठाई हो
ये देखो यहाँ फूल बिखरे पड़े हैं
और सुन्दर पत्तों का बिछौना बना है
साथ में ये जडाऊ शीशा भी पड़ा है
जरूर मनहरण प्यारे ने यहाँ बैठ
राधा का श्रृंगार किया है
उनकी वेणी में फूल लगाया है
और राधा ने शीशे में
प्यारे जू को निहारा है
तभी शीशा यहाँ पड़ा है
ये देख गोपियों का ह्रदय
विरह में विदीर्ण हुआ
मगर परीक्षित प्रभु तो आत्माराम हैं
संतुष्ट व् पूर्ण हैं
जब उनमे दूसरा कोई है ही नहीं
तब काम की कल्पना कैसी
ये तो ब्रह्म अपनी
परछाईं से खेल रहा था
शुकदेव जी ने बतलाया

क्रमश:…………

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

कृष्ण लीला रास पंचाध्यायी………भाग 65


जब प्रभु ने देखा
हाँ----ये सिर्फ मेरे लिए आई हैं
इनमे संसार की ना कोई
तुच्छ वासना रही है
अपना सर्वस्व मुझे ही
समर्पित  है किया
तब मनमोहन ने
महारास का उद्घोष किया
सभी गोपियों ने  योगमाया कृत
दिव्य वस्त्र  आभूषणों   से श्रृंगार किया
प्रभु ने अनेकों रूप बनाये
जितनी गोपियाँ
उतने कृष्ण नज़र आने लगे
मगर दूसरी को ना पता चलता था
हर गोपी को यही लगता था
कृष्ण सिर्फ मेरे संग रास रचाते हैं
कभी एक गोपी बीच में
और चारों तरफ कृष्ण
तो कभी चारों तरफ गोपियाँ
और बीच में कृष्ण
अद्भुत रूप बनाते हैं
रास रंग रचाते हैं
नृत्य गायन वादन से
इक दूजे को रिझाते हैं
कोई गोपी मुरली छीन
अपने अधरों पर रख लेती है
तो कोई गोपी गले में हाथ ड़ाल
प्रभु संग झूला, झूला करती है
अद्भुत दिव्य आनंद समाया है
कभी गोपी कृष्ण तो
कभी कृष्ण को गोपी बनाया है
प्रभु ने सभी के मनानुसार
अपना रूप बनाया है
ह्रदय से लगा सबके ह्रदय की
विरहाग्नि को बुझाया है
कभी मधुर रागिनी बजाते हैं
तो सबकी सुध बुध खो जाती है
कभी  नैन मटकाते हैं
कभी  तिरछी चितवन से
वार करते हैं
तो कभी किसी गोपी की
सुन्दरता पर मोहित होने
का स्वांग भरते हैं
मगर अपने निजरूप में
एकरस रहते हैं
ये तो गोपियों को
दिव्य आनंद देने को
मन बनाया था
वरना तो प्रभु में
मन ने ना स्थान पाया था
क्योंकि पंचतत्वों से बना ना उनका विग्रह  था
जब प्रभु गोपियों के मनानुसार
चेष्टाएं करने लगे
तब गोपियों के मन में अभिमान के
अंकुर का स्फुरण हुआ
मनहरण  प्यारे देखो हमारी
सुन्दरता पर कैसे रीझे जाते हैं
कैसे हमारे इशारों पर नाचा करते हैं
हमारे बराबर सुन्दरी तो
कोई दूसरी नहीं होगी
अब हमारी आज्ञा बिना
ना कोई कार्य करेंगे
जब गोपियों के मन में
ये अभिमान जगा
तभी प्रभु ने सारा हाल जान लिया
जब प्रभु ने देखा
गोपियाँ धर्म लज्जा छोड़
पाप दृष्टि  से देखने लगी हैं
अज्ञानता से मुझे अपना पति
समझ अंग लिपटाती हैं
तब प्रभु ने विचार किया
ये तो मेरी परम भक्त हैं
ऐसे अभिमान का बीज
यदि छोड़ दिया

जिसे जड़ से ना उखाड़ा जाए
तो कल ना जाने
कितना बड़ा वटवृक्ष बन जाये
इसे तो अभी नष्ट करना होगा
क्योंकि मुझे बाकी सब है प्रिय
सिर्फ अभिमानी ही नहीं प्रिय
ये सोच प्रभु गोपियों के
बीच से अंतर्धान हुए
गोपियाँ मोहपाश में बंधी 
ना सोच पाती थीं
जिसमे से सारे जग की
सुन्दरता निकली हो
वो कैसे उन पर रीझ सकता था
उसके प्रकाश से ही तो
उनका रूप प्रकाशित होता था
जिसकी भृकुटी के इशारे पर
ब्रह्मांड नाचा करता है
वो कैसे उनकी उँगलियों पर नाच सकता है
ये तो प्रभु  की परम
भक्त वत्सलता थी
अपने भक्त का मान रखने को
प्रभु अपने स्वामी के रूप से
नीचे उतर आये थे
और आम इन्सान बन
हास विलास करते थे
मगर गोपियाँ कुछ समय के लिए
इस सत्य को भूल गयी थीं
और गर्व कर बैठी थीं
जिसे मिटाना जरूरी था
इसलिए प्रभु राधा जी संग
अंतर्धान हुए
ये देख गोपियों के तो होश उड़े
अरे कृष्ण कहाँ गए
अभी तो यहीं थे
अरे कृष्ण कहाँ गए
अभी तो यहीं थे
इक दूजे से  पूछती फिरती थीं
जैसे मणिधर सर्प की मणि
किसी ने छीन ली हो
जैसे मीन जल बिन मचल रही हो
यूँ गोपियाँ व्याकुल  होने लगीं
जैसे किसी धनवान का सारा धन छिन गया हो
इस महादुख से गोपियाँ बौरा गयीं
इक दूजे से मनहर प्यारे का पता पूछने लगीं
कभी विरह वेदना में
दग्ध हुई जाती हैं
और कान्हा को बारम्बार बुलाती हैं
हम  तुम्हारी बिना मोल की दासी हैं
मनसा वाचा कर्मणा तुम पर न्योछावर हुई हैं
फिर कहाँ जा छुपे हो
किससे पता तुम्हारा पूछें
प्रेमाश्रु बहाती हैं 


क्रमश:………